वेदांत से उपजा सुभाष चंद्र बोस का संघर्ष

Acharya Prashant

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वेदांत से उपजा सुभाष चंद्र बोस का संघर्ष
सुभाषचन्द्र बोस के जीवन में वेदान्त कितना केंद्रीय था, ये बात आमतौर पर सामने नहीं आती है। उनका मन सदा संघर्ष की ओर था। उपनिषद उनके जीवन में आए, और एकदम एक नई शुरुआत हो गई। वो भयानक विद्रोही हो गए थे, और संघर्ष से नीचे वो कोई चीज मानते नहीं थे। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, ऐसे ही कोई ड्रेस पहन के खड़ा हो जाता है, नेताजी कहला जाता है, ऐसा नहीं होता। जान पर खेलना पड़ता है; किसी और से खून मांगने से पहले अपना खून बहाना पड़ता है। इसको साधना बोलते हैं। वेदान्त ये साधना सिखाता है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। अभी इसी माह में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी की जयंती है। और मैंने देखा है, आजकल नेताजी के बारे में काफ़ी बात की जाती है। पिछले कुछ समय में उनके विषय में काफ़ी लोगों की, मतलब कह सकते हैं कि रुचि बढ़ गई है। पर मैं हमेशा देखता हूँ कि जो प्रश्न रहता है, वो इसी बात पर होता है, कि नेताजी जीवित हैं या नहीं, जो जपान में उनकी दुर्घटना हुई थी उसके बाद। ये प्रश्न कोई नहीं पूछता कि उनका जीवन कैसा था। उन्होंने जो क्रान्ति करी थी वो कहाँ से आई थी, कैसे आई थी?

अभी कुछ दिनों पहले आपने स्वामी विवेकानन्द के विषय में बात की थी। वहाँ पर आपने उनके संघर्ष के बारे में बताया था, तो कहीं-न-कहीं मेरे मन में प्रश्न उठ रहा था कि उसकी शुरुआत कहाँ से हुई थी या उनका जीवन कैसा था। जैसे आपने हमेशा कहा है कि क्रान्ति का एक आध्यात्मिक पक्ष भी होता है। तो क्या नेताजी के साथ भी कोई ऐसा पक्ष जुड़ा हुआ है?

आचार्य प्रशांत: ठीक है। साथ-साथ चलना, बात करेंगे। तो इसी माह में दोनों महापुरुषों से संबंधित महत्त्वपूर्ण दिवस मनाए हमने। और हाँ ये बिल्कुल है कि आज अगर नेताजी बोस की बात होती है, तो ज़्यादातर इसी संदर्भ में होती है कि क्या सचमुच दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई थी या उसके बाद भी वो जीवित रहे थे? कुछ लोग गुमनामी बाबा आदि के संदर्भ में उनकी बात करते हैं। तो इस मुद्दे पर आज भी चर्चा रहती है। प्रश्न जीवित है लेकिन बिल्कुल सही कह रहे हो, कि ज़्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दा दूसरा है।

ये जो दोनों नाम लिए आपने, इनमें से दूसरा नाम पहले नाम के बिना हो नहीं सकता था। नेताजी, स्वामीजी के बिना हो नहीं सकते थे, ये बात बहुत कम लोगों को पता होगी। बहुत सारे उनके जीवन के पक्ष सामने लाए जाते हैं। उनके जीवन में वेदान्त का कितना महत्त्व था, सुभाषचन्द्र बोस के जीवन में वेदान्त कितना केंद्रीय था, ये बात आमतौर पर सामने नहीं आती है। और उनके जीवन में वेदान्त को लाने वाले थे स्वामी विवेकानन्द।

तो जिस परिवार में उनका जन्म हुआ था, बंगाली परिवार था पर उड़ीसा कटक में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई थी। और पिता सरकारी नौकरी में थे, तो घर में स्थितियाँ, रुपया-पैसा ठीक-ठाक था। तो उनको उनके बड़े भाइयों के साथ भेजा गया था एक इंग्लिश स्कूल में, और वहाँ आरंभ में उनको कोई धार्मिक शिक्षा या कोई बोध शिक्षा बिल्कुल ही नहीं मिली। वहाँ पर ज़्यादा ज़ोर ये रहता था कि कैसे जितने तरीके की इंग्लिश एजुकेशन हो सकती है जिसमें की ग्रामर, वॉकेब्युलरी, इंटोनेशन इन चीज़ों पर ज़्यादा ज़ोर रहता था।

तो उनकी आरंभिक शिक्षा ऐसी बीती, हालाँकि घर में उनकी माताजी धर्म परायण थीं। तो घर में वो भक्ति आदि के क़िस्से वग़ैरह उनको सुना दिया करती थीं, तो पौराणिक कथाएँ या महाभारत की कुछ कथाएँ। इस तरह की जो बातें हैं, वो उनको घर में मिल जाती थी थोड़ी-बहुत। बाक़ी स्कूल में उनको कुछ नहीं मिलता था, ये शुरुआत थी उनकी। इसमें वेदान्त कहीं नहीं है।

