ज़ॉम्बी बनता समाज

Acharya Prashant

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ज़ॉम्बी बनता समाज
‘ज़ॉम्बी’ शब्द का मतलब समझते हैं? चलती-फिरती लाश। हम वो बन चुके हैं, बहुत हद तक। हम वैसे हो गए कि हमारे सामने अब कुछ भी चल रहा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो हम मर गए। और जो मर गया, वो मरने से क्यों डरे? उसको तुम 2000 की AQI में डाल दो, उसे तब भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा; वो तो मर ही चुका है। ये समाज मृत्युधर्मा होता जा रहा है। हमारे भीतर ये मान्यता कूट-कूट कर भर दी गई है कि जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है, क्योंकि किसी और ने चला रखा है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

आचार्य प्रशांत: 400-500 एक्यूआई की हवा साधारण-सी बात है; क्या फ़र्क़ पड़ता है? जब तक आप ऐसी जगहों पर घूम के न आ जाएँ, जहाँ एक्यूआई डबल-डिजिट में भी नहीं पहुँचता, फिर सवाल उठेगा। क्योंकि आपको आपका हक़ अब लौटा दिया गया, आपको दिख गया कि लोग हैं दुनिया में, जो इस बात को सामान्य नहीं मानते। तो आप ही अनूठे अजूबे नहीं हो कि आपको सवाल उठ रहा है; पूरे-पूरे देश हैं, बड़े-बड़े समाज हैं, जहाँ वो बातें सामान्य और स्वीकृत नहीं हैं, जो हमारे यहाँ चल जाती हैं। अब आपको साहस आएगा पूछने का, कि “ये क्यों है? ये अनिवार्य क्यों है?” आप समझ रहे हैं?

श्रोता: आचार्य जी, एक बात मैं इस पर कहना चाहता हूँ, जो आपने अभी कहा। मै जब यूएस से आया था, पाँच-छह साल लगभग रह गए पहली बार, एनसीआर में सीधा। तो वही उस समय 900-800-900 एक्यूआई थी, तो मास्क पहनता था। तो जब बातें होती थीं आसपास, तो लोग यही कहते थे, कि “यू आर बीइंग हाई-हैंडेड!” इस तरह से आता था लोगों का। और कहीं अगर जाते हैं, नाली-वग़ैरह है, तो थोड़ा-सा क्योंकि पाँच-छह साल आदत हो गई थी, तो आसपास नाली-वग़ैरह है बदबू आती थी, तो भी मास्क पहन लेता था। तो आसपास लोगों का रिएक्शन यही रहता था कि मतलब यू आर एक्टिंग प्राइसी, इंस्टेड ऑफ।

आचार्य प्रशांत: हाँ, “बड़े आए, अपने आपको फ़ॉरेन-रिटर्न दिखा रहे हैं। इधर ही घूमता था अन्नू, अब ये डॉक्टर चैटर्जी बनके आए हैं, बड़े आए यूएस यूनिवर्सिटी से पीएचडी।”

जितना एक्यूआई दिल्ली का था, जब वहाँ से भागकर आपके पास आया था उतना यहाँ का हो गया। मुझे लगा आपका शहर शरण देगा मुझे। यू टू ब्रूटस। और वहाँ का जितना मैं छोड़कर आया था, उससे दूना हो गया; 500-600 पहुँच गया, 200-250 यहाँ का हो गया। अब जाऊँ, तो जाऊँ कहाँ? लो फिर से फ़िल्मी गाना आ गया मेरे, “जाऊँ कहाँ बताए दिल दुनिया बड़ी है; संग-दिल।” कहाँ जाएँ? एक शहर से दूसरे शहर।

श्रोता: हिमालय चले जाइए। कल जहाँ मैं गया था, वहाँ पर भी 180 है।

आचार्य प्रशांत: हाँ, बिल्कुल-बिल्कुल, ऋषिकेश में भी अब जाता है, 150 वहाँ भी जाता है।

ज़िंदगी के प्रति नज़रिया बदलेगा, थोड़ा देखेंगे; सिर्फ़ वहाँ हवा ही नहीं साफ़ है और बहुत-सारी चीज़ें जिनको जानना, समझना बहुत ज़रूरी है। नहीं तो हम यहाँ बैठकर अपने कल्पना-लोक में ही रह जाते हैं।

लोग दिन-भर दौड़ रहे होते हैं। पार्क्स हमारे यहाँ भी हैं, दिल्ली में भी हैं, मुंबई में भी हैं, कोलकाता में भी हैं। मैं भी सुबह-सुबह निकल गया। वो फिर जो रिकॉर्ड किया था, वो आप लोगों को दिया ही था घाट पर। पार्क्स बाहर भी होते हैं और वहाँ बारह-बारह बजे रात तक भी खुले हैं, और लोग घूम रहे हैं, फिर रहे हैं। महिलाएँ भी फिर रही हैं, और आबादी बहुत ज़्यादा नहीं है। तो ऐसा नहीं बहुत ज़्यादा लोग हैं, दूर-दूर पर कोई एक-आध आदमी दिखाई दे रहा है, बाक़ी पेड़ ही पेड़ हैं, पेड़ ही पेड़ हैं, और रात में नौ बजे, दस बजे, ग्यारह बज रहा है।

हमारे यहाँ तो रात में नौ-दस बजे अगर कोई महिला किसी सुनसान पार्क में घुस गई, तो हो गया फिर! वहाँ पर दौड़ लगा रही हैं रात में दो बजे, चार बजे, जिसको जब समय मिला, दौड़ लगाई जा रही है। और पार्क में ही नहीं, सड़कों पर, गलियों में दौड़ रहे हैं। कोई किसी को घूर नहीं रहा।

हमारे यहाँ आप जॉग-वियर या ट्रैक-सूट में भरी सड़क पर दौड़ जाइए, पूरा शहर दौड़ेगा। आप प्रेरणा बन जाएँगी, जो लकवाग्रस्त हों, ज़िंदगी में हिले न हों, पीछे मुड़के देखेंगी वो भी दौड़ रहे होंगे। श्मशान से मुर्दे उठ के दौड़ रहे हैं, और हमें ये सब सामान्य लगने लग जाता है। हमें लगता है, ऐसा तो होता ही है न, अब कोई लड़की ऐसे इतने चुस्त कपड़े पहनकर दौड़ेगी सड़क पर, तो “बॉयज़ विल बी बॉयज़! मर्द-जात है भाई, पीछा तो करेंगे न!”

नहीं, ऐसा नहीं है। कोई नियम नहीं है। ये बस बदतमीज़ी है। इसमें मर्द-जात वाली कोई बात नहीं है, ये कोई जेनेटिक कम्पल्शन नहीं है। ये अनाधिकार-चेष्टा है, ये सोशल-सिविक वायलेशन है जो कि बहुत जगहों पर नहीं भी होता है; तो इसी से सिद्ध होता है कि आवश्यक नहीं है, अनिवार्य नहीं है। माने आप कर रहे हो, तो ये आपका चुनाव है। चुनाव बदला जा सकता है, चुनाव पर सवाल उठाए जा सकते हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। अभी जो एक्यूआई की बात हुई, हम लोग इतने तमस में तो हैं ही, लेकिन जो इंडिकेटर्स हैं जगाने के, जैसे एक्यूआई के इक्विपमेंट्स हैं, बताएँ कि भाई गड़बड़ है, तब तो हम उसके भी शॉर्टकट खोजने लग जाएँ कि इक्विपमेंट बंद कर दो, कैलिब्रेशन गड़बड़ कर दो। तो हम लोग क्या एक्चुअल चल रहा है, वो तो देख ही नहीं पा रहे और जो जगाने के इंडिकेटर्स हैं, वो भी डेड कर दिए गए हैं। तो लगता है कि हो क्या रहा है? सो रहे हैं ज़बरदस्त।

आचार्य प्रशांत: नहीं, देखिए, सुनने में बात अजीब-सी लगेगी पर बिल्कुल मूल से कहता हूँ, मनुष्य का स्वभाव बोध है; प्राणी का स्वभाव बोध है और बोध हेतु चाहिए जिज्ञासा। तो प्राणी का स्वभाव बोध है, बोध हेतु जिज्ञासा चाहिए, माने प्राणों का संबंध जिज्ञासा से है। प्राणों का संबंध ही जिज्ञासा से है, जहाँ जिज्ञासा मर गई वहाँ प्राण निकल गए, वहाँ हम मुर्दा हो गए। जहाँ जिज्ञासा मर गई वहाँ हम मुर्दा हो गए, और जो मुर्दा हो गया अब उसे मरने से फिर डर नहीं लगेगा न।

एक्यूआई हो या कुछ भी हो उसे क्या फ़र्क़ पड़ेगा, वो जीवन-विरुद्ध जिएगा अब। भीतर ही भीतर वो अपने जीवन के प्रति उदासीन हो चुका है। वो कह रहा है, जिएँ या मरें, फ़र्क़ क्या पड़ता है? क्योंकि स्वभावस्थ होकर तो अब जी भी नहीं पा रहे न। तो जीने की उत्कंठा मर जाती है। आदमी अपने ही प्रति उदासीन हो जाता है, अपना ठीक है ज़िंदगी का एक पुराना गतिवेग चल रहा है। ऐसे मोमेंटम है, जिंदगी रोल कर रही है, तो कर रही है। पर अब ये भाव नहीं रहता कि खुल के जिएँगे, चहक कर जिएँगे, एंटी-लाइफ़ कुछ भी होने नहीं देंगे।

जहाँ इंक्वायरी मर गई, वहाँ लव फ़ॉर लाइफ़ भी समाप्त हो गया। जहाँ जिज्ञासा नहीं है, फिर वहाँ प्राणों के प्रति प्रेम नहीं बचता। आदमी मुर्दा होने लग जाता है।

