भारत सबसे धार्मिक और सबसे गंदा देश क्यों?

Acharya Prashant

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भारत सबसे धार्मिक और सबसे गंदा देश क्यों?
मेरे घर का मंदिर साफ़ रहेगा, बाकी मंदिर गंदे हैं तो रहें। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं जाकर अपने उद्धार के लिए गंगा में डुबकी मार रहा हूँ और गंगा को गंदा कर रहा हूँ? दुनिया में किसी देश में इतनी गंदी नदियाँ आपको नहीं मिलेंगी। वाराणसी शायद दुनिया का सबसे पुराना नगर है, भोले बाबा की नगरी है, और जाकर देखो गंदगी। ख़ुद साफ़-स्वच्छ होकर रहे आना धर्म नहीं होता। ‘तुझे साफ़ करने की ख़ातिर मुझे ख़ुद मैला होना स्वीकार है,’ यह धर्म होता है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: काफ़ी बुलंद हो।

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा नाम करण है और मैं दस महीने से गीता सत्रों से जुड़ा हुआ हूँ। हमने अभी बात की थी शुरुआत में सफ़-सफ़ाई की, तो लोकधर्म में बाहरी साफ़-सफ़ाई की बातें बहुत चलती हैं। लेकिन अपन देखते हैं चारों तरफ़ जो मंदिर हैं, जो तीर्थ हैं और तीर्थ तक जाने वाले जो रास्ते हैं, वो सब बहुत गंदे रहते हैं। और जो पहाड़ी रास्तों पर भी जो तीर्थ हैं, उनको गंदा करने की वजह से वहाँ पर लैंडस्लाइड और ऐसी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। तो ये अपना मन कैसा है जो मंदिर को भी ऐसे भोगने का?

आचार्य प्रशांत: नहीं, मन-वन ये सब मत बनाओ। मन की परिभाषा क्या है, वो बताई है न। तो मन कैसा है? अब मेरे साथ हो दस महीने से, तो जो फिर हमारा तरीका है, हमारी भाषा है, हमारा लहजा है, उसी में बात किया करो। है न?

देखो समझो। हम स्वार्थ के कीड़े हैं। बोलो।

प्रश्नकर्ता: हम स्वार्थ के कीड़े हैं।

आचार्य प्रशांत: और लोकधर्म माने स्वार्थ की ही पूजा। ठीक? लोकधर्मी हमेशा किसमें लगा रहता है? मनोकामना पूरी हो जाए वग़ैरह-वग़ैरह, माने स्वार्थ की पूजा। ठीक? स्व-अर्थ माने मेरा जो अर्थ है, माने मेरी जो कामना है वो पूरी हो जाए। ठीक है? सीमित, सब कुछ सीमित। मुझे अपनी कामना पूरी करनी है, ये स्वार्थ है। अपनी, अपने तक सीमित; दूसरों की कामना भी नहीं पूरी करनी है मुझे, कामना भी बस अपनी पूरी करनी है।

तो एक तो कामना, मामला गड़बड़ और दूसरे कामना भी स्वयं तक सीमित। तो जहाँ सीमित कामना होती है, स्वयं तक सीमित कामना होती है, वहाँ स्वयं की ज़िम्मेदारी भी सीमित होती है। मेरी ज़िम्मेदारी बस मेरी अपनी कामना पूरे करने तक है; उसके आगे मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, भाई। मतलब क्या है? मेरे घर का मंदिर होगा, वो साफ़ मिलेगा आपको। जाओ और किसी के घर का मंदिर गंदा दिखा दो, क्योंकि वो मेरा स्वयं का है, और लोकधर्म माने सब कुछ सीमित रखना है, “अपना-अपना देखो भैया, मेरी अपनी कामनाएँ हैं वो पूरी हों जाएँ, दुनिया जले तो जले, सब मरे तो मरे। मेरी अपनी शुचिता, स्वच्छता का मुझे ख़्याल रखना है; दुनिया गंदी है तो होती रहे।” स्वार्थ, “मेरे घर का मंदिर साफ़ रहेगा, बाक़ी मंदिर वो गंदे हैं तो रहें।”

