पशु प्रेम या सिर्फ दिखावा?

Acharya Prashant

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पशु प्रेम या सिर्फ दिखावा?
हम जो एनिमल लवर भी बनते हैं, तो आमतौर पर क्या करते हैं, मुझे आसपास जो दिख रहा है, मैं उसका ख़्याल कर लूँगा। तो ये तो तुम्हारा बहुत संयोग से रिश्ता बना न, बोध की बात तो ये है कि मैं देखूँ कि पूरी पृथ्वी पर क्या चल रहा है और उसके लिए काम करूँगा। और बिल्कुल ये हो सकता है कि जितना समय आप चार जानवरों की सेवा में लगा रहे हो, उतना समय अगर आप जानवरों के लिए सही तरीक़े से लगा दो, तो आप 4 हज़ार जानवर बचा दो। तो बताओ, फिर ये चार जानवरों की सेवा करना प्रेम हुआ या हिंसा? यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। तो आचार्य जी, मुझे पाँच महीने हो गए, अपनी मदर की डेथ के बाद से मैं आपके साथ जुड़ा हुआ हूँ। और गीता सत्रों से अराउंड दो-ढाई महीने से जुड़ा हूँ।

तो मदर की डेथ के बाद अभी मेरा यही शेड्यूल चल रहा है, अभी मैं दिन भर बस आपकी वीडियोज़ देख रहा हूँ और साथ में बस यही इन्फ़ॉर्मेशन कलेक्ट कर रहा हूँ जितनी कर पा रहा हूँ। तो आज मेरा जो प्रश्न है वो है आत्मस्थ होने के बारे में, मैं एक्चुअली कन्फ़्यूज़्ड हूँ कि आत्मस्थ होना है क्या? क्योंकि अगर हम आत्मस्थ हो रहे हैं इसका मतलब हम किसी चीज़ से अटैचमेंट रख नहीं पा रहे अपनी। तो फिर मैं कन्फ़्यूज़ हूँ कि हम नेचर को, एनवायरमेंट को, जानवरों के प्रति प्रेम, वो चीज़ कैसे मैनेज करें?

मुझे ये चीज़ समझ नहीं आ रही कि हम देशभक्ति ये चीज़ें, आप सभी का बता रहे हो कि देशभक्त होना चाहिए, देश के बारे में जानना चाहिए। तो मैं अपने आप को पा रहा हूँ कि मैं इन चीज़ों से अब जुड़ रहा हूँ, इन्हीं से अटैच हो रहा हूँ कि मैं एनवायरमेंट से अटैच हो रहा हूँ, कि हाँ एनवायरमेंट के लिए अच्छा करूँ। या जानवरों को खाना वग़ैरह दे रहा हूँ, वो चीज़ देख के मेरे को सुख मिल रहा है। वो स्टेबल सिचुएशन मेरी अभी भी नहीं है, इस चीज़ के बारे में कन्फ़्यूज़न है मुझे थोड़ी।

आचार्य प्रशांत: अटैचमेंट और प्रेम अलग-अलग बातें होती हैं न, अटैचमेंट का मतलब होता है, उससे जुड़कर मुझे कुछ मिल जाएगा। और प्रेम का मतलब होता है, उससे जुड़ रहा हूँ उसको कुछ देने के लिए।

अटैचमेंट में ये भी हो सकता है कि उससे जुड़ूँगा तो थोड़ा उससे लिया, थोड़ा उसका दिया, ये भी हो सकता है। लेकिन ये लेन-देन वहाँ होता ज़रूर है, और जहाँ लेन-देन होता है फिर वहाँ हिंसा होती है। कभी हुआ है कि लेन-देन चल रहा है और मोल-भाव न किया हो, जब मोल-भाव करते हो तो प्रेम में करते हो? जब बारगेनिंग होती है तो कैसे हो जाते हो? आक्रामक। देखा है? “देख लो भैया, देना है तो ठीक है नहीं तो अगली दुकान!” ये सब प्रेम के वक्तव्य तो नहीं होते न।

और अटैचमेंट, पहली बात उसमें लेन-देन बहुत होता है, दूसरी बात वो अंधा होता है उसमें कोई बोध नहीं होता। समय भरपूर मिला हो किसी भी विषय के साथ, संयोग बैठा हो, नज़दीकी हो गई हो, माने स्थान सही बैठ गया हो तो तुम पाओगे कि अटैचमेंट हो जाता है। जुड़ाव, आसक्ति, जो बोलो।

कितने लोग हॉस्टल वग़ैरह में रहे हैं या पी.जी. में रहे हैं कभी?

(कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)।

हाँ ठीक है।

कितने लोग अच्छा, शेयर्ड रूम में रहे हैं हॉस्टल में या पी.जी. में?

(कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)।

आपका जो रूममेट था उससे कुछ हो गई थी दोस्ती-यारी? हो गई थी? कितने लोग कहेंगे काफ़ी अच्छी दोस्ती हो गई थी? हाथ उठाओ।

(कुछ कम श्रोता हाथ उठाते हैं)।

ये अटैचमेंट है, संयोग। उस संयोग से कोई आ गया है और बहुत समय तक उसके साथ रहना पड़ रहा है, तो जुड़ गए। संयोग से आ गया, स्थान, स्पेस में बगल में है एक ही कमरे में भाई दो लोग हैं, ये मैं रहता हूँ, ये वो रहता है, और संयोग भी है इसमें स्थान भी है और समय भी है कि कम से कम साल भर तो इकट्ठे रहे। हो गया अटैचमेंट, बोध कहीं नहीं है।

और अटैचमेंट कितना अचेतन होता है ऐसे समझ लो कि जब गाड़ियाँ पुरानी हो जाती हैं और उनके शॉकर-सस्पेंशन वग़ैरह का काम कराने की नौबत आ जाती है। किसी ने कराया, टू व्हीलर, फोर व्हीलर किसी में भी, तो उसमें कई बार नट-बोल्ट होते हैं न वो खुलते ही नहीं हैं।

जो नट है वो बोल्ट के साथ फ्यूज़ कर गया होता है, सॉलिड स्टेट फ्यूज़न हो जाता है। वो दोनों इतनी ज़ोर से और इतने सालों से एक-दूसरे के पास थे कि उनमें सॉलिड स्टेट फ्यूज़न हो गया। माने इसके मॉलिक्यूल थोड़े-थोड़े उसमें घुस गए और उसके इसमें घुस गए अब आप वो खोल ही नहीं पाओगे उसको, रेंच लगाओ कुछ नहीं खुलेगा वो, अब काटना पड़ता है। ये अटैचमेंट है।

सिर्फ़ इसलिए कि साथ-साथ थे तो जुड़ाव हो गया, ये अटैचमेंट है। और ज़्यादातर अरेंज्ड मैरिजेस इसी वजह से चल जाती हैं, एबिट, प्रेम नहीं। इतने समय से एक ही कमरे में हैं कि एक फोर्स्ड केमिस्ट्री डेवलप हो जाती है।

कोई दो केमिकल्स हों वो आपस में रिएक्ट नहीं भी करते हों तो भी उनको बहुत समय तक एक साथ छोड़ दो, और वो भी अंडर हाई टेम्परेचर ऐंड प्रेशर में, तो थोड़ा रिएक्शन हो जाता है। और मैरेज है तो हाई टेम्परेचर ऐंड हाई प्रेशर तो होगा ही और कैटलिस्ट भी हैं कई तरीक़े के — फूफी, दादी, नुनू, सब बाबाजी, ये सब कैटलिस्ट होते हैं तो हो जाता है।

ये अटैचमेंट है जिसमें न बोध है, न प्रेम है सिर्फ़ जुड़ाव है।

और उस जुड़ाव का कोई चैतन्य कारण नहीं है सिर्फ़ जड़ कारण है, जड़, कि दो चीजें थीं इतने समय से संपर्क में रहीं कि वो जुड़ गईं आपस में। और उदाहरण दो, घर में भी देखते हो कई बार कि दो चीजें हैं वो इकट्ठी थीं, बहुत सालों तक रहीं, अब फिर वो नहीं अलग कर सकते उनको।

दो उदाहरण दो।

फर्श पर दाग, निर्भर करता है कि फर्श किस पत्थर का है और उस पर अगर कोई जगह है जहाँ पर एक ही तरह का दाग लगते ही गया है, लगते ही गया है तो अब आप कितना भी घिस लो वो दाग नहीं हटेगा। क्योंकि वो जो दाग है वो दाग क्या है वो भी अपने आप में एक पदार्थ है न, वो भी एक केमिकल ही है जिसको आप दाग बोल रहे हो, वो जाकर के पत्थर के केमिकल से अब गुथ गया है।

