रामकृष्ण परमहंस ने ख़ूब प्रयोग किए। वे मानने वाले लोगों में नहीं थे। ये होता है आध्यात्मिक चित्त: वो जानने से, प्रयोग करने से नहीं डरता। रामकृष्ण कह रहे हैं, “जो तुम्हारी मान्यता है, उसी का परीक्षण करो। तुम्हारी वर्तमान स्थिति से ही तुम्हारी मुक्ति का मार्ग निकलेगा: यतो मत, ततो पथ।” जंगल से गुज़र कर ही जंगल से बाहर आते हैं न! यही वो कह रहे हैं कि जहाँ फँसे हो, उसी जगह को ठीक से देखो। मुक्त होने के लिए बंधन को ही साफ़-साफ़ देखना पड़ता है। उसको पहचान लिया, तो मुक्त हो जाओगे।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, रामकृष्ण परमहंस जी का एक कहावत है कि “जतो मत, ततो पथ।” ये कहावत प्रसिद्ध क्यों है और इसका अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: ये बहुत कमाल की बात बोली थी रामकृष्ण जी ने। हर आदमी ये बात बोल नहीं सकता। और इतनी आसानी से इसका मतलब भी समझ में आएगा नहीं। लेकिन बहुत गहरी बात है। बहुत अद्भुत बात है। जो इस बात को समझ गया, वो समझ लो कि स्वयं को समझ गया, वेदान्त को समझ गया, दुनिया को समझ गया, मन को समझ गया और फिर तर भी गया; मुक्त हो गया।
तो उन्होंने क्या बोला है कि “यतो मत, ततो पथ।” हिंदी में कहेंगे “यत मत, तत पथ।” उन्होंने बंगाली में बोला है। तो इसका अर्थ है कि, मत माने तुम्हारा विचार, ओपिनियन और पथ माने रास्ता। रास्ता माने मुक्ति का रास्ता, तुम्हारा जो आध्यात्मिक रास्ता है उस रास्ते की बात कर रहे हैं। तो ऊपर-ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे उन्होंने बोला है कि भई! जैसा तुम्हारा विचार है, जैसा तुम्हारा मत है, उसी के अनुसार रास्ता तुम्हारे लिए ठीक है।
तो इसके अर्थ करे गये हैं। और जितना मैं देख पा रहा हूँ, तो मैं तो यही निवेदन करता हूँ कि ऐसे लोग हैं जिनको ये बात बहुत प्यारी लगी है, और वो इसके बड़े समर्थन में हैं। कहते हैं, "हाँ, बिलकुल सही बात है, कि यतो मत, ततो पथ।" और ऐसे भी लोग हैं जिनको ये बात बिलकुल बर्दाश्त नहीं हुई है और वो कहते हैं, ‘एकदम ही ग़लत बात है।’ और मैं कह रहा हूँ कि जो इस बात का समर्थन कर रहे हैं, शायद वो भी पूरी तरह समझते नहीं हैं इस बात का अभिप्राय। अर्थ ही नहीं समझते पर समर्थन कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है अच्छी बात है। और जो लोग इस बात का विरोध कर रहे हैं, वो तो और बिलकुल नहीं समझते कि बोला क्या गया है।




