किसी को समझाने की ज़िद?

Acharya Prashant

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किसी को समझाने की ज़िद?
आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरी उम्र 22 वर्ष है और मैं अभी एम.एस.सी. क्लीनिकल साइकोलॉजी पढ़ रही हूँ। मेरा प्रश्न ज्योतिष से संबंधित है। मेरे फ़ादर ने वॉलंटरी रिटायरमेंट ली, जिसके लिए उन्हें मैंने ही काफ़ी मतलब उनसे बातचीत की थी, क्योंकि वो अपनी हेल्थ का ख़्याल नहीं रख पा रहे थे। पर वॉलंटरी रिटायरमेंट के बाद का प्लान उनका ज्योतिष सीखना था। तो वो चीज़ देख के मैंने उन्हें काफ़ी; अभी भी मतलब मैं उनसे बात करती हूँ, उन्हें थोड़ा तर्क-वितर्क करती हूँ ताकि उन्हें समझ आए कि ये चीज़ें ठीक नहीं हैं।

तो वो मुझे ये रीजन देते हैं, जैसे उनका पेट बढ़ा हुआ है, तो मैं उन्हें कहती हूँ कि आप वॉक पर जाइए या जिम जॉइन कीजिए। तो वो मुझे बोलते हैं, कि नहीं, ये मेरे पुराने जन्म के कर्म होंगे, मैं कुछ कर नहीं पा रहा। और ये मेरे पुराने जन्म के संस्कार हैं, जो मुझे कसरत नहीं करने दे रहे। और वो मुझे ज्योतिष से ये भी रीजन निकाल के देते हैं, कि ये देख, मेरा गुरु बलवान है और उन लोगों का तो पेट भी बड़ा ही होता है।

और मैं जब उन्हें ये बोलती हूँ, कि आप ये सिर्फ़ एक्सक्यूसेज़ दे रहे हो, आप वॉक करने जाओ, थोड़ा मेहनत तो करो, तो वो मुझे कह देते हैं कि मैं कोशिश तो देख करता ही हूँ। वो नहीं करते, पर वो सारे एक्सक्यूसेज़ इधर-उधर से खोज के ला के देते हैं। और एक डिस्कशन में जब वो मुझसे लॉजिकली बात कर रहे थे, और उन्हें कोई और लॉजिक नहीं मिल रहा था, तो वो मुझे ये कहने लग गए कि तुम तो अब बदतमीज़ हो गई हो, मुझसे बस बहस करना आ गया।

आचार्य प्रशांत: पिछले जन्म के संस्कार हैं आपके।

आयन रैंड का बहुत मस्त वक्तव्य है, “इफ़ यू वॉन्ट टू एक्सपोज़ अ फ्रॉड, पार्टिसिपेट फ़ुली इन इट।” अब कुछ भी करिए आप घर में, जितने तरह का उपद्रव हो सकता है सब करिए। और जैसे ही कोई पूछे तो बोलिए, “पिछले जन्म के संस्कार हैं, मैं क्या करूँ?” समझ में आ रही है बात?

चीज़ें गिरा दीजिए, तोड़ दीजिए सब, जितना सब ख़राब करना हो कर दीजिए। “संस्कार है, मैं क्या इसमें करूँ?” गरमा-गरम पानी, एकदम उबलता पानी प्लास्टिक की बोतल में डाल दीजिए और वो भी फूल जाएगी। बोलिए, “इसका गुरु बलवान है, मैं क्या करूँ?”

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वो मुझे आजकल ये भी कहते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि मैं आपको बहुत ज़्यादा सुनती हूँ, एंड कहीं-न-कहीं वही रीजन थे कि मैंने आपको सुनना शुरू किया था, पर मैं अब जानती हूँ कि वो आपको सुनना क्यों बंद कर चुके हैं। पर वो मुझे ये बोलने लगे हैं, कि “बिल्कुल तुम अपने आचार्य जैसी भाषा बोलने लगी हो; तीखी, तेज़-तर्रार।”

आचार्य प्रशांत: वो भी क्या करें, उनके पिछले जन्म के संस्कार हैं। और मैं भी क्या करूँ, मेरे भी पिछले जन्म के संस्कार हैं।

श्रोता: आचार्य जी, ये तो कॉम्प्लीमेंट हो गया, मुझे लगता है हम सबका; “बदतमीज़ हो तुम।” मेरे को भी मिला है, कि “बदतमीज़ होते जा रहे हो तुम।”

आचार्य प्रशांत: ठीक है कि नहीं है मामला?

