सहारे की ज़रूरत ही क्यों?

Acharya Prashant

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सहारे की ज़रूरत ही क्यों?
लड़कियों को बचपन से निर्भर बनाना उनकी क्षमता नहीं, उनकी स्वतंत्रता छीनता है। आर्थिक, बौद्धिक और व्यावहारिक आत्मनिर्भरता ही वास्तविक सम्मान और सुरक्षा का आधार है। समाज अक्सर उन्हें रूप, भावनाओं और दूसरों पर आश्रित रहने तक सीमित कर देता है, जबकि उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता आज़ादी है। जो भी शिक्षा, कौशल या संघर्ष स्वतंत्रता की ओर ले जाए, उसी पर पूरी ऊर्जा लगानी चाहिए; बाकी सब उसके बाद है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न डिपेंडेंस के ऊपर था कि किस तरह लड़कियों को शुरुआत से पैंरेंट डिपेंडेंट बनाते हैं अपने ऊपर। इसका अगर मैं उदाहरण लूँ, तो मेरी बहन है, उसकी आज तक उससे टिकट नहीं बनती ट्रेन की। हमेशा मुझे बोला जाता है कि बना के दे दे। और है न, मैं नहीं बना हूँ, तो बोलते हैं कि कैसा भाई है।

और मैं इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से हूँ। तो मैं गुड़गाँव में जॉब करता हूँ एमएनसी में। यहाँ भी मैं देख पा रहा हूँ कि कितनी ज़्यादा डिपेंडेंट हैं लड़कियाँ। मतलब छोटे-छोटे डिसीज़ंस के लिए भी अपने बॉयफ्रेंड के ऊपर, और मतलब उनको लोनली रहना पसंद ही नहीं होता। शुरुआत से मैं देख रहा हूँ कि मेरी एक एक्स भी थी, तो मतलब उसको हज़ार लड़के मैसेज भेजते थे दिन भर, मतलब इंस्टाग्राम पर या कैसे न कैसे करके। तो मैं देख पा रहा हूँ कि लोनली लड़कियाँ रहती नहीं हैं मेनली। और हमेशा बात करने में कोई होता है, तो सेल्फ-रिफ्लेक्शन जो होता है, वो होता नहीं है उनके अंदर। हमेशा दूसरे के ऊपर निर्भरता।

आचार्य प्रशांत: ये सुन रहे हैं न? ये बहुत महत्त्वपूर्ण बातें हैं, जो आपको एक पुरुष के मुँह से सुनने को मिल रही हैं। ये जो बातें यहाँ पर एक पुरुष कह पा रहा है, बहुत कम महिलाएँ कह पाएँगी, क्योंकि उन्होंने कभी ये बातें ऑब्ज़र्व ही नहीं करीं।

अकेले नहीं रह पाते। लड़के पीछे लगे रहते हैं, तो हमेशा लड़कों का ख़याल चलता रहता है। आत्म-अवलोकन के लिए, सेल्फ-रिफ्लेक्शन के लिए जो समय और जो एकांत चाहिए, वह लड़कियाँ अपने आप को देती ही नहीं हैं। सारा समय तो चला जाता है देह के ही फ़सानों में।

प्रश्नकर्ता: या चैटिंग करने में लड़कों से।

आचार्य प्रशांत: या लड़कों से चैटिंग करने में। जिसमें उनकी पूरी ग़लती भी नहीं है। लड़के ही मँडराते हैं, भँवरे आ गए। पर फिर वो उसमें मुग्ध भी बहुत हो जाती हैं। भँवरे आ गए, देखो मैं कुछ तो होऊँगी। मैं कली हूँ, कली के लिए तभी तो भँवरे आए हैं। मैं कली हूँ, उतने में ही ख़ुश हो जाती हैं। काहे के लिए पढ़े-लिखें? ज्ञान काहे को अर्जित? इतने भँवरे तो ऐसे ही आ गए, बिना ज्ञान के आ गए। बिना ज्ञान के अगर भँवरे आ सकते हैं, तो ज्ञान का करना क्या है?