और ये कितनी अजीब बात है, क्योंकि सफ़ाई पर, शुचिता पर, लोकधर्म, जो हिंदुओं का लोकधर्म है उससे ज़्यादा शायद ही कोई महत्त्व देता हो, बार-बार सफ़ाई, सफ़ाई, सफ़ाई। और दुनिया में आप किसी भी और मत/संप्रदाय, मज़हब के देवालय में चले जाएँ, वो आपको हमारे मंदिरों से संभवना है ज़्यादा ही साफ़ मिलेगा। आप कहीं भी चले जाइए, गुरुद्वारा, चर्च, मस्जिद, कहीं चले जाइए आप, बौद्ध मंदिर, जैन मंदिर, पारसी मंदिर।

क्यों?

क्योंकि लोकधर्म ने हिन्दू धर्म को जितना अपनी गिरफ़्त में लिया, उतना किसी और को नहीं। वहाँ भी लोकधर्म खूब चलता है, बाक़ी जगहों पर भी। पर हमारे यहाँ जो हमने कर डाला, वो तो कोई करके नहीं दिखा पाया। हमने लोकधर्म को जिन बुलंदियों पर पहुँचाया है, माने हमने वास्तविक धर्म की जो बर्बादी और जो अपमान करा है, उतना तो कोई भी नहीं कर पाया।

तो इसीलिए आप पाओगे कि हमारे पूजा स्थल, हमारे देवालय सबसे गंदे रहते हैं। लेकिन ये बात आप घरों के अंदर नहीं पाएँगे। घरों में सफ़ाई रहेगी; घर में अगर मंदिर है तो वो एकदम साफ़ मिलेगा। क्योंकि लोकधर्म का अर्थ ही है, स्व-अर्थ; माने सीमित अर्थ। मुझे अपना देखना है। और जब कामना अपनी पूरी करनी होती है, सीमित, तो ज़िम्मेदारी भी अपनी होती है, सीमित। कोई और क्या कर रहा है, वो मेरी ज़िम्मेदारी थोड़ी है। मुझे तो साहब अपना देखना है, मुझे स्वर्ग मिल जाए, मुझे मोक्ष मिल जाए, मुझे अपना देखना है। मैं अगले जन्म में कुछ गड़बड़ न बन जाऊँ, अपना देखना है। मैं दान भी किसी को दूँ तो इसलिए कि मुझे पुण्य मिल जाए। मैं किसी को अगर मरने से बचाऊँ भी तो इसलिए कि मुझे पाप न लगे।

सब कुछ स्वयं तक सीमित, तो अपनी ज़िम्मेदारी भी सीमित। फिर मैं क्यों इस बात की फ़िक्र करूँ कि दुनिया गंदी हो रही है, कि मोहल्ला गंदा पड़ा हुआ है? क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं जाकर अपने मोक्ष, अपने उद्धार के लिए गंगा में डुबकी मार रहा हूँ और गंगा को गंदा कर रहा हूँ। ये काम हम ही लोगों ने करके दिखाया है। "मुझे मेरा मोक्ष मिल जाए तो मिल जाए, उसके लिए मैं गंगा को माँ कहता हूँ, माँ मैली हो तो होती रहे।" दुनिया में किसी देश में इतनी गंदी नदियाँ आपको नहीं मिलेंगी और लोकधर्मियों ने नदियों को माँ बोला, ये भी किसी और देश में नहीं मिलेगा आपको। भारत में पर्वतों की जो दुर्दशा है, ये आपको दुनिया में कहीं न मिले।

