
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम मेधा खेंगरे है। सुप्रीम कोर्ट से अभी अरावली हिल्स का जो फ़ैसला है, उससे 90% हिल्स तो माइनिंग एक्टिविटी के लिए खुले हो जाएँगे। इलीगल तो माइनिंग एक्टिविटी हो ही रही है, मतलब 25% और 31% जो राजस्थान की हो रही है। पानी कम हो रहा है, गर्मी बढ़ रही है और ज़्यादा बढ़ेगी; ज़मीन बंजर हो जाएँगी। तो उत्तर भारत और जो नॉर्थ-वेस्ट भारत है, उन लोगों को तो तकलीफ़ होगी ही। लेकिन हम सबको वो नुकसान होने वाला है।
तो ऐसे फ़ैसले कैसे लिए जाते हैं? तो फिर सुप्रीम कोर्ट ऐसे फ़ैसले क्यों ले रहा है?
आचार्य प्रशांत: हम सबको नुकसान होने वाला है। माने किसको होने वाला है? आज आप सब यहाँ बैठे हुए हो। ये जो आज की बातचीत है, ये टिकटेड बातचीत है न। ठीक है? आज यहाँ आने के लिए आपने पैसे ख़र्च करे हैं। जितना टिकट था, उतना अगर आपने दिया है तो अरावली के खनन से आपको बहुत कम नुकसान होने वाला है। आपको नहीं होने वाला।
प्रश्नकर्ता ने कहा, कि पहले ही इतना वहाँ अवैध खनन चल रहा था। कुछ 90% बोला; कुछ 25% बोला कि इतना पहले ही हो चुका था, ये था, वो था। कुछ थोड़ा-बहुत वहाँ पर पहाड़ के नाम पर ठूँठ बचा हुआ था। उसमें भी सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दे दी है कि उसका जो एलिवेशन है अगर वो 100 मीटर से नीचे का है तो उसको अरावली गिनो ही मत। और उसको जो चाहो कर सकते हो, समतल कर दो, फोड़ दो, फाड़ दो, जो करना है। फिर कह रही हैं, नुकसान तो हम सबको होगा।
नहीं होगा। आप यहाँ जो बैठे हुए हैं, आप ज़्यादातर मध्यम वर्ग हैं, कुछ उच्च मध्यम वर्ग भी हैं। आपको बहुत कम नुकसान होने वाला है और यही कारण है कि कोई विरोध नहीं करने वाला।
ये मामला जो है, अरावली के नाश का नहीं है; ये मामला ग़रीबों के नाश का है। भारत में जो मध्यम वर्ग है, मिडिल क्लास वो बहुत बड़ी नहीं है; ख़ासकर अगर मैं उसको स्ट्रिक्टली मिडिल और अपर मिडिल मानूँ तो। अगर मैं जो निम्न आय वर्ग है, उसमें लोअर मिडिल इनकम क्लास भी जोड़ दूँ, तो वही लोग हैं आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा। दो-तिहाई, तीन-चौथाई, निर्भर इस पर करता है कि आप रेखा कहाँ पर खींच रहे हो और किस आधार पर खींच रहे हो। कुछ आधार तो ऐसे हैं, जिन पर अगर आप रेखा खींचो, तो 80-90% भारत लो इनकम ग्रुप और लोअर मिडिल क्लास को बिलॉन्ग करता है।
नुकसान उनको होने वाला है, तो इसलिए आप पा रहे हो कि आवाज़ें बहुत कम उठ रही हैं। ये मामला जो है, एनवायरनमेंटल इनजस्टिस का है, क्लाइमेट इनजस्टिस का है, डिस्ट्रीब्यूशनल इनजस्टिस का है; जलवायु अन्याय, पर्यावरणीय अन्याय, वितरणात्मक अन्याय। कैसे?
वितरण माने क्या? बाँटना। कैसे? अरावली कटेंगी; और अब ये मुद्दा हफ़्ते-भर पुराना क़रीब हो गया तो आप लोगों ने, मैं इतना उम्मीद करता हूँ सामान्य ज्ञान के नाते जो इसका साधारण विवरण है वो तो पढ़ ही रखा होगा न अख़बारों में। सर हिल नहीं रहे हैं, इतनी दूर का है क्या राजस्थान? महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मतलब पड़ोसी का पड़ोसी है भाई। तो पता है न, इसके जो बेसिक फ़ैक्ट्स हैं वो तो पता ही हैं न।
जब अरावली कटेंगी तो दो बातें होंगी, किसी का फ़ायदा, किसी का नुकसान। अब अरावली माने एक पर्वत-श्रृंखला, वो तो अपने आप में चेतन है नहीं, वो तो कॉन्शियस है नहीं तो उसका क्या नुकसान हो जाएगा। ठीक है? बहुत ज़्यादा उस पर हरियाली भी नहीं है, पत्थर ही हैं ज़्यादा। बहुत पुराने पहाड़ हैं अरावली, हिमालय से ज़्यादा पुराने हैं; और इतने पुराने हैं कि घिस-घिस करके अब उनका जो कद भी है वो बहुत ऊँचा नहीं रह गया।
तो किसी का नुकसान होना है, किसी का फ़ायदा होना है। जिनका फ़ायदा होना है वो सब ताक़तवर लोग हैं, वो मुट्ठी-भर लोग हैं पर बहुत-बहुत ताक़तवर हैं। ये मामला सिर्फ़ एनवायरनमेंटल डिस्ट्रक्शन का नहीं है, ये मामला इकोनॉमिक इनजस्टिस का है। और जिनका नुकसान होना है वो बहुत बड़ी तादाद में, बहुमत में हैं, पर वो सब ग़रीब लोग हैं। तो कुल मिलाकर के खेल ये है कि अरावली के कटने से ग़रीबों के पास जो रहा-सहा, बचा-खुचा, थोड़ा-बहुत भी है वो और ज़्यादा अमीरों की तरफ़ चला जाएगा।
आप कहेंगे, अमीर तो अमीर है उसे ग़रीब को लूटने की क्या पड़ी है? इसलिए क्योंकि ग़रीब बहुत ज़्यादा हैं। इतने ज़्यादा हैं ग़रीब कि उनसे थोड़ा-थोड़ा भी लूटा तो काफ़ी हो जाता है। और फिर बात लालच की है, होगा ग़रीब मुझे तो उसको लूटना है क्योंकि मेरे पास लालच है। क्या होने वाला है?