जो मुर्दा होने लग जाता है, जीवन के प्रति उदासीन हो गया या कई बार तो वो जीवन से घृणा ही करने लग जाता है भीतर-ही-भीतर। वो ख़ुद ही ऐसी स्थितियाँ निर्मित करने लग जाता है कि जल्दी से जल्दी मरें। उसे पता नहीं होता, अनजाने में, चुपचाप, पीछे से, अनकॉन्शियसली वो ख़ुद ही ऐसा काम करता है कि सब समाप्त ही क्यों न हो जाए। क्योंकि जीने का आनंद तभी है जब जीवन में क्या हो? जिज्ञासा हो, बोध हो; सिर्फ़ तभी जीवन का आनंद है।

अब जीवन में आनंद तो बचा नहीं, तो आदमी एंटी-लाइफ़ हो जाता है। भीतर कुछ कहता है, कि “मर ही जाएँ तो बेहतर है।” पर आत्महत्या भी करी नहीं जाती, तो फिर हम अपने ही ख़िलाफ़ चुपचाप साज़िश करते हैं। हम कहते हैं, 500 एक्यूआई कर दो, इसको गैस-चेंबर बना दो, धीरे-धीरे मर ही जाएँ। कोई भी आदमी जिसे ज़िंदगी से प्यार होगा वो तो भौचक्का रह जाएगा, वो चिल्लाना शुरू कर देगा। वो कहेगा, “ये हो कैसे सकता है कि हम ये सब बर्दाश्त कर रहे हैं? और वो कुछ नहीं कर पाएगा तो जगह छोड़ के भाग जाएगा। कहेगा, मैं इस समाज के साथ एडजस्ट होकर तो नहीं रह सकता जो ये सब कर रहा है। ये पागलों की दुनिया है। मैं इसमें तो नहीं रहूँगा।”

हमने जो जीवन के प्रति उत्कंठा होती है न, “ज़ेस्ट फ़ॉर लाइफ़” वो खो दी है। “ज़ॉम्बी” शब्द का मतलब समझते हैं? चलती-फिरती लाश। हम वो बन चुके हैं, बहुत हद तक।

कारण फिर से समझिएगा, स्वभाव क्या है?

प्रश्नकर्ता: बोध।

आचार्य प्रशांत: बोध। और बोध आएगा ही किससे?

प्रश्नकर्ता: जिज्ञासा।

आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा से। जहाँ जिज्ञासा पर पहरे लगा दिए जाते हों, जहाँ जिज्ञासा लगभग वर्जित कर दी जाती हो, जहाँ कहा जाता है, “बस मान लो और सर झुका दो;” वहाँ फिर आदमी भीतर-ही-भीतर चुपचाप मृत्यु की ओर बढ़ना शुरू कर देता है। क्योंकि पशु में और मनुष्य में ये अंतर है, पशु को कुछ समझ में नहीं आ रहा हो तो भी जिएगा।

कल जब हम लौट रहे थे, कौन-सा वाला था वो पार्क था, जहाँ पर वो कमल के फूल थे? हाँ, रविंद्र सरोवर। तो वहाँ से लौट रहे थे, तो एक जगह कहा, कि यहाँ हींग की कचौड़ी बढ़िया मिलती है। तो हींग की कचौड़ी झाड़नी शुरू कर दी, तो वहाँ सड़क पर डिवाइडर और उस पर एक कुत्ता बैठा हुआ है। डिवाइडर पर कुत्ता बैठा हुआ है, ऐसे अपना मस्त बैठा हुआ है। आधे घंटे तक हम कचौड़ियाँ देखते रहे, और वो ऐसे बैठा हुआ है। उसके सामने से गाड़ी आ रही है, जा रही है, उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा। उसे कुछ नहीं पता, गाड़ी माने क्या, वो नहीं जानता कि ये जो बक्सा है धातु का, ये क्या चीज़ होती है। उसे कुछ नहीं पता, पर उसे कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ रहा।

हम वैसे हो जाते हैं। और पशु वैसा हो गया, तो कोई समस्या नहीं, क्योंकि बोध उसका स्वभाव नहीं। पर हम वैसे हो गए कि हमारे सामने अब कुछ भी चल रहा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो हम मर गए। और जो मर गया वो मरने से क्यों डरे, उसको तुम 2000 की एक्यूआई में डाल दो, वो उसे तब भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, वो तो मर ही चुका है। बल्कि वो ख़ुद ही ऐसी साज़िशें करेगा कि 2000 का एक्यूआई आए, तो उस दिन रीडिंग ही मत लो। या जहाँ-जहाँ रीडिंग ली जाती है, वहाँ जाकर के पानी छिड़क दो, ताकि ख़ुद को ही धोखा दिया जा सके कि नहीं 800 नहीं है, 400 ही है। या पूरा समाज ख़ुद को समझाना शुरू कर देगा, “बस एक महीने की बात है, नवंबर एंड में दिल्ली में मानसून आ जाएगा।”

आता है हर साल, आपको नहीं पता? दिसंबर-जनवरी दिल्ली में पीक मानसून के महीने होते हैं; तो इतनी बारिश होगी, उससे एक्यूआई बिल्कुल ठीक हो जाएगा। बच्चा लोग, बजाओ ताली! और अगर नहीं होगी, तो हम क्लाउड-सीडिंग करके कर देंगे भाई। दुनिया भर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हम यूँ ही थोड़ी नंबर एक हैं।

ये समाज मृत्युधर्मा होता जा रहा है। उपनिषदों ने हमें समझाया था, क्या? “मृत्योर्मा अमृतं गमय।” हम बिल्कुल उल्टा चल पड़े उपनिषद् के, हम अमृत से मृत्यु की ओर चल पड़े हैं। फिर से कह रहा हूँ, वी हैव बिकम अ डेथ‑सीकिंग सोसाइटी। हम ख़ुद ही ख़त्म होने को आतुर हो रहे हैं, और उसके प्रमाण देखो न।

लोग सड़कों पर जैसे गाड़ी चला रहे हैं। आपको पता होता है कि एक हफ़्ते का मेहमान है या अधिक से अधिक और। पर वो मरना चाह रहा है, तो ख़ुद ही ऐसे काम कर रहा है कि किसी न किसी तरीके से ये सड़ी ज़िंदगी समाप्त हो जाए, क्योंकि सड़ी ज़िंदगी जीने को हम पैदा नहीं होते हैं। हम खुली, सुंदर ज़िंदगी जीने को पैदा होते हैं, और खुली और सुंदर ज़िंदगी हमको मिल नहीं रही है। आप सड़क पर इनको देखते हो न गाड़ियाँ कैसे चला रहे होते हैं, एक बार विचार करना; जब आपको दिख रहा है कि ये मरेगा, तो क्या उसको नहीं दिख रहा है कि वो मरेगा? उसको भी दिख रहा है। उसको दिख रहा है और कहीं न कहीं वो मरना चाहता है।

ये सड़क किनारे वो बेच रहा है, कह रहा है, “सब कुछ ₹50 में पनीर का दे दूँगा आपको; पनीर का कुलचा, पनीर की भुर्जी, पनीर का कटलेट। एक थाली है, कह रहा है ₹50 में ये पनीर ही पनीर से भरी हुई है।” ऐसा तो नहीं कि आप जानते नहीं हो कि पनीर किस भाव आता है, आप भली-भाँति जानते हो कि कोई ₹50 में आपको दे रहा है, उसमें उसे अपना मुनाफ़ा भी निकालना है, तो उसमें कुल अधिक से अधिक आपको इतना-सा (थोड़ा) पनीर दे सकता है। और उसने दिया कितना है? इतना (ज़्यादा)। और पनीर के अलावा भी उसने पाँच चीज़ें और दी हैं आपको। आप बहुत अच्छे से जानते हो कि वो आपको क्या दे रहा है, पर फिर भी आप खाओगे, जानते हुए खाओगे। भीतर कोई है जो मरना चाहता है।

किसी ऊँची लड़ाई में प्राण न्योछावर करना एक बात होती है, और गंदी हवा में घुट-घुट के मरना दूसरी बात होती है। जान देनी ही है तो ऊँचे संघर्ष में वीरगति पाएँगे, शहीद कहलाएँगे।

ये क्या है कि बारिश हो रही थी, जा रहे थे, गटर में मर गए घुस के। क्या? लाश भी नहीं निकली ठीक से, लाश निकली तो कहा, “इसको फ्लश ही कर दो, जलाने की भी ज़रूरत नहीं।” ये कौन-सी मौत है?

