वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है, जो कहता है कि पैसा तो पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है; मेहनत से कमाया जाता है। खाना चाहिए होता है, कपड़ा चाहिए होता है; उसकी अपनी एक जगह है। इतना कमाओ कि कहीं हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन तुम यह सोचो कि पैसे से मानसिक पूर्णता मिल जाएगी, तो यह नहीं होने वाला। और जब ये उम्मीद नहीं रहती कि पैसा पूर्णता दे देगा, तो फिर आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। सर छोटी चीज़ें जो होती हैं उनको हम जगत में पा लें तो कोई दिक़्क़त नहीं है। लेकिन बड़ी चीज़ को जगत में पाने जाओगे तो लात खाओगे, बड़ी चीज़ हमेशा भीतर ही होती है। लेकिन हम छोटी चीज़ को जाने अनजाने इसलिए पाने भागते हैं क्योंकि बड़ी उसके माध्यम से बड़ी चीज़ मिल जाए। तो क्या हमें छोटी चीज़ को पाना चाहिए भी कि नहीं?
आचार्य प्रशांत: छोटी चीज़ को छोटे की जगह देकर पा लो, उससे बड़ी उम्मीदें मत रख लेना। उदाहरण के लिए खाना है एक चीज़ हमें चाहिए शरीर की आवश्यकता है वो, ठीक है? खाना पेट भर देगा इसलिए जाके दुकान से खाना ख़रीद लो, पर खाना अगर इसलिए ख़रीदोगे कि खाना ज़िंदगी भर देगा तो ज़िंदगी तो नहीं भरेगी, तोंद भर जाएगी। मुक्ति नहीं मिलेगी इतना बड़ा घड़ा मिल जाएगा, मटकी मिल जाएगी। समझ में आ रही है बात?
छोटी चीज़ को जानो कि छोटी है और उसको छोटे ही उद्देश्य के लिए ख़रीदो। जो लोग खाने को खाने के लिए खाते हैं उनका स्वास्थ्य बनता है। जो लोग खाने को ज़िंदगी को भरने के लिए खाते हैं कि ज़िंदगी में बड़ी अभी तन्हाई है, ये है समस्या है, खाएँ, उनको मटका मिलता है। छोटी चीज़ तो हमें चाहिए पर छोटे उद्देश्य के लिए चाहिए न। छोटी चीज़ से बड़ी उम्मीदें नहीं पालते। खाना पेट भर देगा ये उम्मीद बिल्कुल जायज़ है। खाना ज़िंदगी भर देगा, ये उम्मीद बड़ी गड़बड़ है। हम छोटी चीज़ों से बड़ी उम्मीदें कर लेते हैं। ये बात गड़बड़ है। छोटी चीज़ से छोटी उम्मीद रखो, कोई समस्या नहीं है। समझ में आई है बात या बस अवाक हो?