ये पहचानना बड़ा मुश्किल होता है कि इसको क्या बोलें, ये सिर्फ़ समय-संयोग आधारित जुड़ाव है या ये बोध आधारित प्रेम है। उसके लिए अपने आप से कुछ प्रश्न पूछने होते हैं,

“यदि जीवन में फलाना संयोग नहीं हुआ होता तो क्या ये संबंध होता?”

“यदि मेरे स्वार्थों की पूर्ति न हो रही हो तो क्या ये संबंध चलेगा?”

“इस रिश्ते में मैं जितना दे रहा हूँ अगर सामने वाला उससे ज़्यादा माँगने लगे तो क्या ये संबंध चलेगा?”

मुझे वही जानवर अच्छे लगते हैं, मैं उन्हीं जानवरों की सेवा करना चाहता हूँ जो प्यारे-प्यारे हैं, फ़री फ़्रेंड्स कुत्ते, बिल्ली, खरगोश। या कभी मैंने साँप भी देखा तो मैं चाहूँगा कि यार इसकी भी रक्षा हो जाए, पालूँगा भले नहीं पर ये चाहूँगा कि इसको झाड़-वाड़ में डाल दो कहीं पर ताकि ये अपना अपने हिसाब से जीवन चलाए।

तोता, मैना, पैराकीट इन्हीं को देख के प्यार आता है, या कौवे को देख के भी? ये सब प्रश्न पूछने पड़ेंगे, आप एनिमल लवर हो। और तिलचट्टा, केचुआ? “ओ माय गॉड! क्या है।” अच्छा क्या लगता है? “आई लव पपीज़ ऐंड किटन्स।

देयर इज़ अ प्रॉब्लम, यू आर नॉट ऐन ऐनिमल लवर यू आर अ फॉर्म लवर।

एक दिन अभी पिछले साल की बात है, तो ये था कि "आचार्य जी, धीरे-धीरे बोला करिए ज़्यादा मत करिए।" फिर ऊपर गया यहाँ से करके, बहुत ज़ोर से चिल्लाया। तो पता नहीं कौन था वो आ गया "इनको तो ज़ोर से बोलना मना है, चिल्ला रहे हैं?" क्या है कि मेरे कमरे में रहती हैं छिपकलियाँ और वो इतनी बदतमीज़ हो गई हैं उन्होंने सत्र सुन लिए, तो निर्लज्ज। वो दुनिया भर की छिपकलियाँ छत पर रहती हैं, मेरी वाली ज़मीन पर रहती हैं। दुनिया भर की छिपकलियाँ सामने पड़ो तो भागती हैं, मेरी वाली मुझे देख के सामने आके ऐसे हो जाती हैं। तो मैं जा रहा हूँ और जब मैं कमरे में नहीं होता तो और एकदम ज़मीन पर उतर आती हैं पूरा ही, ज़मीन ही ज़मीन पर है, गर्मी का समय।

वो ज़मीन पर इसलिए भी उतरती हैं क्योंकि ठंडी हवा है न ज़मीन की तरफ़, फर्श पत्थर जो है वो ठंडा रहता है थोड़ा ज़्यादा। तो यहाँ सत्र से जा रहा था मगन अपना तो पाँव एक पर पड़ने ही वाला था, मैं उसको बहुत ज़ोर से डाँटा "दोबारा ये हरकत की तो कमरे से निकाल दूँगा।" रिश्ता सिर्फ़ प्यारे-प्यारे जानवरों से ही बनता है या आप साँप से, गिद्ध से और तिलचट्टे से भी रिश्ता बना सकते हो? ये कुछ सवाल हैं जो पूछने पड़ते हैं।

संयोग है, पहला सवाल तो ये है कि “संयोग न हो तो क्या ये होता ही रिश्ता?” और दूसरा “स्वार्थ न हो तो क्या आज होगा ये रिश्ता?” ये प्रेम और अटैचमेंट का फ़र्क़ है।

स्पष्ट हुआ?

