पैसा कितना ज़रूरी है?

Acharya Prashant

7 min
1.9k reads
पैसा कितना ज़रूरी है?
वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है, जो कहता है कि पैसा तो पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है; मेहनत से कमाया जाता है। खाना चाहिए होता है, कपड़ा चाहिए होता है; उसकी अपनी एक जगह है। इतना कमाओ कि कहीं हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन तुम यह सोचो कि पैसे से मानसिक पूर्णता मिल जाएगी, तो यह नहीं होने वाला। और जब ये उम्मीद नहीं रहती कि पैसा पूर्णता दे देगा, तो फिर आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। सर छोटी चीज़ें जो होती हैं उनको हम जगत में पा लें तो कोई दिक़्क़त नहीं है। लेकिन बड़ी चीज़ को जगत में पाने जाओगे तो लात खाओगे, बड़ी चीज़ हमेशा भीतर ही होती है। लेकिन हम छोटी चीज़ को जाने अनजाने इसलिए पाने भागते हैं क्योंकि बड़ी उसके माध्यम से बड़ी चीज़ मिल जाए। तो क्या हमें छोटी चीज़ को पाना चाहिए भी कि नहीं?

आचार्य प्रशांत: छोटी चीज़ को छोटे की जगह देकर पा लो, उससे बड़ी उम्मीदें मत रख लेना। उदाहरण के लिए खाना है एक चीज़ हमें चाहिए शरीर की आवश्यकता है वो, ठीक है? खाना पेट भर देगा इसलिए जाके दुकान से खाना ख़रीद लो, पर खाना अगर इसलिए ख़रीदोगे कि खाना ज़िंदगी भर देगा तो ज़िंदगी तो नहीं भरेगी, तोंद भर जाएगी। मुक्ति नहीं मिलेगी इतना बड़ा घड़ा मिल जाएगा, मटकी मिल जाएगी। समझ में आ रही है बात?

छोटी चीज़ को जानो कि छोटी है और उसको छोटे ही उद्देश्य के लिए ख़रीदो। जो लोग खाने को खाने के लिए खाते हैं उनका स्वास्थ्य बनता है। जो लोग खाने को ज़िंदगी को भरने के लिए खाते हैं कि ज़िंदगी में बड़ी अभी तन्हाई है, ये है समस्या है, खाएँ, उनको मटका मिलता है। छोटी चीज़ तो हमें चाहिए पर छोटे उद्देश्य के लिए चाहिए न। छोटी चीज़ से बड़ी उम्मीदें नहीं पालते। खाना पेट भर देगा ये उम्मीद बिल्कुल जायज़ है। खाना ज़िंदगी भर देगा, ये उम्मीद बड़ी गड़बड़ है। हम छोटी चीज़ों से बड़ी उम्मीदें कर लेते हैं। ये बात गड़बड़ है। छोटी चीज़ से छोटी उम्मीद रखो, कोई समस्या नहीं है। समझ में आई है बात या बस अवाक हो?

फिजिकल फुलफिलमेंट और साइकोलॉजिकल फुलफिलमेंट अलग-अलग बातें हैं। फिजिकल में फाइनेंशियल भी आ गया। वह सब अलग-अलग बातें हैं। साइकोलॉजिकल फुलफिलमेंट नहीं मिल पाएगा। मैं साइकोलॉजिकल बोल रहा हूँ और अगर उसको सटीक बोलना है तो बोलो स्पिरिचुअल; स्पिरिचुअल फुलफिलमेंट।

फिजिकल फुलफिलमेंट चाहिए होता है ले लो। किसको नहीं चाहिए ले लो, खाना चाहिए होता है, नहाना चाहिए होता है, नींद चाहिए होती है, कपड़ा चाहिए होता है, ले लो। फाइनेंसियल फुलफिलमेंट भी चाहिए होता है, किसको नहीं चाहिए। कपड़ा कहाँ से मिलेगा अगर पैसा ही नहीं होगा तो? चश्मा आप पहने हो कैसे होगा, नहीं होगा तो? ये सामने मेरे लैपटॉप रखा है, कैमरा रखा है। ये सारी बातें कैसे होंगी अगर पैसा नहीं होगा तो?

ले लो फाइनेंसियल फुलफिलमेंट, उसकी अपनी एक जगह है। लेकिन तुम ये सोचो कि पैसे से साइकोलॉजिकल फुलफिलमेंट मिल जाएगा, मानसिक पूर्णता मिल जाएगी तो ये नहीं होने वाला।

दुनिया में समस्या ये है कि लोग छोटी चीज़ से बड़ी ज़रूरत को पूरा करना चाहते हैं। वो सोचते हैं कि पैसे के माध्यम से मैं ज़िंदगी को पूरा कर लूँगा, कि मैं पैसे से पूर्णता ख़रीद लूँगा। पैसे से पूर्णता नहीं ख़रीद पाओगे। लेकिन बहुत सारी चीज़ें हैं जो तुम पैसे से ख़रीद सकते हो, उनको बेशक ख़रीदो। लेकिन उनको जब ख़रीदो तो कभी यह उम्मीद मत कर लेना कि उनसे पूर्णता मिल जाएगी। और जब ये उम्मीद नहीं रहती न, कि पैसा पूर्णता दे देगा तो आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता फिर।

