भारत का संविधान क्यों ऊँचा है?

Acharya Prashant

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भारत का संविधान क्यों ऊँचा है?
लोगों को लगता है, संविधान तो हमारा दुनिया के बाकी कॉन्स्टिट्यूशन से इंस्पायर्ड है; नहीं, तुम्हारा संविधान तुम्हारी मिट्टी से उठा है। जिस देश के केंद्र में आत्मा हो, वहाँ लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रेटरनिटी अपने आप आ जाती हैं। फ्रीडम, जो कि उच्चतम आध्यात्मिक बात होती है, देखिए आपका संविधान उसको कितना महत्व देता है। भारत इस अर्थ में थोड़ा-सा विशेष राष्ट्र है। भारत का संविधान उदार है, ऊँचा है। क्योंकि हम आध्यात्मिक लोग थे, इसलिए हम इतना उदार संविधान अपना पाए। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मैं अभी इंडियन नेवी में हूँ। ये मेरी ट्रेनीज़ हैं। आज संडे था, तो मैंने सभी को साथ ले लिया है। बाक़ी दिनों में मैं ख़ुद ही सेशन सुनता था।

तो सर, मेरा सवाल यह है कि जो भारतीय सेना है, उसका वेदांतिक अर्थ क्या होना चाहिए? क्योंकि अभी हम बॉर्डर पर तैनात हैं, लड़ रहे हैं कि कोई देश हमारे ऊपर आक्रमण न कर दे। और ये हैं जो हम ट्रेंड हो रहे हैं लड़ने के लिए। पर जो क्लाइमेट चेंज की समस्या है, वो तो सभी के लिए है। तो जो भारतीय सेना का अर्थ है या वेदांतिक अर्थ क्या होना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: किसी भी सेना का, विशेषकर भारत की सेना का एक ही अर्थ होना चाहिए। उसकी रक्षा करो जो उच्चतम है। उसको बचाओ जो बचाने योग्य है।

देखो, राष्ट्र क्या होता है? राष्ट्र का अर्थ होता है, लोग, जो साथ रह रहे हैं, नेशन; और राष्ट्र में जो लोग साथ होते हैं, उनके साथ होने की कोई वजह होती है। कोई कारण होता है, कि वो साथ होते हैं। ऊँचे से ऊँचा कारण होना चाहिए। और उस कारण की रक्षा जो लोग करें, वो लोग फिर सेना कहलाते हैं।

उदाहरण देता हूँ: मोहम्मद अली जिन्ना ने बोला कि “हिंदूज़ ऐंड मुस्लिम्स आर टू सेपरेट नेशन्स।” ये उनका वक्तव्य है, “हिंदूज़ ऐंड मुस्लिम्स आर टू सेपरेट नेशन्स।” तो वो कह रहे थे, कि नेशन का आधार यह है कि तू हिंदू है, मैं मुसलमान हूँ। उन्होंने कहा, कुछ लोग साथ रहेंगे क्योंकि वो सब लोग मुस्लिम हैं, और कुछ लोग साथ रहेंगे क्योंकि वो सब लोग हिंदू हैं। तो उन्होंने कहा, नेशन का आधार यह है कि इसका धर्म क्या है।

उनकी बात चली नहीं, क्योंकि मुसलमान तो पूर्वी पाकिस्तान में भी थे। पर वो मामला तीस साल भी नहीं चला, पचीस साल भी नहीं चला। तो नेशन का आधार क्या होना चाहिए? नेशन का एक आधार यह भी हो सकता है कि हम सबकी साझी भाषा है। जो पूर्वी पाकिस्तान के लोग थे, बंगाली थे, उनको सारी समस्या यही आ रही थी। असल में जो पूर्वी पाकिस्तान था, उसकी आबादी पश्चिम से ज़्यादा थी। लेकिन वो कह रहे, उर्दू ही चलेगी, यहाँ बंगाली नहीं चलेगी। वो बंगाली को ऑफ़िशियल भाषा मानने से इंकार कर रहे थे। तो बंगालियों ने कहा, “नहीं, द बेसिस ऑफ़ नेशनहुड विल नॉट मियरली बी रिलीजन; इट विल बी लैंग्वेज।”

तो राष्ट्र का दूसरा आधार यह हो सकता है कि हम सब एक राष्ट्र के हैं, क्योंकि हम सब एक भाषा बोलते हैं।