प्रश्नकर्ता: मेरा मेन क्वेश्चन है, वो मैं थोड़ा यहाँ हेल्पलेस फ़ील करती हूँ, कि मैं उन्हें क्यों किसी सही रास्ते की तरफ़ ले जा नहीं पा रही हूँ?

आचार्य प्रशांत: आप कोई नहीं है, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। आप हो कौन? इतना समझाया न अभी। दो ही चीज़ें हैं, ये है इसके लिए ये दोनों हैं (बीच में अहंकार उसके एक तरफ़ प्रकृति और एक तरफ़ आत्मा)। ये चाहेगा तो सुधरने की तरफ़ जाए और ये चाहेगा तो गिरने की तरफ़ जाए। आप क्या कर लोगे?

और वेदांत ने तो सुधरने की एक ही विधि बताई है, क्या? दर्पण; तो दर्पण बन जाइए न। वो जैसे हैं आप बिल्कुल वैसे ही बन जाइए, उनको आप में अपना चेहरा दिखाई दे।

सारी फ़िज़ूल हरकतें करिए, एकदम मूर्खता की बातें करिए और कहिए, पिछले जन्म के संस्कार हैं। यही तो है दर्पण बनना और क्या, “देखो मैं बिल्कुल तुम्हारे जैसी हो गई। जैसे दर्पण में अपना ही दिखता है चेहरा, वैसे ही तुम्हें मुझ में अपना चेहरा दिखेगा। और अगर तुम्हें मैं पसंद नहीं आ रही तो इसका मतलब है कि तुम ख़ुद को पसंद नहीं करते हो। और अगर ख़ुद को पसंद नहीं करते हो पापा, तो ऐसे क्यों हो?”

अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है, कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। उसके साथ सबसे अच्छा काम यही करा जा सकता है, कि वो जो गलतियाँ कर रहा है उसे और करने दो। उसके पास से ये बहाना भी हट जाए, कि उसमें कुछ अच्छा है, कुछ बुरा है। उसे पूरा ही बुरा हो जाने दो।

क्या करोगे? पत्थरों पर सर फोड़ोगे? क्या करोगे? और देखा ये जाता है कई बार, कि ऐसे पत्थरों को पीठ दिखा दो तो फिर वो पीछे-पीछे आते हैं। कहते हैं, अच्छा ठीक है, ज़रा बताओ, क्या है, कैसे है? मैंने बहुत पीछा किया लोगों का, बहुत। जहाँ से कोई परिणाम नहीं आ रहा था वहाँ भी दशक-दशक लगाए हैं और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, कि तुमने हमारी ज़िंदगी बर्बाद कर दी, हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?

अगर आपको बाहर निकल करके लोग मिलें अभी, कहीं भी खोजिएगा जो सबसे ज़्यादा कट्टर तरीके से मेरी बुराई करते हों, संभावना है कि ये वही होंगे जिन पर मैंने मेहनत करी है। अफ़सोस इस बात का नहीं कि मेहनत करी, अफ़सोस इस बात का है कि कहीं और भी तो कर सकता था मेहनत तो मुझे करनी ही थी। तभी आपकी कम्युनिटी पर भी कई बार मुझे एक सहज स्नेह उठता है; आप लोग लिखते हो कि मैं कुछ जवाब दे दूँ। मैं थोड़ा टाइप करके भी छोड़ देता हूँ। मुझे अपना अपमान लगता है, मैं जिसको जवाब दे रहा हूँ, जिससे टाइप कर रहा हूँ, इनको कल को ग़ायब हो जाना है। मेरे भी होने की कोई गरिमा है कि नहीं है?