उसके बाद वो आगे बढ़े, वहीं पर कटक में दूसरे स्कूल में गए। इस दूसरे स्कूल में उनका परिचय उपनिषदों से हुआ। वहाँ स्कूल में ऐसी व्यवस्था करी गई थी कि मोटे तौर पर जितना बच्चों को समझ में आ सके; क्योंकि अभी वो मुश्किल से दस-बारह वर्ष की अवस्था के ही थे। जितना बच्चों को समझ में आ सके, दस-बारह साल के बच्चों को भी या चौदह साल के बच्चों को, उतना उनको वेदान्त का ज्ञान ज़रूर दिया जाए।

कितनी ज़बरदस्त बात है! जबकि ये भी जो स्कूल था, ये कोई ऐसा नहीं कि बस भारतीयों द्वारा ही चलाया जा रहा हो। लेकिन फिर भी इस स्कूल को चलाने वालों में, स्कूल के मालिकों में इतनी दूरदृष्टि थी कि उन्होंने कहा कि बाक़ी सब चीज़ें तो स्कूलों में पढाई जाती थीं। बाइबल भी पढाई जाती थी, ब्रिटिश इतिहास पढाया जाता था, सब कुछ, जितना कुछ ब्रिटिश हो सकता था, सब पढ़ाया जाता था। लेकिन उन्होंने कहा इसके साथ थोड़ा सा वेदान्त का ज्ञान भी इनको दे दिया जाए। क्योंकि इतना ब्रिटिश भी समझते थे कि भारत से अगर कोई एक चीज़ लेने लायक है, तो वेदान्त है। तो उपनिषदों को उनके सिलेबस में, पाठ्यक्रम में थोड़ी वहाँ पर जगह मिली हुई थी।

यहाँ उनका पहली बार परिचय होता है, वेदान्त से। शुरुआत उनकी किससे हुई थी? शुरुआत उनकी हुई थी जो पूरा पश्चिमी ज्ञान है, पश्चिमी संस्कृति है, उनको स्कूल में सिखाई जा रही थी। पश्चिमी खानपान, रहन-सहन के तरीके, ऐसे पहनना है, अंग्रेज़ी ही बोलनी है और अंग्रेज़ी भी एक विशिष्ट लहजे में बोलनी है। उस लहजे में, जिसमें कि आपको अंग्रेज़ी नौकरी मिल सके। वहाँ तैयार किए जा रहे थे भारतीय छात्र अंग्रेज़ी नौकरियों के लिए।

तो अब यहाँ; और घर पर उनको क्या माहौल मिल रहा था? घर पर उनको माहौल मिल रहा था विश्वास का, भक्ति का। जैसे महिलाएँ आमतौर पर घर पर रहती हैं, तो वो अपना जो जैसा घरेलू धार्मिक वातावरण बनाकर रखती हैं, उस पर उनका विश्वास था। उपनिषद् उनके जीवन में आए और एकदम एक नई शुरुआत हो गई। और बड़े संयोग की बात थी कि उसी के कुछ दिनों बाद, इसी स्कूल में उपनिषदों से परिचय लेने के कुछ समय बाद उनको एक दिन संयोग से, अकस्मात ही अपने किसी रिश्तेदार के घर पर स्वामी विवेकानन्द की कोई किताब मिल गई।

आपको ताज्जुब हो रहा होगा, कि ये सारी बातें हम नेताजी के बारे में कर रहे हैं। इस तरह की बातें नेताजी के बारे में आमतौर पर आपने होती सुनी हैं? ये पक्ष हमारे सामने लाया नहीं जाता, है न? और ऐसे पक्ष लाए जाते हैं जिनमें गॉसिप ज़्यादा है बस। सेंसेशनलिज़्म है कि सनसनी फैला दो, ज्ञान बहुत कम।

तो वो जाते हैं वहाँ पर; अब उनके रिश्तेदार का क्या नाम था, कहाँ गए थे, क्या आयु थी, ये सब लोग आप पढ़ लीजिएगा। मैं आपको एक विहंगम दृष्टि से बता रहा हूँ, बाक़ी डीटेल्स विस्तार हैं वो आपको स्वयं पढ़ने चाहिए। पढिएगा और कम्युनिटी पर लिखिएगा भी।

तो वहाँ जाते हैं, वहाँ उनको विवेकानन्द की किताब मिल जाती है, और वो जो उपनिषदों से शुरुआत हुई थी, वो तहलका बन जाती है। जीवन में भूचाल आ जाता है। और अब किशोर हो रहे थे, बच्चे नहीं थे। जितना उन्होंने जाना, सुना, पढ़ा था, वो सब एक झटके में जीर्ण-शीर्ण होने लग जाता है, बिखरने लग जाता है, सब टूटने लग गया।

