मनुष्य के शरीर में 70% पानी है और पृथ्वी की सतह पर भी 70% पानी है। आपको दिखाई नहीं दे रहा कि हम पृथ्वी ही हैं। और आप ऐसी जगह जा रहे हो जहाँ पानी की बूंद भी नहीं है, जहाँ अलग से प्लांट लगाकर बस किसी तरह से इतना पानी दिया जाएगा कि पीकर ज़िंदा रह लो। अगर प्लानेट बदल गया, तो आपने ये जितनी ग़ज़लें लिखी हैं, ये जितनी आर्ट फॉर्म्स हैं; ये सब आपके लिए बेकार हो जाएँगी क्योंकि माइंड बदल जाएगा। आप कुछ और हो जाओगे। किसी और ग्रह पर जाने का मतलब है सामूहिक आत्महत्या की सोचना।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम अनुष्का है और मैं टेक्निकल और एथिकल एआई फील्ड में काम कर रही हूँ। हाल ही में एक पॉडकास्ट है जो काफ़ी ज़्यादा वायरल हो रहा है। मैंने वो आज ही देखा है और इसमें दो चीज़ों की बहुत ज़्यादा चर्चा की गई है। दो शब्द जो मेरे ज़ेहन से नहीं निकल रहे हैं: पहला है सिमुलेशन; जहाँ पर ये कह रहे हैं कि हम एक सिमुलेशन में रह रहे हैं, हम माया में रह रहे हैं।
और साथ ही दूसरी बहुत ही विरोधाभास बात कही गई है, कि फ्यूचर में ह्यूमैनिटी विल बी डेड। ह्यूमन्स विल कोलैप्स। तो उसी के साथ-साथ पूरी कॉन्शियसनेस भी कोलैप्स कर जाएगी। चेतना को ही इन्होंने कह दिया है मर जाएगी फ्यूचर में। न कोई सवाल पूछने वाला होगा, न सही जवाब मिलेंगे हमें। और इसलिए ये एक ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना चाहते हैं, कि पृथ्वी बचे या न बचे पर मनुष्य बचा ले जाएँ ये। इनका पूरी एनर्जी, पूरे रिसोर्सेज़ उसी दिशा में अग्रसर हैं।




