
प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये है कि मैंने, मतलब, मैं आपसे सीखी हूँ कि काम का मतलब क्या है? काम जो हमें उठाए। तो पहले मुझे क्लैरिटी नहीं थी। मतलब, मेरा जो बैकग्राउंड है फ़ूड टेक्नोलॉजी से है, मैं बीटेक और एमटेक कर चुकी हूँ। तो आपके वजह से मैंने सीखा है कि डेयरी और मीट जैसी इंडस्ट्री में नहीं काम करना है। तो वैसे मैंने फ़िल्टर लगाती गई और मैंने वो वाली कंपनी जॉइन भी नहीं की, चाहे वो अल्कोहल हो या फिर बेवरेजेज़ हों।
तो अभी मैं जिस कंपनी में हूँ, मेरी वो कंपनी सॉसेज़ और ग्रेवीज़ हैं, तो वो बनाती है वो वेज में भी जाता है, बट जो मैं उसके कस्टमर्स देखती हूँ तो उसका जो एप्लीकेशन है वो नॉनवेज में ज़्यादा जाता है। तो मुझे बहुत ज़्यादा गिल्ट भी आता है। और दूसरी बात है कि ठीक है मैंने कर दिया है काम और उससे ऊपर उठने के लिए मैं दूसरे एग्ज़ाम भी देती हूँ। मैं फ़ूड टेक में रिलेटेड, या फिर उसको एक्सप्लोर करती हूँ कि इससे कुछ बेहतर मुझे मिले।
तो उसमें, जब भी मैं देखती हूँ कि उनकी रिस्पॉन्सिबिलिटी क्या है, तो सिलेबस में होता है: मिलेट्स होता है, सब होता है। जब मैं सिलेबस में देखती हूँ कि एनिमल-रिलेटेड प्रोडक्ट्स हैं, प्रोसेसिंग है, मीट है, जो मैं पढ़ चुकी हूँ मुझे पता है उसमें क्या होता है, तो मेरा बिल्कुल भी मन नहीं करता, मैं नहीं पढ़ूँ, मैं क्यों उसमें अपना एनर्जी दूँ? फिर बीच में मेरा पैटर्न आलस का भी बहुत ज़्यादा है। तो मैं ख़ुद को मतलब एक मन बोलता है कि थोड़ी-न तुझे प्रोजेक्ट वही मिलेंगे डेयरी-रिलेटेड; दूसरे भी मिल सकते हैं। बट बाद में ऐसा लगता है कि मैं ख़ुद को धोखा, मतलब मैं गिल्ट में ही ज़्यादातर रहती हूँ।
आचार्य प्रशांत: तो जैसे चल रहा है, वैसे ही चलने दीजिए, गिल्ट भी चली जाएगी।
प्रश्नकर्ता: मतलब?
आचार्य प्रशांत: अभी नया-नया है इसलिए गिल्ट होती है। जितने अनुभवी लोग हैं, उनसे पूछो किसे कोई गिल्ट होती है? कोई गिल्ट नहीं बचती, गिल्ट भी चली जाएगी।
आपने अपनी पूरी बात की शुरुआत ही इससे करी कि मैं एमटेक, बीटेक, फ़ूड टेक्नोलॉजी में हूँ। अब मैं अपना बीटेक टेक्नोलॉजी बताने लगूँ, तो मैं बोलने लग जाऊँ कि, “साहब, मैंने तो पहले काम किया था फ़ाइनेंस में, फिर मैंने स्ट्रैटेजी में काम किया था, मैंने ऑपरेशंस में काम किया था।” मैं ये सब बोलने लग जाऊँ, तो ये संस्था कहाँ से आती? मैं बोलूँ कि, “यूपीएससी मैंने क्लियर किया था, मुझे रेलवेज़ में होना चाहिए था,” तो ये संस्था कहाँ से आती?