तो लिखते हैं अपनी उनकी आत्मकथा, उसमें लिखते हैं, कि इससे पहले मेरे लिए तो सबसे बड़ी चीज़ मेरे हेडमास्टर ही थे! और मैं उन्हीं को आदर्श मानता था, और मैं आज भी हेडमास्टर साहब का सम्मान करता हूँ; पर विवेकानन्द मेरे जीवन में आए नहीं कि हेडमास्टर पीछे चले गए। इतनी ऊँची चीज़ विवेकानन्द, उन्होंने मेरा हृदय ऐसे पकड़ लिया, बिल्कुल, और किशोर हैं अभी। ये किशोर सुभाष की बात हो रही है। बोले, ऐसे पकड़ लिया। बोले, मेरी पुरानी सारी मान्यताएँ ध्वस्त हो गईं। स्कूल वालों के प्रति मेरा व्यवहार, साथियों का मेरा चुनाव, मेरे जीवन के लक्ष्य और घर के मेरे संबंध, सब बिल्कुल छितरा गए।

तो स्कूल में इन्होंने अपने ही जैसे लोगों का एक दल बनाया। और ये अभी बहुत उम्र के नहीं हैं, पर ये लोग गंभीर दर्शन में संलग्न रहने लग गए। ये लोग अलग निकल जाया करें और बड़ी गहरी चर्चाएँ किया करें। विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस, इन्हीं के साहित्य की चर्चा हो रही है। और अभी ये सब वही हैं आठवीं, दसवीं के लड़के हैं, बस। तो अब स्कूल में कुछ उनका मज़ाक भी बना, लेकिन ये जितने थे, ये सब पढ़ने में भी बहुत अच्छे थे। ये पढ़ने में अच्छे थे, तो स्कूल वाले ज़्यादा मज़ाक नहीं बना पाए।

हमको ये तो पता ही है कि आई.सी.एस. में उनका चौथा स्थान आया था। वो सब उसके बाद आगे बढ़कर कुछ कर लेंगे। लेकिन हमें ये नहीं पता कि मैट्रिकुलेशन में भी कलकत्ता यूनिवर्सिटी में उनका दूसरा स्थान आया था। तो ऐसा नहीं कि वो अचानक ही आई.सी.एस. में सफल हो गए थे। वो बारहवीं में भी यूनिवर्सिटी टॉपर थे; उस समय मैट्रिकुलेशन भी यूनिवर्सिटी के अंतर्गत ही आता था। तो शिक्षकों को वो जैसा सम्मान दिया करते थे, वैसा सम्मान वो पाएँ कि अब वो नहीं दे पा रहें। क्योंकि पहले शिक्षक बहुत बड़ी बात लगते थे, कि वाह-वाह! क्या बात कह दी। अब उनके सामने कहीं और बड़े, ऊँचे आदर्श आ गए थे।

अब रामकृष्ण के साथ हैं, तो वहाँ से उन्होंने सीखा कि शक्ति के प्रति अनन्यता। कह रहे हैं, और कोई नहीं हो सकता, वे विद्रोही हो गए। अनन्य भाव का मतलब होता है, दूसरा कोई नहीं। मेरी पूरी निष्ठा एक के साथ ही है; किसी अन्य के साथ नहीं हो सकती। बोले कि मेरे लिए सबसे प्यारा मंत्र हो गया, कि “हे शक्ति, हे देवी, हम आश्रय तुममें लें, न कि माता-पिता और बंधु-बांधवों में।” अब आप ऐसा करोगे तो माता-पिता को कैसा लगेगा? तो हेमंत कुमार नाम से उन्होंने एक मित्र बना लिए थे। घर में आए दिन विवाद होने लगे। घरवाले कहें, “तुमने जो मित्र बना लिया है, यही तुम्हें बर्बाद कर रहा है।” और उसी मित्र के साथ तो दूर-दूर निकल जाया करें, देर से लौटा करें।

हालाँकि इसके साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई पर कोई प्रभाव नहीं आने दिया, पढ़ाई उनकी चलती रही। लेकिन अलग से उनका जो दार्शनिक विकास का पूरा कार्यक्रम था, वो चलता रहा। तो एक तरफ़ तो स्कूल की पढ़ाई थी, जिसमें वो अव्वल थे ही, और साथ-ही-साथ, उसके समानांतर, उसके पैरेलल उनकी आंतरिक विकास-यात्रा चलती रही, जो कि स्वामी विवेकानन्द के साहित्य के साथ-साथ चल रही थी।

ये दोनों घर से भाग गए। बोले, “काहे को भागे?” बोले, “उत्तर की तरफ़ जा रहे हैं।” और वहाँ देखेंगे, कि क्योंकि उन्होंने पढ़ा था, कोलंबो से अल्मोड़ा तक, हिमालय को लेकर और उत्तर भारत को लेकर उनमें बड़ी उत्सुकता थी। तो भाग गए, घरवालों को बिना बताए। ख़ैर, भागे, अब ये तो घर के सुकुमार थे, अच्छे घर में थे। वहाँ उनको लालन-पालन अच्छा मिला हुआ था। उत्तर की तरफ़ निकले, भारत की ग़रीबी देखी, बीमार पड़ गए। बीमार पड़ गए तो वहाँ जो कुछ भी किया होगा; लड़के ही हैं अभी, भई! अभी ठीक से दाढ़ी-मूँछ भी नहीं आई हो! तो वहाँ से फिर दोनों लोग वापस लौटे, अपने अनुभवों का पूरा भंडार लेकर के।