पहला आधार क्या हो सकता था? कि हम सब एक धर्म के हैं। जैसे जिन्ना ने बोला, “हम सब एक धर्म के हैं, तो हम अलग राष्ट्र हैं। तुम दूसरे धर्म के हो, तो तुम अलग राष्ट्र हो।” फिर दूसरा, जैसे बांग्लादेश के लोगों ने बोला कि “नहीं, हमारी भाषा बंगाली है, तो हम एक राष्ट्र हैं।” कुछ और भी हो सकता है: चेहरे का रंग, खाल का। कई देशों का इस बात पर विभाजन हुआ है कि साहब, जो इस तरीके के लोग हैं, वे उधर जाएँ; जो इस तरह के लोग हैं, वे इधर आएँ। हम साथ नहीं रह सकते। “द बेसिस ऑफ़ आवर नेशन इज़ द कलर ऑफ़ आवर स्किन। जितने लोग एक तरह की खाल वाले हैं, वे इकट्ठे रहेंगे, ये नेशन है।”

और भी तरीके से हुआ है, कि साहब, हमारा ट्राइब क्या है? ऊपर से सब वो एक जैसे दिखते हैं, लेकिन वो कह रहे हैं, “हमारा ट्राइब क्या है?” ट्राइब से क्या आशय है उनका? कि हमारी मान्यता क्या है? अलग-अलग हमारी मान्यता।

अब युगोस्लाविया होता था, उसका विभाजन हुआ। किस आधार पर हुआ था? पता करो। जर्मनी को बाँट रखा था दो हिस्सों में। दोनों में अलग-अलग तरीके की विचारधाराएँ चला रखी थी और आर्थिक व्यवस्थाएँ चला रखी थी। वो बात चली नहीं, जर्मनी की दीवार गिर गई। पाकिस्तान की दीवार गिर गई।

नेशन का आधार क्या होना चाहिए? और एक बार आप जान लो कि उच्चतम आधार क्या है उसकी रक्षा करनी है; सेना उसकी रक्षा के लिए है। मुझे रक्षा करनी है। मैं हर चीज़ की रक्षा थोड़ी करने लग जाऊँगा। मैं उसकी रक्षा करूँगा न, जो मूल्यवान है, कीमती है, उच्चतम है।

तो सेना भी इसीलिए होती है कि उच्चतम की रक्षा की जाए। और उस अर्थ में आप भी सैनिक हैं, मैं भी सैनिक हूँ, हम सब सैनिक हैं। क्योंकि जो ऊँचा है, सच्चा है, कीमती है, उसकी रक्षा करना हम सबका दायित्व है।

भारत इस अर्थ में थोड़ा-सा विशेष राष्ट्र है। भारत का जो संविधान है, उदात्त है, उदार है, ऊँचा है। किसी कॉलेज में था, उन्होंने बुलाया था; वो वीडियो होगा भी। जहाँ मैंने कहा था कि अगर तुम ग़ौर से देखोगे, वहाँ जो हमारा प्रीएंबल है, मैंने उसको लेकर पूरा प्रीएंबल पीछे स्लाइड चली थी; मैंने समझाया था कि देखो, एक-एक बात जो यहाँ कही गई है, ये वास्तव में वेदान्त है।

संविधान का प्रीएंबल होता है। जानते हैं न? वी, द पीपल ऑफ़ इंडिया, गिव टू आवरसेल्व्स दिस कॉन्स्टिट्यूशन दिस डे।

हम कहते हैं कि हम इन बातों पर चलेंगे। वो बस एक वाक्य है। वो जो पूरा प्रीएंबल है, एक सिंगल सेंटेंस है। उसको पढ़िएगा। और ये अभी मुश्किल से, शायद साल-दो साल पहले की बात है, कहीं पर हुआ था। हाँ, दिल्ली का ये जो एस.आर.सी.सी कॉलेज है।

तो इसलिए भारत रक्षा के योग्य है। हम नहीं कह रहे हैं कि तेरी खाल का रंग अलग है, तू जाएगा। उसके पीछे भाव क्या है? नाहं देहास्मि, ये वेदान्त है। तेरी खाल का रंग अलग है, कोई बात नहीं, चेतना तेरी वही है। हम कह रहे हैं कि जात-पात के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। भाव क्या है वहाँ पर? फिर वही, मैं चेतना हूँ। स्त्री-पुरुष में भेदभाव नहीं होगा। मैं चेतना हूँ। इसलिए भारत रक्षा के योग्य है। और भारत रक्षा के योग्य इसलिए है, क्योंकि अगर भारत सशक्त होगा तो हमारी उम्मीद यह है कि यही ऊँचे और उदार विचार पूरी दुनिया में फैल पाएँगे।

लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रेटरनिटी, हम बात कर रहे हैं इनकी। और हम भाई हैं आपस में, फ्रेटरनिटी क्यों? क्योंकि एक ही माँ से हम आए हैं। कौन-सी माँ? प्रकृति। ये वेदान्त है।

तो यह सेना का दायित्व है कि समझे कि भारत किस अर्थ में विशेष है और क्यों रक्षा की जानी चाहिए। आज आप चीन को देखिए। मानिए कि चीन का पूरी दुनिया में साम्राज्य हो जाए, तो फिर पूरी दुनिया में क्या होगा? वही जो विचार आज चीन में है। और चीन में क्या विचार है? तेरी बात की कोई कीमत नहीं। एक पार्टी, एक प्रमुख, एक विचार, बाक़ी आम आदमी क्या बोल रहा है कोई मतलब ही नहीं।

और उसके सामने भारत का संविधान देखिए। लोगों को नहीं समझ में आता, लोग कहते हैं, कि “हम तो सेकुलर हैं न।” साहब, हम सेकुलर हैं, पर हमारे संविधान में गीता बैठी हुई है। और चूँकि गीता हमारे संविधान में बैठी हुई है, इसलिए हम सेकुलर हैं। लोग कहते हैं, “भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है।” क्या करोगे हिंदू राष्ट्र बना के? तुम्हारा संविधान ही वेदान्त है। तुम्हें हिंदू राष्ट्र बनने की ज़रूरत क्या है?

वो कहाँ से आ गया संविधान? कहाँ से आया? समझो तो। उसमें लिखा नहीं है, भले कि यह वाक्य इस उपनिषद् से आ रहा है, पर वो अपने आप में उपनिषद ही है। बस रेफ़रेंस देना बाकी रह गया था। पर वो दे दिया जाए तो लोग भड़क जाएँगे। कहेंगे, ये तो धार्मिक ग्रंथ हो गया। वो धार्मिक ग्रंथ ही है। नहीं तो बताओ बंधुत्व मनुष्य में हो कैसे सकता है? फ्रेटरनिटी कहाँ से आ जाएगी?

जो बातें आपका संविधान कह रहा है न, वह आम आदमी के बस की ही नहीं हैं। हर तरीके की लिबर्टी आपका संविधान आपको दे रहा है। कितने तरीके की फ़्रीडम्स हो सकती हैं, वो विस्तार में लिखकर बता रहा है, यह भी फ़्रीडम, यह भी फ़्रीडम। और बस जब कोई बहुत आपात स्थिति हो जाएगी, तब कुछ समय के लिए आपकी कोई फ़्रीडम रोकी जा सकती है। तो वो भी अगर गलत रोकी गई है, तो सुप्रीम कोर्ट मना कर सकता है। कहता है, नहीं, नहीं, नहीं, रोक नहीं सकते।

इतनी बड़ी बात है फ़्रीडम, जो कि उच्चतम आध्यात्मिक बात होती है न। फ़्रीडम क्या होती है? लिबरेशन, उच्चतम आध्यात्मिक बात, मुक्ति; और देखिए आपका संविधान उसको कितना महत्त्व देता है। और आपका संविधान कहता है, प्रकृति की रक्षा करो; और आपका संविधान कहता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना चाहिए। ये सारे मूल्य कहाँ से आ रहे हैं? ये अध्यात्म से आ रहे हैं।

भारत अगर आध्यात्मिक देश नहीं रहा होता, तो भारत का संविधान भी वैसा नहीं हो पाता जैसा आज है। क्योंकि हम आध्यात्मिक लोग थे, इसलिए हम इतना उदार संविधान अपना पाए। लोगों को लगता है, नहीं, संविधान तो हमारा दुनिया के बाक़ी कॉन्स्टिट्यूशन से इंस्पायर्ड है।

नहीं, तुम्हारा संविधान तुम्हारी मिट्टी से उठा है पागल। हम कहते हैं, नहीं, नहीं, नहीं; पर वो तो जो आयरलैंड का था, और जो यू.एस. का है, और लोग बिल्कुल तर्क के साथ बताते हैं, प्रमाण के साथ। कहते हैं, देखो, भारत का संविधान इन-इन जगहों से है, और कुछ बातें तो बिल्कुल यहाँ से ली हैं। ब्रिटेन से ली है, कुछ बातें यहाँ से ली हैं। वो बातें ली होंगी, भाव सारा विशुद्ध, ख़ालिस देसी है। हमारा है। हमारी मिट्टी का है। नहीं तो हम रिपब्लिक कैसे बन जाते? वहाँ पर तो आज भी क्वीन बैठी हुई है।