तो हमने कह दिया, 100 मीटर से नीचे है तो उसको हम मानेंगे ही नहीं कि पर्वत-श्रृंखला है। मानेंगे ही नहीं। तो क्या होगा उसका? वहाँ पर होगी ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग। शुरुआत इससे होगी। ठीक है? ड्रिलिंग-ब्लास्टिंग होगी तो वहाँ पर उड़ेगी ज़बरदस्त क़िस्म की धूल। पत्थर निकलेगा और उस पत्थर को ट्रकों में भर-भर के ले जाया जाएगा। वो जो पहाड़ था वो अब पत्थर हो गया; वो पत्थर भरा जाएगा ट्रकों में और फिर उस पत्थर को तोड़-तोड़ कर क्या बनाया जाएगा? गिट्टी और बजरी। ठीक है?
इन सबका मुनाफ़ा किसको मिलने वाला है? किसको? वो जो माइनिंग का ठेकेदार है, उसको मिलने वाला है। जिसको क्वारीइंग का कॉन्ट्रैक्ट मिला है उसको मिलेगा मुनाफ़ा। और राजनेताओं के संरक्षण से ही मिलते हैं सब ये जो कॉन्ट्रैक्ट होते हैं, उनको मिलेगा मुनाफ़ा।
अब वो पत्थर हट गया, वो जगह लगभग समतल हो गई। बहुत ऊँची तो थी भी नहीं, वो जगह थोड़ी समतल हो गई। तो अब वहाँ पर आएगा बिल्डर और वो वहाँ पर बनाएगा, अरावली ग्रीन्स। और वो कहेगा, “आप यहाँ आइए, यहाँ मैं रिसॉर्ट भी बना रहा हूँ और इको-टूरिज़्म करिए।” तो फ़ायदा किसका हो गया? वो जो बिल्डर है, जो वहाँ पर अब रेज़िडेन्सेस बनाएगा। और जो वहाँ पर फ़ाइव-स्टार होटल्स खुलेंगे; और अमीरों को कहा जाएगा, “आओ, आओ, यहाँ पर इको-टूरिज़्म करो, कहाँ तुम गुड़गाँव में बैठे हुए हो? कहाँ जयपुर में और दिल्ली में बैठे हुए हो? आओ यहाँ पर टूरिज़्म करो।” और वहाँ पर अब वेडिंग डेस्टिनेशन्स भी बनेंगी, और ये सब कुछ होगा।
खूब फ़ायदा दिखाई दे रहा है न, कि नहीं दिख रहा? जो बिल्डर है, रेज़िडेन्शियल बना रहा है, उसको भी होगा; जो बड़ी-बड़ी फ़ाइव-स्टार चेन्स हैं होटल्स की, उनको भी होगा; जो पत्थर उखाड़ कर के ले गया है, उसको भी हो रहा है। और उस जगह पर पानी तो है नहीं, पर वहाँ पर जो रेज़िडेन्शियल प्रॉपर्टीज़ निकलेंगी वो निकलेंगी बहुत महँगी-महँगी। तो वहाँ पर पानी सप्लाई किया जाएगा बोरवेल से, टैंकर से। अब किसका फ़ायदा हो रहा है? वो जो पानी सप्लाई करने वाला है, उसकी भी चाँदी हो गई।
और अमीरों के पास पैसा बहुत है, और दिल्ली इतनी बर्बाद हो गई है कि वो भागना चाहते हैं। तो उनको थोड़ी-सी भी अगर नीची पहाड़ी पर भी कहीं पर कोई बुला लेगा, कि आ जाओ, आ जाओ। यहाँ पर हमने एक नई सोसाइटी बनाई है, नए विलाज़ बनाए हैं। और उसका कुछ इंटरनेशनल सा नाम दे दो, और बोल दो कि देखो, ये ख़ास तरह का डेवलपमेंट हो रहा है; पत्थर काट दिया गया है और एकदम चौड़ी, साफ़ सड़कें बनाई गई हैं। तो लोग पहुँच जाएँगे वहाँ पर। सबका मुनाफ़ा चल रहा है और यही असली खेल है। मीडिया उन्हीं के हाथ में है जिनका मुनाफ़ा होने जा रहा है, तो मीडिया इस पर आवाज़ क्यों उठाए? बोलो।
नुकसान किनका होने जा रहा है? आम आदमी का। नुकसान किसका होने जा रहा है? पेड़-पौधों का, जानवरों का। नुकसान किसका होने जा रहा है? एकदम जो ग़रीब लोग हैं उनका। और नुकसान किसका होने जा रहा है? उनका जो अभी पैदा भी नहीं हुए।
ये चोरी सिर्फ़ ग़रीबों की जेब से नहीं की जा रही, ये चोरी अजन्मी पीढ़ियों की जेब से भी की जा रही है।
क्योंकि अब क्या होगा? अरावली क्या करते हैं? मैं उम्मीद करता हूँ, आप इस पर पहले ही पढ़ चुके होंगे तो बहुत विस्तार की ज़रूरत नहीं है। अरावली क्या करते हैं? अरावली के पश्चिम में क्या है? रेगिस्तान। तो पहली बात, वहाँ से जो गर्म हवा आ रही है उसको अरावली रोकता है; और दूसरी बात, वहाँ से जो धूल आ रही है महीन उसको अरावली रोकता है। और जिसको आप एक्यूआई कहते हैं, वो भी किससे बढ़ता है? क्या नापता है एक्यूआई? एसपीएम (पार्टिकुलेट मैटर)। माने धूल ही नापता है, गैस नहीं नापता एक्यूआई।
अरावली था जो रोका करता था इसी पार्टिकुलेट मैटर को रेगिस्तान से दिल्ली-एनसीआर की तरफ़ आने से। आप काट दो अरावली को, ये सब और आएगा; आप काट दो अरावली को, गर्म हवाएँ और ज़्यादा आएँगी। उन गर्म हवाओं से अमीरों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला उनके पास एसी हैं। उस धूल से अमीरों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला उनके पास फ़िल्टर्स हैं, प्यूरिफ़ायर्स हैं।
और क्या करता था अरावली? अरावली जब; एक तो वहाँ पहले ही बारिश बहुत नहीं पड़ती है। क्यों नहीं पड़ती? क्योंकि अरावली का जो कद है, बहुत ऊँचा नहीं है। ठीक है? और जो मानसून की हवाएँ होती हैं, वो भी अरावली को ऐसे 90 अंश के कोण पर नहीं मारती हैं, वो ऑब्लिकली मारती हैं अरावली को। तो इसीलिए बहुत ज़्यादा बारिश नहीं होती, दो कारणों से: एक तो अरावली का कद ज़्यादा नहीं है। दूसरे, जो कॉलीज़न होता है मानसून विंड्स का, वो परपेंडिकुलर नहीं होता। पर फिर भी कुछ बारिश तो होती थी अरावली से। कुछ तो होती थी।