घर पर खूब बहस हुई, खूब बहस, और ख़ास तौर पर पिता के साथ। इनके पाँच बड़े भाई थे। बड़े भाइयों ने भी कहा कि ये कर क्या रहे हो तुम? तो कुछ सफल नहीं हुआ। तो कहते हैं, अंत में माँ ने ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। बोले, और कुछ तो मुझ पर सफल हो नहीं पाता, और सब मैं झेल जाता; पर माँ ने ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया कि ये तू कौन-सी तरफ़ जा रहा है, और ये सब नहीं होगा।

बोले, और मेरा ये हो चुका था कि जितना मैंने ठुकराया था अंग्रेज़ों द्वारा दी जा रही शिक्षा को, उतना ही मैंने ठुकरा दिया था सब ये जो घरेलू कर्मकांड, अंधविश्वास थे इनको भी। क्योंकि नेताजी का नज़रिया बहुत खुला हुआ था और बहुत उदारवादी था, महिलाओं को लेकर, प्रगति को लेकर, शिक्षा को लेकर। भूलिएगा नहीं, इंडियन नेशनल आर्मी में वो पहले थे जिन्होंने महिलाओं को स्थान दिया था। उनकी जो लक्ष्मीबाई विंग थी, वो याद है न?

तो स्कूल से भी वो भागा करते थे, और घर से भी भागा करते थे। स्कूल उनको भेजता था कि तुम जाओ पश्चिम की ओर। स्कूल उनके भीतर पश्चिमी संस्कारों का संचार करना चाहता था। और घर उनके भीतर प्राचीन भारतीय संस्कारों का संचार करना चाहता था। उनको मिल गए थे विवेकानन्द, जो कहते थे, “न तुमको कुछ चाहिए जो पश्चिम का है, और न तुमको कुछ चाहिए जो परंपरा का है। तुमको वेदान्त चाहिए।” और सुभाषचन्द्र बोस वेदान्त में और गहरे, और गहरे घुसते ही जा रहे थे।

उपनिषदों में, गीता में, उन्हीं में उनका मन लग गया था। ये लोग गीत भी बनाया करें और अकेले बैठकर के गाया करें। इनको सुविधा ये हुआ करती थी कि उस समय पर खाली जगह बहुत थी। और न मोबाइल था, न सीसीटीवी था तो इनको देख पाना, इनकी निगरानी कर पाना या पकड़ पाना बड़ा मुश्किल था। वैसे भी आसानी से पकड़ में आते नहीं थे। भारत से कैसे भागे थे, पता ही है! तो पकड़ में आने वाले ये बचपन से नहीं थे, तो ये सब इनका अपना चलता रहा, फिर कलकत्ता में आए।

अभी देखो कि क्या होता है जब आप वेदान्त को अपना हृदय बना लेते हो। फिर कलकत्ता में आते हैं तो यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंसी कॉलेज में ये थे। वहाँ भी इन्होंने ऐसे ही लोगों को साथ लिया जिनमें वेदान्त के प्रति निष्ठा और राष्ट्र के लिए संघर्ष करने का भाव था।

और राष्ट्र से इनका आशय यही था, ऐसा राष्ट्र जो वेदान्त के आधार पर खड़ा हो, वही राष्ट्र कहलाने योग्य है। नहीं तो देश हो सकता है राष्ट्र नहीं हो सकता।

तो ये लोग अपना इस तरह चला करें। इनके एक शिक्षक हुआ करते थे, ‘ओटन’ नाम से, ओटन; अंग्रेज़ थे, ज़ाहिर है। अब ये बातें करे गीता की, वेदान्त की और भारत की। तो ओटन साहब ने एक दिन बड़ी ज़ोर से मज़ाक बना दिया, कि ये तो ऐसे ही हैं, “ये क्या बातें कर रहे हो तुम ग़ुलाम लोग, कौन से अपने वेदान्त की बात करते हो?” बोल दिया होगा ऐसा कुछ, अब इसके हमें कोई विस्तार मिलते नहीं। या हैं भी तो मुझे पता नहीं कि उन्होंने क्या बोल दिया था, पर कुछ बोल दिया।

उसके दो दिन बाद कुछ अजीब-सा हुआ। ओटन साहब कहीं उतर रहे थे सीढ़ियों से, तभी अचानक सीढ़ियों की लाइट बंद हो गई। और पाँच-दस जवान लड़के उनके ऊपर कूदे और उन्हें हाथ से नहीं मारा, सिर्फ़ चप्पलों से मारा। कुछ पता ही नहीं लगा किसने मारा। और पटापट-पटापट ओटन साहब की पिटाई चल रही है। और वो जो कुछ भी बोल सकते थे, बोल रहे हैं। और ये जो पीट रहे हैं, इन्होंने अँधेरा कर दिया और ये कुछ बोल नहीं रहे, सिर्फ़ चप्पलें चला रहे हैं, छुआ भी नहीं उनको। बोले, “हाथ से क्या छुएँ?” अँधेरा कर दिया, तो जिन्होंने मारा वो थोड़ी युक्ति भी रखते थे, बुद्धि भी रखते थे। बिल्कुल अँधेरा।

