
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल, पिछले कुछ दिनों से एक वीडियो बहुत ज़्यादा चर्चा में है। कुछ मिलियंस और 10 मिलियंस के व्यूज़ हैं। उसका टॉपिक है, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” क्या भगवान होते हैं?
तो आज के टाइम पर ये हम लोगों के बीच में यह सवाल चर्चा में होना, यह हमारे बारे में और हमारे समाज के बारे में क्या बताता है?
आचार्य प्रशांत: यह बताता है कि हम एग्ज़िस्टेन्स की परिभाषा नहीं जानते। “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है गॉड पर, और बाक़ियों में सवाल लगाया नहीं। माने बाक़ियों में मान्यता यह है कि एग्ज़िस्ट माने क्या होता है यह तो मैं जानता हूँ।
क्या ईश्वर या भगवान हैं? इसमें तुमने अपनी ओर से बहस का मुद्दा किसको बनाया है? गॉड को। लेकिन किसको तुमने इग्नोर कर दिया, यह सोच के कि इसके बारे में तो पता ही है; "है"। यह एक ऑन्टोलॉजिकल डिसऑनेस्टी है।
एग्ज़िस्टेन्स माने क्या? यह छोड़ो बाद में कि गॉड माने क्या, पहले बताओ एग्ज़िस्टेन्स माने क्या? हाउ डू यू कन्फ़र्म समथिंग ऐज़ एग्ज़िस्टेन्ट? पहले एग्ज़िस्टेन्स पर तो क्लैरिटी हो जाए ना, फिर हम जाएँगे कि गॉड माने क्या। पर लोग बहस करे जा रहे हैं, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट? डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?”
व्हाट डज़ इट मीन टू एग्ज़िस्ट? एग्ज़िस्ट माने क्या?
इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं हवाई फ़ायर, उसका कुछ लेना-देना नहीं। बेकार की बात, दोनों तरफ़ से।
प्रश्नकर्ता: सर, आज कहते हैं साइंस और टेक्नोलॉजी के ज़माने में, जहाँ पर लोग ये सवाल हमें लगा था भूल चुके हैं करना, और या तो फिर वो नास्तिक हो चुके हैं। मैं भी एक टाइम पर नास्तिक हो चुकी थी। वहाँ पर फिर से ये सवाल अगर उठ रहे हैं, तो क्या ये एक शुरुआत है जानने की, कि व्हाट इज़ गॉड?
आचार्य प्रशांत: अरे भैया, वो सवाल उठेगा ही उठेगा। क्योंकि अगर आप स्वयं को नहीं जानते, तो यूनिवर्स ड्यूलिस्टिक तो लगेगा ही। साइंस भी ड्यूलिस्टिक है। साइंस कहती है, दो रियलिटीज़ हैं; एक वो जो दिख रही है, और एक वो जो इधर से देख रही है। साइंस भी ड्यूलिस्टिक है। वो लगेगा ही। और जब लगेगा, तो आप कितने भी मॉडर्न हो जाएँ, एडवांस हो जाएँ आज से सौ साल बाद भी आप ये कहोगे, तो फिर इसको (अपनी ओर इंगित करते हुए) और इसको (बाहर की ओर इंगित हुए) बनाया किसने?
तो फिर वो जो गॉड क्वेश्चन है, वो सदा प्रज्वलित रहेगा। हमेशा रहेगा, जब तक आप ड्यूलिटी की जड़ में नहीं घुस जाते कि यह ड्यूलिटी भी सच है कि नहीं?