बारिश का होना ही पर्याप्त नहीं होता है। क्योंकि भारत में बारिश के साथ एक गड़बड़ चीज़ जुड़ी हुई है। क्या? कि मानसून साल में बस तीन महीने के लिए होता है। बहुत सारे दुनिया के देश हैं जहाँ पर जो एनुअल रेनफ़ॉल है वो ऑलमोस्ट ईवनली डिस्ट्रीब्यूटेड होता है, माने प्रतिमाह थोड़ी-थोड़ी वर्षा होती रहती है। भारत में ऐसा नहीं है, भारत में जो ज़्यादातर बारिश है वो जून से लेकर सितंबर के बीच में समाप्त हो जाती है, वो भी ज़्यादा जुलाई और अगस्त में। इससे आशय क्या है? इससे आशय ये है कि बाक़ी समय में कोई बारिश नहीं होती तो पानी बचाना पड़ता है। मानसून में ही गिर गया सारा पानी और उसी पानी का इस्तेमाल साल भर होना है।
पानी बचेगा कैसे? पानी तब बचेगा जब पानी ज़मीन के भीतर चला जाए, तभी तो बचेगा न, ग्राउंड वाटर तभी तो रिचार्ज होगा। पानी नीचे उतना ही जा सकता है जितना उसको सरफेस एरिया मिल रहा है नीचे जाने के लिए। इसको (रुमाल को फैलाते हैं) पूरा फैला दूँ ऐसे। ठीक है? इसको पूरा फैला दूँ और इसको किसी सतह पर रख दूँ और फिर इसमें पानी डालूँ, तो ये कितना पानी सोखेगा? और अगर इसको एकदम ही ऐसा कर दूँ (रुमाल को सिकोड़ देते हैं) और फिर इस पर पानी डालूँ; कब ज़्यादा सोखेगा? जब इसका सरफेस एरिया ज़्यादा होगा।
अब जो पहाड़ी सतह होती है वो ऐसी होती है, असमतल, अनइवन। तो अब्ज़ॉर्प्शन के लिए सरफेस एरिया बढ़ जाता है। तो अरावली, वो जो थोड़ी-बहुत बारिश होती है, थोड़ी-बहुत कीमती बारिश, उसी से काम चलना है राजस्थान का, हरियाणा का और और दिल्ली का। अरावली अपनी असमतल सतह के कारण उस पानी को नीचे जाने का ज़्यादा मौका देता है। आपने उसको क्या बना दिया? एक फ़्लैट, स्मूथ सरफेस, तो पानी गिरेगा और बह जाएगा। बह जाने से पहली बात तो वो अंदर नहीं गया तो ग्राउंड वाटर एक्विफ़र इन्हें कुछ मिला नहीं; दूसरी बात ये जो बह गया ये इकट्ठे बह गया, तो अब आएगी बाढ़।
जो पानी सतह से नीचे चला जाना चाहिए था वो नीचे जाने की जगह एक साथ बह गया, क्योंकि मानसून एक साथ होते हैं दो महीने में बस। वो बह गया। वो बहेगा तो बाढ़ आएगी। बाढ़ में कौन बहेगा? अमीर लोग? नहीं। वहीं पर जो गाँव-निवासी, बस्ती वाले नीचे रहते हैं, वो सब बह जाएँगे। उनके पास न पैसा है, न आवाज़ है, तो उनकी कौन सुनने वाला है?
हम गलत कह रहे हैं अगर हम कह रहे हैं, कि “अरे! अरावली बचाओ।” ये बात अरावली बचाने की है ही नहीं, ये बात आम आदमी को बचाने की है।
भारत में, दुनिया में इनकम इनइक्वैलिटी लगभग सबसे ज़्यादा है। भारत में जो शीर्ष 10-20 लाख लोग हैं इनकम में, वो उतने ही अमीर हैं जितने शीर्ष 10-20 लाख अमेरिकन या 10-20 लाख यूरोपियन। इस बात को अच्छे से समझो।
भारत में अगर इनकम की लिस्ट बनाई जाए तो जो टॉप वन या टू मिलियन हैं, सबसे ज़्यादा आय वाले दस या बीस लाख लोग, उनकी उतनी ही इनकम है जितनी सबसे ज़्यादा आय वाले अमेरिकन या यूरोपियन लोगों की। भारत इतना अमीर है, पर वो सारा पैसा सिर्फ़ ऊपर के 0.1 या 0.5 लोगों के हाथ में है। भारत बहुत-बहुत अमीर है, पर वो सारा पैसा चंद हाथों में है। और ये जो अभी हो रहा है अरावली के साथ, वो उसी लंबी चलती शृंखला की एक और कड़ी है जिसमें ग़रीब के पास जो इतना-सा भी है, उससे नोच करके अमीर को दे दिया जा रहा है। यही है इनकम इनइक्वैलिटी। बात आ रही है समझ में?
तो ये आप गलत देख रहे हो, अगर आप कह रहे हो कि ये तो अरावली के साथ कुछ हो रहा है। ये अरावली के साथ नहीं हो रहा है, ये अमीरों और ग़रीबों के बीच में कुछ चल रहा है।
आप कहते हो, हम सब पर असर पड़ेगा। क्या असर पड़ेगा? हम लोग यहाँ हॉल में बैठे हैं, एसी चल तो रहा है। क्या असर पड़ने वाला है? आपको कभी पानी की क़िल्लत हुई है क्या? बल्कि आपके पास बड़ी गाड़ियाँ हैं, एसयूवी हैं। आप तो ख़ुश रहोगे, आप कहोगे, “डेवलपमेंट हो रहा है डेवलपमेंट; देखो, चौड़ी सड़क बना दी पहाड़ पर।” आपको ये थोड़ी दिखेगा कि उस चौड़ी सड़क ने एक्विफ़र को बाधित कर दिया है। नीचे नाश हो गया, उस सड़क के नीचे सब बर्बाद हो गया। पर ऊपर-ऊपर सड़क जो है चिकनी-चिकनी, चौड़ी-चौड़ी दिखाई दे रही है। आप ख़ुश हो जाओगे।
धूल आएगी, धूल से कुछ भी होता है। कोई भी एक मास हेल्थ प्रॉब्लम जब खड़ी होती है, तो उसमें बहुत डिसप्रपोर्शनेट तरीके से, ग़ैर-अनुपातिक तरीके से ग़रीब ही मारा जाता है। आप पत्थर तोड़ रहे हो, उसमें से धूल उड़ रही है न? वो धूल क्या वो लोग सूँघ रहे हैं जिनके घर में उस पत्थर की अब टाइल्स लगने वाली हैं? उन्हीं पत्थरों की टाइल्स लगेंगी अमीरों के घरों में। पर जब वो खनन चल रहा था और उससे जो माइक्रो पार्टिकल्स उठते हैं खनन से, वो क्या उन अमीरों की नाक में गए थे?
