खेती में छुपी हिंसा

Acharya Prashant

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खेती में छुपी हिंसा
खेत खाली जगह नहीं है; खेत एक ह्यूमन कॉलोनी है। खेत का मतलब होता है कि तुमने वहाँ की पूरी प्रकृति नष्ट कर दी है। 80% जो खेती होती है, वो सिर्फ़ इंसान को अन्न खिलाने के लिए नहीं, वो इंसान को मीट खिलाने के लिए होती है। तो जंगल काट के तुमने खेत बनाया, और वो खेती इसलिए कर रहे हो कि अब जानवर काटोगे। अगर हम में थोड़ी चेतना जगेगी, तो जैसे हम मनुष्यों को मारने को अपराध समझते हैं, वैसे ही हम जीवों को मारने को भी अपराध घोषित करेंगे, और पेड़ काटने को भी अपराध घोषित करेंगे। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो लोग कहते हैं कि पृथ्वी पे इतनी खाली जगह है, तो वो तो जब खेतों को भी देखते होंगे, तो उनको लगता होगा कि ये भी खाली जगह ही है।

आचार्य प्रशांत: खेत, हाँ, ऊपर से देखोगे ऐसे तो लगेगा कि खेत तो खाली जगह ही है, यहाँ इंसान तो दिख नहीं रहा। खेत खाली जगह नहीं है, खेत एक ह्यूमन कॉलोनी है। खेत का मतलब होता है कि तुमने वहाँ की पूरी प्रकृति नष्ट कर दी है और वहाँ अपने लिए खाद्यान्न की एक-दो स्पेसिफिक स्पीशीज़ वहाँ बो दी हैं। तो खेत, प्रकृति नहीं होता। खेत में और जंगल में जमीन-आसमान का अंतर है। जंगल काट के खेत निकलता है, भाई। जिसको आप खेत कहते हो, वो प्रकृति का उदाहरण नहीं होता, खेत विनाश का उदाहरण है।

अगर आपको कहीं खेत दिख रहा है, तो आप ये नहीं कह सकते, आहा!हा! कितनी सुरम्य प्रकृति हमको दिखाई दे गई, कितना अद्भुत प्राकृतिक दृश्य है। वो प्राकृतिक दृश्य नहीं है। वो प्रोडक्शन है, वो एक तरह की फैक्ट्री है। बस वो हरे-हरे रंग की है और उसमें आपको पौधे दिख रहे हैं, तो आपको पता नहीं चल रहा है कि आप कॉलोनाइज़ेशन का और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन का एक आप मंज़र देख रहे हो।

खेत ख़ुद अपने आप में प्रकृति के विनाश का दृश्य होता है। पृथ्वी पर जितनी भी जगह है ठीक है; जितनी भी जगह है, हैबिटेबल, 50% उस पर खेती हो रही है इस वक़्त। पृथ्वी पर जितनी जगह है, वो 50% खेती के लिए इस्तेमाल हो रही है, हैबिटेबल जगह। तो खेत खाली जगह नहीं है, वो उस पॉपुलेशन को फीड करने के लिए जंगल का डिस्ट्रक्शन है।

और 80%, 70%; 70 तो कम मैंने बोला पहले, 80% जो खेती होती है वो सिर्फ़ इंसान को अन्न खिलाने के लिए नहीं होती है, वो इंसान को मीट खिलाने के लिए होती है। अगर आदमी अन्न नहीं खा रहा हो, शाकाहारी हो जाएँ, तो कुल जितनी जगह पर खेती हो रही है, उसकी सिर्फ़ 20% जगह की ज़रूरत पड़ेगी।

हमारी ज़्यादातर जो खेती हो रही है, वो हमारा पेट भरने के लिए नहीं हो रही है, वो बीफ़ पैदा करने के लिए, मटन और चिकन पैदा करने के लिए हो रही है, पोर्क पैदा करने के लिए हो रही है।

खेत खाली जगह नहीं होता। खेत तो हमारी क्रूरता और हवस की निशानी, एक प्रमाण के तौर पर होते हैं। खेत का मतलब होता है कि तुमने न सिर्फ़ जंगल काटे हैं, बल्कि तुम वो खाना जिन जानवरों को खिला रहे हो, उनको भी काटोगे। खेत का यही मतलब है। 80% खेती जानवर काटने के लिए होती है। तो जंगल काट के तुमने खेत बनाया, और वो खेती इसलिए कर रहे हो कि अब जानवर काटोगे। ये कुल मिलाकर के इक्वेशन है।

