मेरे घर का मंदिर साफ़ रहेगा, बाकी मंदिर गंदे हैं तो रहें। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं जाकर अपने उद्धार के लिए गंगा में डुबकी मार रहा हूँ और गंगा को गंदा कर रहा हूँ? दुनिया में किसी देश में इतनी गंदी नदियाँ आपको नहीं मिलेंगी। वाराणसी शायद दुनिया का सबसे पुराना नगर है, भोले बाबा की नगरी है, और जाकर देखो गंदगी। ख़ुद साफ़-स्वच्छ होकर रहे आना धर्म नहीं होता। ‘तुझे साफ़ करने की ख़ातिर मुझे ख़ुद मैला होना स्वीकार है,’ यह धर्म होता है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: काफ़ी बुलंद हो।
प्रश्नकर्ता: सर, मेरा नाम करण है और मैं दस महीने से गीता सत्रों से जुड़ा हुआ हूँ। हमने अभी बात की थी शुरुआत में सफ़-सफ़ाई की, तो लोकधर्म में बाहरी साफ़-सफ़ाई की बातें बहुत चलती हैं। लेकिन अपन देखते हैं चारों तरफ़ जो मंदिर हैं, जो तीर्थ हैं और तीर्थ तक जाने वाले जो रास्ते हैं, वो सब बहुत गंदे रहते हैं। और जो पहाड़ी रास्तों पर भी जो तीर्थ हैं, उनको गंदा करने की वजह से वहाँ पर लैंडस्लाइड और ऐसी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। तो ये अपना मन कैसा है जो मंदिर को भी ऐसे भोगने का?
आचार्य प्रशांत: नहीं, मन-वन ये सब मत बनाओ। मन की परिभाषा क्या है, वो बताई है न। तो मन कैसा है? अब मेरे साथ हो दस महीने से, तो जो फिर हमारा तरीका है, हमारी भाषा है, हमारा लहजा है, उसी में बात किया करो। है न?




