मन को संसार, लोगों और वस्तुओं से नहीं, सत्य में स्थिर रखना ही वास्तविक एकांत है। अकेलापन शरीर का नहीं, मन का होता है। जब मन दुनिया से पाने की आशा छोड़ देता है, तभी वह मुक्त होता है। वस्तुओं और रिश्तों का आकर्षण भी अंततः भोग की इच्छा से ही पैदा होता है, जबकि सच्चा प्रेम केवल सत्य, मुक्ति या श्रीकृष्ण के प्रति हो सकता है। संसार से आशा दुःख देती है, इसलिए मन को केवल सत्य की ओर लगाना ही योग है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: छठा अध्याय, दसवाँ श्लोक, इस श्लोक का जो अनुवाद हमें उपलब्ध है, उसमें कहा गया है कि आत्मा को परमात्मा में निरंतर लगाने का अभ्यास किया जाए। यह आत्मा को परमात्मा में लगाने की बात क्या है? और इसी श्लोक में आशा रहित होना और संग्रह रहित होना क्या है?
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रह-रहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए॥
~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ६, श्लोक १०)
आचार्य प्रशांत: पहली बात तो इसमें जो अनुवाद आप पढ़ रहे हैं, वह ठीक नहीं है। श्रीकृष्ण इसमें कहीं भी परमात्मा की बात नहीं कर रहे हैं। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि योगी योग का अभ्यास करते हुए सतत् आत्मा में ही स्थित रहे, एकाकी रहे और सांसारिक प्राप्तियों की आशा और परिग्रहण से दूर रहे। बस इतना कहा है। बाक़ी जो बात कही गई है, वह अनुवादक की अपनी कल्पना है।