हमने कहा, यहाँ कोई किंग-क्वीन कुछ नहीं। हम सच्चे गणतंत्र हैं। गण माने साधारण आदमी। सोचो, वहाँ आज भी, कहाँ पर? ब्रिटेन में, वहाँ आज भी क्वीन बैठी हुई है। क्यों? क्योंकि परंपरा से रही है क्वीन। यहाँ कुछ नहीं।

यह भाव जानते हो क्या है? सबसे ऊपर आत्मा है, और आत्मा सबके लिए एक बराबर है, तो कोई ऊँचा, कोई नीचा कैसे हो सकता है। क्या आत्मा पर किसी का कम, किसी का ज़्यादा अधिकार है? तो फिर हम किसी को किंग या क्वीन कैसे मान सकते हैं? यह वेदान्त है। वेदान्त के बिना रिपब्लिक होना बहुत मुश्किल है। जहाँ वेदान्त नहीं है, वहाँ तो कोई-न-कोई मोनार्क होगा ही होगा।

यह बात मेरी बहुत आसानी से नहीं पचेगी, लोगों कहेंगे, “हर जगह वेदान्त घुसेड़ देते हैं। आज इन्होंने संविधान में भी डाल दिया।” अरे, मुझे दिख रहा है तो मैं क्या करूँ? मैं कहूँगा, मुझे दिख रहा है। कहे, सावन के अंधे को सब जगह हरा-हरा दिखता है। अब हो सकता है ऐसा, है तो है।

पर मुझे तो यह पता है कि जैसे अ थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज़ जॉय फ़ॉर एवर। सत्यम् शिवम् सुंदरम्; मुझे जहाँ ब्यूटी, सुंदरता दिखाई देती है, मुझे तो वहाँ शिव ही दिखाई देते हैं। सौ तरह के सौंदर्य नहीं होते। प्रकृति का सौंदर्य हो, या गीता का सौंदर्य हो, या संविधान का सौंदर्य हो, सौंदर्य एक ही होता है और एक ही जगह से आ सकता है। उसको आत्मा बोलते हैं। तो अगर संविधान हमारा सुंदर है, तो वो भी आत्मा से ही आ रहा है, वो उसी जगह से आ रहा है। इसको वेदान्त बोला जाता है।

तो सेना का काम सिर्फ़ सीमाओं की रक्षा नहीं है। सेना का काम है राष्ट्र की रक्षा। और यह बात समझनी बहुत ज़रूरी है।

भारत जब पॉलिटिकल स्टेट नहीं भी था, नेशन तब भी था। जब पॉलिटिकली इंडिया कुछ था ही नहीं, नेशन इंडिया तब भी था। जब भारत सौ राज्यों में बँटा हुआ था, तब भी नेशन एक ही था भारत। सेना का काम है नेशन की रक्षा करना।

बिल्कुल हो सकता है, काल के संयोगों की बात है, कि कुछ ऐसा हो जाए कि राजनैतिक तौर पर भारत को पराधीन होना पड़े। होता रहता है, सब राष्ट्रों के साथ होता है। कालचक्र है, कभी बहुत ऊपर, कभी बहुत नीचे। लेकिन भारत स्वाधीन हो, पराधीन हो, अपने उच्चतम बिंदु पर हो, अपने निम्नतम बिंदु पर हो, भारत राष्ट्र का आधार यदि दर्शन है, तो भारत राष्ट्र सदा उच्चतम रहेगा। बस राष्ट्र का लेकिन आधार सही होना चाहिए। जिन राष्ट्रों का आधार गड़बड़ है, वो कहीं के नहीं रहते। वो बस फिर लड़-मरते हैं। और राष्ट्रों के बड़े गड़बड़-गड़बड़ आधार होते हैं बहुत।

