‘ज़ॉम्बी’ शब्द का मतलब समझते हैं? चलती-फिरती लाश। हम वो बन चुके हैं, बहुत हद तक। हम वैसे हो गए कि हमारे सामने अब कुछ भी चल रहा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो हम मर गए। और जो मर गया, वो मरने से क्यों डरे? उसको तुम 2000 की AQI में डाल दो, उसे तब भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा; वो तो मर ही चुका है। ये समाज मृत्युधर्मा होता जा रहा है। हमारे भीतर ये मान्यता कूट-कूट कर भर दी गई है कि जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है, क्योंकि किसी और ने चला रखा है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: 400-500 एक्यूआई की हवा साधारण-सी बात है; क्या फ़र्क़ पड़ता है? जब तक आप ऐसी जगहों पर घूम के न आ जाएँ, जहाँ एक्यूआई डबल-डिजिट में भी नहीं पहुँचता, फिर सवाल उठेगा। क्योंकि आपको आपका हक़ अब लौटा दिया गया, आपको दिख गया कि लोग हैं दुनिया में, जो इस बात को सामान्य नहीं मानते। तो आप ही अनूठे अजूबे नहीं हो कि आपको सवाल उठ रहा है; पूरे-पूरे देश हैं, बड़े-बड़े समाज हैं, जहाँ वो बातें सामान्य और स्वीकृत नहीं हैं, जो हमारे यहाँ चल जाती हैं। अब आपको साहस आएगा पूछने का, कि “ये क्यों है? ये अनिवार्य क्यों है?” आप समझ रहे हैं?
श्रोता: आचार्य जी, एक बात मैं इस पर कहना चाहता हूँ, जो आपने अभी कहा। मै जब यूएस से आया था, पाँच-छह साल लगभग रह गए पहली बार, एनसीआर में सीधा। तो वही उस समय 900-800-900 एक्यूआई थी, तो मास्क पहनता था। तो जब बातें होती थीं आसपास, तो लोग यही कहते थे, कि “यू आर बीइंग हाई-हैंडेड!” इस तरह से आता था लोगों का। और कहीं अगर जाते हैं, नाली-वग़ैरह है, तो थोड़ा-सा क्योंकि पाँच-छह साल आदत हो गई थी, तो आसपास नाली-वग़ैरह है बदबू आती थी, तो भी मास्क पहन लेता था। तो आसपास लोगों का रिएक्शन यही रहता था कि मतलब यू आर एक्टिंग प्राइसी, इंस्टेड ऑफ।




