
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम अनुष्का है और मैं टेक्निकल और एथिकल एआई फील्ड में काम कर रही हूँ। हाल ही में एक पॉडकास्ट है जो काफ़ी ज़्यादा वायरल हो रहा है। मैंने वो आज ही देखा है और इसमें दो चीज़ों की बहुत ज़्यादा चर्चा की गई है। दो शब्द जो मेरे ज़ेहन से नहीं निकल रहे हैं: पहला है सिमुलेशन; जहाँ पर ये कह रहे हैं कि हम एक सिमुलेशन में रह रहे हैं, हम माया में रह रहे हैं।
और साथ ही दूसरी बहुत ही विरोधाभास बात कही गई है, कि फ्यूचर में ह्यूमैनिटी विल बी डेड। ह्यूमन्स विल कोलैप्स। तो उसी के साथ-साथ पूरी कॉन्शियसनेस भी कोलैप्स कर जाएगी। चेतना को ही इन्होंने कह दिया है मर जाएगी फ्यूचर में। न कोई सवाल पूछने वाला होगा, न सही जवाब मिलेंगे हमें। और इसलिए ये एक ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना चाहते हैं, कि पृथ्वी बचे या न बचे पर मनुष्य बचा ले जाएँ ये। इनका पूरी एनर्जी, पूरे रिसोर्सेज़ उसी दिशा में अग्रसर हैं।
तो प्रश्न मेरा यहाँ ये है, कि जैसा कि आप कहते हैं कि वेस्टर्न वर्ल्ड को, पश्चिम को वेदान्त का ज्ञान नहीं मिला तो जो उन्हें बाहर दिखा उन्होंने उसी का बेहतरीन इस्तेमाल करके बड़े से बड़ा कुछ खड़ा कर दिया। मगर इतना बेसिक फैक्ट साइंस का, एक इंसान जिसने इतना कुछ बड़ा बना दिया है; एक बेसिक फैक्ट जो एक बच्चा भी जानता है कि ग्लोबल वार्मिंग इज़ अ सीरियस कंसर्न। हम बचपन से पढ़ते आए हैं, और आज दुनिया जिस कगार पर खड़ी है वो इंसानों की वजह से ही है।
पूरे पॉडकास्ट में एनवायरनमेंट कंसर्न, ग्लोबल वार्मिंग, कार्बन एमिशन की कहीं कोई चर्चा नहीं की गई है। इनस्टेड ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि दुनिया बचे न बचे, हम इंसानों को बचा ले जाएँगे। तो ये कैसी विचारधारा है कि साइंस का एक व्यक्ति फैक्ट्स को इतना मैनिप्युलेट करके दुनिया के सामने रख रहा है, और इतनी बेसिक बातों को कहीं न कहीं छुपाने की कोशिश कर रहा है। ये कैसी विचारधारा है और हम कैसे इसका सामना करें? हम कैसे इस पर तर्क करें? यही मेरा प्रश्न है।
आचार्य प्रशांत: नहीं, विचारधारा की बात नहीं है। धारा का जो स्रोत है, उसकी बात है। विचारक की बात है। साइंस माने क्या होता है? साइंस माने यही तो कि ये जो बाहर आपकी दुनिया है, जो मटेरियल वर्ल्ड है, वो अब आपके लिए ज्ञात हो गया, कॉम्प्रिहेन्सिबल हो गया। ठीक है न? पानी नीचे को क्यों गिर रहा है? सूरज की रोशनी पृथ्वी तक आने में समय क्यों ले रही है? चंद्र ग्रहण क्यों लग जा रहा है? ये सब बातें हो सदा से रही थीं, अब आपने जान लिया कि क्यों और कैसे होती हैं। इसको विज्ञान कहते हैं।
तो उससे आप भीतर से कोई ज़्यादा स्पष्टता थोड़े ही हासिल कर लोगे। आप ख़ुद को लेकर के बहुत उलझे हुए हो सकते हो। विचार का जो स्रोत है, विचारक, वो भीतरी अंधेरे में एकदम डूबा हुआ हो सकता है, फिर भी बहुत संभव है कि उसे विज्ञान में कुछ महारत हासिल हो, बिल्कुल संभव है। तो विज्ञान से आप बेहतर इंसान नहीं बन जाते, बिल्कुल भी नहीं। बल्कि आप अगर आदमी ही गड़बड़ हो तो आप विज्ञान का इस्तेमाल भी सबसे गिरे हुए कामों के लिए करते हो।
ये हमारी भूल रहती है सोचना, कि कोई वैज्ञानिक है तो आदमी भी बढ़िया होगा। ऐसा कुछ भी नहीं है। ठीक है विज्ञान से बाहरी अंधविश्वास हटते हैं। पर सबसे भयानक और ख़तरनाक अंधविश्वास तो भीतर होता है न, उसका नाम होता है, अहंकार; और विज्ञान से वो नहीं हटता। और जहाँ अहंकार होता है, वहाँ कामना होती है। अहंकार माने अपूर्णता। जहाँ अपूर्णता है, वहाँ दुनिया को लेकर कामना उठेगी कि दुनिया का कोई विषय मिल जाए तो मेरी अपूर्णता दूर हो जाए।
हम गीता सत्रों में गाते हैं न, जब काम भरा हो आँख में, तब सच नज़र नहीं आता है। आप कह रहे हो बच्चा भी जानता है कि आज दुनिया बिल्कुल विनाश के मुहाने पर खड़ी है। क्लाइमेट क्राइसिस सब जानते हैं। तो फिर और ये जो सब बहुत सारे बड़े-बड़े लोग हैं, क्लाइमेट डिनालिस्ट्स हैं, इनको क्यों नहीं दिख रहा है?