कुछ मिनरल्स भी निकल सकते हैं इन पहाड़ियों पर। वो जो मिनरल्स निकलेंगे, उन मिनरल्स को निकालने की सारी ज़िम्मेदारी किस पर है? वहाँ जो एक ग़रीब वर्कर है। पर उन मिनरल्स का इस्तेमाल कौन करने वाला है?
रात में अपने ज़्यादा सरफेस एरिया के कारण अरावली ठंडी हो जाती है। क्यों? क्योंकि वहाँ पर, राजस्थान में बादल बहुत कम होते हैं। जब बादल बहुत कम होते हैं न, तो जो ओपन सरफेसेज़ होती हैं वो अपनी हीट को स्पेस में वापस रेडिएट कर देती हैं। तो वो जो अरावली ठंडी हो जाती है उसका कुछ असर अगली सुबह तक भी चलता है, अगली सुबह तक भी कुछ ठंडक रह जाती है।
आपने उसको काट-कूट के समतल कर दिया। तो उसकी रेडिएट करने की क्षमता भी चली गई। पहले ही गर्मी इतनी है इस क्षेत्र में जिसकी बात हो रही है, वहाँ गर्मी और बढ़ेगी। लेकिन उस गर्मी का कोई भी असर अपर मिडिल क्लास पर नहीं पड़ना है, मिडिल क्लास पर भी बहुत कम असर पड़ना है। वो जो मज़दूर है, वो जो सड़क पर मोमोज़ बेच रहा है, वो जो रिक्शा चला रहा है, वो जो ऑटो चला रहा है, जो ठेला लगा रहा है, मरेंगे ये। या जो गार्ड हैं, जो जाकर के यहाँ पर इधर-उधर की बस्तियों में रहते हैं, बाहर ड्यूटी कर रहे होते हैं आपके घरों के बाहर, ये मरेंगे। या वो जो घर पे आते हैं फ़ूड डिलीवरी करने, भुगतेंगे ये।
इसलिए आप पा रहे हो कि कोई बड़ी आवाज़ इसमें नहीं बोल रही है, क्योंकि किसी का कोई नुकसान होने जा ही नहीं रहा। सबको ऐसा लग रहा है। नुकसान तो होगा और भरपूर होगा, पर वो नुकसान क्या है इनको दिखाई नहीं दे रहा। बात आ रही है समझ में?
यही काम हिमालय के साथ हुआ है। यही काम वेस्टर्न घाट्स के साथ हुआ है, जहाँ आप लोग हैं, ये जो हमारे पश्चिमी घाट हैं। यही काम समुद्र-तटों के साथ और नदियों के तटों के साथ हुआ है। इकोलॉजिकल डिस्ट्रक्शन हमेशा अनजस्ट होता है। पर्यावरण जब भी बर्बाद किया जाता है, जिन्होंने बर्बाद किया उन्हें नहीं भुगतना पड़ता। जिनका कोई क़ुसूर नहीं है या बहुत कम क़ुसूर है, भुगतना उनको पड़ता है।
और यही कारण है कि क्लाइमेट चेंज को लेकर के दुनिया कुछ नहीं कर रही है। क्योंकि क्लाइमेट चेंज को रोकने की जिनके पास ताक़त है, वही ज़िम्मेदार हैं क्लाइमेट चेंज करने के लिए। लेकिन वो रोकें क्यों जब वो भुगत नहीं रहे हैं। जो क्लाइमेट चेंज कर रहे हैं उन्हें क्लाइमेट चेंज की मार नहीं भुगतनी पड़ रही है, और उन्हीं के पास ताक़त है नीति-निर्धारण की कि वो रोक पाएँ। पर वो नहीं रोकेंगे, नहीं रोकेंगे, नहीं रोकेंगे।
और जो भुगत रहे हैं वो गूँगे हैं और मूर्ख हैं, उन्हें दिखाई नहीं देता कि जिन अमीरों को और नेताओं को और सेलिब्रिटीज़ को और बाबाओं को, तुम अपना आदर्श बनाते हो और पूजते हो वही तुम्हारी ज़िंदगी खा रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: सर, लेकिन करने वाला कोई होता है, भरने वाला कोई होता है। तो पड़ोसी राज्य के; मतलब हम अगर महाराष्ट्र से हैं, तो हम उनके प्रति जो करुणा रखते हैं।
आचार्य प्रशांत: आप वो करुणा को वेस्टर्न घाट्स के लिए रख लीजिए न। आप चलिए महाराष्ट्र से हैं तो आप छोड़िए अरावली को। भारत का सबसे रिच, लेकिन सबसे सेंसिटिव और थ्रेटेंड इकोलॉजिकल हॉटस्पॉट तो महाराष्ट्र में ही है। महाराष्ट्र से शुरू करके केरल तक आप उसका ही ख़्याल रख लो। आप उसका भी क्या ख़्याल रख रहे हो?
बड़ा अच्छा लगता है। वो कहते हैं, फ़ार्म हाउसेज़ बन रहे हैं फ़ार्म हाउसेज़। शहर से दूर पहाड़ काटकर फ़ार्म हाउसेज़ बन रहे हैं। हमें भी लगता है, अब हम प्रकृति के क़रीब आ गए। प्रकृति को बर्बाद करके तुम प्रकृति के क़रीब आ गए हो। चलो, बढ़िया है। हमारे पास फ़ार्म हाउस है।
सबसे गंदे इनके नाम होते हैं; इनके नामों में होगा, इको, ग्रीन, नेचर, ट्रीज़, पाइनस, द सिंगिंग रिवर, द ब्लू स्काई। और वहाँ पर एक-एक यूनिट होगी पाँच-पाँच करोड़ की, पाँच करोड़ से शुरू करके, पाँच करोड़ से पच्चीस करोड़ तक। और नाम उसका ऐसे दिया जाएगा जैसे बिल्कुल जंगल ही है।
हक़ीक़त ये है कि जंगल को काटकर वो सब बनाया गया है, जंगल था। फिर जितने धनाढ्य लोग हैं, जब जाएँगे, तो उन्हें गोल्फ़ भी खेलना होगा। और वो बड़ी ग्रीन-सी जगह लगती है न, गोल्फ़ का मैदान। वो जो ग्रीन है वो बस घास है। वो उतनी बड़ी जो जगह है, जहाँ पर आप खड़े हो जाते हो वो बग्गी लेकर के; इतनी बड़ी जो जगह है वहाँ सिर्फ़ घास कैसे बची? वहाँ पहले क्या रहा होगा? क्या रहा होगा? वो जंगल था।
अमीरों के पसंदीदा खेल भी इकोलॉजिकली डिस्ट्रक्टिव होते हैं। बहुत सारे गोल्फ़ ग्राउंड्स बनने वाले हैं!