ख़ैर, मार-पीटकर जब लौट रहे थे, तो एक चपरासी की नज़र पड़ गई। लौटने वालों में भी एक उसने पहचान लिया। बड़ी सनसनी मची, अख़बारों में छपा, हल्ला मच गया। अंग्रेज़ पिटा है, वो भी प्रोफ़ेसर! वो चपरासी ने पहचान लिया था कि ये सबसे आगे-आगे यही थे, सुभाषचन्द्र; और सबसे ज़ोर से उन्होंने ही मारा है। तो उनको निकाल दिया गया। जो सबसे मेधावी छात्र था यूनिवर्सिटी का, उसको यूनिवर्सिटी से, कॉलेज से निकाल दिया गया। प्रेसिडेंसी से उनको निकाला गया है।

और पिता उनके बड़े रसूख़ वाले आदमी थे। अंग्रेज़ों में भी वो अपनी पहुँच रखते थे, तो उन्होंने बहुत सोर्स लगाया, बहुत सोर्स लगाया। जब सोर्स लगाया, तो छह महीने जाने साल भर बाद, बड़ी मुश्किल से उनको यूनिवर्सिटी के किसी दूसरे कॉलेज में दे दिया गया। कहा गया, “पिछले कॉलेज में इसने बहुत दोस्त-यार बना लिए हैं, और ये फिर पीटेंगे किसी को।” तो किसी दूसरे कॉलेज में उनको एडमिशन दे दिया गया।

इधर उनके भीतर ज़बरदस्त एक विद्रोह जो है, वो खड़ा होता ही जा रहा था, स्वयं के प्रति, अपने घर के प्रति, समाज के प्रति, और जैसा भारत हो गया है, भारत के प्रति। और कहने की ज़रूरत नहीं, ब्रिटिश राज्य के प्रति, ब्रिटिश सरकार के प्रति। भयानक विद्रोही हो गए थे वो, और संघर्ष से नीचे वो कोई चीज़ मानते नहीं थे। ख़ैर, घर में सरकारी नौकरी का माहौल था! पिताजी की भी प्रोन्नति होती जा रही थी, तो इनको कहा गया, “बेटा, तुम जाओ ब्रिटेन।”

तो कहा गया कि तुम जाओ वहाँ पर, और वहाँ से आई.सी.एस. की तैयारी करो। तो वो वहाँ पहुँचे। अब वहाँ तैयारी कर रहे हैं, लेकिन तैयारी करते-करते बार-बार अपने-आप से पूछ रहे हैं, “ये मैं कर क्यों रहा हूँ?” ये क्या मुझे इनकी नौकरी करनी है क्या? मैं ये क्यों कर रहा हूँ? तो इसी उधेड़बुन में उन्होंने अपना एक पेपर भी ख़राब कर लिया।

एक पेपर था जिसमें संस्कृत लिखनी थी, शायद। तो उसको उन्होंने कहीं रफ़ पर लिख दिया, और मेन कॉपी पर लिखा ही आधा-अधूरा, भूल गए। तो उन्हें यही लग रहा था कि मेरा तो चयन, सेलेक्शन होगा भी नहीं। और कुल छह ही सीटें थीं। ख़ैर, जो उनका प्री-फ़ाइनल राउंड था, उसमें उनका चौथा स्थान आ गया। जो हम कहते हैं न, उनका सेलेक्शन हो ही गया था; सेलेक्शन से पहले वाली स्टेज थी।

अब आख़िरी जो चीज़ थी, उसके लिए इनको बुलाया गया कि “भाई, छह लोग हैं; छह में से आप भी हैं। आइए, अब जो चयन की आख़िरी राउंड की प्रक्रिया है, वो होगी।” और वो आसान थी, उसको वो निकाल ही लेते, कोई मुश्किल नहीं थी उसमें।

उसमें कुछ क़ानून-विषयक प्रश्न थे और शायद घुड़सवारी की परीक्षा वग़ैरह ली जाती है, वो निकाल लेते। पर तब तक उनको पक्का होने लग गया था कि मुझे ये काम करना ही नहीं है। बोले, “जो क्रान्ति मुझे लानी है, वो सरकारी नौकरी करके थोड़े ही ले आ लूँगा!” अब ये बात उन्होंने घर पर बता दी। घर पर जो रोना, पीटना, कोहराम मचा भयानक! बोले, “कर क्या रहे हो तुम ये?” बच इसलिए गए क्योंकि वहाँ कलकत्ता और ये बैठे थे वहाँ ब्रिटेन में, तो घर वालों की कोई सीधी पहुँच नहीं थी।

और घर से ज़बरदस्त इन पर भावनात्मक क़िस्म का दबाव पड़ने लग गया। उनको समझ में ही न आए कि करें क्या। बहुत सारे प्रश्नों से उलझे हुए थे, सीधा-सीधा निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि नहीं, मुझे ये नौकरी अंग्रेज़ों की नहीं ही करनी है, आई.सी.एस.।

तभी उन्हें अपनी माँ से, बड़ा अनपेक्षित उन्हें कुछ होता है। माँ से उनको एक पत्र मिलता है, और माँ कहती हैं, “अंग्रेज़ों के रास्ते पर नहीं, महात्मा गाँधी के रास्ते पर चलो।” महात्मा गाँधी का नाम लेकर के माँ ने पत्र लिखा। क्योंकि ये जो बात है, ये सन् 1919-1920 के आसपास की है 1921 की। और कौन-सा उस वक़्त आंदोलन चल रहा था, 1921 में?