जो पेस्टिसाइड यूज़ है ने, वो पिछले 50-60 साल में 800% बढ़ा है (स्रोत: विकिपीडिया)। पेस्टिसाइड यूज़, फर्टिलाइज़र यूज़, ये कई गुना बढ़े हैं। और नतीजा ये है कि वहाँ जो कीड़ों की आबादी, जो इंसेक्ट पॉपुलेशन, इंसेक्ट स्पीशीज़ हैं, ये सिर्फ़ पिछले 50 साल में 70% कम हो गए हैं। 70% ही कम हुई है जंगलों में सारे वन्य प्राणियों की आबादी। सिर्फ़ 50 साल में जंगलों में जितने भी जानवर रहते थे, उन सबकी आबादी हमने 70% कम कर दी है। और खेती करके जो नेचुरली ऑकरिंग इंसेक्ट्स थे, उनकी आबादी भी हमने 70% कम कर दी है।

तो खेती इतनी वायलेंट चीज़ है। हम कहते हैं, अरे, मुझे फैक्ट्री वग़ैरह नहीं देखनी, मुझे ह्यूमन कंस्ट्रक्शन नहीं देखना, मुझे तो खेत बड़े प्यारे लगते हैं। साहब वो खेत भी विनाश है। इस वक़्त 1 मिलियन स्पीशीज़ हैं, 1 मिलियन स्पीशीज़ जो विलुप्ति की कगार पर खड़ी हैं, एक्सटिंक्ट होने वाली हैं। पृथ्वी पर 1 मिलियन स्पीशीज़ ऐसी हैं, जो विलुप्त होने वाली हैं। क्यों होने वाली है? क्योंकि उनके लिए हैबिटेट नहीं छोड़ा आपने। उनका जंगल काट दिया आपने। अपने आप विलुप्त हो रही हैं। जंगल क्यों काटा? खेत बनाने के लिए।

इस पृथ्वी पर जितनी ज़मीन है, जहाँ इंसान रह सकता है, उसमें से आधी ज़मीन सिर्फ़ खेती में इस्तेमाल हो रही है। तो खेतों को देखकर ये न सोचें, कि अरे, अभी तो बहुत जगह बाकी है, खेत हटाकर मैं यहाँ पर रेज़िडेंशियल कॉम्प्लेक्स बना लूँगा। रेज़िडेंशियल कॉम्प्लेक्स बना लोगे, तो उनके लिए और खेत चाहिए होंगे।

और जब खेती के लिए जगह नहीं मिलेगी, तो तुम उसमें और ज्यादा फर्टिलाइज़र और पेस्टिसाइड का इस्तेमाल करोगे ताकि कम जगह पर ही ज़्यादा पैदा हो जाए। और जितना तुम इन चीज़ों का इस्तेमाल करोगे, उतना तुम जो ज़मीन में जितना ऑर्गेनिक मैटर होता है और जो ऑर्गेनिक आबादी होती है कीड़ों की, जीवों की, तुम उन्हें इतना और नष्ट करोगे। सोइल को और पॉल्यूट करोगे और इंसान के पेट में भी और ज़हर डालोगे।

आप अगर कहीं से गुज़र रहे हैं और वहाँ आपको चारों तरफ़ खेत ही खेत दिखाई दे रहे हैं, तो ये कोई बहुत अच्छा नज़ारा नहीं है। ये विनाश की आहट है। खेत दिखाई देना और इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स या रेज़िडेंशियल कॉम्प्लेक्स दिखाई देना एक ही बात है। क्लाइमेट चेंज की दृष्टि से भी।

क्योंकि अगर आपको खेत दिखाई दे रहा है, तो इसका मतलब है वहाँ से जो अब अन्न पैदा होने जा रहा है, वो जाएगा किसी एनिमल फ़ार्म की ओर। खेत की जो पूरी पैदावार है वो जाएगी, 80% पैदावार जाएगी किसी एनिमल फ़ार्म की ओर। और उस एनिमल फ़ार्म में ज़बरदस्त रूप से कार्बन डाइऑक्साइड एमिशन चल रहा है।

फॉसिल फ्यूल जलाने के बाद दूसरा सबसे बड़ा स्रोत कार्बन एमिशन का है, एनिमल एग्रीकल्चर; मांस खाना।

एक सबसे बड़ा स्रोत तो ये है, कि आपने चलो फ्यूल जला दिया, उससे कार्बन डाइऑक्साइड रिलीज़ हुई; और दूसरा ये कि आप जो मांस खाते हो, उससे सबसे ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड रिलीज़ होती है। और वो जो आप मांस खाते हो, उसके लिए अन्न खेत से जाता है। तो आप जो खेत देख रहे हो, वो भी कार्बन एमिशन का बहुत बड़ा स्रोत है। तो जैसे आप फैक्ट्री देखते हो और कहते हो, अरे, ये तो कार्बन एमिट कर रहा होगा, वैसे ही जब खेत देखो, तो इंडायरेक्टली वो खेत भी कार्बन एमिट कर रहा है।

हमें कोई बहुत प्राकृतिक और पिक्चरिस्ट दृश्य दिखाना होता है फिल्मों वग़ैरह में, तो हम ऐसे दिखाते हैं, “ये देखो, ये सरसों के खेत हैं, और हवा चल रही है, तो ऐसा लग रहा है जैसे पीला रंग झूम रहा हो।” आपकी आँखों को धोखा हो रहा है। वो भी विनाश का ही दृश्य है।

अच्छा, तो एक काम करते हैं, खेत हटा देते हैं। हम ख़ुद नए जंगल बना देंगे। इसे बोला जाता है...