और फिर सुप्रीम कोर्ट इस मामले को देख रहा है। बेहतर क्वालिफ़ाइड है, बेहतर जानते होंगे। लेकिन मैं जहाँ से देख रहा हूँ, ये संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है: राइट टू लाइफ़ का। क्योंकि राइट टू लाइफ़, ख़ुद सर्वोच्च न्यायालय की परिभाषा के अनुसार राइट टू लाइफ़ में राइट टू हेल्थ, राइट टू डिग्निटी, ये सब आता है। राइट टू लाइफ़ माने राइट टू अ डिग्निफ़ाइड लाइफ़। अगर कोई फ़ैसला ऐसा है जिससे लाइफ़ पॉल्यूटेड हो जाएगी, तो वो आर्टिकल 21 का उल्लंघन है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। सो, फ़र्स्ट ऑफ़ ऑल, मैं आपका धन्यवाद करना चाहता हूँ। एक, डेढ़, दो साल पहले आप हमारे जीवन में आए, आपके विचारों के माध्यम से। और आप जब आए तो हमने देखा कि आप पहले ऐसे व्यक्ति थे जो बिना ईगो के आ रहे हैं; बिना वो वस्त्रों के, मालाओं के, और केवल प्योर विचारों के साथ आ रहे हैं। और केवल आप नहीं आए, बड़े ज़ोरदार तरीके से आपके साथ कबीर साहब आए, बोध आया, और श्रीकृष्ण जी आए। घर में आए तो बच्चों के साथ भी बातें शुरू हुईं, आपके विचार बच्चों तक पहुँच रहे हैं।
ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में काम करते हैं, तो पहले के जो दुख थे जो अभी हास्यास्पद लगने लगे हैं। बट अभी जो दुख आ रहे हैं, अभी जो बेचैनी आ रही है, ये काफ़ी बेचैन करता है। क्योंकि जब कॉर्पोरेट वर्ल्ड में हम बात करते हैं और इसी मुद्दे पर काम होता है, ऐज़ एन ऑटोमोटिव हमको आजकल सस्टेनेबिलिटी और CO₂ न्यूट्रैलिटी की बड़ी बातें चल रही हैं।
बात ये होती है कि हमें धरती को बचाना है तो हमें ये-ये चीज़ें करनी हैं, स्कोप वन करना है, स्कोप टू करना है, इलेक्ट्रिसिटी पर काम करना है। और हम बड़े प्रवचन देने लगते हैं, हमारे सभी लोगों को कि हमें ये करना है, वो करना है। बट वो करते समय काफ़ी छोटा महसूस होता है क्योंकि उसी समय हमें दिख रहा है कि अभी अरावली की बात हो रही है; उसी समय हम सोच रहे हैं कि हम छोटे-छोटे क्रियाओं से कुछ बचा लें, और उसी समय दिख रहा है इतने बड़े वॉर्स हो रहे हैं।
हर दिन इतनी CO₂ न्यूट्रैलिटी की एक तरफ़ हम बात कर रहे हैं, उसके हज़ारों-करोड़ों गुना हर दिन ये सब चीज़ें हो रही हैं। ऑर्गनाइज़ेशन्स आर वेरी ईगर, बिकॉज़ दे नाउ सी द प्रॉफ़िट फ्रॉम द CO₂ न्यूट्रैलिटी प्रोजेक्ट। और अमीरों की जो थॉट प्रोसेस है प्रॉफ़िटेबिलिटी की तरफ़ भी पूरी दुनिया झुक रही है, और वो काफ़ी पावरफ़ुल है; और ये दुखद है।
जब हम घर में बच्चों के साथ बातें करते हैं, ये विचार बच्चों तक पहुँचाते हैं, कहीं-न-कहीं ये डर लगता है कि हम उन्हें बता रहे हैं बट हम जी नहीं रहे हैं। तो वो एक बेईमानी अंदर से हर तरफ़, हर दिन आती है कि हमें बताना भी है, अंदर बेईमानी भी है। ऑफिस में भी बात हो रही है बट अंदर बेईमानी है। हम बात कर रहे हैं कि हमको धरती बचानी है। तो इसमें आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: पृथ्वी आपकी अकेले की थोड़ी है। यहाँ बेईमानी नहीं है अभी, अभी समझ में कमी है। आप सोच रहे हो कि गीता आपकी ज़िंदगी में आ गई या संतवाणी आ गई, तो आप किसी तरह के महामानव बन जाओगे। और आप जा करके खड़े होकर के वहाँ पर जो स्टोन क्रशर चल रहा होगा या जो जेसीबी लगी होंगी, आप ऐसे (हाथ से रोकने का इशारा करते हुए) करोगे उनको रोक लोगे। आप ऐसे कर लोगे क्या?
भगवद्गीता से आशय क्या आपने श्रीकृष्ण की उस कथा से लिया कि उन्होंने सूरज को पहले अस्त करा दिया और फिर कहा, बाहर आ जाओ, हाँ भाई, मार दो जयद्रथ को? पृथ्वी आपकी अकेले की नहीं है, और न आपने अकेले ने नष्ट करी है। तो आप अकेली ग्लानि, माने व्यक्तिगत ग्लानि रख के भी क्या कर लोगे? वो भी एक तरह की बेईमानी है।
जो भी संकट हैं, चाहे वो अरावली के हों, चाहे जलवायु के हों, चाहे वन्य प्रजातियों की विलुप्ति के हों, वो आपने करा है सब क्या? आपने करा है? तो आप बैठकर के कहो कि “नहीं, मुझे तो गिल्टी फ़ील करना है, मुझे तो बुरा अनुभव होना चाहिए, मैं दोषी हूँ।” तो ये भी क्या है?
पृथ्वी सबकी है, तो उसे बर्बाद भी करने में एक बड़ी संख्या में लोगों का हाथ रहा है। कुछ लोगों ने सक्रिय रूप से करा है और कुछ लोगों ने परोक्ष रूप से करा है, अपनी निष्क्रियता से करा है। लेकिन हाथ सबका रहा है।
एक आदमी है जो ऐसे बर्बाद कर रहा है कि वो जाकर के जंगल काट रहा है, तो उसने ऐसे बर्बाद किया। और बाक़ी हैं वो ऐसे बर्बाद कर रहे हैं कि जंगल काटने वाले आदमी को पूज रहे हैं, बाकियों ने ऐसे बर्बाद किया। और जंगल काट के जो उत्पाद निकल रहा है, वो उसको भोग रहे हैं कंज़्यूम कर रहे हैं, बाकियों ने ऐसे बर्बाद किया। हाथ सबका है। तो आप अकेले क्या कर लोगे? तो व्यक्तिगत गिल्ट से लाभ क्या होने वाला है?
और यहीं से फिर समाधान निकलता है। जब पृथ्वी सबकी है और सबने डायरेक्टली या इनडायरेक्टली बर्बाद करी है, तो अगर पृथ्वी बचेगी भी तो सिर्फ़ तब बचेगी, जब?