अरे भैया, मैं हूँ और यह दुनिया है क्योंकि यह दुनिया मुझे दिखाई दे रही है, तो सबको यह सवाल उठेगा। यह बात कोई पिछड़ेपन से नहीं है। एकदम जो मोस्ट मॉडर्न आदमी होगा, यहाँ तक कि जो साइंटिस्ट होगा, उसको भी यह सवाल उठेगा कि फिर इन दोनों को बनाया किसने? तो फिर उसमें एक फ़िल-इन-द-ब्लैंक की तरह जो गॉड कॉन्सेप्ट है, वो आ जाएगा। कि मैं हूँ, यह है, हम दोनों को किसी ने तो बनाया होगा।
मैं हूँ, यह है और एक असम्प्शन है। अब इनको रिकन्साइल करने के लिए कुछ चाहिए, तो फिर वहाँ गॉड आएगा। कौन-सा गॉड? द क्रिएटर गॉड। अब इसमें ट्रुथ कहीं नहीं है। सत्य ही परम है, यह बात कहीं नहीं है। अब यहाँ पर क्या किया गया है, कि कहा गया है, मैं ही परम हूँ। क्योंकि मैं तो हूँ। एक सच्चाई यह है, एक सच्चाई यह (अपनी तरफ़ इंगित करते हुए) है और इन दोनों सच्चाइयों को फिर बनाने वाला भी कोई होना चाहिए। क्योंकि दुनिया में जो कुछ है, उसे किसी ने बनाया है तो दुनिया को भी किसी ने बनाया होगा।
जो साइंटिस्ट है, वह भी बिग बैंग पर जाकर रुक जाएगा। वह कहेगा, बिग बैंग से पहले क्या था? बिग बैंग से पहले क्या था? तो फिर गॉड, गॉड; गॉड एक कन्वीनिएंट फ़िल-इन-द-ब्लैंक है, तब तक जब तक कि आप दर्शन में प्रवेश न करो और कहो, कि मैं और यह क्या अलग-अलग हैं? क्या मुझसे अलग इसका कोई अस्तित्व भी है? क्या इससे अलग मेरा कोई अस्तित्व है? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह प्रश्न जिसको उठ रहा है वही मिथ्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्य इस प्रश्न के मिटने में निहित है?
प्रश्नकर्ता: पर ऐसा भी तो हो सकता है। एक टाइम पहले जहाँ पर लोग बोलते थे कि गॉड तो होता ही है। यह मानते थे।
आचार्य प्रशांत: अरे, होता माने क्या?
प्रश्नकर्ता: बट आज वहाँ सवाल कर रहे हैं। कम से कम थोड़ा तो बहस।
आचार्य प्रशांत: वो सवाल करके भी बस यही कहेंगे अधिक से अधिक, कि ड्यूलिटी है पर वो अनकॉज़्ड ड्यूलिटी है। वह भी अभी अंधविश्वास में है। जो अपने आप को एथिस्ट बोलते हैं, वो भी घोर अंधविश्वासी हैं।
देखो, वेदान्त विशेष इसलिए है क्योंकि वो आस्तिक होने को और ईश्वरवादी होने को अलग-अलग कर देता है। वो कहता है, तुम्हें आस्तिक होना है, ईश्वरवादी होना ज़रूरी नहीं है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा सत्य ही गॉड है। तुम अगर कहोगे भी कि गॉड वहाँ (बाहर की ओर इंगित करते हुए) है, तो मैं कहूँगा नहीं, गॉड यहाँ (अपने भीतर इंगित करते हुए) है। सत्य ही गॉड है, ट्रुथ इज़ गॉड। यह वेदान्त है। समझ में आ रहा है?
और बाक़ी जगहों पर यह नहीं कहा गया है। वहाँ पर एथिस्ट बोल करके सब कुछ एक झटके में हटा दिया गया है। “मैं तो एथिस्ट हूँ। मैं नहीं मानता।” क्या नहीं मानते? तुम गॉड को नहीं मानते, ट्रुथ को नहीं मानते? जब आप कहते हो मैं एथिस्ट हूँ, तो माने आप किसको रिजेक्ट कर रहे हो? गॉड को या ट्रुथ को? गॉड को तो तुम ला सकते हो बहस में, पर ट्रुथ को रिजेक्ट कर सकते हो क्या?
जो ट्रुथ को रिजेक्ट न करे, उसे आस्तिक कहते हैं। वेदान्त दर्शन आस्तिकता का है। ईश्वरवाद बिल्कुल अलग चीज़ है।
हाँ, अब लोकधर्म में क्या हो गया है कि ईश्वरवादिता को ही आस्तिकता मान लिया गया है। पर ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है, आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है। सही बात तो यह है कि ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। क्योंकि सत्य को समर्पित नहीं हैं वो।
आस्तिक वो है, जो सत्य को समर्पित हो। समझ में आई बात?
