सुरक्षा नहीं मकान में, लड़की रहो उड़ान में

Acharya Prashant

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सुरक्षा नहीं मकान में, लड़की रहो उड़ान में
तुम बात-बात पर यदि निर्भर रहो, ‘पैसे दे दो, सुरक्षा दे दो,’ तुम्हें क्या लगता है, जो कोई तुम्हें यह सब कुछ देगा, तुमसे इनकी कीमत नहीं वसूलेगा? जिस लड़की के कदम खुले आकाश में नहीं निकले, जिसने दुनिया नहीं नापी, जो शिक्षित नहीं है, जो कमाती नहीं है, जिसका मन खुला हुआ नहीं है, सबसे ज़्यादा संभावना उसी लड़की के शोषण की है। घर के बाहर निःसंदेह खतरा है, पर घर के भीतर और बड़ा खतरा है। सुरक्षा तुम्हें सबसे ज़्यादा पिंजड़ों में मिलती है, पर फिर पिंजड़ों में तुम उड़ भी नहीं सकते। भूलना नहीं इस बात को। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: लड़कियों को काम के लिए अथवा पढाई के लिए घर से बाहर बहुत कम ही भेजा जाता है, क्योंकि समाज में एक डर व्याप्त है कि कहीं उनके साथ कुछ बुरा न हो जाए। ऐसी स्तिथि में हम लड़कियों को क्या करना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: ठीक है। एक तथ्य है कि समाज में तमाम तरह की हिंसा है। तथ्य है, इसको तुम गुब्बारे की तरह फुला नहीं सकते न; और जब आदमी तथ्य को देखे, तो तथ्यों को उनकी पूर्णता में देखना पड़ेगा। ये सच है कि आदमी के मन में विकृतियाँ बढ़ रही हैं, पर ऐसा भी नहीं है कि समाज कभी बड़ा साफ़ सुथरा रहा हो।

आज तुमको अगर चारों तरफ़ सुनने को मिलता है, पढ़ने को मिलता है कि ऐसी घटना और वैसी घटना, तो ऐसा भी नहीं है कि ये घटनाएँ पहले नहीं घटती थीं। सच तो ये है कि आज की औरत के हाथ में थोड़ी ज़्यादा सामर्थ्य है तो इसलिए वो चिल्ला कर के बता देती है कि मेरे साथ इस तरह का दुराचार हुआ। पहले तो और जम के होता था, बता पाने की आवाज़ भी नहीं थी उसके पास। पुलिस में जाकर के एक एफ.आई.आर भी नहीं लिखा सकती थी।

ये हुआ एक तथ्य कि जब कहा जाता है कि घटनाएँ बढ़ रही हैं, तो घटनाएँ बढ़ी तो हैं पर ऐसी कोई बाढ़ नहीं आ गई है क्योंकि ये धारा हमेशा से बह रही है, ये पहली बात है।

दूसरी बात, जब तुम कहते हो कि घटनाएँ बढ़ी हैं, तो तुम बात ये करते हो कि सड़क पर और गली में और मोहल्ले में ये सब घटनाएँ हो रही हैं। तुम इस तथ्य को बिल्कुल ही भूल जाते हो कि ऐसी घटनाएँ सबसे ज़्यादा तो घरों के अंदर होती हैं। एक बहुत बड़ा अनुपात है उन लड़कियों का, महिलाओं का जो घर के भीतर ही तमाम तरह के शोषण और हिंसा का शिकार होती हैं; सम्बन्धी, पिता, भाई, पति उनकी क्या गिनती है?

तो अगर कोई तुमसे कहे कि घर के बाहर मत निकलो खतरा है, तो उनसे पूछो, कि “घर के भीतर क्या सुरक्षा है?”

और घर के भीतर सबसे ज़्यादा असुरक्षित जानते हो कौन सी लड़कियाँ होती हैं? जो जीवन भर घर के भीतर ही रह गईं।

जिस लड़की के क़दम खुले आकाश में नहीं निकले, जिसने दुनिया नहीं नापी, जिसने अपने हाथ मजबूत नहीं किए, जो शिक्षित नहीं है, जो कमाती नहीं है, जिसके पास ज्ञान नहीं है, जिसका मन खुला हुआ नहीं है; सबसे ज़्यादा संभावना उसी लड़की के शोषण की है।

तो अगर शोषण से बचना चाहती हो तो तब तो और भी ज़रूरी है कि घर से बाहर निकलो। क्योंकि घर के बाहर खतरा है, निःसंदेह खतरा है, पर घर के भीतर मैं तुमसे कह रहा हूँ और बड़ा खतरा है। क्योंकि जो जगा हुआ नहीं है, जो बलहीन है, वो तो कभी भी शिकार हो जाएगा न। तुम बात-बात पर यदि निर्भर रहीं, हाथ फैलाती रहीं, "पैसे दे दो, कपड़े दे दो, खाना दे दो, घर दे दो, सुरक्षा दे दो;" तो तुम्हें क्या लगता है जो कोई तुम्हें ये सब कुछ देगा, तुमसे इनकी कीमत नहीं वसूलेगा? या मुफ़्त में ही मिल जाएगा? मुफ़्त में नहीं मिलेगा, कीमत दोगी।

प्रश्नकर्ता: सर, जो फैमिली को डर है, उसको कैसे दूर करें?

आचार्य प्रशांत: फैमिली को ही बताओ ये सब कि आप एक तथ्य तो देखते हो, जो टी.वी में, अख़बारों में आ जाता है, पर दूसरे तथ्य की ओर भी तो देखो न। मुझे तो पूरा जीवन जीना है।

सुरक्षा तुम्हें सबसे ज़्यादा पिंजड़ों में मिलती है, पर फिर पिंजड़ों में तुम उड़ भी नहीं सकते। भूलना नहीं इस बात को।

पिंजड़े खूब सुरक्षा देते हैं तुमको पर वो तुम्हारे पर भी कतर देते हैं। पिंजड़ों में खाना भी मिल जाता है, पिंजड़े की चिड़िया को सुबह-शाम खाना दे दिया जाता है। तो सुरक्षित रहना चाहती हो खूब, तो किसी पिंजड़े में जाकर बैठ जाओ। चाहती हो ऐसा जीवन?

बाहर खतरा तो है। चिड़िया बाहर उड़ेगी तो बाहर चील है और बाज़ है, चिड़िया का शिकार हो सकता है। पर तुम चुन लो, तुम्हें शिकार होने की डर की वजह से क्या पिंजड़ा ज़्यादा पसंद है?

प्रश्नकर्ता: नहीं, सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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