श्रोता: असहयोग आंदोलन।

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो गाँधी जी उस वक़्त घर-घर का नाम बन चुके थे। तो माँ ने महात्मा गाँधी का नाम लेकर लिखा कि मत करो अंग्रेज़ों की नौकरी, तुम इनके साथ आओ। तो जैसे डूबते को तिनके का सहारा। उन्होंने तत्काल अंग्रेज़ों को लिखा कि “काइंडली डू नॉट कंसिडर मी फ़ॉर द फ़ाइनल राउंड।” मैं जा रहा हूँ।

और साथ-ही-साथ उन्होंने वहाँ पर एक कोर्स था, उसके लिए उन्होंने एनरोल करा था, बी.ए. था शायद, तो उसको भी उन्होंने आधा-अधूरा छोड़ा। उसका उन्होंने आधे मन से जाकर जो आख़िरी वर्ष था, उसको पूरा करा। तो जो इतने मेधावी छात्र थे, उस फ़ाइनल कोर्स में उनकी थर्ड डिवीज़न आई। उसको छोड़-छाड़कर उन्होंने वहाँ पर अपनी डिग्री, डिप्लोमा जो था, वो भी नहीं लिया। बोले, “जिसको लेना हो ले, मैं वो भी छोड़कर जा रहा हूँ।” भागकर भारत आए, और भारत आते ही सीधे गाँधी जी के पास गए।

गाँधी जी के पास जाते हैं। जो चर्चा होती है, उस चर्चा में भी केंद्र पर गीता। क्योंकि गाँधी जी बोला करते थे, “गीता मेरी माँ हैं।” और गीता को ही आधार बनाकर सुभाष उतनी ऊँची नौकरी छोड़कर आए थे, जिसकी उस समय सिर्फ़ छह सीटें होती थीं। बोले, कि “श्रीकृष्ण अर्जुन को आराम करना थोड़े ही सिखा रहे हैं। वो युद्ध करना सिखा रहे हैं न, मैं भी युद्ध करूँगा।” तो गाँधी जी के पास इस उम्मीद से गए थे कि गाँधी जी उन्हें युद्ध के रास्ते पर ढकेलेंगे।

पर पहली ही मुलाक़ात में बात बहुत बनी नहीं। पर कहा जाता है, गाँधी जी ने कहा कि अभी नौजवान है, अभी कुछ बातों को लेकर जोश ज़्यादा है, धीरे-धीरे समझ जाएँगे। गाँधी जी ने उनको स्वीकार कर लिया और उनको कलकत्ता काँग्रेस की ओर भेज दिया। तो वहाँ उनको चितरंजन दास मिले। चितरंजन दास थोड़ा ज़्यादा जो रैडिकल तरीके थे, उनके प्रति खुले हुए थे। तो उनकी और सुभाष बोस की बनने लग गई। उसके बाद उन्होंने कई तरीके के आंदोलन किए हैं। कलकत्ता में “इंडियन यूथ काँग्रेस” थी, उसके वो प्रेसिडेंट भी बने हैं, फिर काँग्रेस के सेक्रेटरी बने हैं।

और इस बीच में उनको तीन-चार बार अंग्रेज़ों ने जेल भेजा है। और जितनी बार वो जेल से वापस आते, उतनी बार वो और बड़े पद को अर्जित कर पाते। कलकत्ता के मेयर बने, और ये सब कुछ जेलों से वापस आते-आते हुआ। एक बार जेल गए, वापस आ रहे हैं; फिर जा रहे हैं, फिर वापस आ रहे हैं, और एक के बाद एक वो ऊँचे पायदानों पर चढ़ते चले जा रहे हैं।

उनका मन लेकिन सदा संघर्ष की ओर था। संघर्ष के रास्ते पर वो वैसे ही नहीं चल पड़े थे। चूँकि श्रीकृष्ण आदर्श थे उनके, तो उन्होंने कहा, “श्रीकृष्ण भी तो गए थे पहले सुलह करने ही न।” तो उन्होंने यूरोप का दौरा लगाया और जाकर के जितने कंज़र्वेटिव पार्टी के ऊँचे-से-ऊँचे नेता थे, उनसे बातचीत करी। और वो बातचीत कर सकते थे क्योंकि वो काँग्रेस के स्वयं पदाधिकारी थे। तो इस नाते, एक ऊँचे भारतीय राजनेता होने के नाते, वो ब्रिटेन गए और वहाँ पर जो कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता थे, उनसे बोले, “मुझे आपसे बात करनी है, और भारत के भविष्य को लेकर आपसे बात करनी है।” ठीक वैसे, जैसे स्वयं श्रीकृष्ण दुर्योधन के पास गए थे शांतिदूत बनकर।

लेकिन नेताजी का अनुभव क्या रहा? अभी वो नेताजी वैसे कहलाते नहीं थे। नेताजी उनको कहा गया बहुत बाद में, 1942 में, जब वो जर्मनी में थे, तब से उन्हें नेताजी कहा जाने लगा। तो वहाँ उनका अनुभव ये रहा कि वहाँ कंज़र्वेटिव पार्टी के नेताओं ने उनसे मिलने से ही मना कर दिया। उन्होंने कहा, ये तो ऐसे ही हमारी कॉलोनी से आया है, इससे क्यों मिलें?