लेकिन हमने अपने पर्वतों को देवस्थल बोला, देवभूमि बोला। ये भी आपको कहीं नहीं मिलेगा क्योंकि हर काम स्वार्थ हेतु है। लोकधर्म का अर्थ ही है स्वार्थ के लिए धर्म, और ये कितनी अधिक दुखद बात है क्योंकि हमारे पास, मैं बार‑बार कहता हूँ, सर्वोच्च दर्शन है। और ये जो सर्वोच्च दर्शन है, आदर्श रूप में यही हमारे धर्म की आधारशिला होना चाहिए।

बहुत-बहुत ऊँचा धर्म होना चाहिए, लेकिन हमने उस आसमान जैसी ऊँचाई को बिल्कुल लाकर के ज़मीन पर भी नहीं, पाताल में पटक दिया।

कोई दिखा रहा था मुझे कि कहीं कोई सर्वे हुआ है या किसी ने व्यक्तिगत तौर पर लोगों से बार‑बार सवाल पूछे, वो पूछ रहे हैं: दुनिया में सबसे गंदा देश कौन सा है? और ज़्यादातर विदेशियों से सवाल पूछे जा रहे हैं, अलग‑अलग देशों के लोगों से सवाल पूछे जा रहे हैं, कि दुनिया में सबसे गंदा देश कौन सा है? और ज़्यादातर लोग कह रहे हैं; इंडिया। और हम बहुत धार्मिक लोग हैं, ज़रूर हमारी इस धार्मिकता और हमारी सार्वजनिक जगहों के गंदे होने में कोई गहरा नाता है। गरीबी बिल्कुल एक कारण है, पर सिर्फ़ गरीबी कारण नहीं हो सकती, क्योंकि और भी गरीब देश हैं वो इतने गंदे नहीं हैं।

हमने माता वैसे सिर्फ़ नदियों को ही नहीं बोला, हमने गाय को भी बोला। और गाय पर अत्याचार और बीफ़ का निर्यात, इसमें भारत बहुत आगे है। अत्याचार हम सिर्फ़ मारने में थोड़े करते हैं; उससे ज़्यादा बड़ा अत्याचार होता है जब जन्म दिया जाता है। गौवंश को जन्म ही कैसे दिया जाता है, ये बात बहुत छुपा कर रखी जाती है। दुधारू जितने पशु हैं, वो नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा वो कृत्रिम गर्भाधान से पैदा होते हैं। वे कोई ख़ुद थोड़े पैदा हो रहे हैं, ज़बरदस्ती पैदा किया जाता है ताकि आप दूध पियो और फिर उनका माँस बिके।

लोग कहते हैं, दूध नहीं पिएँगे तो इन सब का क्या होगा? दूध नहीं पियोगे तो, वो पैदा नहीं होंगे, ये होगा। वो ज़बरदस्ती पैदा किए जाते हैं और बहुत अमानवीय तरीके से पैदा किए जाते हैं, बड़े क्रूर तरीके से पैदा किए जाते हैं। ये प्रश्न आता है।

बड़ी अकड़ के साथ कहते हैं, कि “अगर हम दूध नहीं पिएँगे तो ये सब गाय‑भैंसें हैं इनका क्या होगा?” उनका तो यही होगा कि ये पैदा नहीं होंगे। वो ज़बरदस्ती पैदा किए गए थे; वो प्राकृतिक नहीं हैं। वो नब्बे फ़ीसदी समझो लगभग फैक्ट्री में पैदा किए गए हैं तुम्हारे भोग के लिए। पर नहीं, हमारा स्वार्थ जुड़ा हुआ है और हमने उसमें धार्मिक कोण भी जोड़ दिया है, दूध के साथ। तो किसी और का क्या होता है, मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है? मुझे तो मेरी व्यक्तिगत मुक्ति की परवाह है; मुझे मोक्ष मिल जाए, मुझे पुण्य मिल जाए। मैं जाकर के ये कर आया या मेरा स्वास्थ्य बना रहे या मेरी परंपरा बनी रहे; इसके लिए मैं ये कर लूँगा, बाक़ी जो किसी का होता है सो हो, मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है?