श्रोता: जब सब जगेंगे।
आचार्य प्रशांत: जब सब जगेंगे। आपका काम ये नहीं है कि आप कहो, कि “अरे, ये फलानी चीज़ हो रही है, मैं उसको रोक नहीं पा रहा।” आपको रोकने का काम जो कुछ भी गलत हो रहा है; कहीं स्लॉटर हाउस है, आपका ये काम नहीं है कि जाकर के स्लॉटर हाउस में घुस के आप रोक दोगे। आप फ़िल्मी हीरो थोड़ी हो।
आपका काम है कि आप पूरी जान लगा दो ये सूचना और चेतना फैलाने में, कि मांसाहार क्या होता है, कि वन्य प्राणियों की विलुप्ति और जलवायु परिवर्तन में क्या रिश्ता है। क्योंकि वो स्लॉटर हाउस तभी तक चल सकता है जब उसका माल ख़रीदने वाला कोई हो। और जब तक उसका माल ख़रीदने वाला कोई है; आपने मान लीजिए उस स्लॉटर हाउस में जाकर डायनामाइट भी लगा दिया, तो क्या होगा? क्या होगा? उसके बहुत विकल्प हैं। जो उसके प्रतिस्पर्धी हैं उनको फ़ायदा हो जाएगा। और जहाँ आपने डायनामाइट लगा भी दिया, छह महीने बाद आप पाओगे वो दोबारा खड़ा हो गया।
ये समस्या आम आदमी की चेतना की है। और आम आदमी की चेतना को ही ठीक करके इसका उपचार हो सकता है। आप लोग समझ क्यों नहीं रहे इस बात को?
कभी आपको लगता है टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन से उपचार हो जाएगा, और कभी आपको लगता है पॉलिसी मेज़र्स से हो जाएगा। और कभी जब आप ज़्यादा ईमानदार हो जाते हो तो आपको लगता है कि पर्सनल इंटरवेंशन से हो जाएगा, पर्सनल हीरोइज़्म से हो जाएगा। इनसे किसी से नहीं होने वाला। सबने बर्बाद करा है, तो बचाएँगे भी?
श्रोता: सब।
आचार्य प्रशांत: सभी। और अगर सब नहीं बचा रहे, तो कोई एक सुपरमैन आकर नहीं बचा सकता। बात आ रही है समझ में?
आपको दिखाई दे रहा है, वो बकरा है वो कट रहा है। आप कैसे रोक लोगे? जो काट रहा है, वो बोलेगा, “बकरे पर मेरा भी हक़ है, भाई। मैंने ख़रीदा है।” आप क्या कर लोगे अब? वो कहेगा, “इस पृथ्वी पर जितने भी जानवर हैं, वो सब तेरे हैं क्या? मैं उन्हें मारना चाहता हूँ। पृथ्वी मेरी भी है, मैं मारना चाहता हूँ।” आप कहेंगे, “पृथ्वी मेरी है, मैं बचाना चाहता हूँ।” वो कहेगा, “पृथ्वी मेरी भी है, मैं मारना चाहता हूँ।” आप उसे कैसे रोक लोगे? इंसान को जागृत किए बिना कोई समाधान नहीं है।
तो आपने अगर गलती करी भी है, जिसकी आपको ग्लानि होनी चाहिए, तो वो ये है कि आपने संख्या-बल नहीं बढ़ाया। सौ बार बोलता हूँ, संख्या-बल बढ़ाओ। संख्या-बल बढ़ाओ। जान लगा दो लोगों को जोड़ने में अपने साथ, पर आप जान लगाने से बेहतर समझते हैं गिल्ट को पालना। आप अपने अँधेरे कोने में कमरे में बैठकर गिल्टी अनुभव कर लेंगे, पश्चाताप कर लेंगे, रो लेंगे, ख़ुद को ही दोषी, अपराधी घोषित कर लेंगे; ये चलता है आपका। लेकिन आप ये नहीं करोगे कि घर से बाहर निकलकर खड़े हो जाओ और कहो कि एक हज़ार लोगों को जोड़कर दिखाऊँगा। ये आप नहीं करोगे।
गिल्ट कन्वीनिएंट है। गिल्ट में, अपराध-भाव में सुविधा है, सुरक्षा है, और बाहर निकलकर साहसपूर्ण निष्काम कर्म करने में अहंकार को ख़तरा है, तो वो नहीं करता। वो कहता है, “हाँ, मैं तो बुरा हूँ, मैं तो दोषी हूँ, मुझे दोषी मान लो, मुझे दो चप्पल मार दो। वो ठीक है।” लेकिन मैं युद्ध में नहीं उतरूँगा। आप युद्ध में नहीं उतरना चाहते।
आप कायर कहलाने की पीड़ा झेलने को तैयार हो। आप भगोड़ा कहलाने का दोष लेने को तैयार हो। लेकिन आप युद्ध में उतरने को तैयार नहीं हो।
आप जिस व्यक्ति से सवाल पूछ रहे हो, उसने क्या करा? आप बताओ तो उसने क्या करा? क्या मैंने इंतज़ार करा कि मैं एक संस्था बना दूँ, उस संस्था का एक बोधस्थल बना दूँ और उसमें जिसको आना हो वो आएगा, जिसको नहीं आना वो नहीं आएगा? मैंने करा क्या? मैंने क्या करा? मैंने आपका इंतज़ार नहीं करा। आप अगर आज यहाँ बैठे हो, तो इसलिए बैठे हो क्योंकि मैं आपके घर में घुस गया था। आप मेरे पास नहीं आए थे, मैं आपके मोबाइल के अंदर घुस-घुसकर आपको यहाँ लेकर आया हूँ। और एल्गोरिद्म मुझे सपोर्ट नहीं कर रहा था। तो जो कुछ मेरे पास था, जितने संसाधन थे वो मैंने सब प्रचार में लगा दिए ताकि मैं आप तक पहुँचूँ, ताकि संख्या-बल बढ़े।
मैं ये थोड़ी कह सकता था कि जब इनकी मर्ज़ी होगी तब समझ ही लेंगे, आप अपना काम करते रहिए बाक़ी लोग धीरे-धीरे आ जाएँगे। अरे, समय नहीं है इतना, कैसे आ जाएँगे? दस-बीस साल मेरे पास हैं? दस-बीस साल पृथ्वी के पास भी हैं? मैं कैसे प्रतीक्षा कर लूँ कि जब लोगों को अपनी ओर से बात समझ में आएगी तो आ जाएँगे। अपनी ओर से क्या समझ में आएगी? गीता तो शताब्दियों से है। अपनी ओर से आ गई थी क्या समझ में? आ गई थी?