सतर्क रहिएगा, एंटी-लाइफ़ तो नहीं हो रहे हैं? और लाइफ़ माने साँस लेना नहीं होता। लाइफ़ माने चलना-फिरना, खाना-पीना ये नहीं होता। उसके लिए तो क्या बोल गए हैं? “जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्राण।।” वो ज़ॉम्बी की ही बात कर रहे थे।

जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान। जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्राण।।

बोले, वो जो लुहार जैसे फूँक मारता है, उसमें भी ऐसे ही लगता है जैसे साँस ली जा रही है, वो चमड़े का होता है, ऐसे होता है हवा फूँकने के काम आता है। प्राण तो नहीं हो गए न, तुम्हारे फेफड़े चल रहे हैं इससे, तुम प्राणवान नहीं माने जा सकते। आप ज़िंदा हो, ये आपके फेफड़ों से नहीं साबित होता। आप ज़िंदा हो, ये दिल की धड़कन से भी नहीं साबित होता। आप ज़िंदा हो, ये आपकी जिज्ञासा से, आपके प्रेम से और आपके विद्रोह से साबित होता है। ज़िंदगी छोड़ मत दीजिएगा, फेफड़े चलते रहें और धड़कन चलती रहे, इसके लिए प्रेम और जिज्ञासा मत छोड़ दीजिएगा।

मनुष्य के लिए जीवित होना, फेफड़े और दिल की बात नहीं है, लीवर और किडनी की बात नहीं है। मनुष्य के लिए जीवित होना, प्रेम और चेतना की बात है। जहाँ प्रेम नहीं, जहाँ चेतना नहीं, वहाँ प्राण भी नहीं फिर।

प्रश्नकर्ता: एक और फ़ॉलो-अप है आचार्य जी, कि जहाँ भी एक्यूआई जैसे भारत में दिख रहा है कि एक्यूआई बढ़ा हुआ है, तो ये मुझे लगा कि मैंने ऑब्ज़र्वेशन किया, अपनी लाइफ़ में भी किया कि कामअंध होते हैं तो ज़्यादा चीज़ इकट्ठी करने लगते हैं। मतलब कामना से ग्रसित होते हैं, तो एग्रीगेशन बढ़ जाता है। तो भारत कामअंध तो हो ही गया है, तभी एक एक्यूआई इतना बड़ा हुआ है।

आचार्य प्रशांत: नहीं, देखिए, अगर आप चीज़ों की बात करेंगे, मटेरियल पॉज़ेशन्स की, तो वो तो पश्चिम के पास प्रति व्यक्ति हमसे कई गुना है। ठीक है? बात उसकी नहीं है। जिनके पास बहुत ज़्यादा मटेरियल पॉज़ेशन्स हैं, उनकी भी हवा साफ़ है। और जिनके पास हमारे जैसे, या बल्कि हमसे थोड़े कम भी हैं मटेरियल पॉज़ेशन्स, उनकी भी हवा साफ़ है।

आप श्रीलंका चले जाइए, या आप साउथ-ईस्ट एशिया चले जाइए। ठीक है? वो मटेरियल पॉज़ेशन्स में हमसे थोड़ा ही आगे हैं। और अगर आप हमारे बड़े शहरों को लेंगे, तो आप मुंबई को ले लें और आप बैंकॉक को ले लें। तो उनमें पर कैपिटा में कोई आपको पाँच-सात गुने का अंतर नहीं मिलने वाला। ठीक है? बल्कि मुंबई के आप टॉप 5 मिलियन लोग ले लें, 50 लाख, और साउथ-ईस्ट एशियन किसी भी सिटी के भी आप टॉप 5 मिलियन लोग ले लें, तो बिल्कुल एक बराबर पर कैपिटा इनकम आनी चाहिए, मेरे अनुमान से। बाक़ी आप जाँच लीजिएगा।

तो बात मटेरियल पॉज़ेशन्स की नहीं है। हमसे जो बहुत ज़्यादा एक्यूमुलेट करे बैठे हैं, वो भी इतने एंटी-लाइफ़ नहीं हैं। जो हमारे जितना ही करे बैठे हैं, वो भी इतने एंटी-लाइफ़ नहीं हैं। जो हमसे कम बैठे हैं, अभी वो भी उतने गंदे नहीं हैं। कुछ हमने ही अपने साथ ख़ास कर रखा है। पहले ये हुआ कि दुनिया के जो सबसे दस गंदे शहर हैं, उनमें पाँच भारत के आए। बड़ा बुरा लगा। फिर सात हुए भारत के, और अभी शायद हालत ये है कि दुनिया के पचास सबसे गंदे शहरों में पैंतालीस या सैंतालीस भारत के हैं, या शायद सौ में से नब्बे भारत के हैं। कुछ ऐसी स्थिति आ गई है। और टॉप 10 में तो सब दस के दस हम ही होते हैं, या बीच में एक-आध बार ये पाकिस्तानी भांजी मार देते हैं। इन्हें चैन ही नहीं है। लाहौर घुस आता है बीच में, टॉप 10 पूरा हमारा होता, बीच में आ गया।

ये कैसे हो सकता है, बताओ तो, कि दुनिया का एक देश दुनिया में सौ में से पच्चानवे सबसे गंदे शहर रखकर बैठा है। वजह कुछ और होगी। ये पर कैपिटा इनकम वग़ैरह तो वजह नहीं हो सकती, कोई और अलग, गहरी बात है। कुछ और चल रहा है।

वहीं आऊँगा, जहाँ सारे फसाद की जड़ है; लोकधर्म। जो तथ्यों को देखने नहीं देता, क्योंकि उसमें कल्पनाएँ और कहानियाँ बहुत हैं। जो देखने ही नहीं देगा कि यमुना और गंगा की क्या हालत है, क्योंकि उसमें यमुना एक कथा का किरदार बन चुकी हैं, यमुना अब नदी हैं ही नहीं। यमुना कथा की एक बहुत सुंदर चरित्र हैं, पात्र हैं। और कथा में तो सुंदर हैं ही, कथा में तो सुंदर हैं ही न, यमुना? तो तथ्य में कैसी हैं, इससे बहुत फ़र्क़ पड़ता नहीं; क्योंकि यमुना नदी नहीं है, यमुना क्या है? यमुना एक कहानी है, और कहानी सुंदर है। तो अब वो सामने तथ्य कैसा है, फ़र्क़ क्या पड़ता है। हम तथ्यों से बिल्कुल कटकर जीना सीख चुके हैं। सब कुछ हमारे लिए महान है, बिना ये देखे कि उसकी हक़ीक़त क्या है अभी।

उसकी हक़ीक़त देखो, फिर बताओ कि कहाँ है महानता? और जिसको तुम महान नहीं बोल रहे, जिसको तुम गिरा हुआ बोल रहे हो, निंदित बोल रहे हो, गरहित बोल रहे हो, तुम बताओ उसमें किसकी निंदा कर रहे हो? किस बात की निंदा कर रहे हो? उसकी हक़ीक़त, उसका फ़ैक्ट देखकर बताओ, कि वहाँ निंदनीय क्या दिख रहा है तुमको? जिन लोगों को फ़ैक्ट दिखना ही नहीं, उन्हें नदी और हवा की गंदगी क्यों दिखे। जिन्हें कल्पनाओं में ही जीना है, वो ये भी फिर कल्पना कर सकते हैं कि दिल्ली का एक्यूआई पाँच है। कल्पना में ही तो जीना है, सब कुछ कल्पना है। और कोई कल्पना पर अगर सवाल उठाएगा तो क्या बोलोगे? “देखो, हमारी भावनाओं के साथ मत खेलो, ये हमारे सेंटिमेंट्स हैं। भाई, अगर मेरा सेंटिमेंट कह रहा है कि दिल्ली का एक्यूआई 5 है, तो है। आप कौन होते हैं कुछ कहने वाले, साहब? ये हमारी आस्था है, है तो है।” ठीक है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर। मैं आदित्य। मेरा प्रश्न एक्यूआई से रिलेटेड है। एक्यूआई घोर समस्या है, क्लाइमेट चेंज हमारा देश बहुत ग्रसित है उससे। हमारे देश में कहीं न कहीं इलेक्शन्स हर समय होते रहते हैं। अभी बिहार में इलेक्शन्स हैं, आगे जाकर बंगाल में इलेक्शन्स होंगे। हम सभी मुद्दों पर बात करते हैं: रोटी, कपड़ा, मकान। मैक्सिमम वोट वही ले जाते हैं जो बोलते हैं कि “महिलाओं को हर महीने ₹1000 देंगे, ₹2100 देंगे, ₹2500 देंगे।” इन सब कारणों से सरकारें बदल जाती हैं।

क्लाइमेट चेंज के बारे में हम कभी बात नहीं करते। हमारे पब्लिक में भी इतना ज्ञान नहीं है कि हम समझ पाएँ, कि भाई, वो आगे जाकर हमें क्या-क्या विपदाएँ देने वाली है। अभी बिहार का मैनिफ़ेस्ट देखें, बंगाल का मैनिफ़ेस्ट जो होगा, कहीं पर भी हम क्लाइमेट चेंज, एक्यूआई की बात नहीं करते। आज मान लीजिए 300 है, बढ़कर 350 होगा, 400 होगा। अगर कुछ ऐसा कर सके, अब हम आम आदमियों के पास एक ही संशोधन है, कि पॉलिटिशियन्स सुन नहीं सकते, कर नहीं सकते। एक ही संशोधन हमारे पास होता है, जुडिशियरी के पास जाएँ, कि भाई अगर जुडिशियरी सिस्टम कुछ ऑर्डर्स निकाले, कुछ बोल सके कि नहीं, ये तो आपको करना मेंडेटरी है, तो इन लोगों को मानना पड़ता है।

तो अगर ऐसा कुछ हम कर सकें, लार्ज स्केल में मैनिफ़ेस्ट कर सकें, कि आगे जाकर जो भी इलेक्शन्स होंगे, उसका इंपॉर्टेंट है कि “भाई, एक्यूआई लेवल हमें हर साल 10% पर्टिकुलर स्टेट का कम करना है,” तो शायद उस डिरेक्शन में हम बढ़ सकते हैं। तो इस तरह ख़ाली ये सोचना कि बढ़ता जा रहा है, बढ़ता जा रहा है, हम अपनी तरफ़ से क्या कर सकते हैं? जस्ट इसके बारे में आपसे समझना चाहता हूँ।

आचार्य प्रशांत: आप गीता कम्युनिटी से हैं?

प्रश्नकर्ता: आपके सत्र को सुनता हूँ।

आचार्य प्रशांत: गीता कम्युनिटी से सुनते हैं या कहीं बाहर से?

प्रश्नकर्ता: मैं आपके रिकॉर्डेड सेशन सुन रहा हूँ, चैप्टर वन कंप्लीट किया है। चैप्टर टू के पंद्रहवें-सत्रहवें श्लोक पर हूँ अभी। मैं रिकॉर्डेड सेशन्स देखता हूँ।

आचार्य प्रशांत: कम्युनिटी पर हैं कि नहीं हैं?