और जबकि वास्तविक अध्यात्म के बिल्कुल केंद्र में ये बात है कि जब तक तुम्हारे सरोकार सीमित हैं, जब तक तुम दूसरे की पीड़ा नहीं समझ सकते, जब तक तुम दूसरे की मुक्ति के लिए प्रयासरत नहीं हो सकते, तब तक तुम कहाँ से धार्मिक हो गए।

जो सिर्फ़ अपने कल्याण के लिए सोच रहा है, उससे बड़ा अधर्मी कोई है? धर्म होता है कि मुझे दुनिया की सबसे ऊँची वस्तु भी मिल रही हो, परम मुक्ति के दरवाज़े खुल गए हों मेरे लिए, मैं तो उन्हें ठुकरा दूँगा। क्योंकि अभी मैं दूसरों को पीड़ा में देख रहा हूँ, ये धर्म होता है।

मेरी ज़रूरत वहाँ मुक्ति के आसमानों में नहीं है; बड़ा स्वार्थी हो जाऊँगा अगर चुपचाप अकेले व्यक्तिगत मुक्ति लेकर उड़ जाऊँगा। मेरी ज़रूरत वहाँ नहीं है, मेरी ज़रूरत यहाँ ज़मीन पर है जहाँ पीड़ा है, बंधन है, दुख है, अज्ञान है। मेरी ज़रूरत यहाँ है। मैं नहीं जाऊँगा वहाँ; मैं ज़मीन पर रहूँगा। ये सब जो तड़प रहे हैं, इनके साथ मैं ख़ुद भी तड़पूँगा। ये सब जो बंधन में हैं, इनकी ख़ातिर मैं स्वयं भी बंधन स्वीकार कर लूँगा। ये धर्म होता है।

ख़ुद साफ़‑स्वच्छ होकर रहे आना धर्म नहीं होता।

तेरे घर की सफ़ाई करने के लिए, तेरे घर की गंदगी में घुसूँगा। और जब गंदगी में घुसो तो तुम्हारे ऊपर भी कुछ मैल तो लग जाएगी न। हाँ, तो तुझे साफ़ करने की ख़ातिर मुझे ख़ुद मैला होना स्वीकार है, ये धर्म होता है। गाड़ियाँ चला रहे हैं, खिड़की खोल कर सड़कों पर चिप्स और पानी की बोतल और सब तरीके का प्लास्टिक फेंक रहे हैं। चाहे वो कितनी भी खूबसूरत सड़क क्यों न हो, चाहे वो कितनी भी साफ़ जगह क्यों न हो, उसको गंदा करना ही करना है। अपने घर को ऐसे थोड़े गंदा करते हैं, सार्वजनिक जगह है तो कर देंगे क्योंकि वो हमारी ज़िम्मेदारी में नहीं आती, मेरी ज़िम्मेदारी तो बस अपने लिए है। अपने घर को कौन गंदा रखता है? अपने कमरे को, अपने कपड़ों को कौन गंदा रखता है?

मैंने रेलवे में देखा, एसी में वो बिछाने के लिए चादर दे देते हैं, ओढ़ने के लिए भी। लंबी दूरी की यात्रा, एक देवी जी के कई छोटे‑छोटे बालक उनको लेकर के चढ़ी हुई हैं, उनमें से दो‑चार इतने ही छोटे, उन्होंने वहीं पर टट्टी‑पेशाब कर दी। अभी कई घंटे बाक़ी थे मंज़िल आने में, देवी जी ने वही, जो रेलवे ने दिया हुआ था, सफ़ेद रंग का होता है वो, उसे लेकर फर्श साफ़ कर दिया। और जो बाक़ी के मुसाफ़िर थे, वो भी आपत्ति कर रहे थे। न न सफ़ाई करने पर नहीं, जब बदबू आ रही थी तो आपत्ति कर रहे थे बाक़ी यात्री, उन्हें भी बड़ी राहत मिली कि चलो सफ़ाई हो गई।

