सुभाषचन्द्र बोस के जीवन में वेदान्त कितना केंद्रीय था, ये बात आमतौर पर सामने नहीं आती है। उनका मन सदा संघर्ष की ओर था। उपनिषद उनके जीवन में आए, और एकदम एक नई शुरुआत हो गई। वो भयानक विद्रोही हो गए थे, और संघर्ष से नीचे वो कोई चीज मानते नहीं थे। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, ऐसे ही कोई ड्रेस पहन के खड़ा हो जाता है, नेताजी कहला जाता है, ऐसा नहीं होता। जान पर खेलना पड़ता है; किसी और से खून मांगने से पहले अपना खून बहाना पड़ता है। इसको साधना बोलते हैं। वेदान्त ये साधना सिखाता है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। अभी इसी माह में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी की जयंती है। और मैंने देखा है, आजकल नेताजी के बारे में काफ़ी बात की जाती है। पिछले कुछ समय में उनके विषय में काफ़ी लोगों की, मतलब कह सकते हैं कि रुचि बढ़ गई है। पर मैं हमेशा देखता हूँ कि जो प्रश्न रहता है, वो इसी बात पर होता है, कि नेताजी जीवित हैं या नहीं, जो जपान में उनकी दुर्घटना हुई थी उसके बाद। ये प्रश्न कोई नहीं पूछता कि उनका जीवन कैसा था। उन्होंने जो क्रान्ति करी थी वो कहाँ से आई थी, कैसे आई थी?
अभी कुछ दिनों पहले आपने स्वामी विवेकानन्द के विषय में बात की थी। वहाँ पर आपने उनके संघर्ष के बारे में बताया था, तो कहीं-न-कहीं मेरे मन में प्रश्न उठ रहा था कि उसकी शुरुआत कहाँ से हुई थी या उनका जीवन कैसा था। जैसे आपने हमेशा कहा है कि क्रान्ति का एक आध्यात्मिक पक्ष भी होता है। तो क्या नेताजी के साथ भी कोई ऐसा पक्ष जुड़ा हुआ है?
आचार्य प्रशांत: ठीक है। साथ-साथ चलना, बात करेंगे। तो इसी माह में दोनों महापुरुषों से संबंधित महत्त्वपूर्ण दिवस मनाए हमने। और हाँ ये बिल्कुल है कि आज अगर नेताजी बोस की बात होती है, तो ज़्यादातर इसी संदर्भ में होती है कि क्या सचमुच दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई थी या उसके बाद भी वो जीवित रहे थे? कुछ लोग गुमनामी बाबा आदि के संदर्भ में उनकी बात करते हैं। तो इस मुद्दे पर आज भी चर्चा रहती है। प्रश्न जीवित है लेकिन बिल्कुल सही कह रहे हो, कि ज़्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दा दूसरा है।