प्रश्नकर्ता: मैं ऐप में हूँ।

आचार्य प्रशांत: ऐप में हूँ माने क्या? ऐप डाउनलोड की हुई है आपने?

प्रश्नकर्ता: ऐप डाउनलोड की हुई है, सर।

आचार्य प्रशांत: आप रिकॉर्डेड सेशन देखते हैं?

प्रश्नकर्ता: सर, रिकॉर्डेड देखता हूँ। तो एक चालू किया है और वहाँ से फिर बढ़ता जा रहा हूँ।

आचार्य प्रशांत: इतने मैंने एग्ज़ाम्स क्लियर किए ज़िंदगी में, अगर जुडिशियरी से हो जाता न तो इंडियन जुडिशियल सर्विस भी क्लियर करके जज बन जाता।

प्रश्नकर्ता: नहीं, मैं समझ सकता हूँ सर।

आचार्य प्रशांत: आप नहीं समझ सकते, क्योंकि जहाँ समझाता हूँ, वहाँ आप सो रहे होते हैं। जब मैं समझा रहा होता हूँ तो आप सो रहे होते हैं; और फिर आप चाहते हो कि इंस्टिट्यूशनल तरीकों से काम हो जाए। क्यों? क्योंकि आप इंस्टिट्यूशन्स का आधार नहीं समझ रहे हो। उन सब इंस्टिट्यूशन्स का आधार, हमारा ही अज्ञान है। तो इंस्टिट्यूशन के अंदर से तुम कैसे बदलाव ले लोगे? कि ला सकते हो?

एक बस में एक यात्री बैठा हुआ है, ठीक है? क्या वो कुछ भी करके बस को रोक सकता है? वो बस में दौड़े, भागे, दीवारों को मुक्का मारे, कुछ भी करके; और बस के ड्राइवर तक उसकी एक्सेस नहीं है क्योंकि कोई एक ड्राइवर नहीं है। वो बस चल रही है अपने सारे यात्रियों की सामूहिक ऊर्जा से। कोई भी यात्री रोक सकता है क्या? एक ही तरीका है बस से पहले तो नीचे उतरो। ये जो इंस्टिट्यूशनल बस है, पहले तो उससे नीचे उतरो। और फिर बाहर उतरकर देखो कि अब इस बस का करना क्या है।

फ़ंडामेंटल इंस्टिट्यूशन का नाम जानते हैं आप क्या है? जिससे सारे इंस्टिट्यूशन्स निकलते हैं? “ईगो।” मैं उस फ़ंडामेंटल इंस्टिट्यूशन से सबको उतारने का काम कर रहा हूँ, उससे उतर जाओ। जज इसी समाज से आता है न, या आसमान से उतरते हैं बेचारे? बोलिए। और वो भी प्रेसिडेंट से बंधे हुए हैं, पुराने नियम-कायदों से बंधे हुए हैं। अभी कल ही उन्होंने कहा कि पॉलिसी मैटर्स पर तो हम कुछ बोलेंगे ही नहीं। वी आर गार्डियंस ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन। अगर कोई पॉलिसी सीधे-सीधे कॉन्स्टिट्यूशन को वायलेट कर रही होगी, तो पास आ जाना। वरना पॉलिसी क्या बना रही है, लेजिस्लेचर वो जाने। देयर इज एन इंस्टिट्यूशनल डिवीज़न ऑफ पावर्स एंड रिस्पॉन्सिबिलिटी।

लेजिस्लेचर जो काम कर रहा है, उसमें जुडिशरी दख़ल नहीं देगी, उन्होंने ख़ुद कह दिया है। और यही व्यवस्था बनाई गई है। और लेजिस्लेचर माने क्या होता है? वही लोग जिनको आप वोट दे रहे हो। और जुडिशरी ने तो बोल दिया कि हम लेजिस्लेचर के काम में दख़ल नहीं देंगे। बिल्कुल ठीक बोला, क्योंकि संविधान ने ही तय कर रखा है कि कौन कितना करेगा और कहाँ तक जाएगा। हाँ, जुडिशियल एक्टिविज़्म दिखाते हैं, राइट टू लाइफ़ है: आर्टिकल 21, उसकी एक ज़्यादा जेनेरस, एक ज़्यादा लिबरल परिभाषा करती है जुडिशरी कई बार। तो राइट टू लाइफ़ में राइट टू क्लीन एनवायरनमेंट भी शामिल करने की कोशिश करती है। ये सब काम जुडिशरी करने की कोशिश करती है, अपने तल पर। पर ज़्यादा करेगी, तो फिर वो कहलाता है जुडिशियल ओवर-रीच: कि जितने तुम्हें संविधान प्रदत्त अधिकार हैं, तुम उससे आगे जाने की कोशिश कर रहे हो, यू आर ओवरलीपिंग योरसेल्फ। वो नहीं कर सकते।

पर हम क्या कह रहे हैं? “नहीं, एग्ज़ीक्यूटिव कर दे। अच्छा, ठीक है ये जो सरकारी तंत्र है, एनफोर्समेंट वाला, ये कर दे। ये लोग आकर के पराली जलना रुकवा दें। ये लोग आकर के वाहनों का चालान काट दें। अच्छा, अच्छा, एग्ज़ीक्यूटिव वाले नहीं कर रहे, तो आप लोग कुछ नियम बना दीजिए न। आप लेजिस्लेचर हो, प्लीज़, प्लीज़, आप लोग कर दीजिए। अच्छा, ये भी नहीं कर रहे, तो अब किसके पास जा रहे हैं? अरे, अरे, योर ऑनर, आप जुडिशरी हो, आप लोग कर दीजिए। वो भी नहीं कर रहे, तो अब क्या करें? क्या करें?”

“अच्छा, वो फ़ोर्थ पिलर, मीडिया, उसके पास जाते हैं। देखिए, आप लोग लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाते हैं। आप लोग खूब लिखिए न, आप लोग करिए।” बिना ये देखे कि ये चारों ही जने आते कहाँ से हैं। कहाँ से आते हैं? हमारे ही घरों से आते हैं। एक ही घर, एक ही माँ और उसके चार लड़के-लड़कियाँ हो सकते हैं। एक प्रेस में है, एक कोर्ट में है, एक पार्लियामेंट में है, और एक अफ़सर बना बैठा है। हो सकते हैं न? चारों अलग-अलग काम कर रहे हैं। चारों अब अलग-अलग *इंस्टिट्यूशन/*संस्थाओं के प्रतिनिधि हो रहे हैं। पर चारों की माँ तो एक ही है न, चारों के संस्कार तो एक ही हैं न। तो वो निश्चित रूप से कुछ अच्छा करने का प्रयास कर सकते हैं। पर कितनी दूर तक जाएँगे? बोलो, कितनी दूर तक जाएँगे? और इतना ही नहीं है, जैसे हम हैं, ऐसे ही रहे।

तो संविधान कोई देववाणी तो है नहीं। हम जैसे हैं, कोई बड़ी बात नहीं कि हम कह दें कि संविधान में ये सब जो इक्वलिटी और जस्टिस और ये सब लिखा हुआ है, ये बेकार की बात है। संविधान ही बदल डालो। संविधान बेचारा क्या करेगा? लोगों के भीतर जैसा अँधेरा है, वो अगर बढ़ता ही गया, बढ़ता ही गया, तो संविधान को भी बदल डालेंगे। अभी, आज ही कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट हुआ है पाकिस्तान में। वो असीम मुनीर को बना दिया उन्होंने फील्ड मार्शल ज़िंदगी भर के लिए। और अब वो आर्मी भर का प्रमुख नहीं है। आर्मी, नेवी, एयरफोर्स सबका बन गया है, और ये काम बाकायदा कॉन्स्टिट्यूशनली कराया गया है। इसको कॉनस्टिट्यूशनल क्वो कहा जा रहा है, कि पहले तख़्ता पलट होता था, तो उसमें दिखाई देता था। जैसे मुशर्रफ़ ने जाकर नवाज़ शरीफ़ को बिल्कुल घेर लिया था, भगा दिया था। या जैसे ज़ियाउल हक़ ने भुट्टो को फाँसी दे दी थी, तो दिखाई पड़ता था कि देखो, जो इलेक्टेड रिप्रेजेंटेटिव है, फ़ौजी जनरल ने जाकर उसका तख़्ता पलट दिया।

अब इस बार वो प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उनकी पूरी लेजिस्लेचर ने मिलकर स्वयं घोषित किया है, कि ये महानुभाव फील्ड मार्शल हैं और अब ये देश के रहनुमा बनेंगे। क्या कर लोगे आप, इंस्टीट्यूशन का? इंस्टीट्यूशन तो इंसानों से ही बनते हैं। वो इंसान ख़ुद ही इंस्टिट्यूशन को सबवर्ट कर दे, तो आप क्या करोगे? बोलो। ये हो गया पाकिस्तान में, अभी कल ही हुआ है। कोई क्रांति हो रही है वहाँ पर? कुछ नहीं हो रहा। लोग उठ रहे हैं क्या विद्रोह में? कुछ नहीं हो रहा। जुडिशरी तो वहाँ भी है। कुछ करती है क्या? कुछ करती है? और जितने थोड़े बहुत छिटपुट अधिकार हैं, उस हिसाब से अपना कुछ कर दिया, फुटकर काम, उतना चलता रहता है।

आपको इंसान को जगाना होगा।आप ये नहीं कर सकते, कि “तुम कर दो, तुम कर दो, तुम कर दो। ये इंस्टिट्यूशन क्यों नहीं कर रहा? वो इंस्टिट्यूशन क्यों नहीं कर रहा?” सारे इंस्टिट्यूशन्स के नीचे, फिर दोहरा रहा हूँ, द फ़ंडामेंटल इंस्टिट्यूशन अनफॉर्चूनेटली इज़ द ईगो; द डार्कनेस इन मैन’स हार्ट। और जब तक उसको चैलेंज नहीं करोगे, बार-बार जाकर इंस्टिट्यूशन्स का मुँह देखना, कि “तुम मेरे लिए कुछ कर दोगे? तुम कर दोगे? तुम कर दोगे?” कोई कुछ नहीं करने वाला।

श्रीकृष्ण इसीलिए बोलते हैं, निराश हो जाओ। वी नीड अ थरॉ डिसिल्यूज़न्मेंट। वी नीड टोटल डिसअपॉइंटमेंट। तुम जब तक ये उम्मीद बाँधकर बैठे हो न, तब तक चीज़ें और बुरी होती जाएँगी। आपकी आशा निराधार है। आप बीमारी के लक्षण से ही बीमारी का इलाज माँग रहे हो। मिलेगा कभी? और जहाँ बीमारी का सचमुच इलाज हो रहा है, वहाँ आप कहते हो, “वो मुझे नींद आ जाती है। तो अब मैं क्या कर सकता हूँ?”