आग दहके पर धुएँ से, प्रकाश ढक सा जाता है। जब काम भरा हो आँख में, तो सच नज़र नहीं आता है।
आँख में जब कामना भरी हो तो सच्चाई नहीं दिखाई देती। और कामना कब भरी होती है? जब आपको दुनिया का बहुत पता होता है, अपना कुछ भी नहीं पता होता। और ऐसे लोग बहुत ख़तरनाक हो जाते हैं।
“पृथ्वी ख़त्म हो जाए, इंसान को बचाना है।” वाह रे वाह! इंसान जिसको आप इंसान बोलते हो, उसकी रग-रग पृथ्वी है। पृथ्वी नहीं रहेगी तो इंसान कहाँ से रहेगा? कई बातें हैं इसमें, ये पहली बात है। अभी आपका जो कद है, वो पृथ्वी के व्यास से निर्धारित हो रहा है। पृथ्वी की जो ग्रेविटी है न, वो आपकी हाइट तय कर रही है। पृथ्वी की ग्रेविटी जो है और पृथ्वी की ग्रेविटी उसके रेडियस से आ रही है। पृथ्वी का रेडियस तय कर रहा है कि आपके शरीर में माँसपेशियाँ कितनी होंगी।
अच्छा बताइए, आपका जो मसल मास है, वो टोटल मास का एक पर्टिकुलर परसेंटेज ही क्यों होता है? आपने अपना बॉडी मास एनालिसिस कभी कराया हो तो उसमें आता है, बॉडी में इतना फैट है, इतना स्केलेटल मास है और इतना मसल मास है; ऐसे आता है। तो जो आपका मसल मास आता है, चाहे जितना भी आता हो, 45%, 70%, यही सब रहता है लोगों का। तो वो उतना ही क्यों आता है? क्योंकि उसका संबंध पृथ्वी के व्यास से है, डायमीटर से है। ग्रेविटी तय करती है आपको कितनी मसल चाहिए। अगर ग्रेविटी ज़्यादा होती तो आपकी थाई मसल्स, आपकी काफ मसल्स और मजबूत चाहिए होती चलने के लिए।
अगर ग्रेविटी बहुत ज़्यादा होती, तो आपका शरीर बहुत दूसरे तरीके से इवॉल्व करता। और ब्रेन भी शरीर ही है न? ब्रेन भी शरीर है। ग्रेविटी दूसरी होती तो ब्रेन भी दूसरे तरह से इवॉल्व करता। ब्रेन दूसरे तरीके से इवॉल्व करता तो जिसको आप थॉट या कॉन्शियसनेस बोलते हो, वो भी दूसरी होती।
तो इंसान का तन और मन दोनों पृथ्वी ही हैं। आप मालूम है क्या हो? पृथ्वी की सतह पर चल रही बहुत मामूली गतिविधि; उसको बोलते हैं इंसान। 6400 कि.मी पृथ्वी का रेडियस है। और जो पृथ्वी की क्रस्ट है, जो पृथ्वी का बिल्कुल बाहरी छिलका है, टॉप सोइल से भी ज़रा सा ऊपर वाला, उस पर कुछ नन्हे-नन्हे कीड़े रेंग रहे होते हैं और वो वहाँ कुछ ऐसे ही अपना इधर-उधर कुछ-कुछ कर रहे हैं। उसको इंसान बोलते हैं।
पृथ्वी की सोइल के ऊपर कुछ ऐसे ही एक्टिविटी चल रही होती है। उस एक्टिविटी को कहते हैं, द ह्यूमन बीइंग। आपकी क्या औकात है 6,400 कि.मी. के रेडियस के सामने। आप हो 5 फीट, 6 फीट के और आप जिस चीज़ पर खड़े हो, उसका रेडियस देखिए। तो उसकी सरफेस पर आप बिल्कुल एक मिनिस्क्यूल प्रेजेंस हो। और आपकी जो पूरी प्रेजेंस है, वो आपके प्लैनेट, आपके ग्रह ने ही तय करी है। आपकी आँखों का जो पूरा कॉन्फ़िगरेशन है, वो इस प्लैनेट ने तय करा है। बताता हूँ, कैसे?