पर ये मूर्खों का बल्कि बेईमानों का पसंदीदा तर्क होता है, कि “आप इतनी ज़बरदस्ती और इतना प्रचार क्यों करते हैं? आप अपनी बात कहिए, जिसको सुननी होगी, जिसको समझनी होगी, वो ख़ुद ही आ जाएगा अगर बात में दम होगा।” तो क्या श्रीकृष्ण की बात में दम नहीं था? श्रीकृष्ण की बात में तो पूरा दम है, पर गीता समझी कितनों ने? बात में दम होना पर्याप्त नहीं होता, अहंकार के घर में घुसकर उसको मारना पड़ता है।
संख्या-बल बढ़ाने के लिए जो करना हो करो, क्योंकि आम आदमी ही है जो उत्तरदायी है। अगर अपनी सक्रियता के द्वारा नहीं, तो अपनी निष्क्रियता के द्वारा उत्तरदायी है वो। जब तक उसको जगाओगे नहीं, तब तक रोने से कुछ नहीं मिल जाएगा कि “अरे-अरे, मैं क्या करूँ? पृथ्वी बर्बाद हो गई मेरे जीते-जी, मैं कुछ कर नहीं पाया। मैं महा-अपराधी हूँ।” रो लो।
और मुझे सबसे ज़्यादा समस्या न ये जो तथाकथित इज़्ज़तदार लोग होते हैं, इनसे होती है। जो कहते हैं, “भाई, देखो, हम सीरियस क़िस्म के लोग हैं। हम थोड़े ही जाकर के अब पाँच लोगों को इकट्ठा करेंगे, उनको कुछ बताएँगे। हम तो बस मतलब, हम ख़ुद समझ रहे हैं, हम ख़ुद सुन रहे हैं।”
भाई, ये कृष्णमूर्ति का समय नहीं है कि आपने बहुत अपनी ऊँची जगह पर बैठकर बातें बोल दीं। जिसको सुननी है, सुनी। जिसको नहीं सुननी, तो नहीं सुनी। ये समय घर में घुसने का है, ये समय अपमान का दर्द उठाने का है। उसके पास भी जाने का है, जिसके पास पता है जाओगे तो वो आपके मुँह पर थूक देगा। फिर भी उसके पास जाओ। पर हमारी कम्युनिटी में भी बहुत ज़्यादा इज़्ज़तदार लोग हैं, और वो एक तरह का प्रायश्चित करने के लिए डोनेशन कर देते हैं। वो कहते हैं, “हम तो कुछ नहीं कर पा रहे, पर हमें पता है हम कुछ नहीं कर पा रहे तो एक काम करिए इस बार ये ₹1000 ज़्यादा डोनेशन रखो।”
रखो अपनी जेब में अपनी डोनेशन, संस्था तुम्हारी डोनेशन इकट्ठा करने के लिए थोड़ी है। संस्था का एक मिशन है, अगर वो मिशन ही नहीं पूरा हो पाया तो इस डोनेशन का क्या करेंगे। और थोड़ा सा समय है।
आप लोग बहुत ज़्यादा इज़्ज़तदार हो। आपकी बिल्कुल ऐसे जान सूख जाती है अगर कोई आपको वो जो माँ-बहन वाली गाली होती है, वो तो दूर की है; कोई आपसे कड़े रुख़ में भी बात कर दे तो आपको लगता है, “अरे यू नो, दैट्स अ ब्लॉट ऑन माय रिस्पेक्टेबिलिटी।”
मुझे कई बार सलाह दी गई है कि यूट्यूब पर जो कमेंट्स आते हैं उनको मॉडरेट क्यों करवाते हैं? देखने दीजिए न पूरी जनता को कि हिंदुस्तान कैसा है। मैंने कहा, भाई, देखो, अगर विरोध आ रहा हो तो विरोध बिल्कुल पब्लिश कर दो, कमेंट में या जो भी हो। डिसेंट से विरोध से, असहमति से मुझे कोई समस्या नहीं है। पर कहीं कोई विरोध नहीं है, कोई असहमति नहीं है सिर्फ़ और सिर्फ़ गालियाँ हैं, गालियाँ। सिर्फ़ और सिर्फ़ गालियाँ। किसी के पास बौद्धिक तल पर विरोध करने के लिए कोई तर्क है ही नहीं। या तो गालियाँ हैं या झूठ है, मिसइन्फ़र्मेशन। मिसइन्फ़र्मेशन, और वो तो मैं पब्लिश नहीं होने दूँगा। वो मेरी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि अगर मैं झूठ को, मिसइन्फ़र्मेशन को पब्लिश होने दे रहा हूँ तो इसका मतलब है मैं उसको फैलाने में साझेदार हो गया।
मैं अपना प्लेटफ़ॉर्म, मैं छह करोड़ लोगों का प्लेटफ़ॉर्म किसी झूठ बोलने वाले का कमेंट पब्लिश करने के लिए क्यों इस्तेमाल होने दूँ। उसको झूठ बोलना भी है तो जाकर ख़ुद बोलना अपना तेरा जो भी है। पर हम वो गालियाँ खाते हैं, रोज़ खाते हैं। आपको गाली खाने से बहुत समस्या है, आप अपनी नाज़ुक-सी इज़्ज़त बचाए घूम रहे हो। “नहीं, नहीं, नहीं; नो, नो, नो।”
किसी को वीडियो फ़ॉरवर्ड करते भी हो, कई बार देखता हूँ। लोग दिखाते हैं कि फ़ॉरवर्ड करा है हमने किसी को, उसका व्हाट्सऐप स्क्रीनशॉट भेज देंगे, “ये आचार्य जी का वीडियो देखो।” तो उसमें क्या लिखा हुआ है? “यू मे कंसीडर लिसनिंग टू हिम।” क्या ये तुमने फ़्री-स्पीच की वर्कशॉप चला रखी है? क्या है ये? ख़ुद तो कह रहे हो कि तुम्हें इतना फ़ायदा हुआ है कि तुम्हारी ज़िंदगी बदल गई। तो बाहर आकर घोषणा क्यों नहीं करते हो उसी आदमी के सामने, जिसको ये फ़ॉरवर्ड कर रहे हो।
क्या नहीं है तुम्हारे पास? ईमानदारी नहीं है, कि ग्रैटिट्यूड नहीं है? बोलो न उसको, ये लिख के क्यों भेज रहे हो कि “दिस कैन बी कंसीडर्ड?” लिखो, “दिस मैन चेंज्ड माय लाइफ़।” और इसलिए नहीं कि ये जो आदमी खड़ा है वो तुम्हारा अनुग्रह या ग्रैटिट्यूड साथ लेकर मरेगा, इसलिए क्योंकि जब ये लिखोगे तो बात फैलेगी। और इसलिए क्योंकि ये बात जो तुम लिखोगे वो झूठ नहीं है वो सच है, और सच नहीं है तो मत लिखना। पर ख़ुद ही मेरे सामने आकर बोलते हो, अभी आपने बोला, “आचार्य जी, आपने मेरी ज़िंदगी बदल दी, ये कर दिया, वो कर दिया, ये कर दिया।” तो ये मुझे क्यों बता रहे हो, यार। जाकर पूरी दुनिया को बताओ न।