आप शुरुआत ही कर रहे हो, अपने अतीत को सेक्रेड और इनवायलेबल बना के। आप कह रहे हो, “मैंने एमटेक, बीटेक करा है फ़ूड टेक्नोलॉजी में,” तो वो तो अब बिल्कुल नित्य सत्य हो गया, अलंघनीय, इनवायलेबल। उसका तो अब कुछ हो ही नहीं सकता। उसके बाद वो शर्त एक बहुत बड़ी मैक्रोकंडीशन रख देने के बाद अब आप कह रहे हो, “अब मुझे गिल्ट होती है, क्योंकि मैं जो भी कुछ बनाती हूँ, वो तो उसमें भी जाता हैक् मांस उद्योग में जाता है, यहाँ-वहाँ जाता है।” इतनी बड़ी शर्तें रख के ज़िंदगी नहीं जी जाती, नहीं जी जाती।
मैं भारत सरकार की रेलें चला रहा होता अभी, यही, यही मुझे मिला था। या फिर मेरे अटेम्प्ट बचे हुए थे, मैंने फिर से दिया होता, तो कहीं पर जाकर के कुछ किसी प्रदेश में सेक्रेटरी वग़ैरह बन के बैठा होता। मैं भी ऐसे ही कह देता कि अब यूपीएससी हो गया है, तो अब और कुछ क्यों करना है? या कि अब मैंने भी सॉफ़्टवेयर से शुरुआत करी थी, तो अब सॉफ़्टवेयर में हूँ तो चलो, तब तो नया-नया था, सनराइज़ सेक्टर था सॉफ़्टवेयर एकदम ही नया-नया था। मैं तो मैं भी बाहर चला जाऊँगा, क्योंकि भाई, मैं कहाँ का बंदा हूँ? मैं टेक्नोलॉजी का बंदा हूँ। और जॉब कहाँ पर ली है मैंने? सॉफ़्टवेयर में ली है। तो मुझे काम तो वहीं करना पड़ेगा, न।
आप लोग इतनी बड़ी-बड़ी शर्तें रख लेते हो, और फिर शर्तें रख कर के सवाल पूछने आते हो। इन शर्तों के दायरों के बीच कोई जवाब दिया नहीं जा सकता।
“आचार्य जी, मेरी पत्नी है, मेरा पति है, वो बहुत नालायक है। वो ये है, वो शराब पीता है, वो ये करता है, मुझे मारता है, बच्चों को फोड़ देता है, ये कर देता है, वो कर देता है। मुझे सत्र भी नहीं देखने देता, ऐसा है, वैसा है। और घर तो चलाना ही है, ऐसा करना है, वैसा। अब मैं क्या करूँ?”
मैं अब क्या बता सकता हूँ, क्या करूँ? जो होना है, वो हो ही रहा है, और अच्छे से पिट लो। मैं अब क्या बता सकता हूँ इसमें? जब आप इतनी बड़ी शर्तें रख के आते हो तो उसमें मेरे बोलने के लिए फिर कुछ बचता नहीं है। अब आप मेरे पास आ रहे हो कुछ पेन-रिलीवर माँगने। कह रहे हो, “पेनफ़ुल कंडीशन तो चलेगी, क्योंकि मैंने तय कर रखा है कि मैं छोड़ूँगी तो नहीं। तो मुझे पेन-रिलीवर दे दो।” वो मेरे पास होता नहीं, दुर्भाग्य से। तो मैं क्या करूँ? मेरे पास डायनामाइट होता है। आप माँगते हो पिल, मेरे पास क्या है?