श्रोता: एफॉरेस्टेशन।

आचार्य प्रशांत: एफॉरेस्टेशन या रिफॉरेस्टेशन। हम ख़ुद जाकर के वहाँ पर अब जंगल लगा देंगे। भाई साहब, आप जो कर रहे हो, वो किसी भी तरीके से एक प्राकृतिक जंगल के समतुल्य नहीं है। आप वहाँ जाकर पेडों की लगाओगे पाँच प्रजातियाँ, और जंगल में होती हैं पाँच हज़ार। और वो जो पेड़ है, उसे पूरा वृक्ष बनने में लगते हैं कभी पंद्रह साल और कभी 45 साल। आप उसकी इतनी देखभाल कर लोगे?

लेकिन जो आपने काटा, वो एक्ज़िस्टिंग कार्बन सिंक था, और उसे आपने एक पल में जीरो कर दिया। और अब आप कहते हो, ख़ुद को सांत्वना देने के लिए और दुनिया को बेवकूफ़ बनाने के लिए, कि ‘हमने जितना काटा है और हमने जितनी जगह निकाली है खेती के लिए या किसी इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट के लिए या माइनिंग के लिए हमनें जो जंगल काटा है, उसके बदले में हम जाकर कहीं और पेड़ लगा देंगे। हम एक कृत्रिम जंगल बना देंगे।’ ये ढकोसला है, ये ख़ुद को बेवकूफ़ बनाने की बात है। ये साइकोलॉजिकली और साइंटिफिकली दोनों दृष्टि से फ्रॉड है।

आप जो ये पेड़ वग़ैरह लगा रहे हो, इससे कुछ नहीं होने का। और आम आदमी भी अपने आप को खूब बेवकूफ़ बनाता है ये कह-कह के कि ‘मैंने दो पेड़ लगा दिए।’ तुम ये बताओ तो, कि बीस साल में जब तक वो तुम्हारा पेड़ बड़ा होगा, उतने में वो हर साल कितनी कार्बन अब्सॉर्ब करेगा? पेड़ का यही फायदा होता है न, जो कार्बन अब्सॉर्ब करता है, वही कार्बन उसकी लकड़ी बन जाता है।

तो ये तो बताओ कि वो बीस साल में कितनी कार्बन अब्सॉर्ब करेगा? और तुम ये बताओ कि तुम एक साल में ही कितनी कार्बन एमिट करते हो। वो जितनी बीस साल में अब्सॉर्ब करेगा, उससे कहीं ज़्यादा तुम एक साल में एमिट करते हो। और वो बीस साल ज़िंदा रहेगा और भरपूर वृक्ष बन पाएगा, इसकी संभावना भी बहुत कम है। तो ले-दे के, तुम किसको बेवकूफ़ बना रहे हो।

पेड़ काटना सीधे-सीधे हत्या है, सीधे-सीधे हत्या है। मैंने तो यहाँ तक पूछा कि अगर ये सचमुच कोई प्राकृतिक इलाका है, तो इसमें इतनी सारी ये जो बीच में जगह है, ये खाली तो नहीं रही होगी। यहाँ भी पेड़ रहे होंगे, पर आपके चलने के लिए रास्ता बनाने के लिए यहाँ से पेड़ काटा गया होगा। होने को तो ये भी हो सकता था कि ये जितना चौड़ा रास्ता बनाया गया, इसका आधा ही चौड़ा बनाया जाता। आप तब भी चल लेते। आप आए हो अगर प्रकृति के बीच, तो थोड़ा मिट्टी पर चल लो, भाई। टेक्नोलॉजी है हमारे पास। जूते वग़ैरह तो हमारे ठीक होते ही हैं, मिट्टी पर भी हम चल लेंगे। क्यों फालतू पेड़ काट दिए?

अगर हम में थोड़ी चेतना जगेगी, तो जैसे हम मनुष्यों को मारने को अपराध समझते हैं, वैसे ही हम जीवों को मारने को भी अपराध घोषित करेंगे और पेड़ काटने को भी अपराध घोषित करेंगे।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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