प्रश्नकर्ता: जी। तो जितना मैं समझ पा रहा हूँ, ये बेसिकली मैं बात कर रहा हूँ मेरे घर के बाहर कुछ पक्षी रहते हैं तो उनको खाना वग़ैरह डालता हूँ। मेरी बात वहाँ से उठ रही है तो पहले तो ये था कि कुछ खाना वग़ैरह बच जाता था, रोटी वग़ैरह तो मैं डाल देता था उनको। बट अभी थोड़ा-सा फ़र्क़ आया, अब मैं बाकायदा मार्केट जा रहा हूँ ख़ुद उनके लिए लेकर आ रहा हूँ। और मन में कोई ऐसा रूढ़िवाद भी नहीं है कि “हाँ, मेरे को पुण्य मिल जाएगा।” ऐसा तो परिवार में कभी ऐसी धारणा रही नहीं हमारे।

तो इसको मैं आई थिंक अटैचमेंट से कन्फ़्यूज़ कर रहा था। तो बेसिकली अगर मुझे सच में उनकी तरफ़ देख के उनसे तरस आ रहा है या कुछ अच्छा फ़ील हो रहा था तो क्या मैं इसको फिर प्रेम कह सकता हूँ?

आचार्य प्रशांत: नहीं कह सकते हो। कारण बताता हूँ, ये संयोग है कि तुम्हारे घर के सामने कुछ जानवर हैं या पक्षी हैं, और ये संयोग नहीं है कि इस पृथ्वी पर न जाने कितनी प्रजातियाँ हैं और एक करोड़ से ज़्यादा जानवर रोज़ काटे जाते हैं। वो जो बात है कि एक करोड़ रोज़ कट रहे हैं उसका तुम पर बहुत कम प्रभाव पड़ रहा है। तुम पर प्रभाव पड़ रहा है उन चार जानवरों का जो तुम्हें इन इंद्रियों से दिखाई दे रहे हैं। ये संयोग की बात है।

हम जो एनिमल लवर भी बनते हैं तो आमतौर पर क्या करते हैं, मुझे आसपास जो दिख रहा है मैं उसका ख़्याल कर लूँगा। तो ये तो तुम्हारा बहुत संयोग से रिश्ता बना ना, बोध की बात तो ये है कि मैं देखूँ कि पूरी पृथ्वी पर क्या चल रहा है और उसके लिए काम करूँगा। और बिल्कुल ये हो सकता है कि जितना समय आप चार जानवरों की सेवा में लगा रहे हो, उतना समय अगर आप जानवरों के लिए सही तरीक़े से लगा दो तो आप 4 हज़ार जानवर बचा दो। तो बताओ फिर ये चार जानवरों की सेवा करना प्रेम हुआ या हिंसा?

मैं नहीं कह रहा कि आपके घर के बाहर चिड़िया है तो आप उसको पानी मत दीजिए, पर कुछ बातें हैं जो समझनी ज़रूरी होती हैं। हम अपने आप को बहुत जल्दी सर्टिफ़िकेट दे देते हैं एनिमल लवर होने का। “मैं कुत्ते को रोटी डाल देता हूँ, मैं चिड़िया को पानी पिला देता हूँ।” अरे भाई, वहाँ वो उससे बात हुई थी फूड फ़ार्मर, वहाँ पर खड़े होकर के मैंने बोर्ड पर लिख-लिख के आँकड़ों से सिद्ध कराया। वो भी पब्लिश करेगा।

प्रति दिन 100 करोड़ से ज़्यादा जानवर मारे जाते हैं (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)। प्रति दिन 100 करोड़ से ज़्यादा जानवर इंसान मारता है, अभी सिर्फ़ ये खाने की बात हो रही है बाक़ी उद्देश्यों के लिए जो मारता है अलग है।

अब बताओ जब 100 करोड़ जानवर इस पृथ्वी पर रोज़ मर रहे हों, तो वहाँ आप जिन चार जानवरों को शैम्पू लगा के नहला रहे हो, तो मैं आपको क्या मानूँ? पशु-प्रेमी मानूँ? क्या मानूँ? और जो 100 करोड़ हैं उनके प्रति आपने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली, कि वो तो मेरा नहीं मेरा उनसे क्या लेना देना।