दूसरी, अभी इसकी कोई उम्र भी नहीं; इससे बात करके हमें क्या मिलेगा? और तीसरी बात, ये बड़ी विद्रोही और आंदोलनकारी बातें करता है, रैडिकल है। इससे क्या बात करें? यहाँ उनको स्पष्ट हो गया कि अंग्रेज़ों से बातचीत से कुछ हासिल नहीं होगा। और दूसरी ओर, काँग्रेस के तौर-तरीकों से भी उनका मन उचटता जा रहा था, लेकिन उनकी भारत में लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी।

तो 1938 में फिर वो काँग्रेस के क्या बने? अध्यक्ष। एक साल रहे। लेकिन वो कहते थे कि मात्र समाजवाद से नहीं चलेगा, हमें रैडिकल सोशलिज़्म चाहिए। वो कहते थे कि हमें ऐसा सोशलिज़्म चाहिए जो कम्युनिज़्म की ओर झुका हुआ हो। समझ में आ रही है बात?

तो इस बात पर जो काँग्रेस के लोग थे, जो ज़्यादा पेसिफ़िस्ट थे, उनसे उनकी बनती नहीं थी। फिर 1939 का काँग्रेस का चुनाव हुआ; उसमें भी वो बने। और उसके बाद गाँधी जी की जो उक्ति है, वो प्रसिद्ध हो गई कि “पट्टाभि सीतारमैया की हार मेरी हार है।”

तो जो काँग्रेस के बाक़ी पदाधिकारी थे, उन्होंने असहयोग करना शुरू कर दिया था, बोस के साथ। तो बोले, “जब तुम मेरे साथ काम ही नहीं कर सकते, अध्यक्ष मैं हूँ और तुम रोड़े वग़ैरह अटका रहे हो।” तो उन्होंने वहाँ से त्यागपत्र दे दिया और कलकत्ता वापस चले गए। और कलकत्ता में जाकर उन्होंने आंदोलन किए अपनी ओर से। अब समय आ गया था विश्वयुद्ध का। यही वो समय है जब दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था, 1939।

और वो वहाँ कलकत्ता में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे थे, तो अंग्रेज़ों ने उन्हें घर में ही नज़रबंद कर दिया। बोले, “बहुत हो चुका। भारत से बात बननी ही नहीं है।” काँग्रेस से भी उनकी जो आशा थी, वो अब बहुत क्षीण हो गई थी। बोले, “अब कुछ और ही करना पड़ेगा।”

तो आप समझिए, आप सोचते हो कि आध्यात्मिक आदमी क्या करता है? बैठकर किताबें पढ़ता है। आध्यात्मिक आदमी सड़क पर उतरता है। आध्यात्मिक आदमी वो सारे काम करता है जो आपको कई बार लगता है कि शरीफ़ों के होते नहीं। आध्यात्मिक आदमी युक्ति जानता है, और साधारण सांसारिक लोग जब उसे घेरने की कोशिश करते हैं, तो वो ऐसे सांसारिक लोगों को धोखा देना भी जानता है।

नज़रबंद कर रखा था उनको घर में। तो बोले, “देखो भाई, मैं तो वेदान्त का उपासक हूँ, और वेदान्त में जो आख़िरी बात होती है, वो होती है, मौन।” रमण महर्षि इसको सबसे ज़्यादा सफ़ाई से अभिव्यक्त किया करते थे। वो कहते थे, “आत्मा माने मौन।” बोले, “देखो, आख़िरी चीज़ तो मौन है; तो मैं तो मौन-व्रत पर जा रहा हूँ। और मैं न किसी से बात करूँगा, न किसी को देखूँगा। क्योंकि वास्तविक मौन मात्र जिह्वा का निग्रह नहीं होता, समस्त इन्द्रियाँ; तो कोई मेरे सामने भी न पड़े।”

तो बोले, “हाँ! बिल्कुल सही बात है।” और नेताजी की वेदान्त-निष्ठा से लोग परिचित थे, तो बोले, “नहीं-नहीं, कह रहे हैं मौन में जा रहे हैं तो जाने दो, अभी कोई सामने न पड़े।”