यह प्रश्न हमेशा बना रहेगा। आप जब तक ड्यूलिटी के पार नहीं चले जाते, आप अंधविश्वासी ही रहोगे। ईगो इज़ द फ़र्स्ट सुपरस्टिशन। और ईगो कहाँ है? इस यूनिवर्स में। तो जब तक यह ड्यूलिटी है कि देयर इज़ द ईगो, देयर इज़ द यूनिवर्स, यू आर सुपरस्टिशियस इवन इफ़ यू आर अ साइंटिस्ट।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। ये जो सवाल या जो ये बात है, बहुत क्रूड लगेगी। बट ये मैं रोज़ या हर पल आई कैन से फ़ेस करती हूँ। आई ऐम अ लेक्चरर। आई टीच सीए, सीएमए, सीएस स्टूडेंट्स, लॉ एंड मैनेजमेंट।
अभी आज की जो पीढ़ी है, आज का जो युवा है, वो ना ही तो लोकधर्म को मानना चाहता है और ना ही गीता को मानना चाहता है। इट्स नॉट अबाउट इग्नोरिंग। इट्स अबाउट नॉट एकनॉलेजिंग ओनली। उसे ऊपर या नीचे रखने की बात ही नहीं है। उसे टोटली एकनॉलेज ही नहीं करना चाहता। उनका भी जो एटीट्यूड है, पैसा। जिनके पास पैसा।
आचार्य प्रशांत: आपने गलत डायग्नोस किया है। गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो यह जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण, सब एक है। और वो जो चलती है रावण संहिता, उनके लिए सब एक है।
वो कहते हैं, जो कुछ भी संस्कृत में लिखा है, वो सब एक ही बात है। जो कुछ भी संस्कृत में लिखा है, वो सब बिल्कुल एक ही बात है। चाहे वो केनउपनिषद् हो कि मनुस्मृति हो, दोनों एक हैं, क्योंकि दोनों पुरानी बातें हैं और दोनों संस्कृत में लिखी हुई हैं। तो अगर हम ठुकराएँ, तो सबको ठुकरा देंगे।
प्रश्नकर्ता: राइट, आचार्य जी। तो अभी उनका जो एटीट्यूड है वो चार्वाक फ़िलॉसफ़ी थी न, हेडोनिज़्म।
आचार्य प्रशांत: उन्होंने पढ़ी है?
प्रश्नकर्ता: नहीं फ़िलॉसफ़ी तो वो वही एक्चुअली जीते हैं।
आचार्य प्रशांत: नहीं जीते, भाई। चार्वाक कोई जेन-ज़ी थोड़ी थे।
प्रश्नकर्ता: लेकिन उनका जो एटीट्यूड है आज की लाइफ़ का, वो यही है कि पैसा कमाएँ। सीए की पढ़ाई में मज़ा नहीं आता।
आचार्य प्रशांत: वो एटीट्यूड हर उस व्यक्ति का होगा, जिसकी ज़िंदगी का कोई दार्शनिक आधार नहीं होगा। वो डिफ़ॉल्ट एटीट्यूड है। वो जेन-ज़ी का नहीं है, वो इंसान का सदा से रहा है। हम पैदा ही ऐसे होते हैं, जेन-ज़ी को काहे को दोष दे रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: नहीं, मतलब मैं जिनसे मिलती हूँ, युवा पीढ़ी से बातचीत करती हूँ।
आचार्य प्रशांत: सब ऐसे ही थे।
प्रश्नकर्ता: हाँ, हम सब ऐसे ही हैं, बराबर। तो एक सवाल जो है, आपने कहा; मतलब हम जान गए हैं अभी कि आत्मा नहीं होती और पुनर्जन्म नहीं होता है। तो वो एक सवाल करते हैं, तो फिर हम एंजॉय क्यों न करें लाइफ़?