पृथ्वी अगर सूरज से ज़्यादा दूर होती, तो आपकी आँखों को ज़रूरत पड़ती और ज़्यादा शार्प होने की, क्योंकि रोशनी कम होती। पृथ्वी अगर सूरज के ज़्यादा पास होती, तो भी आपकी आँखें अलग होती, क्योंकि रोशनी ज़्यादा होती। तो फिर आँखों में आपके जो रोड्स का, कोन्स का, रेटिना का जो साइज़ है, वो सब दूसरे तरीके का होता। आपकी खाल दूसरी होती अगर पृथ्वी सूरज के ज़्यादा पास होती, क्योंकि रेडिएशन ज़्यादा होता, तो खाल भी दूसरे तरीके की होती। ठीक वैसे जैसे जो लोग इक्वेटर पर रहते हैं और जो लोग ज़्यादा टेम्परेट रीज़न्स में रहते हैं, उनकी खाल अलग-अलग होती है न; खाल की मोटाई, खाल का रंग, सब अलग-अलग हो जाता है।
तो वैसे ही आप अगर सूरज से दूर रह रहे होते, आप किसी और ग्रह पर होते, तो आपकी खाल, आपकी आँखें, आपके होंठ, आपके बाल, सब अलग होते। ये सब तो छोड़ दो, मैं कह रहा हूँ, आपका ब्रेन ही अलग होता। माने इंसान की कॉन्शियसनेस ही दूसरी होती, अगर वो पृथ्वी पर नहीं होता।
पृथ्वी और मनुष्य एक ही बात हैं। जैसे पृथ्वी में अलग-अलग सतहें होती हैं न, तो वैसे ही सबसे ऊपरी सतह के ऊपर एक और सतह है। उस सतह को आप कह सकते हो, द ह्यूमन लेयर। हम वो हैं। बस इस सतह को गुमान हो गया है, कि वो पृथ्वी से भिन्न है। इस सतह को गुमान हो गया है कि वो पृथ्वी से भिन्न है और वो किसी और ग्रह पर भी चली जाएगी तो वो बची रहेगी।
प्याज़ के छिलके को लग रहा है कि उसको केले के ऊपर बाँध दोगे, तब भी वो ज़िंदा रहेगा। भाई, तू प्याज़ का छिलका है। तू प्याज़ का छिलका है, तू ज़िंदा ही तभी तक है जब तक तू प्याज़ के ऊपर है। जिस दिन तुझे केले के ऊपर बाँध दिया गया, तू मर गया। इसी तरह, मनुष्य भी तभी तक ज़िंदा है जब तक वो अपनी प्याज़, माने अपनी पृथ्वी के ऊपर है। हम भी इस पृथ्वी के एक छिलके ही हैं। जब तक हम पृथ्वी के ऊपर हैं, तब तक हम हैं, उसके बाद हम नहीं हैं। और ये बात बहुत सीधी है।
आपका जो ब्लड प्रेशर है, वो कैसे तय होता है? वो एटमॉस्फेरिक प्रेशर से तय होता है। और एटमॉस्फेरिक प्रेशर किससे तय होता है? वो ग्रेविटेशनल पुल से तय होता है। आपका दिल कितना धड़क रहा है, वो तय होता है इससे कि एटमॉस्फेरिक प्रेशर कितना है और आपकी बॉडी का साइज़ कितना है। उससे आपका हार्ट रेट तय होता है। अगर पृथ्वी बदल गई तो ये आपका जो दिल धड़क रहा है, ये धड़केगा कैसे? आप कहीं और चले जाओगे, दिल का धड़कना ही बंद हो जाएगा।
आप किसी ऐसी जगह चले गए जहाँ रेडियस बहुत कम है, तो वहाँ एटमॉस्फेरिक प्रेशर भी कम होगा। जब एटमॉस्फेरिक प्रेशर कम होगा तो आपकी जो नसें हैं, जो खून लेकर के घूम रही हैं, उनका प्रेशर एटमॉस्फेरिक प्रेशर से ज़्यादा हो जाएगा। आपकी सारी नसे फट जाएँगी। ठीक वैसे जैसे जब आप पहाड़ों के ऊपर जाते हो, तो कई बार नाक से खून आ जाता है न। क्यों आ जाता है नाक से खून? क्योंकि एटमॉस्फेरिक प्रेशर कम हो गया। आपका शरीर फटना शुरू हो जाता है। आप किसी दूसरे प्लैनेट पर जाओगे, आपका शरीर फटने लगेगा।
दूसरी ओर, आप जुपिटर जैसी किसी जगह पर पहुँच गए जहाँ पर ग्रेविटी बहुत ज़्यादा है। तो एटमॉस्फेरिक प्रेशर हो सकता है इतना ज़्यादा हो, कि आपकी ये जितनी ब्लड वेसल्स हैं, वो सब कंप्रेस हो जाएँ। और मैं बहुत बेसिक साइंस की बात कर रहा हूँ। आप इसमें और आगे पढ़ोगे तो मामला और न्यूऑन्स्ड है।
कहीं और चले जाओगे तो देखने में भी तकलीफ़ आने वाली है; साँस लेने में भी, खाने में भी, आप जो वनस्पतियाँ खाते हो। आप मिनरल्स और केमिकल्स खाकर तो जी नहीं सकते। आप सब जो चीज़ें खाते हो, पृथ्वी पर पैदा होती हैं। कहीं और कैसे पैदा हो जाएँगी? कैसे हो जाएँगी?