इस बात पर भी हो जाते हैं, कि तुम दक्षिण वाले, हम उत्तर वाले; हम अलग-अलग रहेंगे। क्यों अलग-अलग रहोगे? कोई वाजिब कारण बताओ। क्या वाजिब कारण है कि उत्तर कोरिया दक्षिण से अलग है? बताओ। कोरिया तो एक देश है। बीच में उन्होंने एक रेखा खींच रखी है। क्यों खींच रखी है? उस राष्ट्र की कोई वजह है? कोई वजह नहीं है। एक परिवार है, वो वजह है। जिस दिन वो परिवार नहीं रहेगा, वो एक हो जाएँगे। और दुनिया भर के जो बाक़ी देश हैं, उनकी साज़िशें वजह हैं। एक हिस्से को अमेरिका ने लपेट रखा है, एक को चीन ने, दोनों अपना-अपना प्रभुत्व छोड़ने को तैयार नहीं हैं। नहीं तो कोई वजह है कि ये दो अलग-अलग कंट्रीज़ हों? कोई वजह नहीं है।

भारत ऐसा राष्ट्र नहीं है, भारत के पास एक बहुत वाजिब वजह है होने की। काश कि वो वजह पूरे विश्व को मिले। तो आपको अपने काम में ज़बरदस्त समझ होनी चाहिए और बड़ा गौरव होना चाहिए। आप किसी छोटी-मोटी चीज़ की रक्षा नहीं कर रहे हो। जो जीवन में उच्चतम हो सकता है, आप उसकी रक्षा कर रहे हो।

भारत यदि हारता है, भारत यदि पीछे रहता है, तो ये भारत नहीं पूरे विश्व का नुकसान है। हमने कहा तो एशिया में कल चीन भारत पर चढ़ बैठे, ये सिर्फ भारत का नहीं नुकसान होगा, यह पूरी दुनिया के लिए ख़तरे की बात हो जाएगी। इसलिए नहीं कि चीनी गड़बड़ लोग हैं, इसलिए क्योंकि वो जो उन्होंने विचारधारा पकड़ रखी है, वो मानव-मात्र के लिए ज़हरीली है। नहीं तो चीनियों ने एक समय पर बुद्ध के संदेश का स्वागत कितनी विनम्रता से किया था। चीनी गड़बड़ लोग नहीं हैं, किसी तरह के गड़बड़ लोग नहीं हैं। कोई भी आदमी गड़बड़ नहीं होता।

हमको लगता है कि एक चीज़ होती है इंसानियत और एक चीज़ होती है धर्म। हम कहते हैं, धर्म की ज़रूरत नहीं, इंसानियत पर्याप्त है। साहब, अगर इंसानियत सच्ची है तो उसके केंद्र में धर्म बैठा होगा, भले ही आपको पता हो चाहे न पता हो। नहीं तो इंसान माने क्या होता है? फिर तो इंसान वैसा ही है जैसे जंगल का कोई भी और पशु। जिसको आप ह्यूमैनिटी बोलते हो, जो बात आज ह्यूमनिज़्म करके चलती है, “न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा,” ये जो हायर ह्यूमन वैल्यूज़ हैं, ये सब-की-सब कहाँ से आती हैं? जंगल से नहीं आतीं। ये दर्शन से आती हैं, फ़िलॉसफ़ी से आती हैं। पर ये बात हम सोचते नहीं। हम बस कहते हैं, इंसानियत के नाते।

इंसानियत क्या चीज़ होती है? बताइए ज़रा। और इस इंसानियत के क्या नियम होते हैं? बताइएगा। खोलकर बताइएगा, विस्तार में। एक-एक बात जो आप लिखें, बिल्कुल साफ़ करके बताइएगा। पर हमारी आदत हो गई है, हेज़ी बातें करने की। हेज़ी ह्यूमन वैल्यूज़। ह्यूमन वैल्यूज़ क्या होती हैं? जितनी भी हेज़ी ह्यूमन वैल्यूज़ हैं, वो वास्तव में सब स्पिरिचुअल वैल्यूज़ हैं।

फ़्रीडम, लिबर्टी उदाहरण के लिए, हमारे संविधान का केंद्रीय तत्त्व है। और वह क्या है, कहाँ से आ रहा है? हमारा षड्दर्शन बोलता है, मुक्ति, मुक्ति, लिबरेशन। क्योंकि हमारा दर्शन बोलता है लिबरेशन, इसीलिए हमारा संविधान बोलता है लिबर्टी, फ़्रीडम।