आचार्य प्रशांत: इस तरीके से आप बोलोगे न, आत्मा नहीं होती, पुनर्जन्म नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: नहीं, नहीं, हम जब डिस्कस।
आचार्य प्रशांत: तो यही हो गई न गड़बड़। मैंने कहा है, पुनर्जन्म नहीं होता? मैंने बोला? बोलो। घंटा भर समझाया है कि होता है।
प्रश्नकर्ता: प्रकृति है, और प्रकृति रूप बदलती है और आती है।
आचार्य प्रशांत: आपने ऐसे समझाया? प्रकृति है, समष्टि है, लहरें हैं। समझाया?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो क्वेश्चन मुझे पूछते हैं न, वो ये पूछते हैं कि आज ग्लोबल वॉर हो रहे हैं। आज क्लाइमेट चेंज में जो तबाही मचा रहे हैं, उनका क्या होगा? वो तो एंजॉय कर रहे हैं। मतलब जो सफर कर रहा है, वो तो ग़रीब है।
आचार्य प्रशांत: आप ये बताइए न, ये सवाल आपसे पूछा जाता है। ये सवाल तो मुझसे भी पूछा गया। मुझसे भी पूछा गया, मैं उसका वही जवाब देता हूँ जो आप देते हो? या मैं सवाल को पकड़ करके पहले उसके मूल तक लेकर आता हूँ? अभी पिछले ही सत्र में समझा रहा था कि आप हमेशा हारोगे, जब आप क्वेश्चनर का पैराडाइम एक्सेप्ट कर लोगे। जब आप उससे उसी के अखाड़े में लड़ने जाओगे और हमेशा हारोगे।
जब आप कहोगे कि मुझे तेरा फ़्रेमवर्क स्वीकार है, मुझे तेरे क्वेश्चन की फ़ाउंडेशनल असम्प्शन स्वीकार है, और अब मैं जवाब दूँगा, तो आप हमेशा हारोगे। स्वीकार नहीं करना होता है। वह जो बोल रहा है, उसके पीछे जो धारणा है, जिस केंद्र से प्रश्न उठ रहा है, पहले उसको उखाड़ना होता है। तब जाकर आप कुछ समझा पाओगे। नहीं तो कुछ नहीं समझा सकते।
मैंने कितने तो उदाहरण दिए थे, याद है पिछले सत्र में? आप वो करते नहीं हो। आप फँस जाते हो। क्यों? क्योंकि आप अभी भी भीतर-भीतर, भले ही आप गीता में हो पर भीतर-भीतर आप अभी भी उसके पैराडाइम को, उसके चौखटे को, उसके फ़्रेमवर्क को स्वीकार करते हो। तो जब वो वहाँ से आकर आपसे कुछ बोलता है, तो फिर आप निरुत्तर हो जाते हो कि आप क्या जवाब दें, फँस गए, फँस गए, फँस गए।
ये बहुत होता है हमारे यहाँ। आप अपने घर में होते हो, समाज में होते हो, दफ़्तर में होते हो, और वहाँ आप पहुँच जाते हो गीता-ज्ञान बताने के लिए। कई-कई लोग तो सोशल मीडिया पर भी ये कर चुके हैं। कहते हैं, हम जा रहे हैं वहाँ पर गीता-ज्ञान बताएँगे, बहस करेंगे, डिबेट करेंगे, यूट्यूब पर, फ़ेसबुक पर, कहीं जाकर। और वहाँ चीथड़े उड़ गए।
क्यों उड़ गए?
क्योंकि तुम क्वेश्चनर के पैराडाइम को स्वीकार करके फिर जवाब देने की कोशिश कर रहे हो। तुम उसके प्रश्न की बुनियाद में जो भूल है, उसको ही पॉइंट-आउट नहीं कर पा रहे हो। मैंने आज कहा कि मूर्खता होगी कहना, आत्मा क्या है? है न? आत्मा क्या है? मैंने बताया था। क्यों? क्योंकि पूछ सकते हो कि टोपा क्या है? हेडफ़ोन क्या है? मूँछ क्या है? नाक क्या है? बाल क्या है? जूता क्या है? पूछ सकते हो, क्योंकि ये क्या है? ऑब्जेक्ट्स हैं।
टोपा है, कह सकता हूँ, क्योंकि क्या है? उतार दो। टोपा ऑब्जेक्ट है इसीलिए कह पाया कि, है। और ऑब्जेक्ट है, इसीलिए कह पाया कि?
श्रोता: उतार दो।
आचार्य प्रशांत: अरे नहीं यार, नहीं है। आप (टोपी पहने श्रोता की ओर इंगित करते हुए) खड़े हो जाओ। है, (टोपी को इंगित करते हुए।) क्यों कह पाया? क्योंकि?
श्रोता: नहीं है।
आचार्य प्रशांत: अरे यार, क्यों कह पाया कि है?
श्रोता: ऑब्जेक्ट है।
आचार्य प्रशांत: (श्रोता को टोपी उतारने का इशारा देते हुए) नहीं है। क्यों कह पाया कि नहीं है?
श्रोता: ऑब्जेक्ट है।
आचार्य प्रशांत: क्योंकि ऑब्जेक्ट है। और दीदी, आप जाकर बोलते हो आत्मा नहीं है। तो आपने भी आत्मा को क्या बना दिया?
श्रोता: ऑब्जेक्ट।
आचार्य प्रशांत: इसलिए आप अपने छात्रों को कुछ नहीं समझा सकते, क्योंकि अभी आपको बात समझ में ही नहीं आई है।
जितनी बड़ी गलती वह कर रहा है जो कहता है कि आत्मा है, उतनी ही बड़ी गलती वह कर रहा है जो कह रहा है कि आत्मा नहीं है। क्योंकि दोनों ही उसे ऑब्जेक्टिफ़ाई कर रहे हैं। और अध्यात्म सब्जेक्ट के बारे में है। क्योंकि दुःख सब्जेक्ट को है, तड़प मैं रहा हूँ, मैं आत्मा को ऑब्जेक्ट काहे को बना रहा हूँ, यार। ऑब्जेक्ट से क्या लेना-देना? बात सारी सब्जेक्ट की है, क्योंकि सफ़रिंग सब्जेक्ट की है।
आप जाकर के इधर-उधर, बिना मुझे समझे, मेरी बात को दूसरों के सामने ले आते हो, बहस करते हो। तो फिर वहाँ कपड़े फट जाते हैं। बदनामी मेरी कराते हो। समझा मुझे है नहीं। नाम वहाँ मेरा बड़ा-बड़ा लगा दिया, जैसे मैंने आपको अधिकृत करा हो, रिप्रेज़ेन्टेटिव बनाया हो अपना कि जाओ और।
आ रही है बात समझ में? पूरा सोशल मीडिया भरा हुआ है। आत्मा नहीं है कहना भी उतना ही गलत है, जितना गलत है कहना कि आत्मा है। पुनर्जन्म नहीं है, ये कहना भी उतना ही गलत है, जितना कहना कि पुनर्जन्म है। गलती कहाँ है? गलती इस मान्यता में है कि कोई है, जिसका पुनर्जन्म या तो होता है या नहीं होता है।
जब आप कहते हो पुनर्जन्म होता है, तो भी आप किसको मान रहे हो? अहंकार को, यार। और किसको मान रहे हो? थोड़ा शार्प तेज़ी से चलो। आप कहते हो पुनर्जन्म होता है तो भी आपने किसको मान लिया? अहंकार को, कि अहंकार है और वो दूसरे शरीर में चला गया।
जब आप कहते हो पुनर्जन्म नहीं होता है, तो भी आपने किसको मान लिया? कि अहंकार है, पर वो दूसरे में नहीं जाता। तो ये दोनों ही बातें बराबर की गलत हैं। पर आप जनता के सामने आकर ऐसे बोलते हो, जैसे आचार्य जी बोलते हैं कि पुनर्जन्म नहीं होता। अब पटके जाओगे, और नाम किसका ख़राब कर रहे हो? मेरा। और मेरा हो तो हो और किसका ख़राब कर दिया? वेदान्त का नाम ख़राब कर रहे हो।
बहसें होती हैं गॉड है कि गॉड नहीं है, थीस्ट वर्सेस एथीस्ट। दोनों ही पगले हैं, क्योंकि दोनों ही यह नहीं पूछ रहे कि किस फ़ाउंडेशन पर तुम क्या बात कर रहे हो। गॉड माने क्या? एपिस्टेमिक इन्क्वायरी है ही नहीं, और बहस चल गई दो घंटे। भागे जा रहे हैं, भागे जा रहे हैं बिना ये देखे कि पाँव के नीचे ज़मीन है कि नहीं।
जैसे कार्टून में होता था कई बार, कि वो यहाँ से दौड़ता हुआ आएगा और आगे भागता जा रहा है, हवा में ही। और फिर नीचे देखेगा ज़मीन नहीं, तब गिर जाएगा। लंबी-चौड़ी बहस चल रही है, बिना यह देखे कि तुम्हारी बहस का कोई फ़िलॉसॉफ़िकल बेसिस ही नहीं है।
सत्य नहीं हारता, सत्यमेव जयते। सत्य के पक्ष में या सत्य के प्रतिनिधि बनकर अगर आप खड़े हो और आपको हारना पड़ रहा है, तो इसका मतलब आप सत्य से बहुत दूर हो। सत्य के साथ होते तो हारना नहीं पड़ता।
प्रश्नकर्ता: सर, मेरा नाम माधुरी है। मैं बचपन से स्वाध्याय परिवार से जुड़ी हूँ जो गीता से जुड़ा है। तो उसमें एक बात सिखाई थी हमें, कि गीता इज़ नॉट ओनली द स्क्रिप्चर ऑफ़ हिन्दूइज़्म। गीता इज़ अ स्क्रिप्चर ऑफ़ ह्यूमैनिटी।
तो सर, बचपन से मतलब मुझे सच्चाई के साथ रहने की आदत है। तो जब भी हम लोगों के साथ इस चीज़ को; आपने बोला, ‘तो?’ सवाल करो। तो मुझे आदत ही है। कोई कुछ बोले, तो, ‘तो?’ जब हम ऐसा बोलते हैं सच, तो लोगों को चुभता है। आपने अभी ईगो की बात की, आत्मा-अवलोकन। वह तो ठीक है, ख़ुद के बारे में। जब हम सच बोलते हैं, तो लोग बोलते हैं कि “अरे, इसमें तो ईगो है। इसका ईगो हर्ट होता है, इसलिए इतना एक्सप्लेनेशन करती है।”
या फिर मतलब वो पूरा झुंड बना देते हैं। हाँ तो पूरा अकेले-अकेला मतलब ये करते हैं। तो ऐसे लोगों के साथ कैसा बिहेव करें? मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: ‘तो?’ उन्हें चुभता है, ‘तो?’ न, न यह मुहावरेबाज़ी नहीं हो रही, हँसी-मज़ाक नहीं हो रहा। ‘तो’ का संबंध उनसे नहीं तुम्हारे स्वार्थ से है। तुम्हारी समस्या ये नहीं कि उन्हें चुभता है। तुम्हारी समस्या ये है कि उन्हें अगर चुभेगा, तो वो तुम्हारा नुकसान कर देंगे, इसलिए डरते हो। ये जो ‘तो’ है न, ये उनसे नहीं पूछा जाता, ख़ुद से पूछा जाता है। “हाँ, मैं सच बोल रहा हूँ, उसको चुभ रहा है, ‘तो?’ मुझे मुक्त होना चाहिए इस आशा से कि तुम मेरा नुकसान न करो। तुम्हें चुभता है तो चुभे। मैं जानता हूँ मैं कौन हूँ। मेरा तुम नुकसान कर नहीं सकते।”
यह सब बात, कि “मैं लोगों को सच बताती हूँ, पर लोगों को बुरा लग जाता है तो क्या करें?” अरे यार, सच नहीं बुरा लगता। सच के आगे झूठ मिटता है। ऐसी सी बात है कि रोशनी से अँधेरे को बुरा लग जाता है, तो क्या करें? कुछ हो सकता है इस बात का? इसका स्वभाव है प्रकाशित करना। उसकी प्रकृति है, अँधेरापन। इसमें कुछ पूछ-पूछने से क्या होगा?
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। जैसा कि हम जानते हैं कि यहाँ पर अभी बात चल रही थी कि हम जो भी क्वेश्चन-एंड-आंसर्स की बात चल रही थी, कि जो भी अब स्टूडेंट्स हैं, वो क्वेश्चन करते हैं। मेरा हमेशा से यही आता है कि अगर कोई ऐसे कुछ भी अंट-शंट आंसर-क्वेश्चन बात करता है कोई, तो उसका रिप्लाई क्यों ही देना है?
न प्रेम है, न ईगो, ईगो वाली बात नहीं रही कि मतलब मेरे को जीतना है इससे। और न ही उस बंदे से इतना कुछ लगाव सा है, तो क्यों ही आंसर देना किसी को?
आचार्य प्रशांत: अगर जो कह रहे हो, वो सब नहीं है तो उत्तर मत दो। पर कुछ लोगों को प्रेम होता है, इस नाते उत्तर देना चाहते हैं। जो तुम कह रहे हो, वो मैं भी कह सकता हूँ, कि इनके जवाब क्यों दूँ? फँस गए।
प्रश्नकर्ता: सर, जो तर्क में हम हार जाते हैं। यूज़ुअली एक टाइम आता है कि वो सब कन्विन्स हो जाते हैं। और एक उसके बाद फिर उनको लगता है, कि उसके बाद फिर संख्या-बल का एक स्तर आता है, कि उनकी संख्या ज़्यादा रहती है। अगर मैं तर्क में जीत भी जाऊँ। और दूसरी जगह जहाँ हम जीत नहीं पाते हैं। तो मतलब यह पैराडाइम शिफ़्ट मतलब एक तो बेसिक्स क्लियर होना। यह सिंपली बोल सकते हैं?
या फिर मतलब एक बेसिक्स जैसे इन द लाइट ऑफ़ वेदान्त, जैसे गीता समझी जाए इन द लाइट ऑफ़ वेदान्त। तो बेसिक्स अगर हमारे क्लियर हों, जैसे आपने बोला, तो ये मतलब हमसे क्यों नहीं हो पा रहा है? तर्क क्यों नहीं? पैराडाइम शिफ़्ट क्यों नहीं हो रहा है?
आचार्य प्रशांत: आपने शुरुआत करी थी कि अगर पैराडाइम शिफ़्ट हो जाए तो ऐसा-ऐसा होता है। फिर आप कह रहे हो, पैराडाइम शिफ़्ट क्यों नहीं हो पा रहा है? हो पा रहा है कि नहीं हो पा रहा है?
प्रश्नकर्ता: नहीं समझ में आ रहा है, सर।
आचार्य प्रशांत: पैराडाइम शिफ़्ट नहीं करना होता, पैराडाइम समझना होता है। जब कोई प्रश्न कर रहा हो, तो उसके प्रश्न के केंद्र में, हर क्वेश्चन के पीछे कुछ फ़ॉल्सनेस होगी। क्योंकि सत्य तो सवाल पूछता नहीं न। सवाल के लिए कंट्राडिक्शन चाहिए। इतना समझ में आ रहा है। वरना सवाल क्यों उठेगा? और स्पष्टता के बाद सवाल तो बचता नहीं है। तो हर सवाल के पीछे एक झूठ होता है, उस झूठ को उघाड़ना होता है।
पर सवाल बन के ऐसे खड़ा होता है जैसे, मैं?
