किसी प्रदेश की समृद्धि केवल प्राकृतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि वहाँ के लोगों की चेतना, शिक्षा और विवेक से तय होती है। खनिज स्वयं विकास नहीं लाते; यदि समाज जागरूक न हो तो वही संसाधन शोषण और भ्रष्टाचार का कारण बन जाते हैं। सच्ची संपदा धरती के नीचे नहीं, मनुष्य के मस्तिष्क में होती है। विद्या और आत्मज्ञान ही किसी राज्य या राष्ट्र को वास्तविक अर्थों में समृद्ध और स्वतंत्र बनाते हैं।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम दीपक कुमार है। संस्था से दस महीनों से जुड़ा हुआ हूँ। सवाल जो है न, झारखंड से रिलेटेड है। जैसे कि यहाँ पर झारखंड को बोला जाता है “सोना झारखंड।” और जब हम लोग विद्यालय में पढ़ते थे, तो हम लोगों को पढ़ाया जाता था कि जिस राज्य में संसाधन जितना ज़्यादा होगा, वह राज्य उतना ज़्यादा विकसित होगा। वह देश उतना ही ज़्यादा विकसित होगा। जैसे अमेरिका में संसाधन बहुत ज़्यादा है, तो वह देश विकसित भी है और आध्यात्मिक भी है। और वहीं फिर जब हम अपने देश के बारे में बात करते हैं, तो पूरे देश का 40% खनिज झारखंड के पास है; फिर भी हमारा राज्य पॉल्यूशन के मामले में भी बहुत आगे है, पिछड़ा राज्य भी है। ठीक है?
और हम अपने अहंकारवश बोल भी देते हैं कि झारखंड में क्या है, सिर्फ़ सोना ही सोना है। और फिर जब तैयारी करने वाले स्टूडेंट से बात करते हैं, या तो फिर किसी नेता से, तो स्टूडेंट बोलते हैं कि अगर पैसा कमाना है तो झारखंड में ट्रांसफ़र ले लो। करप्शन भी, मतलब, बहुत ज़्यादा झारखंड में है। ऐसा क्यों? खनिज भी बहुत ज़्यादा है, फिर भी हमारा राज्य पिछड़ा है।
आचार्य प्रशांत: खनिज तो तब भी था न जब एक भी इंसान नहीं था झारखंड में। एक दिन ऐसा भी था जब इंसान, इंसान बना ही नहीं था। झारखंड की मिट्टी में खनिज तो तब भी थे न।मिट्टी में खनिज होने से कोई प्रदेश विकसित या संपन्न थोड़ी हो जाता है।