मनुष्य और पृथ्वी दो नहीं हैं। आप इस पृथ्वी पर रहते नहीं हैं, आप ये पृथ्वी हैं। पृथ्वी आपका घर नहीं है, पृथ्वी आपका केंद्र है, पृथ्वी दिल है आपका।
प्याज़ का छिलका सोच रहा है, “मैं प्याज़ पर रहता हूँ।” प्याज़ का छिलका सोच रहा है, “मैं तो प्याज़ पर बस रहता हूँ।” तुम रहते नहीं हो प्याज़ पर, तुम प्याज़ हो। यहाँ से बाहर जाकर के अगर कुछ बचेगा भी, तो वो मनुष्य नहीं होगा। वो मनुष्य से मिलती-जुलती कोई चीज़ होगी, या उसे आप ‘ह्यूमनोइड’ बोल सकते हैं, वो ‘ह्यूमन’ नहीं होगा। उसका कद भी दूसरा होगा, उसका ब्रेन भी दूसरा होगा।
वो सारी चीज़ें जो आपको पता है न, हमारी हस्ती में पूरा एक माइंड-बॉडी रिलेशनशिप चलती है। हम साइकोसोमैटिक जीव हैं। आपका माइंड बॉडी से माने मटीरियल से ज़बरदस्त तरीके से प्रभावित रहता है। हम साइको-सोमैटिक लोग हैं, साइको और सोमा, माइंड और बॉडी। बॉडी मटीरियल है। मटीरियल अगर बदल गया तो माइंड बदल जाएगा। अगर प्लैनेट बदल गया, तो आपने ये जितनी ग़ज़लें लिखी हैं, ये जितनी आर्ट-फॉर्म्स हैं, ये सब आपके लिए बेकार हो जाएँगी क्योंकि माइंड बदल जाएगा। आप कुछ और हो जाओगे।
किसी और ग्रह पर जाने का मतलब है सामूहिक आत्महत्या की सोचना। वो स्पीशीज़ दूसरी होगी, वो आप नहीं होंगे। अगर बचे तो; कहीं और जाकर बचे तो, याद रखना, अगर किसी भी ग्रह पर इतनी ही फ़ेवरएबल स्थितियाँ होती जीवन के पनपने की, तो अब तक पनप गई होतीं। वो सब ग्रह बंजर पड़े हैं। इससे पता क्या चलता है? कि वहाँ जीवन के पनपने की संभावना अपने-आप में बहुत कम है। अब आप वहाँ जाकर उसको आर्टिफ़िशियली कॉलोनाइज़ करना चाहते हो। जहाँ पर अपने-आप जीवन कभी नहीं बन पाया, वहाँ पर आप जाकर कृत्रिम रूप से जीवन बसाना चाहते हो। अगर वो जगह इतनी अच्छी होती, तो उनमें आज तक अपना जीवन क्यों नहीं है?
बहुत अब तो हमारे पास ये सब जो लो फ्लाइंग सैटेलाइट्स होते हैं। उन्होंने तस्वीरें ली हुई हैं, आप सैटर्न की, जुपिटर की, मार्स की, मरकरी की, इनकी सबकी सतहों की तस्वीरें देखिए और फिर अपने आप से पूछिए, “मैं यहाँ बसना चाहती हूँ क्या? मैं यहाँ बसना भी चाहती हूँ?”
मिट्टी नहीं है भाई वहाँ। ज़्यादातर लोगों ने तस्वीरें देखी भी हैं तो चंद्रमा की सतह की देख ली है। हमारा चंद्रयान चला गया है, या नील आर्मस्ट्राँग के समय की। “अच्छा चट्टान-चट्टान जैसा होता है।” नहीं भाई, वैसा भी नहीं होता। कई तो ग्रह ऐसे हैं जिनकी सतह ही गैस की है। कई ऐसे हैं जो थोड़ा दूर वाले हैं, ठंडे वाले हैं जहाँ गैसें भी जमी हुई हैं, जहाँ पर कार्बन डाइऑक्साइड तक जम गई है, सॉलिडिफाई हो गई है। आप वहाँ रहना चाहते हो? कई ऐसे हैं जहाँ पर सैकड़ों डिग्री तापमान की लगातार आँधियाँ चलती रहती हैं। आप वहाँ रहना चाहते हो?
लेकिन अगर पृथ्वी को पूरा बर्बाद कर दिया, ठीक है? तो कहीं और रहना पड़ेगा। ठीक वैसे ही जैसे जो आईएसएस था, (इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन), उसमें कुछ लोग रह लेते थे। वो कैसे रह लेते थे? वो रह लेते थे बहुत सारे रिसोर्सेज़ कन्ज़्यूम करके; ये पहली बात। और दूसरी बात, कितने रह लेते थे?
तो जो लोग बातें कर रहे हैं न, कि हम कहीं और चले जाएँगे और वहाँ पर हम अपनी दुनिया बसाएँगे। वो ये नहीं कह रहे कि आप सब चले जाओगे, वो ये कह रहे हैं कि वो चले जाएँगे क्योंकि उनके पास पैसा है। आप थोड़ी चली जाओगी, मैं थोड़ी चला जाऊँगा। वो अपना रॉकेट पर बैठ के अपनी पूरी, अपना कुटुंब लेकर, दो चार दर्जन बच्चे लेकर और अपने जैसे लोग लेकर, वो उड़ जाएँगे। क्योंकि ये एक हाइली रिसोर्स इंटेंसिव काम है। आप और मैं थोड़ी उड़ जाएँगे।
इस पृथ्वी की करोड़ों प्रजातियाँ, जिनमें मनुष्य भी शामिल हैं; हमें तो नीचे छोड़ दिया जाएगा मरने के लिए। और बच कौन रहा है? वही जिसने पृथ्वी में आग लगाई, वो बच जाएगा। क्यों? क्योंकि हमने उसे अपना आदर्श, अपना भगवान मान रखा है, वो बच जाएगा। वो हमारे ही सारे संसाधन लेकर उड़ जाएगा और वो अपना कहीं जाकर, किसी स्पेस स्टेशन में या किसी प्लैनेट की सतह पर, किसी तरीके से अपनी कुछ बची-खुची ज़िंदगी 10-20 साल काट देगा।
बहुत चंद मुट्ठी भर लोग हैं जो जाकर, उदाहरण के लिए, मार्स पर सफलतापूर्वक किसी क़द्र जी सकते हैं। बहुत कम लोग। पर उस सपने को पूरी मानवता के सामने ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे ये जितनी 800 करोड़ लोगों की पृथ्वी पर आबादी है, ये सारे चले जाएँगे, और सब जो जीव-जंतु हैं बाक़ी वो भी चले जाएँगे। और 70% जो जीव-जंतुओं की आबादी है, वो तो समुद्र में रहती है। तो हमें वो शायद ये बताया जा रहा है कि हम अपने समुद्रों का सारा पानी भी ले जाएँगे, उसमें जितने जीव-जंतु हैं और जल राशि है, वो सारी हम वहाँ ले जाएँगे। एक्वेटिक लाइफ़ जो है, वो सारी जो है, हम रॉकेट पर लाद करके मार्स ले जाएँगे। है न?