ये बात हमें समझ में नहीं आती। हमें लगता है, संविधान तो ह्यूमन वैल्यूज़ से आया है। नहीं साहब, संविधान के भी केंद्र में वेदान्त है, वेदान्त नहीं बोलना चाहते तो कह दो हाई फिलॉसफी। ऐसे बोल दो। अभी एक बड़ा तबका खड़ा हो गया है। वो कहते हैं, “रिलिजन इज़ बुलशिट। ह्यूमैनिटी इज़ सफिशियंट।” मैं कहता हूँ, माइट बी। प्लीज़ एलाबोरेट, ये ह्यूमैनिटी क्या होती है? वो आगे फिर बोल नहीं पाते। बिल्कुल एक वेग हेज़ी टर्म है, ह्यूमैनिटी, इंसानियत, मानवता। क्या, मानवता क्या? बोलते हैं? नहीं पर वो तो हमें दिल से, यू नो, भीतर से पता होता है न। अच्छे काम करना, यही तो मानवता है। किसी का दिल न दुखाना, यही तो मानवता है। आप थोड़ा और वेग हो जाइए। अच्छे काम करना, दिल न दुखाना, दिल क्या होता है? दिल माने क्या?

रैंडम कॉन्सेप्ट्स में बात कर रहे हो, अच्छे काम करना, अच्छे माने क्या होता है? और जैसे ही आप इन बातों में गहरे जाओगे, इसी को तो फ़िलॉसफ़ी बोलते हैं न। अच्छा माने क्या? एथिक्स क्या है वो? फ़िलॉसफ़ी की एक ब्रांच है। समझ में आ रही है बात?

तो आप अगर यह भी बोलते हो कि भारत का संविधान ह्यूमन वैल्यूज़, इंसानियत, मानवता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, तो वो जो ह्यूमन वैल्यूज़ हैं, वो भी वास्तव में स्पिरिचुअल वैल्यूज़ ही होती हैं। अगर आप स्पिरिचुअल नहीं हैं, तो ह्यूमन वैल्यूज़ के नाम पर न जाने कौन-सा कचरा आप खड़ा कर दोगे।

बड़ा आनंद आए कभी मुझे, आप लोग अगर समय दे पाएँ कि मैं संविधान को लूँ, उसके आर्टिकल, अनुच्छेदों को लूँ, और बता पाऊँ यह जो लिखा हुआ है न, ये आर्टिकल, ये अनुच्छेद, ये संतों के किस भजन से आ रहा है; और ये जो है, ये उपनिषद् के किस श्लोक से आ रहा है; और ये जो पूरा सेक्शन ही है, ये गीता का कौन-सा अध्याय है। तो आप लोग अगर कभी मौका दे पाएँ, तो मैं यह करके रखूँगा सामने।

हम सेकुलर भी इसीलिए हैं, क्योंकि हम आध्यात्मिक हैं। जब आध्यात्मिक हो गया न, फिर वो धर्म के आधार पर बहुत नहीं चलता। लोगों को लगता है कि आध्यात्मिक होने का मतलब होता है, और ज़्यादा अब तुम कट्टर धार्मिक हो जाओगे। उल्टी बात है। जो आध्यात्मिक हो गया, वो धर्म के आधार पर भेदभाव बंद कर देता है, ये सेकुलरिज़्म है। सेकुलरिज़्म माने आध्यात्मिकता, वास्तव में।

जिसका धर्म अभी अधकचरा है, अधपका है, वह कट्टर हो जाता है। और जिसका धर्म पक जाता है, परिपक्व हो जाता है, वह धार्मिक भेदभाव आदि से ऊपर उठ जाता है। तो वास्तव में सच्ची धार्मिकता ही धर्मनिरपेक्षता के रूप में सामने आती है। भारत क्योंकि सच्चे अर्थों में धार्मिक रहा है, इसलिए धर्मनिरपेक्ष है।

धर्मनिरपेक्ष का मतलब यह नहीं होता कि अब धर्म से कोई लेना-देना नहीं। धर्मनिरपेक्ष का मतलब होता है, हमारी धार्मिकता अब परवान चढ़ चुकी है। हम बहुत गहरे अर्थ में धार्मिक हो चुके हैं। लोग कहेंगे, “क्या बोल रहे हो आप, सेक्युलर माने डीपली रिलीजियस!”

यस, सर। अनलेस यू आर डीपली, डीपली रिलीजियस, यू कैनॉट बी सेक्युलर। और इसीलिए आज धर्मनिरपेक्षता का भारत में इतना विरोध हो रहा है। क्योंकि जो लोग विरोध कर रहे हैं उनकी धार्मिकता अभी कच्ची है, वेट बिहाइंड द ईयर्स, अभी वो पके नहीं हैं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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