रेलवे की चादर है भाई, कर दो साफ़, मेरे घर की थोड़ी है। और फिर हम कहते हैं कि हम देशभक्त हैं। और ऐसे ही लोग होते हैं जो ज़्यादा देशभक्ति के नारे लगाते हैं। पान खाकर सरकारी अस्पतालों की सीढ़ियों पर थूकने वाले, ये बड़े देशभक्त हैं।

बिना समझ की अंधी भक्ति, इसी ने ख़राब किया धर्म को। अगर ज्ञान नहीं है तो भक्ति अंधभक्ति हो जाती है, ज्ञान नहीं है तो भक्ति अंधविश्वास बन जाती है।

ज्ञान असंभव है बिना प्रेम के, और भक्ति असंभव है बिना ज्ञान के। ये जो बिना ज्ञान की भक्ति है, जो बस मान्यताओं, कहानियों, स्वार्थों पर चलती है, बड़ी गड़बड़ करी।

प्रश्नकर्ता: सर, जब मैं किसी के साथ सार्वजनिक स्थान पर जाता हूँ तो वो कचरा वहीं फेंकने की कोशिश करते हैं। मैं उनको कहता हूँ कि ऐसा नहीं करना चाहिए, लेकिन वो कहते हैं, अपने को कौन सा रोज़-रोज़ आना है? चला जाएगा नाली के अंदर।

आचार्य प्रशांत: कई लोगों को आपने देखा होगा वो चलते‑चलते बिना बात के थूकते रहते हैं, मुँह में कुछ नहीं होता तो भी थूकते रहते हैं। ये ज़मीन पर नहीं थूक रहे हैं, ये पूरी दुनिया पर थूक रहे हैं। ये कह रहा है कि अपने मज़े के लिए मुझे कहीं भी थूकना पड़े, मैं थूकूँगा, मेरे मन में शून्य सम्मान है अपने स्वार्थों के अलावा किसी भी और चीज़ के लिए।

ईशावास्य उपनिषद् है, "ईशावास्यमिदं सर्वं।” परम सत्ता का जिधर देखो उधर वास है। तुम किसके ऊपर थूक रहे हो? तुम ईशावास्य पर थूक रहे हो। और उपनिषद् आगे कहते हैं, “पूर्णमदः पूर्णमिदं।” ये वो, जो कुछ भी तुम देख सकते हो, देख नहीं सकते, सोच सकते हो, सोच नहीं सकते हो, सब पूर्ण ही है। तुम किसके ऊपर थूक रहे हो? पर अहंकार यही है, “मैं हूँ और अपने उपभोग के लिए, अपने स्वार्थ के लिए मैं किसी के ऊपर भी थूक सकता हूँ।”

हम ऋषिकेश से आगे जाया करते थे शिविर के लिए, रास्ते में एक पड़ता है, झिलमिल ढाबा, दस साल पहले की बात होगी। उसमें रुका करते थे। तो एक बार मैंने वहाँ लड़ाई देखी। रात के दो बजे की बात होगी। देर रात निकलते थे, सब काम-वाम निपटा करके बारह-एक बजे निकलते थे और सुबह छह-सात-आठ बजे एकदम, सुबह-सुबह पहुँच जाया करते थे, तो वही दो-तीन बजे की बात होगी। वहाँ लड़ाई हो रही है, लड़ाई किस बात पर हो रही है, समझो। वहाँ बस आकर रुकी। बस वालों ने अपने ढाबे वग़ैरह निश्चित कर रखे होते हैं कि यहाँ बस रोकते हैं। बस वाले ने रोकी, तो उसमें से निकल करके लोग पेशाब करने लगे। तो लड़ाई की आवाज़ आई। कहीं कुछ धूम‑धड़ाका हो रहा हो, मेरी रुचि न जागे। ऐसा कैसे हो सकता है? मैं गया। मैंने कहा, देखूँ क्या है? सिर्फ़ लड़ ही रहे हैं, अभी मारपीट क्यों नहीं हुई?