यह शर्म की बात होनी चाहिए न कि आपको साधारण काम, आपको अमेज़न पर शॉपिंग करनी न आए। आपको अपना फ़्लाइट का या ट्रेन का टिकट कराना न आए। कोई साधारण सा सरकारी दफ़्तर में काम है, वो कराने के लिए आपको पति पर, या बॉयफ्रेंड पर, या बेटे पर आश्रित होना पड़े, या पड़ोसी पर। यह तो शर्म की बात है।

बहुत कम महिलाएँ होती हैं। आप सरकारी दफ़्तरों में जाओ, वहाँ पर पुरुषों की भीड़ लगी होती है। लगी होती है कि नहीं? उदाहरण के लिए, आप आरटीओ चले जाओ। वहाँ आपको 5% नहीं दिखेंगी महिलाएँ। मुझे तो समझ में नहीं आता, इनके लाइसेंस कौन बनवाता है। कैसे बन जाते हैं? भाई बनवा रहे हैं लाइसेंस। ₹3000 एजेंट को दिए, लाइसेंस बन गया। अब उसको पता भी नहीं है कि आरटीओ होता क्या है।

तो आप चले जाओ वहाँ पर। वहाँ पर बिल चाहे जमा कराने की बात हो, जैसे आधा बिल आ गया है, उसका डिस्प्यूट डालना है, वहाँ आपको सब पुरुष ही पुरुष मिलेंगे। महिला क्या कर रही है? घर में बैठी हुई है। और घर में बैठोगे, तो ख़ाल तो गोरी हो ही जाएगी न? हाँ, वह निकल रहा है धूप में और धूल फाँक रहा है। लेकिन फिर इसी कारण वह स्वामी भी बन जाता है। आप घर में बैठी ही रहिए।

मुझे अपने बचपन से याद आ रहा है। छोटा था, तो बहुत सारे ऐसे विज्ञापन आते थे, जो ज़्यादातर आएँ ही दोपहर के समय में, 12:00 से लेकर 4:00 बजे तक। 11:00 बजे से शुरू होता था 4:00 बजे तक, तो उसमें जो चैनल होते थे उनमें सब अजीब-अजीब विज्ञापन आए। और वो विज्ञापन ऐसा लगे, किसी एकदम विक्षिप्त आदमी को टारगेट करके विज्ञापन बनाया गया है। एकदम लो-आईक्यू के लोगों के लिए विज्ञापन बनाया गया है।

मैं कहूँ, ये इतने मूर्खतापूर्ण विज्ञापन जो हैं, सब ज़्यादा दोपहर में ही क्यों आते हैं? रात में भी कुछ आते थे, पर ज़्यादा सब दोपहर में ही क्यों आते हैं? फिर समझ गया, क्यों दोपहर में ही आते हैं। मतलब ऐसे विज्ञापन, जिनमें सीधे-सीधे उपभोक्ता को बेवकूफ़ बनाया जा रहा है। और अगर उपभोक्ता ज़रा भी समझदार होगा, तो समझ लेगा कि ये विज्ञापन में जो माल बेचा जा रहा है, वो ग़लत है। पर वो विज्ञापन धड़ल्ले से चल रहा है, और उपभोक्ता बेवकूफ़ बन भी रहा है। और ये सारा काम दोपहर में हो रहा है ज़्यादा।

दोपहर में क्यों होता है? ज़्यादा उपभोक्ता को सीधे बेवकूफ़ बनाया जा रहा है, उपभोक्ता की कभी तारीफ़ करके, कभी कुछ बोल के, कभी कुछ बोल के। उदाहरण के लिए, “इससे आपका रूप 99% तो निखर जाएगा।” 99% ऑफ़ व्हाट? अब ये परसेंटेज वाला कैलकुलेट करना तो चौथी-पाँचवीं में ही सिखा देते हैं स्कूल में। तो वो बोल रहा है, “इससे आपका गोरापन 99% बढ़ जाएगा।” मैं पूछ रहा हूँ, 99% किस स्केल पर? बेस क्या है? वो बता ही नहीं रहा। और पता चले कि इस विज्ञापन से उस माल की बिक्री भी शुरू हो गई।

तो मैं सोचूँ, जो खरीद रहा है इस माल को, वो कितना बेवकूफ़ है। वो क्यों खरीद रहा है? कौन से लोग हैं, जिनको ये दिखाया जा रहा है कि ये माल लगाने से गोरापन बढ़ जाएगा, और वो खरीद भी ले रहे हैं, बिना पूछे कि 99% ऑफ़ व्हाट? और कौन सी रिसर्च है? कहाँ छपी है? बेस क्या है? आधार क्या है? कुछ नहीं बता रहे। बस बोल दिया, और एक चित्र दिखा दिया, जिसमें वो पहले काली-काली दिख रही है, फिर गोरी-गोरी दिख रही है। और बीच में “टें-टे-टे” ऐसी आवाज़ आई। उसने उसके मुँह पर ऐसे-ऐसे मला, और झनझना के बिल्कुल दूधनुमा गोरी हो गई। और माल बिकना शुरू हो गया।