आम आदमी नहीं जाने वाला। आम आदमी छोड़िए, जब तक आप टॉप 0.00000000000001 परसेंटाइल में नहीं हैं, आपके लिए कोई स्कोप नहीं है पृथ्वी से कहीं जाने का। वो बहुत महँगा काम है, क्योंकि जाने ही नहीं वाले हो, बात वहाँ बसने की हो रही है। उसमें प्रति व्यक्ति करोड़ों, अरबों रुपए का ख़र्चा है। आप कहाँ से दे दोगे? और उस ख़र्चे के बाद भी आपको जो जीवन मिलेगा वो ह्यूमन का नहीं, ह्यूमनोइड का मिलेगा।
जो लोग आपको ये सपना बेच रहे हैं, उनकी मक्कारियों के आरपार देखो। वो मानवता के अपराधी हैं। वो ये सब इसलिए कह रहे हैं, ताकि क्लाइमेट चेंज की ओर आपकी नज़र न जाए। ताकि आपको लगे, “अच्छा, क्लाइमेट चेंज से पृथ्वी समाप्त ही होने वाली है, तो हो जाए। हमें तो दूसरे प्लैनेट पर जाना है न।” अपने घर में आग लगी हुई है। इससे आप बेख़बर हो जाओ, इसलिए आपको दूसरे घर का सपना बेचा जा रहा है।
और घर में आग क्यों लगी हुई है?
क्योंकि उस आग पर हाथ सेकने वाले लोग मौजूद हैं, जो आपको और प्रोत्साहित कर रहे हैं, “हाँ हाँ और आग लगाओ, और आग लगाओ, और बच्चे पैदा करो। और बच्चे पैदा करोगे तो दो फायदे होंगे: पहली बात, हमें चीप लेबर मिलेगा अपनी फैक्ट्रीज़ के लिए। और दूसरी बात, कंज़्यूमर भी तो होने चाहिए, तो और बच्चे पैदा करो। न तो क्लाइमेट चेंज कोई समस्या है, न पॉपुलेशन एक्सप्लोजन, न कंज़्यूमरिज़्म।”
अमेरिका जो एवरेज अमेरिकन है, वो जितना कंज़म्प्शन करता है, उतना अगर पृथ्वी का हर प्राणी करने लगे तो छह पृथ्वियों की ज़रूरत पड़ेगी। और ये सब जो लोग हैं, ये “द ग्रेट अमेरिकन ड्रीम” ही बेच रहे हैं चारों तरफ़। और ये चाहते हैं कि आप बिल्कुल बेहोश रहो। आपको बिल्कुल पता न लगने पाए कि आप ज्वालामुखी के मुँह पर बैठे हो, और ज्वालामुखी फट चुका है। ये चाहते ही नहीं कि आपको इसकी ज़रा भी भनक लगे। आदमी अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए कितना भी गिरने को तैयार हो जाता है।
आपको क्या लगता है, जो चीज़ें आप अपनी ज़िंदगी में प्यारा मानते हो, सब वैसे ही चल लेंगी? नहीं चलेंगी। टाइड्स हैं, लूनर एक्टिविटी है, लूनर मंथ है, इनमें आप देखते नहीं हो कि एक सिंक्रोनाइज़ेशन होता है? और आप ऐसी जगह जा रहे हो वहाँ न चाँद है; चाँद नहीं है तो वहाँ तो ऐसा कुछ नहीं है कि महीना फिर 28 या 30 दिनों का ही होगा; कि होगा? और उस चीज़ का संबंध मनुष्य-शरीर से भी है। अब क्या होगा? अब कैसी दुनिया होगी वो? कैसी ज़िंदगी होगी वहाँ पर?
मनुष्य के शरीर में 70% पानी है और पृथ्वी की सतह पर भी 70% पानी है। आपको दिखाई नहीं दे रहा कि हम पृथ्वी ही हैं। और आप ऐसी जगह जा रहे हो जहाँ पानी की बूँद भी नहीं है, जहाँ अलग से प्लांट लगाकर बस किसी तरीके से इतना पानी दिया जाएगा कि पी के ज़िंदा रह लो। पर हम 70% पानी हैं शरीर से और 70% पानी हैं हम अपने ग्रह पर भी। बहुत संबंध है भाई।
आपके वोकल कॉर्ड्स जो एक्टिविटी करते हैं और हवा की जो डेंसिटी है, इसमें रिलेशन है। क्योंकि आपको जो वेव पैदा करनी है, उसको एयर को मीडियम बनाकर चलना है। तो उस वेव में जो एनर्जी होनी चाहिए, वो डिपेंड करेगी एयर की डेंसिटी पर; दूसरी जगह आप बात कैसे कर लोगे किसी और से? आप ऐसी जगह जाना चाहते हो जहाँ आप बात ही न कर पाओ! आप क्या सोच रहे हो, आप वहाँ खड़े हो जाओगे एक-दूसरे से बात कर लोगे? अरे भाई! हमारी जो वेव्स हैं, वो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स नहीं हैं, उन्हें मीडियम चाहिए होता है। हवा नहीं है तो दूसरे से बात कैसे करोगे?