तो किस बात पर लड़ाई हो रही थी, जानते हो? वो ढाबे का मालिक कह रहा है, “यार, तुम सब यहाँ खुले में पेशाब कर रहे हो, और पूरी बस भर के उतरी है, सब तुम खुले में कर रहे हो। मेरे यहाँ लोग नहीं रुकेंगे बदबू के मारे।” मैंने कहा, इसकी बात तो सही है। पर वो इतनी सी ही बात पर नहीं कुपित था। वो बोला, “ये बस हमेशा रुकती है, मुझे पता है कि तुम लोग उतरोगे, पेशाब करोगे। तो मैंने यहाँ पर लाइन से छह तुम्हारे लिए बनवा दिए हैं, मूत्रालय। यहाँ कर लिया करो।”

तो मैंने देखा, वो छह के छह खाली थे। तो अब तो बात रोचक हो गई कि छह खाली हैं, तो ये सब जाकर खुले में क्यों पेशाब कर रहे हैं? और वो जो मालिक था, या मैनेजर, जो भी रहा होगा, वो तड़पा जाए, कहे, “खुले में यहाँ कर रहे हो तुम।” जब हाथापाई की नौबत आ गई, तो उनमें से एक बोलता है, “देख भाई, हमारी तो खुले में ही उतरती है।” बोल रहा है, “ये सब कमरा बंद कर रखा है और ये सब है, ऐसे में हमारी उतरती ही नहीं। जब तक कुछ बढ़िया, खुली, साफ़ जगह नहीं होगी, हम मूतते ही नहीं।”

ये है, कि सामने उपलब्ध भी है शौचालय, तो भी वहाँ नहीं जाएँगे। जहाँ लोग खाना खा रहे हैं, उनके बस बीस हाथ बगल में जाकर के वो खुले में पेशाब कर रहा है। और वहाँ महिलाएँ भी मौजूद हैं, वो भी खा‑पी रही हैं। और हम अंग प्रदर्शन का इल्ज़ाम अक्सर स्त्रियों पर लगाते हैं। वो तो फिर भी कुछ बाहर‑बाहर के अंग प्रदर्शित करती होंगी।

जो भी कोई हाईवे पर कभी चला है, उसने तो पुरुषों के सारे ही अंग देख लिए होंगे। आनंद है। ये धरा क्यों है? ये पृथ्वी है ही किस लिए? कि हम इस पर मूते। और किस लिए है? तुम बेकार में ही ये सब लैट्रिन वग़ैरह बनवा रहे हो। भारत सरकार ने कार्यक्रम चलाया कि खुले में शौच नहीं होगी, वो कार्यक्रम सफल होकर भी विफल है क्योंकि तुम बनवा भी दो, तो भी कहते हैं, “जब तक हम देश‑दुनिया देखते हुए और जब तक देश‑दुनिया हमें ना देखे, तब तक उपलब्धि कैसे होगी सुबह की?” कि दो‑चार महिलाएँ निकल रही हों, अचानक उनकी नज़र पड़ जाए, वो बिल्कुल झिझक जाएँ, लजा जाएँ, हड़बड़ा जाएँ, इधर-उधर भागें कि ये क्या, सुबह की शुरुआत पुराने जानवर के साथ। मुझे मौज आनी चाहिए, बस।