अपनी ओर से जो भरसक प्रयास कर रहा हूँ, वो आपको पता है, आपको बता दिया है। कहीं और हो सकता, तो मुझे भी कोई शौक नहीं था अपनी जान, अपनी ज़िंदगी जलाने का। मैं भी चला गया होता किसी इंस्टिट्यूशन की शरण में और वहाँ जाकर कोई पदाधिकारी बन गया होता, बहुत आसान था। बहुत इंस्टिट्यूशन खुले हुए थे, “हाँ, आओ-आओ-आओ।” पर दिख रहा था कि वहाँ कुछ होना नहीं है।

एक क्लोज़्ड सिस्टम को उसके भीतर से बदला नहीं जा सकता, क्योंकि वो सिस्टम ये भी तय करता है कि उसके भीतर कौन प्रवेश करेगा। उसके भीतर प्रवेश ही वो उसको करने देता है जिसकी नियत ही न हो उसको बदलने की। आप बहुत बड़े क्रांतिकारी हैं, ये बात आप जाकर यूपीएससी के इंटरव्यू में बोल दीजिए। आपका सिलेक्शन नहीं होगा, क्योंकि उन्हें क्रांतिकारी नहीं चाहिए, उन्हें कैसे लोग चाहिए? जो स्टेटस-क्वो को मेंटेन कर सकें। अच्छे क़ाबिल मैनेजर्स चाहिए, एडमिनिस्ट्रेटर्स चाहिए, क्रांतिवीर नहीं चाहिए। आप बोलो, कि “मैं आ रहा हूँ, और पूरी व्यवस्था को भीतर से तोड़ के रख दूँगा।” तो वहीं से आपको ही तोड़ के निकाल देंगे, “चलो बेटा।”

तो उन इंस्टिट्यूशन में प्रवेश ही उन्हीं लोगों को मिलता है जो व्यवस्था में मामूली सुधार तो कर सकते हैं, पर कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं ला सकते, कोई फ़ंडामेंटल रैडिकल चेंज नहीं ला सकते। द इंस्टिट्यूशन इज़ बिल्ट टू प्रिज़र्व इट्सेल्फ़। मार्जिनल ग्रेजुअल इम्प्रूवमेंट लाना एक बात होती है और उसके लिए इंस्टिट्यूशन्स हमारे वेल-इक्विप्ड होते हैं। लेकिन अभी हम बात किसी और चीज़ की कर रहे हैं। अभी हम किसकी बात कर रहे हैं? अभी हम पैराडाइम-चेंज की बात कर रहे हैं, अभी हम सेंटर में ही एक रैडिकल-शिफ्ट की बात कर रहे हैं। वो काम किसी इंस्टिट्यूशन के भीतर से नहीं हो सकता, उसके लिए इंसान को ही जगाना पड़ेगा। क्योंकि इन्हीं इंसानों से सब इंस्टिट्यूशन निकलते हैं, और इन इंसानों में अगर अँधेरा है तो उसी अँधेरे से सारे इंस्टिट्यूशन निकल रहे हैं।

ये काम मेहनत का है, ये काम लंबा है, लॉन्ग-ड्रॉन् है कठिन है। पर इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है, बाबा।

प्रश्नकर्ता: सर, सौ में से अस्सी आदमी तो आज के दिन में एक बोलने से हँसते हैं, समझते ही नहीं कि क्या बोल रहे हो।

आचार्य प्रशांत: तो आदमी को बदलना होगा न फिर। जब सौ में से अस्सी आदमी हँस ही रहे हैं, तो कोर्ट्स किस सीमा तक जाकर के हस्तक्षेप कर सकते हैं? आप कोर्ट्स पर भी हँसोगे।

मान लीजिए कोई सुरमा जज निकल ही आता है, दिल का साफ़, जो कह ही रहा है कि “ये जो दुर्दशा है, ये नहीं होनी चाहिए; मैं इसे ठीक करूँगा।” ठीक है न? ज्यूडिशियल-सिस्टम् के भीतर ऐसा कोई व्यक्ति निकल आता है, तो क्या आप लोग उसका समर्थन करोगे? आपने ही कहा, सौ में से अस्सी लोग तो एक्यूआई पर हँसते हैं। कौन समर्थन करेगा उसका? न तो उसको उसके इंस्टिट्यूशन के भीतर से समर्थन मिलेगा और न ही उसे जनता-जनार्दन से समर्थन मिलेगा, तो वो बेचारा फिर क्या करेगा? कुछ नहीं करेगा।

आपके इंस्टिट्यूशन इतने ही अच्छे होते, ठीक है? आपके इंस्टिट्यूशन इतने ही अच्छे होते, तो ये इंसान जो आपके सामने खड़ा हुआ है, इसे इन्स्टिट्यूशनल-रेकग्निशन नहीं मिल गया होता? आपको दिख नहीं रहा है? आप कैसे लोग हो? आपको दिख नहीं रहा है कि आपके देश का एक-एक इंस्टिट्यूशन मुझे बिल्कुल कॉर्नर करके रख रहा है। उनके लिए मैं एग्ज़िस्ट ही नहीं करता। उन्हें जहाँ मैं दिख जाता हूँ, वो जल्दी से आँखें बंद कर लेते हैं, जितने भी इंस्टिट्यूशन हों, चारों मीडिया, लेजिस्लेचर, सब। इसी से आप समझ लीजिए कि इंस्टिट्यूशन कितना बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।

पर सवाल पूछना हमारी फ़ितरत के बाहर की बात हो चुकी है, बहुत साधारण सवाल भी हमें कौंधते ही नहीं हैं। मैं पूछ रहा हूँ आपसे बताइए न, मैं आपके सामने खड़ा हूँ, आपने मुझे इतना-सा भी इन्स्टिट्यूशनल-रेकग्निशन मिलते कहीं देखा है? इन्स्टिट्यूशनल-प्रोटेक्शन मिलते देखा है? हाँ, इन्स्टिट्यूशनल-थ्रेट्स ज़रूर हैं। ये हैं हमारे इंस्टिट्यूशन्स, और मेरे सामने खड़े होके मासूमियत से कह रहे हैं, “हम लोगों को अपने इंस्टिट्यूशन्स पर भरोसा रखना चाहिए।” ठीक है, दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है। बहलाओ।

प्रश्नकर्ता: सर दिल को बहलाने की बात नहीं है।

आचार्य प्रशांत: मैं गलत समझा आपको, माफ़ कर दीजिए, गलती हो गई। नहीं-नहीं, मुझे माफ़ कर दीजिए, प्लीज़। दिल को बहलाने की बात नहीं है, इसका मतलब मैं गलत समझा हूँ। माफ़ कर दीजिए।

प्रश्नकर्ता: नहीं, सर।

आचार्य प्रशांत: और अगर मैं सही समझा तो फिर…।

प्रश्नकर्ता: आप जो संकल्प ले अग्रसर हो रहे हैं, वो हर कोई के बस की बात नहीं है।

आचार्य प्रशांत: आपको संकल्प पता ही नहीं है। फिर से आपने ऐसी बात बोल दी जो लगभग आधारहीन है। मुझे माफ़ करिएगा, मुझे मालूम है आप यहाँ पर आए हैं, और आज के दिन तो टिकट ख़रीद कर आए हैं। मैं आपका दिल वग़ैरह दुखाना नहीं चाहता हूँ। लेकिन आपको क्या पता है मेरा संकल्प? जब आप शत्रुओं से जुड़े हुए ही नहीं हो, तो आप क्यों बस एक औपचारिकता पूरी कर रहे हो ये कहकर कि आपका संकल्प बहुत शुभ है, महान है? क्यों बोल रहे हो? आपको क्या पता है? कम्युनिटी में कितने लोग हैं? ये बताओ, जो कम्युनिटी में नहीं हैं, उन्हें पता चल सकता है कि अंदर क्या हो रहा है? कितना आधारहीन वक्तव्य दे रहे हो आप।

प्रश्नकर्ता: सर, मैं इतना जानता हूँ कि आप ज्ञान के बिंदु को सबके लोगों में जगाना चाहते हैं।

आचार्य प्रशांत: अगर इतने जानने से काम हो जाता, तो फिर जो हम दिन-रात मेहनत कर रहे हैं उसकी क्या ज़रूरत थी, भाई। लेकिन मैं आपको आपकी बात को समझ रहा हूँ।

प्रश्नकर्ता: नहीं, सर।

आचार्य प्रशांत: उम्मीद पर दुनिया कायम है। आप उम्मीद बना कर रखिए, और बाक़ी हम लोगों को हमारा काम करने दीजिए। आप उम्मीद बनाकर रखिए। आप अपने जितने भी आप संस्थागत का द्वार खटखटा सकते हैं, “ये इंस्टीट्यूशन मेरे लिए कुछ कर देगा। ये काउंसिल मेरे लिए कुछ कर देगी। ये एकेडमी मेरे लिए कुछ कर देगी। ये असेंबली मेरे लिए कुछ कर देगी।” आप उन सब से जाकर के ज़ोर आज़माइश करते रहिए। हम तो पागल लोग हैं, हमें हमारा काम करने दीजिए। पर हमें समझ में आ रहा है कि उन दरवाज़ों को खटखटाने से क्या होना है। आप दरवाज़ा देख रहे हो। तो हमें पहले ही पता है, दरवाज़े के पीछे कौन है। दरवाज़े के पीछे हम ही हैं, हमारा ही अज्ञान है। उसको आप खटखटाओगे भी, तो अंधेरा ही जवाब देगा भीतर से। क्या मिल जाएगा आपको?