हमारी सबकी सीमित ज़रूरतें हैं। पैसा चाहिए होता है, पर उतना भी नहीं जितना लोगों की कामनाएँ होती हैं हवस होती है। लोग बिलियन बिलियन डॉलर रख के बैठे हुए हैं और उनके पास ज़िंदगी का कोई उद्देश्य नहीं है। उनसे पूछो तूने कमाया क्यों? कोई उत्तर नहीं है। उत्तर यह है कि उन्हें लग रहा है कि और कमाऊँगा तो शायद भीतर की बेचैनी मिट जाए, खोखलापन भर जाए। वो भरेगा नहीं कभी डायमेंशनल डिफरेंस है न।

हम आप यहाँ ज़मीन पर कितना भी दौड़ लो आकाश पर थोड़ी पहुँच जाओगे? बहुत ज़्यादा पैसा कमाने वाला सोच रहा है कि ज़मीन पर ज़्यादा दौड़ूँगा तो आकाश पहुँच जाऊँगा। पैसा कितना भी इकट्ठा कर लो आकाश नहीं मिल जाएगा उससे। हाँ, कई बार ज़मीन पर कुछ जगहें चाहिए होती हैं, कुछ चीज़ें चाहिए होती हैं, तो ज़मीन पर दौड़ के वो जगह मिल जाएँगी, वो चीज़ें मिल जाएँगी। वो ठीक है, वहाँ तक ठीक है।

वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है जो कहता है कि पैसा तो त्याज्य वस्तु है और पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है, मेहनत से कमाया जाता है। और उसकी कुछ वाजिब उपयोगिता भी होती है। जहाँ तक उसकी एक वाजिब उपयोगिता है, पैसा ज़िंदगी में रखो। लेकिन एक बिंदु आता है और वो जल्दी आ जाता है। तुम्हें दिखाई देता है कि अब मुझे जो चाहिए वो पैसे से नहीं मिल सकता। अब उसके बाद अंधाधुंध पैसा कमाने से कुछ नहीं होगा। तो इतना कमाओ भी कि अपने काम चल सकें, कहीं हाथ ना फैलाना पड़े। लेकिन उसके ज़्यादा कमाने की कोशिश व्यर्थ है।

इसी बात को ज्ञानी लोग कैसे बोल गए? उन्होंने बिल्कुल नहीं कहा कि एकदम मत कमाओ। उन्होंने कहा, नहीं इतना तो ज़रूर कमाओ कि कुछ ज़रूरी काम हैं वो हों। लेकिन कहा उसके आगे कमाना जीवन बर्बाद करने वाली बात है, क्योंकि कमाने में समय लगता है श्रम लगता है न, जीवन लगता है पैसा कमाने में। जो पैसा तुम्हारे उपयोग का ही नहीं है उसको कमाने में तुमने जो जीवन लगाया श्रम लगाया वो जीवन की बर्बादी हो गया। “इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाए।” ये वाजिब ज़रूरत है अब बच्चा पैदा करके बैठे हो तो उसे स्कूल तो भेजना पड़ेगा।

“साहिब इतना दीजिए जामे कुटुंब समाए।” अब कुटुंब पैदा करा है तो उसकी ज़रूरतें तो पूरी करोगे, तो इतना तो कमाओ। और मैं भी भूखा ना रहूँ साधु ना भूखा जाए, तो इतना तो कमाना पड़ेगा। लेकिन इससे ज़्यादा कमाओगे तो पागल हो जाओगे। इतना ज़रूर कमाना पर इससे ज़्यादा मत कमाना। समझ रहे हो बात को?

दो तरह के विक्षिप्त होते हैं। एक जो कमाए ही जा रहे हैं और दूसरे जो पाखंडी होकर कह रहे हैं कि पैसा तो….

प्रश्नकर्ता: माया है।

आचार्य प्रशांत: मैल है हाथ का, पाप है, माया है। पैसा ना पाप है, ना पुण्य है, ना मैल है, ना मुक्ति है। ज़िंदगी की छोटी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक उपयोगी चीज़ है। वो छोटी चीज़ें आप ले आइए पैसे से। दुनिया में वो सब छोटी ज़रूरतें आपकी पूरी हो जाएँगी और उन्हें करना भी पड़ता है।

क्या नंबर है आपके चश्मे का?

प्रश्नकर्ता: थ्री।

आचार्य प्रशांत: थ्री। सोचो चश्मा टूट जाए और जेब में फूटी कौड़ी नहीं है तो क्या होगा?

प्रश्नकर्ता: कुछ दिखेगा नहीं।

आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं दिखेगा। तो ये वो ज़रूरतें हैं जिनमें पैसा आवश्यक है। ठीक है? लेकिन पैसा अंधाधुंध ख़र्च करके भी अगर मुक्ति ख़रीदना चाहोगे, सत्य ख़रीदना चाहोगे, प्रेम ख़रीदना चाहोगे तो नहीं मिलेगा। हमें पता होना चाहिए कहाँ तक पैसा उपयोगी है और उसके बाद पैसा उपयोगी नहीं है।

ना पैसे का अपमान करना, ना उसके पीछे अंधाधुंध भागना; दोनों ही बातें गलत है।

पैसे की बात हम क्यों कर रहे हैं? क्योंकि पैसा मटीरियल को ख़रीदता है। और दुनिया क्या चीज़ है? मटीरियल चीज़ है। आपने कहा ना छोटी ज़रूरतें दुनिया में पूरी हो जाती हैं। तो दुनिया माने पदार्थ मटीरियल जिसका रिश्ता पैसे से है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories