मैं हूँ और यह दुनिया है, तो सबको यह सवाल उठेगा कि, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है ‘गॉड’ पर। यह छोड़ो कि गॉड माने क्या, पहले बताओ ‘एग्ज़िस्टेन्स’ माने क्या? इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं, बेकार की बात, दोनों तरफ़ से। आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है, ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा, सत्य ही गॉड है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल, पिछले कुछ दिनों से एक वीडियो बहुत ज़्यादा चर्चा में है। कुछ मिलियंस और 10 मिलियंस के व्यूज़ हैं। उसका टॉपिक है, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” क्या भगवान होते हैं?
तो आज के टाइम पर ये हम लोगों के बीच में यह सवाल चर्चा में होना, यह हमारे बारे में और हमारे समाज के बारे में क्या बताता है?
आचार्य प्रशांत: यह बताता है कि हम एग्ज़िस्टेन्स की परिभाषा नहीं जानते। “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है गॉड पर, और बाक़ियों में सवाल लगाया नहीं। माने बाक़ियों में मान्यता यह है कि एग्ज़िस्ट माने क्या होता है यह तो मैं जानता हूँ।
क्या ईश्वर या भगवान हैं? इसमें तुमने अपनी ओर से बहस का मुद्दा किसको बनाया है?