प्रश्नकर्ता: समय की बर्बादी, सर।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आचार्य जी, आपने आज के सत्र में जो चर्चा की कि हम लोग एंटी-लाइफ़ हो गए हैं, एक्यूआई वग़ैरह को हम लोग बिल्कुल देख नहीं पा रहे हैं। तो मैंने अपने आप से प्रश्न पूछा कि मैं वो क्यों नहीं देख पाता हूँ, जो आचार्य जी देख पाते हैं। तो मुझे जो उत्तर मिला, कि बहुत सारे मास्टर्स बैठे हुए हैं मेरे मन के अंदर। मेरा अहम् के केंद्र से ही मैं लगातार जी रहा हूँ, जिसकी वजह से मैं वो नहीं देख पा रहा हूँ।

तो क्या ये जो जैसे एक साँप को देखने के बाद जैसे हम भाग जाते हैं, पीड़ा होती है हमें, या और भी बहुत जगह हम जिस तरह से पीड़ा करते हैं, वैसे ही पीड़ा हमें एक्यूआई को देखने से क्यों नहीं होती है? और क्या ये अहम् के विगलन से ही वो संभव हो पाएगा?

आचार्य प्रशांत: ये बहुत आप ब्रह्मास्त्र चलाना चाह रहे हैं, एक ऐसी चीज़ के लिए जो शायद उतनी बड़ी है नहीं। आप ताज़ी हवा में साँस लेने का जोखिम उठा लीजिए। फिर ये आपको धुआँ कम बर्दाश्त होगा।

हमारे भीतर ये मान्यता कूट-कूट कर भर दी गई है कि जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है, क्योंकि किसी और ने चला रखा है। सब हमसे बड़े हैं। जो भी कोई मुझसे अलग है, वो मुझसे बड़ा ही है, श्रेष्ठी है। कुछ भी जो कोई और कर रहा है, ठीक ही होगा। ठीक क्यों होगा? क्योंकि कोई और कर रहा है। क्या आपको पता है आप जो भी कुछ कर रहे हैं, वो क्यों कर रहे हैं? कुछ भी पता है क्या? आपने उदाहरण के लिए कुछ कंगन जैसा पहना हुआ है, आपने कुछ गले में पहना हुआ है, अंगूठी किसने पहनी हुई है? ऐसे-ऐसे क्या है, ठंड बढ़ गई अचानक। आपको पता भी है कि क्यों ये सब है? कुछ भी पता है? जिन्होंने बाल बड़े कर रखे हैं, वो बता सकते हैं, उनके बाल बड़े क्यों हैं। बता सकते हैं क्या?

जो कुछ भी चलता आ रहा है, वो ठीक है क्योंकि मैंने नहीं चलाया न। भाई, मैंने चलाया होता, तो शायद गलत भी होता। कुछ भी है जिसका स्वामी कर्ता-धर्ता मुझसे इतर कोई और है, मुझसे अलग कोई और है, वो ठीक ही होगा। वो ठीक ही होगा, तो सब ठीक लगने लग जाता है, सब ठीक है। लगता है पूरी दुनिया ऐसी ही चलती है। जाकर के इसीलिए अपने आप को अनुभव दो, उन लोगों का, उन जगहों का, उन समाजों का, उन सोचों का, उन संस्कृतियों का जहाँ वो सब बिल्कुल नहीं चलता, जो हमें सामान्य लगता है। उसके बाद दम घुटेगा, बिल्कुल घुटेगा।

नियम फिर से समझा देता हूँ; जीव और जगत एक दूसरे के प्रतिबिंब होते हैं। जीव और जगत एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। जैसा जगत आपके चारों ओर परितह होता है, आप भी वही बन जाते हो।

समझ में आ रही है बात?

मान लो, एकदम काला-काला धुआँ ही है चारों ओर आपके, तो आपका मुँह भी कैसा हो जाएगा? काला। तो जो काला हो गया, उसे कालीमा बुरी लगेगी क्या अब? और काले आप क्यों हो गए, क्योंकि आपका जगत काला था। जैसा जगत होता है, उस जगत का जीव भी वैसा ही हो जाता है, और चूँकि वो वैसा हो जाता है, इसीलिए वो जगत उसको विचित्र या भद्दा लगना बंद हो जाता है। जगत के धुएँ से जिसका मुँह काला हो गया, उसे अब जगत की कालिमा बुरी लगेगी क्या? क्योंकि वो ख़ुद भी वैसा ही हो गया है। सूट, कार्बन, उसे अब कुछ बुरा नहीं लगेगा। अब कोई चाहिए जो आपकी दुनिया से बाहर का हो, जो बिल्कुल आपसे अलग हो, जो आपको चकित कर जाए एकदम और आप कहो साफ़ चेहरा संभव था। मुझे तो ये बताया गया था कि चेहरे का मतलब ही होता है गंदा होना, कलंकित होना। साफ़ चेहरा संभव भी है क्या?

वो साफ़ चेहरा कभी किताब में मिल सकता है, कभी यात्रा से मिल सकता है। कभी किसी विचारक, किसी दर्शन की बात में, और कभी किसी शास्त्र में मिल सकता है।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आचार्य जी।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन था कि जैसे कि ये धरती ख़त्म हो रही है, तो दूसरे मिल्की गैलेक्सी में तो एक और धरती होनी चाहिए। तो दूसरी धरती के पास जाने के लिए तो वॉर्म होल का ज़रूरत पड़ता है, तो कैसे जा सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: अरे बेटा, कोई दूसरी धरती नहीं है। नहीं है, देयर इज़ नो प्लैनेट बी। दूसरी धरती जैसा कुछ नहीं होता, यही है। और तुम्हारी भी जो पूरी व्यवस्था विकसित हुई है न, वो इसी धरती, इसी ग्रह से हुई है। सब कुछ हमारा, हमारे नाख़ून जैसे हैं; उनका संबंध इस पृथ्वी से है। जैसी ये पृथ्वी है, ऐसी न होती तो हमारे नाख़ून, हमारा मुँह, हमारे फेफड़े, हमारा मस्तिष्क, कुछ भी वैसा नहीं होता। पृथ्वी तो पृथ्वी छोड़ो, पृथ्वी के पास अगर अपना उपग्रह नहीं होता, चंद्रमा, तो भी मनुष्य वैसा नहीं होता जैसा है।

सारा जीवन कहाँ से हम कहते हैं शुरू हुआ है? पानी से। ठीक है? और हम जानते हैं कि चंद्रमा का पानी पर क्या असर पड़ता है। 70% जो जलराशि है, समुद्र, उन पर क्या असर पड़ता है। चंद्रमा भी नहीं होता, तो भी पृथ्वी पर जीवन जैसा है ऐसा नहीं होता। आपको क्या लग रहा है कि जीवन और ये प्लैनेट दो अलग-अलग चीज़ें हैं? कि आप प्लैनेट बदल लोगे तो जीवन तब भी वैसा का वैसा रह जाएगा? नहीं।

आपका जितना कद है, आपने कभी सोचा कि इंसानों का जो औसत कद है, वो 5 1/2 फ़ीट के आसपास क्यों होता है? आपने कभी सोचा? उसका ताल्लुक पृथ्वी से है। पृथ्वी का जितना व्यास है, उतना न होता तो आदमी का कद भी अलग होता। पृथ्वी का जितना डायमीटर है, उससे कुछ और हो, तो इंसान की जैसी संरचना है वैसी नहीं रह जाएगी। पृथ्वी की ग्रैविटी दूसरी हो तो आपका मसल मास दूसरा हो जाएगा। इसीलिए जो लोग ज़ीरो-ग्रैविटी एनवायरनमेंट्स में जाते हैं, जब लौट के आते हैं तो उनका मसल डिके हो चुका होता है। उनके पास मसल ही नहीं बचती। और यही ग्रैविटी और ज़्यादा हो तो आपका मसल मास भी और ज़्यादा होगा, होना पड़ेगा उसे।

आपकी जो भीतर नाज़ुक नसें हैं और आर्टरीज़ वग़ैरह हैं, उनका भी डायमीटर बदल जाए, अगर पृथ्वी जैसी है वैसी न हो, किसी और तरह की हो। तो पृथ्वी डिस्पोज़ेबल नहीं है। पृथ्वी का कोई अल्टरनेटिव नहीं है, भाई। पृथ्वी ट्रेन के डब्बे की तरह नहीं है कि B2 में नहीं मिला तो A1 में चले जाएँगे। एक ही पृथ्वी है और इंसान उससे अभिन्न है, इनसेपरेबल है।

आपका ब्रेन जैसे काम करता है, उसका संबंध पृथ्वी की बनावट से है। आपकी आँखें जैसी देखती हैं, उसका संबंध सूरज और पृथ्वी के बीच की दूरी से है। सूरज और पृथ्वी के बीच में और ज़्यादा दूरी होती, तो आपकी आँखें दूसरे तरह की होतीं। अब आप यही आँखें लेकर के दूसरे ग्रह पर चले जाओगे, तो क्या होगा?