श्रोता: डायनामाइट।
आचार्य प्रशांत: डायनामाइट है, हथगोला। आप माँगते हो गोली, मेरे पास है गोला। “तेरा-मेरा मनवा कैसे खोई रे।”
सॉरी टू डिसपॉइंट, मेरे पास कुछ है नहीं। अब ज़्यादा-से-ज़्यादा उत्तर, जवाब जो हैं न आप लोगों के सवालों के, मेरे उत्तर ऐसे ही हुआ करेंगे कि “सॉरी टू डिसपॉइंट।” मैं कब तक आपको बस एंटरटेन करता चलूँ। सच्चाई तो यही है कि आप जो बनकर मेरे पास आए हो, मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है। भला हो कि आप भी किसी भुलावे में न रहो, किसी इल्यूज़न में न रहो। नहीं तो बाद में मुझे ही दोष दोगे कि मैं कुछ कर सकता था मैंने किया नहीं; या फिर ये दोष दोगे कि जब ये कुछ कर नहीं सकते थे, तो इन्होंने हमें बाँध कर क्यों रखा?
तो इससे अच्छा मैं आपको थोड़ा शुरू में ही बता दूँ कि आप जो शर्तें लेकर बैठे हुए हो, इन शर्तों के रहते मैं आपके लिए कुछ नहीं कर सकता। मेरे पास आपसे कहने के लिए भी कुछ नहीं है। आपको आपकी दुनिया, आपकी ज़िंदगी मुबारक हो। मैं क्या करूँ?
प्रश्नकर्ता: सर, छोड़ सकती?
आचार्य प्रशांत: मुझसे पूछ के नहीं छोड़ोगे, बेटा। जब-जब छोड़ना था न तो मैंने किसी से नहीं पूछा था, न किसी को बताने गया था। आज हम बात कर रहे थे न, ये कुछ बातें होती हैं जो पूरी तरह से भीतरी होती हैं। और अगर मेरे बोलने से छोड़ोगे न, तो इल्ज़ाम भी फिर मेरे ऊपर आएगा कि “मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी। अच्छी-खासी मेरी नौकरी चल रही थी, बड़ी मुश्किल से मैंने बीटेक-एमटेक करा था, नौकरी पाई थी, और इन्होंने पता नहीं कौन-सा मायाजाल बिछाया, बाबागिरी दिखाई, अच्छी-खासी लड़की नौकरी छोड़-छाड़ के घर पर बैठ गई, अब बर्बाद हो गई है।”
वो इल्ज़ाम भी फिर मेरे ही ऊपर आएगा। और ये नहीं कि दूसरे इल्ज़ाम देंगे, तुम्हारा अपना मन भी यही कहेगा कि “इनके चक्कर में फँस के मैंने नौकरी छोड़ दी।” तो मेरे चक्कर में न ही फँसो।
जो करना है उसकी ओनरशिप, उसकी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले सकते हो, तो कुछ करो। जैसे मैंने अपने कर्मों की ज़िम्मेदारी किसी और पर नहीं डाली।
और जो भी मुझसे ग़लतियाँ हुईं, और मुझे दुख भुगतने पड़े या पड़ रहे हैं, उनकी ज़िम्मेदारी मैं अपने ऊपर रखता हूँ। मन मेरा भी करता है कि मैं दूसरों पर इल्ज़ाम डाल दूँ, लेकिन सही बात तो ये है कि ले-दे के चुनाव तो अपना ही था। तो जैसे मैं किसी दूसरे को दोष नहीं दे सकता, न दूसरे के ऊपर ज़िम्मेदारी डाली, वैसे ही आप भी अपनी ज़िंदगी जियो। मैं यही सिखा सकता हूँ, बस, कि मैंने आप पर थोड़ी रोशनी डाल दी है। उस रोशनी में आपको कुछ चीज़ें थोड़ा बेहतर दिखने लगी होंगी। अब जब वो चीज़ें आपको दिख रही हैं, तो रास्ता क्या लेना है, ये आप जानो। रास्ता मुझसे मत पूछो, क्योंकि हम सब एडल्ट्स हैं। जैसा मैं हूँ, वैसे ही आप हो, जैसे मुझे अपनी ज़िंदगी अपनी राह खुद चलनी है, वैसे ही आपको चलनी है। मैं आपको क्या बताऊँ?
बल्कि उनसे बचना, जो राह बताने को तैयार हैं।