मालूम है, तुम दूसरों को तकलीफ़ देने में क्यों नहीं हिचकिचाते हो? क्योंकि तुम्हें अपनी तकलीफ़ का अंदाज़ा नहीं है, तुम अपने प्रति संवेदना हीन हो चुके हो। जो अपने दुख से परिचित हो जाता है, वो कभी दूसरों को दुख नहीं देगा। नहीं दे सकता। जो अपने प्रति जितना असंवेदनशील रहता है, वो दूसरों को उतना दुख देता है। ज्ञानियों ने कहा है, “जाके पाँव न फटे बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई।” अर्थ समझो। जब अपने दुख का एहसास होता है, तभी दूसरे के दुख का एहसास होता है।

हम में से ज़्यादातर लोगों की समस्या ये है कि हमें अपने ही दुख का एहसास नहीं है। ये आत्मज्ञान का अभाव है। तुम जानते ही नहीं कि तुम कितनी तकलीफ़ में हो, तुम्हें अपनी हालत का पता ही नहीं है। तुम दुनिया से बाद में, सबसे पहले स्वयं से बेख़बर हो। और धर्म होता ही इसीलिए है ताकि सबसे पहले तुम्हें तुम्हारी ख़बर लगे।

धर्म दुनिया भर की उल-जुलूल हरकतें करने का नाम नहीं होता, धर्म आईने में स्वयं को साफ़‑साफ़ देखने का नाम होता है।

जो स्वयं को देखेगा, कहेगा, मैं कितना गंदा हूँ। क्षोभ, दुख, जिसके भीतर से उठेगा, वो ये नहीं कर पाएगा कि मैं गंदा हूँ और ये मुझे बुरा लग रहा है, तो अब मैं जाकर किसी और को भी गंदा कर दूँ। वो कहेगा, नहीं, रहने दो।

धर्म का पालना रहा है ये जो मेरा देश, इसे धर्म की आज बहुत ज़रूरत है। सबसे ज़्यादा कमी हमारे ही प्यारे भारत को है, अभी धर्म की। धर्म के नाम पर, न जाने हमने क्या‑क्या शुरू कर दिया। और जो अपने आप को धार्मिक बोलता दिखाई दे, सबसे पहले इसे जान लेना कि यही है जिसने धर्म को विकृत, बर्बाद कर रखा है, यही है असली अधार्मिक।

बनारस से मेरा नाता रहा है, कई बार हमारा शिविर लगा बनारस में। मेरे पिताजी, छोटा भाई सब बीएचयू से हैं। सूखा गोबर, गीला गोबर, पतली गलियाँ, उन्हीं गलियों के साथ पानी की निकासी भी और वो पानी भी गंदा है। और वाराणसी शायद दुनिया का सबसे पुराना नगर है। हमें नाज़ है वाराणसी पर। शिव मुझे बहुत प्रिय हैं और भोले बाबा की नगरी है, और जाकर देखो गंदगी। उन्हीं पतली-पतली गलियों में सामने कोई भरोसा नहीं है कि गाय तो गाय, सांड भी आ सकता है।

कहते हैं, कि जिसको मुक्ति चाहिए वो काशी आकर मरे। हम कौन सी व्यक्तिगत मुक्ति की बात कर रहे हैं? काशी में मुक्ति तब मिलेगी न, जब पूरे शहर के लिए काशी को पहले साफ़ कर दिया जाए। ये होगी। काशी में आकर मरने से थोड़ी मुक्ति मिलेगी। काशी आओ, जब जवान हो, शरीर से सबल हो, तब आओ और सफ़ाई करो। व्यक्तिगत मुक्ति का लोभ छोड़ो, सार्वजनिक हित की बात करो, ये मुक्ति है। क्योंकि व्यक्तिगत तो मात्र अहंकार होता है। और मुक्ति का अर्थ ही होता है; अहंकार से मुक्ति, माने व्यक्तिगत से मुक्ति। जो व्यक्तिगत मुक्ति के लिए काशी आ रहा है, वो चाहे किसी घाट पर जल ले, उसे नहीं मिलनी मुक्ति। आओ, काशी सफ़ाई करो। तब मुक्ति मिल सकती है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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