श्रोता: आँखे ख़राब हो जाएँगी।

आचार्य प्रशांत: ये आँखें ठीक से काम नहीं कर पाएँगी। ये ज़बरदस्त एक फ़ैंटेसी है सिर्फ़, कि हम जाकर के दूसरी जगहों को कॉलोनाइज़ कर लेंगे। अरे भाई, ब्रिटेन से निकलकर अफ्रीका को कॉलोनाइज़ करना एक बात है क्योंकि वो एक ही ग्रह हैं दोनों। पर पृथ्वी से निकल कर के कहना कि हम मार्स को कॉलोनाइज़ कर लेंगे, ये पागलपन है। इसमें फ़िज़िकल और मेंटल डिसऑर्डर दोनों होने हैं। और दूसरी बात, ये इतना एक्सपेंसिव काम है कि मुश्किल से कुछ सौ लोग या कुछ हज़ार लोगों के लिए, बहुत हुआ तो कुछ लाख लोगों के लिए संभव हो सकता है। माने जो पृथ्वी की 800 करोड़ की आबादी है अभी, और हम सिर्फ़ मनुष्यों की आबादी की बात कर रहे हैं, जीव-जंतुओं की तो कोई बात ही नहीं।

ये जो हमारी आबादी है इसका 0.001% भी नहीं कर पाने वाला है इंटरप्लैनेटरी ट्रैवल। और नहीं जाकर के मार्स भी सेटल हो सकता है। तो ये जो आम आदमी को बड़ा नशा चढ़ा रहता है न कि “ये पृथ्वी अगर क्लाइमेट चेंज से बर्बाद हो रही है तो हो, ह्यूमैनिटी इज़ नाउ गोइंग टू कॉलोनाइज़ मार्स।” ह्यूमैनिटी नहीं जाने वाली है मार्स पर, कुछ चुनिंदा ट्रिलियनैयर और बिलियनैयर जाने वाले हैं। तुम नहीं जाने वाले हो। तुम यहाँ नीचे खड़े रहोगे जलते हुए ग्रह पर और देखोगे कि वो उनका स्पेसशिप निकल गया।

झुन्नू लाल खुश हैं कि हमें भी मार्स पर जाने को मिलेगा। मार्स पर जाने भर से तो होना नहीं है। फिर वहाँ जाकर के सस्टेनेबली बसना भी है। उसकी जो एंड-टू-एंड कॉस्ट आएगी, अगर वो प्रति व्यक्ति ₹150 करोड़ आनी है, तो झुन्नू लाल, दोगे तुम? दोगे? और 150 करोड़ में बहुत कम बोल रहा हूँ। क्योंकि तुम, अब तो ज़िंदगी भर के लिए वहाँ जाने की बात कर रहे हो न, तो तुम तो रिकरिंग कॉस्ट की बात कर रहे हो। और फिर वहाँ पहुँच जाओगे तो कॉस्ट तो लग जाएगी, और लगती रहेगी। इनकम का क्या होगा? इनकम तो यहाँ से आती थी, इस ग्रह से। और बिना इनकम के वहाँ भाग गए, और वहाँ जो लाइफ़टाइम कॉस्ट आनी है रुकने की, बसने की, खाने की, पीने की, जीने की और जो सौ तरह की वहाँ बीमारियाँ होंगी, उनके एक्सपेंसेज़ की, वो आनी है ₹500 करोड़। और झुन्नू खुश है। कह रहे हैं, जला दो इस पृथ्वी को। क्योंकि मुझे मेरे ट्रिलियनैयर रोल मॉडल ने बताया है कि हम मार्स पर जा रहे हैं। हम मार्स पर नहीं जा रहे, वो मार्स पर जा रहा है। तुमको यहाँ जलता हुआ छोड़ के वो मार्स पर जा रहा है। कोई दूसरा ग्रह नहीं है।

जी लोगे किसी दूसरी जगह, जहाँ दिन ही 24 घंटे का न होता हो? क्या होगा तुम्हारी सारी साइकल्स का? बोलो। अभी आपके जितने फ़िज़िकल साइकल्स हैं, वो प्लैनेटरी साइकल्स के साथ सिंक्रोनाइज़्ड हैं। क्योंकि इसी प्लैनेट से आपका शरीर निकला है, और वहाँ जा रहे हो। वहाँ पर साल है 819 दिनों का। आप किसी और ग्रह पर जा रहे हो, जहाँ 819 दिन का साल होता है और 42 घंटे का दिन होता है। अब क्या करोगे? कब जियोगे? कब उठोगे? कब मरोगे? क्या करोगे?

ग्रैविटी है 5 m/sec², और ग्रैविटी है 15। यहाँ तो कह देते हो, “अरे रे रे रे! बुढ़ा गया, अर्थराइटिस है। घुटने में बड़ा दर्द है।” और जहाँ 15 m/s² ग्रैविटी होगी, वहाँ तुम्हारे घुटनों का क्या होगा? लउठा लोगे? ऐसा लगेगा कि बीस-बीस किलो के पत्थर बँधे हुए हैं टाँगों में। चल लोगे? और अगर नहीं चल पाओगे तो जियोगे कितने दिन? पर बिल्कुल एक रोमैन्टिक झुनझुना दे दिया गया है आम आदमी को, “बजाओ।” पृथ्वी जल रही है, तो जलने दो। कोई बात नहीं। बड़े वाले अंकल जी तुम सबको मंगल ग्रह पर बसाएँगे। ज़रूर।

अच्छा, जो स्पेसशिप आपको लेकर जाएगा, उसकी कैपैसिटी कितनी होगी एक चक्कर की, बताइएगा। बताइए तो। अभी तो ये होता है कि किसी देश में कोई इंसरजेंसी हो जाती है और वहाँ पर इंडियन्स हैं, जैसे कुवैत में हो गई थी या कहीं और हो जाती है, और वहाँ से उनको इवैक्युएट कराना होता है, तो भी हमारी हालत ख़राब हो जाती है। यूक्रेन से भगाना पड़ा इंडियन्स को कि “अरे, वहाँ लड़ाई शुरू हो गई, यूक्रेन से इंडियन्स को लेके आओ।” हमारी हालत ख़राब हो गई, जबकि वहाँ कुल कितने थे? महज कुछ हज़ार। तो भी जान निकल गई कि उनको यूक्रेन से इंडिया ही कैसे लेकर आएँ? अच्छा।

यूक्रेन से इंडिया लाना, वो भी महज कुछ हज़ार लोगों को, और वो एक अनमैनेजेबल ऑपरेशन हो जाता है। और आप पृथ्वी से ये 800 करोड़ लोगों को ले जाकर के वहाँ टाँग दोगे दूसरे प्लैनेट पर! है न? शाबाश! कितना बड़ा स्पेसशिप है? कितने चक्कर लगाएगा? उतना फ़्यूल कहाँ से आने वाला है? और अगर फ़्यूल आपने ला भी लिया, मान लीजिए, आप कहते हो, “नहीं साहब, ये तो इसमें भीतर हम फ्यूज़न रिऐक्टर लगा देंगे, न्यूक्लियर फ़्यूल से चलेगा।” तो उसकी जो कॉस्ट होगी वो कौन बियर करने वाला है? ये सब हमारे ग़रीब लोग? इनके बूते, ये जाएँगे?

और वहाँ अगर चले भी गए, तो वहाँ जाकर क्या करेंगे, नाचेंगे? इतने लोगों के लिए वहाँ घर बनवा रखे हैं? और वहाँ हवा नहीं, पानी नहीं। कह रहे हैं, “आर्टिफ़िशियली पानी बनाएँगे।” कितने लोगों के लिए आर्टिफ़िशियली पानी बनाओगे? कितने लोगों के लिए? ऑक्सीजन नहीं। कह रहे, “नहीं, नहीं, हम स्टेशन्स बनाएँगे, जिनसे कम्प्रेस्ड ऑक्सीजन बिल्कुल पृथ्वी वाले प्रेशर पर हम सबको देंगे।” कितने लोगों को दोगे? अभी तो कोविड हुआ था। कितने लोगों को ऑक्सीजन दे पाए थे? कोविड हुआ था, तब तो ऑक्सीजन मिली नहीं थी। कह रहे हो, “मार्स पर जाकर 800 करोड़ लोगों को ऑक्सीजन देंगे!” शाबाश!