नैतिक दृष्टि से आप अच्छे आदमी हो, बिल्कुल आप बुरे आदमी नहीं हो, मैं नहीं कह रहा कि आप किसी जानवर को खाना-पानी देते हो तो बंद कर दो। लेकिन उसमें अपने आप को आपने जो मान लिया है वो बहुत ज़्यादा है, और आप जो हो वो बहुत कम है।

चार जानवरों की सेवा करके और 100 करोड़ जो मर रहे हैं, और मैं अभी उनकी बात कर रहा हूँ जो मर रहे हैं जिनको यातना दी जा रही है उनकी अभी बात नहीं कर रहा। जो 100 करोड़ मर रहे हैं उनकी उपेक्षा कर दी है। चार जानवरों को दाना-पानी दे दिया है और इतना करके अपने आप को प्रमाण-पत्र दे दिया है कि मैं…। स्वार्थ देखा कुछ? इतना-सा काम करा है 4/100 करोड़ और अपनी नज़र में क्या बन गए? स्वार्थ है कि कुछ नहीं है।

मत लग जाना कि "तो क्या इसका मतलब ये है कि हम ये भी न करें?" इसका क्या? मैं आपको बस कुछ तथ्य दिखा रहा हूँ तथ्यों के साथ रहिए।

अब आपके दोस्तों में उदाहरण के लिए, निश्चित रूप से लोग होंगे जो इस 100 करोड़ में से एक हिस्से के लिए उत्तरदायी होंगे, होंगे ना? और अभी भी आपके दोस्त हैं। आपके घर में भी लोग हो सकते हैं जो ये 100 करोड़ में से एक हिस्से के लिए जवाबदेह हैं, वो भी अभी आपके घरवाले हैं।

और आप दो पक्षियों को पानी रख दे रहे हो, खूब चलेगा अभी गर्मी आएँगी कि “अब गर्मी बहुत हो गई है जानवरों के लिए पानी रख दो।” और लोग बहुत खुश होते हैं "देखो, हम इतने अच्छे आदमी हैं, हम इतने अच्छे आदमी हैं!" आप बेशक रखिए पर इसके कारण अपने आप को अच्छा आदमी बोलना मत शुरू कर दीजिए। अच्छा आदमी हो जाना इतनी सस्ती बात नहीं होती है कि कबूतरों को दाना डाल दिया, गौरैया को पानी डाल दिया तो अच्छे आदमी हो गए। वो भी तब जबकि फिर बोल रहा हूँ कितने? 100 करोड़ रोज़ मारे जा रहे हैं।

आप दो पक्षियों को पानी डाल के अच्छे आदमी नहीं हो जाते, आप बहुत और कुछ है जो कर सकते हो पर आप कर नहीं रहे, क्योंकि इस संसार से, दुनिया से, समाज से आपके स्वार्थ जुड़े हुए हैं।

ठीक।

वो सब आप नहीं कर रहे, आप दो पक्षियों को दाना डाल रहे हो और आप अच्छे आदमी हो गए?

जाओ क्यों नहीं भिड़ जाते हो अपने दोस्तों से कि “नहीं खाएगा चिकन तू नहीं खाएगा," क्यों नहीं भिड़ जाते हो घर में अपने माँ-बाप, भाई-बहन से? बोलो ना। वो जहाँ तुम्हें भिड़ना चाहिए था न भिड़ कर के ये सब करना कि गाय को रोटी खिला दी, और ये नहीं देख रहे हो कि वो गाय पैदा ही ज़बरदस्ती कराई गई है। वो गाय पैदा ही इसलिए की गई थी कि जीवन भर उसका शोषण किया जाए। ये सब नहीं देखना और कहना "मैंने तो गाय को रोटी खिला दी।" या "हम जाकर गौशाला में कुछ दान दे आते हैं।" मैं नहीं मानता कि इससे आप पशु-प्रेमी हो गए।

प्रेम बहुत अलग बात होती है, नैतिकता एक अलग बात होती है और जुड़ाव (अटैचमेंट) वो और एक अलग बात होती है।

“आई लव डॉग्स, आई लव ऐनिमल्स और आई ऐडमायर एलन मस्क।”

प्रेम गली अति साँकरी, जा में चौदह न समाए। प्रेम बहुत अलग बात है, हम उसको बहुत सस्ते में उछाल लेते हैं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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