तुम बात-बात पर यदि निर्भर रहो, ‘पैसे दे दो, सुरक्षा दे दो,’ तुम्हें क्या लगता है, जो कोई तुम्हें यह सब कुछ देगा, तुमसे इनकी कीमत नहीं वसूलेगा? जिस लड़की के कदम खुले आकाश में नहीं निकले, जिसने दुनिया नहीं नापी, जो शिक्षित नहीं है, जो कमाती नहीं है, जिसका मन खुला हुआ नहीं है, सबसे ज़्यादा संभावना उसी लड़की के शोषण की है। घर के बाहर निःसंदेह खतरा है, पर घर के भीतर और बड़ा खतरा है। सुरक्षा तुम्हें सबसे ज़्यादा पिंजड़ों में मिलती है, पर फिर पिंजड़ों में तुम उड़ भी नहीं सकते। भूलना नहीं इस बात को।
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प्रश्नकर्ता: लड़कियों को काम के लिए अथवा पढाई के लिए घर से बाहर बहुत कम ही भेजा जाता है, क्योंकि समाज में एक डर व्याप्त है कि कहीं उनके साथ कुछ बुरा न हो जाए। ऐसी स्तिथि में हम लड़कियों को क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: ठीक है। एक तथ्य है कि समाज में तमाम तरह की हिंसा है। तथ्य है, इसको तुम गुब्बारे की तरह फुला नहीं सकते न; और जब आदमी तथ्य को देखे, तो तथ्यों को उनकी पूर्णता में देखना पड़ेगा। ये सच है कि आदमी के मन में विकृतियाँ बढ़ रही हैं, पर ऐसा भी नहीं है कि समाज कभी बड़ा साफ़ सुथरा रहा हो।
आज तुमको अगर चारों तरफ़ सुनने को मिलता है, पढ़ने को मिलता है कि ऐसी घटना और वैसी घटना, तो ऐसा भी नहीं है कि ये घटनाएँ पहले नहीं घटती थीं। सच तो ये है कि आज की औरत के हाथ में थोड़ी ज़्यादा सामर्थ्य है तो इसलिए वो चिल्ला कर के बता देती है कि मेरे साथ इस तरह का दुराचार हुआ। पहले तो और जम के होता था, बता पाने की आवाज़ भी नहीं थी उसके पास। पुलिस में जाकर के एक एफ.आई.आर भी नहीं लिखा सकती थी।
ये हुआ एक तथ्य कि जब कहा जाता है कि घटनाएँ बढ़ रही हैं, तो घटनाएँ बढ़ी तो हैं पर ऐसी कोई बाढ़ नहीं आ गई है क्योंकि ये धारा हमेशा से बह रही है, ये पहली बात है।