कोई थोड़ा भी बुद्धिमान आदमी ऐसा माल खरीदेगा नहीं। लेकिन यह हाल करा है हमने अपनी महिलाओं का। हमने उनकी चेतना और बुद्धि को विकसित ही नहीं होने दिया। हम विकसित करते हैं बस उनकी देह को, और वो भी बस उपभोग के लिए, सेक्सुअल उपभोग के लिए। देह की बढ़िया हो जाए और दिमाग की औंधी रहे।

जो बिल्कुल पढ़ा-लिखा वर्ग होता है, मैं फिर वही आईआईटी के अपने दिनों की बताता हूँ। मेरे भी बैच में कई ऐसे लड़के थे, बोलते थे, “हमें बहुत ज़्यादा समझदार और बहुत सोचने वाली लड़की चाहिए ही नहीं।” बोले, “साधारण चाहिए दिमाग से और सुंदर चाहिए शरीर से।” बोले, “दिमाग ज़्यादा होता है न, तो उपद्रव करती है। बुद्धि कम चले तो अच्छा है।”

बहुत सारे माँ-बाप अभी भी ये करते हैं। कहते हैं, “ज़्यादा पढ़-लिख लेगी तो शादी नहीं होगी। बुद्धि कम चले तो बेहतर है।” तो उसको बुद्धिहीन बना दिया गया, उसको बना दिया गया भावना-प्रधान और बुद्धिहीन। भावनाएँ, इमोशंस, फीलिंग्स में जियो तुम। क्योंकि तुम तो स्त्री हो न, तुम्हारे पास भावनाएँ हैं, तुम्हारे पास आँसू हैं, और बुद्धि? वो पुरुषों के लिए छोड़ दो।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा क्वेश्चन है। एक लड़की है, एक लड़का है। अगर हायर एजुकेशन की बात आती है, तो एज कंपेयर जो प्रेफ़रेंस दी जाएगी, वो बॉयज़ को दी जाएगी। चलो, आप पढ़ने जाओ। तो लड़की को कहा जाएगा, “आपके यहीं अरेंजमेंट कर देते हैं, गाँव में या अपने आसपास के...” मैं एक गाँव से रहता हूँ, तो गाँव में ऑब्ज़र्व करता हूँ इस चीज़ को। तो मैं वो चाहता हूँ कि आप उनके लिए क्या संदेश देंगे, सर, जो ग्रामीण महिलाएँ या लड़कियाँ हैं?

आचार्य प्रशांत: कोई कहीं फँसा होता है, तो उसे क्या संदेश दिया जाता है?

बाक़ी सारे अपने धंधे बंद करो, एक काम पर ध्यान लगाओ। क्या? आज़ादी।

बाक़ी जिन भी चीज़ों में तुमने अपना ध्यान बाँट रखा है, वह चीज़ें तुम्हारे काम नहीं आएँगी। न सजना-सँवरना काम आएगा, न इधर-उधर रिश्ते बनाना तुम्हारे काम आएगा। न घूमना-टहलना तुम्हारे काम आएगा, न मनोरंजन करना तुम्हारे काम आएगा। तुम्हारे तो एक ही चीज़ काम आनी है, तुम्हारी आज़ादी। क्योंकि तुम फँसी हुई हो। तो बाक़ी सारे अपने काम-धंधे बंद करो, और एक चीज़ पर ध्यान पूरा केंद्रित करो। किस चीज़ पर? आज़ादी पर। बस यही है।

जो चिड़िया जाल में फँस गई हो, उसको शोभा देता है कि वह चिड़े के ख़याल करे और बैठ के रूहानी सपने बुने? बोलो। या सोचो चिड़िया जाल में फँसी हुई है और कह रही है, “लाना ज़रा काजल। काजल लगाना।” ये शोभा देता है क्या? जानो कि तुम एक फँसी हुई चिड़िया हो, और अपनी ऊर्जा, पूरी ऊर्जा सिर्फ़ एक काम में केंद्रित कर दो, आज़ादी। बाक़ी सारे काम बंद करो, बिल्कुल।

हाँ, आज़ादी का अगर मार्ग पढ़ाई से होकर जाता हो, तो पूरी ऊर्जा किसमें लगानी है? पढ़ाई में। आज़ादी का मार्ग अगर विद्रोह से होकर जाता है, तो विद्रोह में लगानी है। आज़ादी का मार्ग अगर किसी और ज्ञान, गुण, कौशल-वर्धन से जाता है, तो उन चीज़ों का वर्धन करना है। वर्धन करना माने बढ़ाना है।

जिस भी रास्ते से तुम्हें आज़ादी मिलती हो, उस रास्ते पर अपनी पूरी ऊर्जा, अपना पूरा समय लगाओ। बाक़ी सब काम बंद करो।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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