और दिखाई भी नहीं दे रहा कि बेवक़ूफ़ बनाए जा रहे हो। क्यों बेवक़ूफ़ बनाए जा रहे हो? ताकि क्लाइमेट बैक बर्नर पर पड़ा रहे। ताकि आम आदमी क्लाइमेट के मुद्दे पर एजिटेट न होने पाए, उसको एक झुनझुना दे दो। बस ये है और कुछ नहीं।

अच्छा एक बात बताओ ये सब बनती हैं; साइंस, फिक्शन, मूवीज और लिटरेचर रहता है। इसमें एलियंस रहते हैं बहुत बार। ठीक है? वो एलियंस बाहर से आए होते हैं। कभी दूसरी गैलेक्सी से, कभी दूसरे ग्रह से। है ना? तो वो एलियन कभी इंसान जैसे होते हैं? इसका मतलब वहाँ जो रहेगा वो कैसा हो जाएगा? कैसा हो जाएगा? वो एलियन जैसा ही तो हो जाएगा, तो वैसा होना है। *“ओह माय गॉड! मेरी स्किन वैसी हो जाएगी?” यस।

क्योंकि वहाँ रह के भी अगर इंसान हुआ जा सकता तो साइंस फिक्शन में आप ये क्यों दिखाते कि वहाँ से जो आया है तो किसी की पूँछ है। किसी का मुँह, वो फिल्म कौन सी आई थी, ऋतिक रोशन की, जिसमें वो कोंका कोंका कर रहा होता है। सोचिए आपकी जाने बाहर जाने तमन्ना वैसी दिख रही है, “कोंका कोंका।” मिल गव मार्स? खाओगे क्या? ये तो पृथ्वी की मिट्टी है जिस पर इतना कुछ पैदा हो जाता है। वहाँ भी हो रहा है? खेती करोगे? क्या करोगे? खाना कहाँ से आएगा? बस, लेकिन दिमाग न बिल्कुल फितूर, जैसे ही गाना बज रहा है, ऐसा ही हो गया है। “रात कली एक ख़्वाब में आई और गले का हार हुई। मेरी स्पेसशिप पृथ्वी से पार हुई। सुबह को जब हम नींद से जागे, एलियन से मार हुई।”

छोटे बच्चों को स्कूलों में ये जो सबसे आगे आगे के स्कूल हैं, आईबी वग़ैरह के, उनमें वो रोल प्ले वग़ैरह कर रहे हैं, “हाउ टू लिव हार्मोनियसली विथ एलियंस।” मैंने कहा, इसको ये तो पता नहीं है “हाउ टू लिव हार्मोनियसली विथ कैट्स।” कुत्तों को पत्थर मारता है, उनकी पूँछ खींचता है और वो पूरा करके आ रहा है कि एलियंस के साथ कैसे हमको हार्मोनी से रहना है। बिकॉज़ द फ्यूचर इज़ स्पेशल। फ्यूचर में तो सब वहाँ रहेंगे।

आप तो आ ही रहे हो रोज़। आपको तो मैं कल ढूँढूँगा, आइएगा और कल सवाल पूछिएगा।

प्रश्नकर्ता: टॉपिक के चक्कर में असली बात निकल जा रही है। आज संसारी था, कल गीता समागम, असली बात कब करेंगे। मेरा कोलकाता डूबने वाला है, सर। आपको पता है।

नमस्ते, सर। मतलब, आपको तो पता ही है कि कोलकाता का जो सी राइजिंग लेवल है, एक जियोलॉजिस्ट उन्होंने तीन-चार वीडियोस निकाले हैं कि कोलकाता की जो अंडरग्राउंड वाटर है, उसका लेवल बहुत कम हुआ जा रहा है। ये बोरिंग जो सिस्टम लगाया गया है। तो मेरा ग्रुप है, हम लोग काम मतलब कोशिश करते रहते हैं लोगों को समझाने की। तो उन सबको प्रैगमैटिक सॉल्यूशन चाहिए। अब प्रैगमैटिक सॉल्यूशन कहाँ से लाए? उनको बोला है कि आप सही से जियो, सही से सोचो।

तो बोलता है कि नीचे से पानी नहीं दोगे तो ऊपर से व्यवस्था कर दो। तो पूरा वरुण देव के चेंबर से एकदम चैनल लगावा दें क्या? मेरा धस जाएगा, मेरा कोलकाता तो डूबने वाला है दस साल में।

आचार्य प्रशांत: तो फिर आपको वो क्रांति चाहिए जो पद पर बैठे इस तरह लोगों को उखाड़ फेंके, वरना बस शिकायत करते रह जाओगे।

प्रश्नकर्ता: फिर तो इलेक्शंस।

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो बस यही करते रह जाओगे। वो यही कहेंगे।

प्रश्नकर्ता: तो वो तो मैनिफेस्टो निकलने वाला है नहीं।

आचार्य प्रशांत: बिल्कुल कि क्लाइमेट चेंज हम रोकेंगे, लेकिन प्रैगमैटिक सॉल्यूशंस दो। समझ में आ रही है बात? और प्रैगमैटिक सॉल्यूशन क्या है? जिसमें आप पॉपुलेशन कंट्रोल की बात मत करो, जिसमें आप फूड की बात मत करो। क्योंकि फूड तो एक पर्सनल डाइटरी, कल्चरल प्रेफरेंस है। माने जितनी-इतनी चीज़ों से कार्बन एमिशन होता है, उनकी बात मत करो। उसके अलावा कोई और बात करो तो प्रैगमैटिक रहे। माने कि साँप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे, कार्बन एमिशन भी कम हो जाए और लोगों की लाइफ़स्टाइल जैसी चल रही है वैसी ही चलती रहे। लोगों की ज़िंदगी का जो सेंटर है, जिस केंद्र से वो सारे फैसले करते हैं और काम करते हैं, वो सेंटर भी ना बदले और कार्बन एमिशन भी रुक जाए।

तो ये लोग जो बैठे हैं अभी कुर्सियों पर, ये तो ऐसी ही बातें करेंगे। एक ही तरीका है, ये व्यवस्था ही पूरी बदलनी पड़ेगी, इसका केंद्र ही बदलना पड़ेगा। जो लोग कुर्सियों पर बैठे हैं, इंस्टीट्यूशंन्स में घुसे हुए हैं, उनसे उम्मीदें करोगे न तो ऐसे ही रोना पड़ेगा। वो ऐसी ही बातें करेंगे, कि “नहीं, आपकी बात तो ठीक है, लेकिन जो चल रहा है, वो भी तो ठीक है। तो कुछ ऐसा करते हैं कि जो चल रहा है, वो चलता भी रहे और नहीं भी चले।” ये उनका समाधान आएगा। ये समाधान है।

*द मिनिमम यू कैन डू इज़ स्टॉप कोऑपरेटिंग इन दिस सिस्टम। एंड स्टॉप मेंटेनिंग होप्स फ्रॉम दिस सिस्टम। एंड बाय दिस सिस्टम, आई डू नॉट मीन अ पर्टिकुलर वे ऑफ गवर्नेंस ऑर अ पर्टिकुलर आइडियोलॉजी। आई मीन द वेरी सेंटर ऑफ मैनकाइंड।** हम जब तक जैसे हैं, वैसे ही रहेंगे, तब तक कुर्सियों पर बैठे लोग भी वैसे ही रहेंगे।

अभी COP फिर से शुरू हो गया है, किसी अख़बार में कवरेज भी देख रहे हो आप इसकी? पेरिस एग्रीमेंट से, जो हर साल मुलाक़ात होनी पड़ती है सारी पार्टीज़ की, जहाँ पर आकर के डिस्कस करते हैं कि अभी तक क्या किया और अब आगे क्या करना है। वो शुरू हो गया है। आज ही से, आज 10 तारीख है न, कल से शुरू हो रहा है। कहीं इसका उल्लेख मिल रहा है आपको? वो चीज़ बस चुपके-चुपके नीचे, नीचे निकल जानी है। क्योंकि कुछ नहीं किया गया है, बल्कि जो करना था उसका उल्टा किया गया है।

अमेरिका तो पता ही है, बाहर ही हो गया है। बड़े देशों में जिसका सबसे ज़्यादा पर कैपिटा एमिशन है, वो तो ख़ुद ही अलग हो के बैठ गया है। हमें कोई लेना-देना नहीं, मागा (मेेक अमेरिका ग्रेट अगेन), हम तो अमेरिका को ग्रेट बनाएँगे और और ज़्यादा एमिशन करेंगे। वो डेमोक्रेटिकली इलेक्टेड लीडर* है, भाई। इलेक्टोरेट ही ऐसा है, तो ऐसे को ही तो इलेक्ट करेगा। आप जब तक इलेक्टोरेट नहीं बदलोगे, तब तक ऐसे ही लोग पहुँचते रहेंगे कुर्सियों पर। इलेक्ट्रोइट बदलने का मतलब है कि अपनी तादाद बढ़ाओ, इसीलिए बार-बार बोलता हूँ।

आपको लगता है कि मैं चाह रहा हूँ कि गीता समागम में लोग जुड़ जाएँगे, तो उससे संस्था को पैसा आ जाएगा। पागलों जितने लोग जुड़ रहे हैं, संस्था उन पर उतना ज़्यादा अधिक ख़र्च कर रही है। आ नहीं रहा, संस्था अपने ख़र्चे पर ला रही है सबको, आओ। आप तब भी नहीं जोड़ पा रहे हो लोगों को। एक ही तरीका है, दिस प्लेस विल हैव टू रीच अ क्रिटिकल मास। ये बात आपको अभी चाहे जितनी अव्यवहारिक लग रही हो, इसके अलावा कोई समाधान नहीं है। आपको ही अपनी तादाद इतनी बढ़ानी पड़ेगी, दैट यू स्टार्ट काउंटिंग। राइट नाउ, विद द नंबर्स यू हैव, यू डोंट काउंट, यू डोंट मैटर। एंड, आल्सो, बिकॉज़ यू आर अफ्रेड। जितनी आपकी संख्या है, वो बहुत छोटी भी नहीं है।

कम्युनिटी एक लाख होने को आई। एक लाख छोटी संख्या है, पर उतनी भी छोटी नहीं है। दूसरी समस्या ये है कि आप डरे हुए बहुत हो। ये जो एक लाख लोग हैं, बहुत डरे-सहमे लोग हो आप, आपसे बोला नहीं जाता, चू नहीं होती आपसे।

कई बार तो मुझे झल्लाहट, कोफ्त हो जाती है। अपने ऊपर शर्म आती है कि इतने डरे हुए लोगों का मैं क्या नेतृत्व करूँ? क्या इनका मैं शिक्षक बनूँ? आवाज़ ही नहीं है मुँह में। जितने नालायक हैं, अधर्मी हैं, पापी हैं, वो सब कुतुब मीनार पर चढ़ के चिल्ला रहे हैं; उन्हें न डर है, न शर्म है। पर हमारे लोगों के बिल्कुल ताला लगा हुआ है, घीघी बँधी हुई है। चलिए, कल मिलते हैं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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