और आपके ये कानों के पर्दे हैं; आपको पता है, आप खड़ी रह लेती हो उसकी वजह ये है कि यहाँ और यहाँ (कानों में) एक फ्लूइड होती है, जो आपके शरीर का बैलेंस बनाने में मदद करती है। और वो कैसे काम करती है? वो प्रेशर को मेज़र करके काम करती है, एटमॉस्फेरिक प्रेशर।
आप जब ऐसे गोल-गोल घूम जाते हो, तो चक्कर आता है न? आप गिरने लगते हो, होता है न? आप खड़े-खड़े ऐसे बार-बार, बार-बार घूमिए चक्कर आता है। क्यों? क्यों गिरने लग जाते हो? क्योंकि वो जो फ्लूइड है वो बिल्कुल डिस्टर्ब हो गई होती है। तो आप रुक भी जाते हो, तो फ्लूइड ऐसे-ऐसे जैसे बाल्टी का पानी है, बाल्टी में पानी हिला दो तो पानी थोड़ी देर तक हिलता रहता है न, तो ऐसी वो जो फ्लूइड है वो वहाँ हिलती रहती है, तो आपको फिर चक्कर-सा आ जाता है।
और वो जो फ्लूइड है, वो काम ही करती है एटमॉस्फेरिक प्रेशर को अकाउंट में लेकर के। आप प्लेन में जाते हो, थोड़ा-सा प्रेशर बदलता है तो क्या हो जाता है कानों में? और जब प्रेशर पूरा ही बदल जाएगा, तो क्या हो जाएगा आपका?
अच्छा आप अपनी पैथ लैब में जाती हैं, आप वो कराती हैं कि बॉडी-कम्पोज़िशन, मिनरल्स, विटामिन्स सब मेरे नापो। तो आप अगर देखोगे कि कितने तरीके के मिनरल्स शरीर को चाहिए होते हैं, आप हैरान रह जाओगे; कई-कई दर्जन। भारत में उतनी ज़्यादा हेल्थ-अवेयरनेस नहीं है, नहीं तो शरीर में ज़िंक, मैग्नीशियम, मैंगनीज़, ऐसे आप गिनने लग जाओगे। तो कई दर्जन एलिमेंट्स निकलेंगे। फिर कई कम्पाउंड्स भी निकलेंगे। कई आयोडाइड्स हैं, ये हैं, वो हैं; सब जो आपको चाहिए होते हैं। और उन्हीं से आप बने हो, क्योंकि वो यहाँ की मिट्टी में मौजूद हैं। और अगर वो यहाँ की मिट्टी में मौजूद न होते तो आपको नहीं मिलते, तो आपको डेफ़िशिएंसी हो जाती तो आप मर जाते।
आप जहाँ जा रहे हो, वहाँ की मिट्टी में ये सब मिनरल्स, एलिमेंट्स, कम्पाउंड्स मौजूद हैं? और नहीं मौजूद हैं, तो आप जी कैसे लोगे? पैकेज्ड फ़ूड पर?
और बताता हूँ, आपके जीने के लिए सिर्फ़ खाना नहीं चाहिए होता है। आपको बहुत सारे अच्छे वाले बैक्टीरिया भी चाहिए होते हैं। हम सिंबायोटिक जीव हैं। आप सोचते हो द ह्यूमन बीइंग; ह्यूमन बीइंग एक व्यक्ति नहीं है वो अपने आप में एक सिस्टम है। हमारे भीतर न जाने कितने और स्पीशीज़ हैं जो काम कर रही हैं, तब जाकर हम चल पा रहे हैं। आप एंटीबायोटिक्स बहुत सारी खा लो, आपकी तबीयत ख़राब हो जाएगी। बताओ क्यों? क्योंकि वो आपके भीतर न जाने कितने तरह के बैक्टीरिया को मार देंगे और फिर आप गड़बड़ हो जाओगे एकदम।
और वो बैक्टीरिया सिर्फ़ आँतों में नहीं होते, वो बैक्टीरिया शरीर के बाक़ी हिस्सों में भी होते हैं और बहुत इंपॉर्टेंट रोल अदा करते हैं। बहुत सारे वो जो बैक्टीरिया हैं, वो हमें कहाँ से मिलते हैं? मिट्टी से मिलते हैं। उनमें से कुछ तो हमें हवा से भी मिलते हैं।
आप जहाँ जा रहे हो, वहाँ पर आपको ये जो बाक़ी स्पीशीज़ हैं, ये भी मिल जाएँगी? इनके बिना आप कैसे जी लोगे?