पूरी दुनिया को तो तुम बताते नहीं। जब पूरी दुनिया को बताते नहीं, तो संख्या-बल बढ़ता नहीं। जब संख्या-बल नहीं बढ़ता, तो इस प्लैनैटरी-क्राइसिस को कैसे रोकें हम? सारी लड़ाई हमने डिजिटली लड़ी है क्योंकि ये समय ब्रिक-एंड-मॉर्टार का नहीं है। ये समय नहीं है कि मैं कहीं पहाड़ पर जाकर कोई आश्रम बना दूँ और उसमें अधिक-से-अधिक हज़ार लोग आ सकते हैं, या दो-हज़ार आ सकते हैं। हज़ार-दो हज़ार से क्या होगा? और पैसा बहुत लग जाएगा हज़ार-दो हज़ार बनाने में। न हमारे पास पैसा था और न हमें कोई आश्रम बनाने में कोई लाभ दिखाई दिया।
काम सारा हमारा डिजिटल है और डिजिटल काम इस वक़्त वैलिडिटी पाता है एआई से, क्योंकि डिजिटली तो बहुत सारी वॉइसेज़ हैं जिसके जो मन में आता है वो लिख देता है सोशल मीडिया पर, इधर-उधर, वेबसाइट पर, ब्लॉग पर। लोग सब कुछ लिखते रहते हैं अपना। उसमें से क्या सही है, क्या गलत है, उसका जज अब कौन बन बैठा है? एआई बन बैठा है। आपको कहीं कुछ बात तय करनी होती है तो आप जाकर चैट से या ग्रॉग से पूछते हो, “ग्रॉग, प्लीज़ टेल मी द रियलिटी ऑफ़ दिस।”
आपने कभी सोचा कि चैट, ग्रॉग, जेमिनी ये आपको रियलिटी कैसे बता पाएँगे अगर वो रियलिटी आप ख़ुद ही बाहर जाकर डिक्लेयर नहीं कर रहे हो तो। जो हमारे काम को रोकने वाले लोग हैं वो छतों पर चढ़कर चिल्ला रहे हैं, डिजिटली। और एआई उनकी बात को पिक करता है रेडिट से, कोरा से। और हमारे काम को लेकर जब कोई सवाल पूछा जाता है तो एआई उनकी बात बता देता है, क्योंकि आप लोग इतने इज़्ज़तदार हो कि आपके मुँह में ज़ुबान नहीं है। अब इज़्ज़तदार हो या डरपोक हो, आप जानो। पर मुझे ये पता है कि ग्लानि से कुछ नहीं होता।
अपने आप को कहना रह गया, “मैं तो क्या करूँ? मेरी नियत अच्छी थी, पर मैं कुछ कर नहीं पाया आचार्य जी, आपके लिए या कि इस पृथ्वी के लिए कुछ कर नहीं पाया।” तो मैं तो आपसे कहूँगा कि जाओ, देखो, क्या कहती हैं हमारी किताबें, “न दैन्यं न पलायनम्,” दीनता जैसी कोई चीज़ नहीं है। मुझे तो दिख भी गया होगा मैं लड़ाई बुरी तरह हार चुका हूँ और आख़िरी दिन, आख़िरी मिनट है मेरा, मैं तब भी लड़ रहा हूँगा। मुझे पता होगा ये हारी हुई लड़ाई है इसमें कुछ नहीं है। मैं ये थोड़ी कहूँगा कि मैं बैठ के रोऊँ, अब तो कुछ हो नहीं सकता, अब तो बस छूट गई, अब तो मरने का समय आ गया।
लेकिन आप लोगों को दीनता बहुत प्यारी है। इतनी बार बोला, वेदान्त में मजबूरी, विवशता, ऐसी कोई चीज़ होती नहीं है। क्यों कह रहे हो कि मैं इस वजह से रुका हुआ हूँ। कोई वजह नहीं है। और ये तुमसे कहा नहीं जा रहा है कि सुबह की फ़्लाइट लेकर ब्राज़ील चले जाओ, और अमेज़न की आग को तुम्हें अकेले और निहत्थे बुझाना है। ये बोला क्या? ऐसा बोला? कोई असंभव काम करना है?
जिन गाँवों में, जिन शहरों में, जिन सोसाइटिज़ में, जिन मेट्रोस में आप रह रहे हैं वहीं पर जितने ज़्यादा लोगों को हो सके सैकड़ों को, हज़ारों को, आपको जगाना है। ये करना है। पर आधे तो यहाँ पर आए भी छुप-छुप के होंगे। कईयों की धुकधुकी बँधी होगी कि कहीं अकाउंट स्टेटमेंट में दिख न जाए यहाँ का टिकट ख़रीदा है। तो उन्होंने अपने किसी दोस्त वग़ैरह के खाते से ख़रीदा होगा।
संस्था से आपका रिश्ता वैसा ही है जैसा कुंती का सूर्य से था, कि प्यार तो है पर ज़माने को नहीं बता सकते। और फिर उससे महाभारत ही होती है। कर्ण को बहाया नहीं होता न, तो महाभारत भी नहीं होती। आप अपने कर्ण को रोज़ बहा देते हो, और सूर्य का अस्त होगा; यहाँ कोई देवता नहीं खड़ा हुआ है ये सूरज तो ढलेगा। फिर ग्लानि करते रह जाना।
मुझे कबीर साहब से जो मिला, वो मैंने छुपा कर रखा? कमरा बंद करके, बाथरूम बंद करके, धीरे-धीरे, चुपके-चुपके गाता था? या निकला इस ज़माने में और दहाड़ दिया? बोलो। और आज नहीं, आज से सात-आठ साल पहले बोला था कि मर रहा होऊँगा तो एक निर्गुणी भजन सुना देना साहब का। ये गंगाजल वग़ैरह लाने की कोई ज़रूरत नहीं है। याद है? वीडियो के शीर्षक में शायद “फ़ैन बॉय” लिखा हुआ है।
तो मुझे तो अगर प्यार है तो मैंने ऐलान भी किया। आपका कौन-सा प्यार है? कि प्यार भी करना है और इज़्ज़त भी बचानी है। मैं तो कुंती हूँ और रोऊँगी फिर टप-टप-टप-टप। नहीं है समय आँसू बहाने का भी। बहुत दुख हो रहा हो अपने आसपास जो हो रहा है उसको देखकर, तो भी आँसू मत बहाओ। दुख जितना बढ़े उतना हथियार उठाओ, लड़ो। आँसू बहा के क्या मिलेगा?