यह मामला जो है, अरावली के नाश का नहीं है। यह मामला ग़रीबों के नाश का है। क्या होने वाला है? ड्रिलिंग-ब्लास्टिंग होगी, तो वहाँ पर उड़ेगी ज़बरदस्त क़िस्म की धूल। बिल्डर आएगा और वो वहाँ पर बनाएगा, अरावली ग्रीन्स। महँगी-महँगी रेज़िडेन्शियल प्रॉपर्टीज़ निकलेंगी। और अमीरों को कहा जाएगा, 'आओ, आओ, यहाँ पर इको-टूरिज़्म करो।' नुकसान किनका होने जा रहा है? आम आदमी का। पेड़-पौधों का, जानवरों का। एकदम जो ग़रीब लोग हैं, उनका। उनका, जो अभी पैदा भी नहीं हुए। यह चोरी सिर्फ़ ग़रीबों की जेब से नहीं की जा रही, यह चोरी अजन्मी पीढ़ियों की जेब से भी की जा रही है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम मेधा खेंगरे है। सुप्रीम कोर्ट से अभी अरावली हिल्स का जो फ़ैसला है, उससे 90% हिल्स तो माइनिंग एक्टिविटी के लिए खुले हो जाएँगे। इलीगल तो माइनिंग एक्टिविटी हो ही रही है, मतलब 25% और 31% जो राजस्थान की हो रही है। पानी कम हो रहा है, गर्मी बढ़ रही है और ज़्यादा बढ़ेगी; ज़मीन बंजर हो जाएँगी। तो उत्तर भारत और जो नॉर्थ-वेस्ट भारत है, उन लोगों को तो तकलीफ़ होगी ही। लेकिन हम सबको वो नुकसान होने वाला है।
तो ऐसे फ़ैसले कैसे लिए जाते हैं? तो फिर सुप्रीम कोर्ट ऐसे फ़ैसले क्यों ले रहा है?
आचार्य प्रशांत: हम सबको नुकसान होने वाला है। माने किसको होने वाला है? आज आप सब यहाँ बैठे हुए हो। ये जो आज की बातचीत है, ये टिकटेड बातचीत है न। ठीक है? आज यहाँ आने के लिए आपने पैसे ख़र्च करे हैं। जितना टिकट था, उतना अगर आपने दिया है तो अरावली के खनन से आपको बहुत कम नुकसान होने वाला है। आपको नहीं होने वाला।