लेकिन हम जिस दुनिया में रह रहे हैं न, वहाँ पर क्राइसिस ऑफ मैच्योरिटी है। सब इनफ़ेंट्स हो गए हैं, द इनफ़ेंटलाइज़ेशन ऑफ इंटेलेक्ट; ये हुआ है। साठ-साठ, सत्तर-सत्तर साल वाले हैं, वो बच्चों जैसी बातें कर रहे हैं। उनका मुँह भी बच्चों ही जैसा हो जाता है, बिल्कुल बच्चे हो गए हैं। लोग अब ग्रो‑अप करते ही नहीं, कोई मैच्योरिटी नहीं है, आपने नोटिस किया होगा। और बल्कि इस बात में लोगों को नाज़ होता है कि “मैं तो देखो साठ का हो गया हूँ, लेकिन अभी भी मैं बीस साल वालों जैसी बात करता हूँ।” वो यूथफ़ुलनेस नहीं है, वो रिग्रेशन है, वो एक तरह का रिटार्डेशन है।
और जो बातें आप बता रही हैं कि हो क्या रहा है दुनिया में, वो वही हैं, द क्राइसिस ऑफ़ मैच्योरिटी। कोई मैच्योरिटी नहीं है किसी किस्म की। बिल्कुल ऐसी बातें जैसे पाँच साल का बच्चा कर रहा हो, हवा‑हवाई कार्टून‑शो है जैसे, एक गुड्डे को एक प्लैनेट से उठाकर दूसरे प्लैनेट पर रख देना है; कार्टून‑शो चल रहा है न।
प्रश्नकर्ता: आचार्य‑जी, बच्चे तो फिर भी प्रश्न उठा लेते हैं, पूछ लेते हैं। पर ये जनता कैसी है जिसने ऐसों को गद्दी पर बैठा रखा है, जो कहते हैं कि “क्लाइमेट‑क्राइसिस इज़ जस्ट ऐन इल्युज़न।”
आचार्य प्रशांत: नहीं, ये जनता ऐसों का ही निर्माण है। ये जो लोग हैं जो कह रहे हैं “क्लाइमेट‑क्राइसिस इज़ जस्ट अ होक्स,” ये इस जनता को ऐसा बनाने में स्वार्थ रखते हैं। जनता जितनी गिर गई है, उसको गिराने में ऐसों का ही तो हाथ रहा है। पॉपुलर मीडिया कौन कंट्रोल करता है? मुश्किल से दुनिया में एक दर्जन लोग। और आप दिन‑रात मीडिया कंज़्यूम कर रहे हो न; उस मीडिया का ही इस्तेमाल किया जाता है आपको इंफैंटिलाइज़ करने के लिए, आपको इममैच्योर बनाने के लिए।
टीवी पर जो ये आपको बेहूदी चीज़ें दिखाई जाती हैं, वो यूँ ही नहीं दिखाई जातीं उसके पीछे एक गहरी बात है। वो बात ये है कि इंसान का दिमाग इतना कुंद कर दो, कि वो कुछ भी गहरी बात समझने या गहरा विचार करने के लायक ही न बचे। उसके बाद तुम उसे कुछ भी बेच सकते हो।
टीवी है, सोशल‑मीडिया; सोशल‑मीडिया एल्गोरिदम किस चीज़ को फ़ेवर करते हैं? विज़डम कंटेंट को? सचमुच? नहीं। टीवी पर जो आप देख रहे हो, क्या करता है? वो आपको और ज़्यादा बेवक़ूफ़ बना देता है। जो जितना टीवी देख रहा है, वो उतना बेवक़ूफ़ हो रहा है दिन‑ब‑दिन। उसकी हार्ड‑वायरिंग तक बदल रही है, इस पर प्रयोग हो चुके हैं। आप ज़्यादा टीवी देखिए, आप एकदम बेवक़ूफ़ होते चले जाते हैं। और टीवी में भी ख़ासकर वो कार्यक्रम, जो महिलाओं को टार्गेट करके बनाए जाते हैं; वो हैं ही इसीलिए ताकि वो यहाँ (दिमाग) से बेवक़ूफ़ बनी रहें।
तो जनता जब इन्हीं के द्वारा तैयार है, इन्हीं चंद लोगों ने जनता को तैयार किया है, तो जनता तो बेवक़ूफ़ होगी न। आप सोचते हो आपका दिमाग आपका है; आपका दिमाग आपका नहीं है, आपका दिमाग दुनिया के क़रीब बारह, पंद्रह या बीस लोग होंगे, आपका दिमाग उन्होंने तैयार किया है। आपका दिमाग आपका अपना नहीं है, आप बेवक़ूफ़ बनाए गए हो। आपको लग रहा है आपकी अपनी ज़िंदगी है? आपकी अपनी ज़िंदगी है ही नहीं। आप सब‑कुछ वही कर रहे हो, जो दूर बैठी ताक़तें आपसे करवाना चाहती हैं।
और मैं कोई बहुत गहरी बातें नहीं बता रहा हूँ। मैं जो बातें बोल रहा हूँ, वो आप साधारण सर्च भी करोगे तो आपको पता चल जाएँगी। न जाने कितनी किताबें हैं, जो आपको सीधे‑सीधे बता देंगी। आप इवोल्यूशन थोड़ा‑सा पढ़ लीजिए, तो वो बताएँगी कि कैसे कोई भी स्पीशीज़ इवॉल्व करती है, बाहरी स्थितियों के साथ एक डायलेक्टिकल एंगेज़मेंट से। ये तो शायद सातवीं‑आठवीं का बच्चा भी जान जाएगा, कि ये क्या बातें हो रही हैं।
दूसरा प्लैनेट होगा, तो इंसान थोड़ी होगा उस पर! फिर दूसरा प्लैनेट होगा तो फिर उस पर एलियन्स होंगे। आप अपनी सब ये साइंस‑फिक्शन भी जो बनाते हो, उसमें क्या ये दिखाते हो कि दूसरे प्लैनेट से या गैलेक्सी से कोई आया है, तो इंसान आया है। कभी दिखाते हो? दिखाते हो, एक भद्दा‑सा एलियन है। यही तो दिखाते हो।