बहुत ऐसे रहे आते हैं कम्युनिटी पर चार-छह महीने खेलते हैं, इठलाते हैं, “आचार्य जी, आचार्य जी, आप मेरे सब कुछ हो, आचार्य जी।” और उसके बाद वही कहीं नज़र नहीं आ रहे, और कोई आएगा रिकॉर्डिंग लेकर के, कि देखिए आचार्य जी इनको फ़ोन किया कि आपने दो महीने से एनरोल नहीं किया, इन्होंने गाली दी है। और उन्हीं में से फिर कोई दिखाई दे जाता है, “आचार्य प्रशांत एक्सपोज़्ड।”

मैं मोटी-खाल का हूँ, ऐसे टूटने नहीं वाला। लगता तो है ही लेकिन। मैं थोड़ा डरने-सा लग गया हूँ, जब कोई आकर के बहुत अपनापन दिखाए न।

श्रोता: इससे तो हमें लॉस हो गया सर। हम अपनापन भी नहीं दिखा पाएँगे।

आचार्य प्रशांत: आप दिखा लो, मुझे डरने दो। आपको थोड़ी रोका है।

अभी हमारा विकिपीडिया पेज डाउन होते-होते बचा है, कम्युनिटी के अपनेपन के कारण। पता नहीं कौन-सा धुरंधर था, वो कोई जाकर के विकिपीडिया पेज पर अंधाधुंध एडिटिंग कर आया। न उसको विकिपीडिया के नियम पता, न उसको ये पता एडिटिंग कैसे करते हैं, क्या करते हैं, और इतनी तेजी से करी एक महीने के अंतराल में ही। ये नोटिस भी नहीं किया कि ये क्या कर रहा है, कौन कर रहा है। हमें क्या पता कौन कर रहा है?

एक दिन किसी ने बोला कि आचार्य जी, आपकी विकिपीडिया पेज के ऊपर तो एक तिलक लगा हुआ है। दो उसमें थीं बातें: कि एक तो था सी.ओ.आई. (कॉन्फ़्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट), कि इस पेज की एडिटिंग कोई ऐसा व्यक्ति कर रहा है जो इनको व्यक्तिगत रूप से जानता है। एक सी.ओ.आई. था, दूसरा क्या था?

श्रोता: एल.एल.एम.।

आचार्य प्रशांत: एल.एल.एम.। भाई साहब, ये जो एडिटिंग करने गए थे, इनका अंग्रेज़ी में इतना हाथ टाइट था कि ये जाते थे हिंदी में कुछ लिखते थे, उसको चैट से अंग्रेज़ी में करवाते थे और वो जाकर विकिपीडिया पर चिपका देते थे। अब वो उनके सॉफ़्टवेयर ने पकड़ लिया, कि ये तो एल.एल.एम. से कंटेंट है। नौबत ये आ गई थी, कि वो विकिपीडिया पेज ही उड़ जाता; कम्युनिटी का वरदान! लेकिन स्ट्रॉन्ग पेज है, बहुत समय से उसमें चीज़ें छप रही हैं, साइटेशन्स हैं, ये सब है तो उतना दूर तक नहीं गया मुद्दा। नहीं तो ये जो शैलो लव होता है न, ये भारी ही पड़ता है।

अभी और भी चीज़ें हुई हैं। अभी वो बताया ही, कि किताबों को लेजा-लेजा कर वो कहीं और पर कर रहे हैं। कम्युनिटी के ही तो सब हैं। और अभी दो-तीन चीज़ें और हुई कम्युनिटी के अंदर से ही न। हाँ, कम्युनिटी के लोग जा-जा के बाहर वो मेरे रिप्रेज़ेंटेटिव बन के बैठ रहे हैं, वहाँ आचार्य प्रशांत को डिफ़ेंड करेंगे। वहाँ पॉडकास्टिंग चल रही है। मैं कितना समझाऊँ, क्या सुधारूँ, क्या बोलूँ?

एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए। हो गया। उस सीमा के बाद प्रयास यही है कि पीठ दिखा दो।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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