श्रोता: सच हूँ।
आचार्य प्रशांत: भाई, सवाल को जवाब नहीं चाहिए होता। सवाल को डिसोल्यूशन चाहिए होता है। सवाल को उत्तर नहीं, आईना चाहिए होता है ताकि सवाल मिट जाए। क्योंकि हर सवाल झूठा है।
सवाल की डेफ़िनिशन ही यही है, दैट वीच इज़ असेर्टिंग अ कंट्राडिक्शन एंड सेइंग, नाउ आंसर। द आंसर लाइज़ इन एक्सपोज़िंग द कंट्राडिक्शन, नॉट आंसरिंग इट।
बिकॉज़ इन आंसरिंग इट, यू आर एक्सेप्टिंग इट। उस कंट्राडिक्शन को एक्सेप्ट कर लिया तो क्या तुमने आंसर दिया? देन नाउ द क्वेश्चन हैज़ बीन एक्सटेंडेड, नॉट आंसर्ड।
प्रश्नकर्ता: तो सर, इसमें यह बिलीफ़ सिस्टम हमारे, मतलब दिमाग पर इतनी छाई है, डीप कंडीशन्ड हो गई है कि हम यह ऑलरेडी मान चुके होते हैं कि हम गलत हैं। और उसका पैराडाइम करेक्ट है। और उस हिसाब से हम बहते चले जाते हैं उसमें।
आचार्य प्रशांत: ये बात हुई न, हाँ। आपके भीतर हीन-भावना बैठी है। आप कहीं-न-कहीं पहले माने बैठे हो कि बात तो उसकी सही है। लेकिन फिर भी आचार्य जी कुछ बोलते हैं, वो इम्प्रेसिव लगता है। तो मैं उससे बहस कर लेता हूँ। अब पिटोगे नहीं तो क्या होगा? तुम पिटोगे नहीं तो क्या होगा? बोलो।
आप ये नहीं देख पा रहे कि वो जहाँ खड़ा है, उसकी फ़ाउंडेशन में क्या गलती है। क्यों? क्योंकि उसकी फ़ाउंडेशन पर तो आप भी खड़े हो, आप अलग हुए ही नहीं अभी तक। भीतर से आप उसी के जैसे हो। और भीतर से उसी के जैसे रहते हुए आप उससे हारोगे ही।
प्रश्नकर्ता: कल का एक सिंपल इंसिडेंट है, सर। दो मिनट में बताना चाहता हूँ। क्रॉसवर्ड में जो बुक-साइनिंग का इवेंट था, वहाँ पर मैंने मेरी सोसाइटी में जो रहते हैं, वो एक क्लोज़ फ़्रेंड है। पर वो एक तर्क के बेसिस पर मुझसे सिमिलर विचार रखते हैं। पर वो अभी तक आपसे जुड़ नहीं पाए। तो उनको मैंने इनवाइट किया था, और वो आए थे। अभी वहाँ पे एक आत्मावलोकन जैसा हुआ क़िस्सा।
आचार्य प्रशांत: क़िस्सा नहीं, वक़्त नहीं है। मैं सुना देता हूँ क़िस्सा। आप हैं, आप यहाँ बैठे हैं, आधी रात हो गई। आप घर जाते हैं। घर में कोई पिता, माता, पत्नी, आपसे कहती हैं कि “कौन तुम्हारे ज़्यादा क़रीब का है? मैं कि आचार्य?” आप हारोगे? क्यों हारोगे? बताओ। क्योंकि निकटता की वही परिभाषा जो वो लेकर आए हैं, आपने भी स्वीकार कर रखी है। अब आप हार गए, आपका मुँह बंद हो जाएगा।
अभी आप यहाँ से जाओगे इतना गीता वग़ैरह पढ़ के, घर में अभी बीवी खड़े हो के बोलेगी, “बताओ, तुम्हारा ज़्यादा सगा कौन है, मैं कि आचार्य?” आप ऐसे (चुपचाप खड़े होकर देखना)। क्योंकि सगेपन की आप उनकी ही परिभाषा पहले स्वीकार कर चुके हो। पहले उनकी पैराडाइम, जो उनकी मान्यता है उसको चुनौती दो कि सगा माने?
श्रोता: क्या?
आचार्य प्रशांत: अब होगी बात। नहीं तो बस अपना-सा मुँह लेकर आ जाना, कि नहीं है तो वही अपने न, अपने तो अपने होते हैं।