तो माने, दूसरे प्लैनेट पर जो होता है वो एक भद्दा‑सा एलियन होता है। वही आप भी बन जाओगे, अगर आप किसी क़द्र वहाँ पहुँच भी गए और बच भी गए। पहली बात तो पहुँच नहीं सकते आप। आप बस एक फ़ैन की तरह जब वो लोग अपने रॉकेट में बैठकर भाग रहे होंगे, एक फ़ैन की तरह नीचे से खड़े होकर सेल्फ़ी ले रहे होंगे, “ये मैं हूँ और ये वो रॉकेट है। और चारों तरफ़ मेरे अब ये दुनिया जल रही है और ये अपने रॉकेट में भाग रहे हैं, और मैं अभी भी नीचे खड़ा होकर एक फ़ैन की तरह सेल्फ़ी ले रहा हूँ।”
और वो भाग भी रहे होंगे तो बहुत सारे लोग उनकी चरण‑वंदना करके कह रहे होंगे, “सर‑सर, प्लीज़ सर! ऑटोग्राफ़ सर!” एक उन्होंने कीड़ा बेचा है, बेचा नहीं इम्प्लांट करा है आपके खोपड़े पर। जानते हो उसका क्या नाम है? पॉज़िटिविटी। तो कहते हैं, डोंट बी रियलिस्टिक, बी पॉज़िटिव। सच्चाई मत देखो, ख़्वाब सजो। सच्चाई मत देखो, कामना के घोड़े पर सवार होकर बादलों में उड़ जाओ; ये पॉज़िटिविटी है।
मैं जो भी कुछ बोल रहा हूँ, इसको बोलेंगे “वेरी नेगेटिव, वेरी नेगेटिव; एकदम नेगेटिव बातें कर रहा है आदमी! जबकि जो मैं बात कर रहा हूँ, यथार्थ है, ज़मीनी बात है। मैं जो बात कर रहा हूँ, वो साइंस है। आप साइंस को नेगेटिव बोलना चाहते हो तो बोलो, मैं जो बात कर रहा हूँ, साइकोलॉजी है। उसको नेगेटिव बोलना चाहते हो; फ़िलॉसफ़ी है, नेगेटिव बोलना है बोलो।
टाइटैनिक जब डूब रहा था न, तो लोगों ने माँग करी, कि “संगीत सुनाओ!” इंसान वो शय है। वो बहुत पॉज़िटिव लोग थे। बोल रहे थे, “हम ये जानना ही नहीं चाहते हैं कि डूब रहा है। कुछ नहीं डूब रहा है, ब्रिंग ऑन द म्यूज़िक!” और वो म्यूज़िक बिल्कुल ऐसा, आसमान में उड़ गए। इधर बैठ गए। चाँद है, तारे हैं, परियाँ हैं और पानी था बढ़िया ठंडा-ठंडा, अटलांटिक वाला। इतना ठंडा कि उस पर आइसबर्ग घूम रहा था, और ये बढ़िया अपनी सब गरम-गरम सारी आउटफ़िट्स डालकर के क्या कर रहे हैं? म्यूज़िक सुन रहे हैं और उसके पाँच सेकंड, दस सेकंड बाद, वो बढ़िया ठंडा-ठंडा फ़्रीज़िंग-कोल्ड वॉटर। उसी में आपकी फ्रोज़न ग्रेव बननी थी। ये है पॉज़िटिविटी।
“ह्यूमन कॉन्शस्नेस इज़ टू प्रेशियस टू बी लेफ़्ट टू द फेट ऑफ अ सिंगल प्लैनेट, सो वी नीड टू डिस्पर्स द सीड्स ऑफ ह्यूमैनिटी अक्रॉस प्लैनेट्स ऐंड गैलेक्सीज़।” क्या खाकर आए हो? क्या पिया है? ह्यूमन कॉन्शियसनेस इज़ दिस प्लैनेट इट्सेल्फ़। वही प्याज़ के छिलके वाली बात। वो कह रहे हैं, कि “ह्यूमन कॉन्शियसनेस इतनी प्रेशियस चीज़ है कि उसे हम सिर्फ़ एक प्लैनेट पर कैसे छोड़ सकते हैं? उस प्लैनेट पर कोई ऐस्टरॉइड आकर टकरा गया तो ह्यूमन-बीइंग्स का क्या होगा?”
इसमें जो मूल अज्ञान है, वो ये है कि आप सोच रहे हो कि मनुष्य और पृथ्वी अलग-अलग हैं। नहीं, अलग-अलग नहीं हैं। विज्ञान की दृष्टि से भी नहीं हैं, और अध्यात्म की दृष्टि से भी नहीं हैं।
स्वयं को प्रकृति से भिन्न मानना, इसी को अहंकार कहा गया है, जो कि मूल माया है।
लेकिन सुनने में ये बात कितनी इम्प्रेसिव लगती है न? “ह्यूमन कॉन्शियसनेस इज़ जस्ट टू प्रेशस टू बी टाइड टू द फेट ऑफ अ सॉलीटेरी प्लैनेट, लेट्स हेज़ आवर रिस्क, लेट्स टेक ह्यूमैनिटी टू डाइवर्स प्लैनेट्स, सो दैट वी सर्वाइव ईवन इन द केस ऑफ अ कैटैस्ट्रॉफिक इवेंट इन्वॉल्विंग अ कपल ऑफ प्लैनेट्स। वी विल स्टिल सर्वाइव बिकॉज़ वी हैव डाइवर्सिफाइड।”
ये स्टॉक ट्रेडिंग कर रहे हो? हेजिंग! तुम्हें एग्ज़िस्टेन्स और ट्रेडिंग में अंतर नहीं समझ में आता? तुमने लिविंग को ट्रेडिंग मान लिया!
एक बात बस याद रख लीजिएगा, वी डोन्ट लिव ऑन दिस प्लैनेट, वी आर दिस प्लैनेट। आईदर द टू ऑफ अस लिव टुगेदर ऑर वी गो डाउन टुगेदर, बिकॉज़ वी आर नॉट टू ऐट ऑल; वी आर वन।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य-जी।