वो मौन में रहे और दाढ़ी बढ़ा ली, अंदर रहकर। किसी को पता भी नहीं लगा। क्योंकि कोई देख भी नहीं सकता, तो दाढ़ी बढ़ गई है। लोगों ने तो यही देखा था कि वो क्लीन-शेव्ड हैं। और ये करके किसी तरह से उन्होंने पठान का वेश पूरा बना लिया। और पठान का वेश बनाकर निकलते हैं। और जो वृत्तांत है, वो कहता है कि लोगों ने देखा भी पर इतनी सफ़ाई से उन्होंने वेश धारण किया था कि कोई पेशेवर अभिनेता उनके आगे पानी भरे। ये होता है आध्यात्मिक आदमी।

ये थोड़े ही, कि “मैं तो देखिए साहब, भजन-कीर्तन करने वाला आदमी हूँ। ये सब तो सांसारिक स्वाँग हैं। मैं स्वाँग करना नहीं जानता, मैं नाटक करना कैसे जानता हूँ?” नेताजी ने ज़बरदस्त नाटक किया। और ऐसा नाटक वही कर सकता है जो सचमुच गीता से ताक़त पा रहा हो। लीला करना कोई हल्की बात होती है क्या? और आप अगर गीता के साथ नहीं हो, तो गीताकार की लीला से भी क्या सीखोगे? फिर आप भी बस खड़े रह जाओगे, जैसे काठ का पुतला!

तो वहाँ से निकलते हैं, वहाँ से बिहार गए, और बिहार से, जहाँ से उन्होंने ट्रेन पकड़ी, उस स्टेशन का नाम ही उनके नाम पर कर दिया गया अब। वहाँ से पेशावर पहुँचे; पेशावर से पहुँचे अफ़ग़ानिस्तान। अब वहाँ से आगे निकलना था। और बने हैं पठान और वही पठानों का इलाक़ा। पठानों की भाषा आती नहीं, पश्तो वग़ैरह कुछ। बोले, “दिक़्क़त ही कुछ नहीं; मैं पठान हूँ, पर मैं गूँगा-बहरा पठान हूँ। तुम पकड़ कैसे लोगे मुझको?”

मैं ये कह रहा हूँ, “ये करके दिखाओ न आप लोग। मिट्टी के माधव बनकर बैठे रहोगे कब तक? गोबर गणेश कब तक?” चतुराई कहाँ है, तेज़ी कहाँ है, बल कहाँ है, युक्ति कहाँ है? या यही बोलते रहोगे, “हम क्या करें? हम तो कमज़ोर हैं, बेचारे हैं।” मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता स्क्रीन पर जब आप कमज़ोर और बेचारे बनकर आ जाते हो, “मैं क्या करूँ?”

आप जिनकी बात कर रहे हो, उनको उस सल्तनत ने नज़रबंद किया था, हाउस अरेस्ट किया है जिसमें कभी सूरज नहीं डूबता था। और वो वहाँ से कैसी तरक़ीब लगाकर भागे हैं! तुम जानते हो कलकत्ता से पेशावर रेल से भी जाओ तो दूरी कितनी है? और पेशावर भी कहाँ है, कोई लाहौर नहीं है। पेशावर पाकिस्तान में भी है और पश्चिम की तरफ़ है, तब भारत में ही था। और अफ़ग़ानिस्तान, तब कोई सड़क नहीं थी कि वहाँ बस में बैठकर जा रहे हैं, पैदल-पैदल। और वहाँ से वो रूस में घुस रहे हैं।

रूस में घुसकर वहाँ से रोम पहुँच गए, रोम से जर्मनी पहुँचे। ये होता है युद्ध। ये होता है संघर्ष, युध्यस्व। समझ में आ रही है बात?

हम किसी सार्थक काम के लिए उठकर दो किलोमीटर पैदल न जा पाएँ अगर वाहन उपलब्ध न हो। कितनी बार होता है, बोधस्थल में होता है! लोग अपनी जगह आरक्षित करवा देते हैं और आते नहीं हैं। “क्यों नहीं आए?” बोले, “हमें पता चला कि लौटते वक़्त ओला नहीं मिलेगा। आचार्य जी छोड़ते हैं रात में एक-दो बजे।” ओला का गोला चूसो तुम, कुछ हो नहीं सकता। वेदान्त तुम्हारे लिए नहीं है। और बड़ा बुरा लगता है एक सीट तुमने वहाँ रखी थी; वहाँ कोई और आकर बैठ गया होता। तब लिखवा दिया कि हम आज रात को आ रहे हैं, गीता में बैठेंगे; आए नहीं।

और इस पूरे खेल में पाँच-छह अलग-अलग तरह के साधनों से उन्होंने यात्राएँ करी, जिनमें से एक साधन उनके अपने पाँव भी थे। बहुत लंबी-लंबी दूरी तक पाँव-पाँव चलते रहे। और ठंडे देश हैं वो, जिनकी हम बात कर रहे हैं। उन ठंडे देशों में क्या बनकर? गूँगा-बहरा पठान, ताकि कोई पकड़ न ले।

जर्मनी जाते हैं, वहाँ पर जर्मनों ने उनसे सहयोग तो करा, पर पूरे तरीके से नहीं, क्योंकि जर्मनों ने कहा कि देखिए, गाँधी और नेहरू की तुलना में आप उतने अभी जन सामान्य को स्वीकृत नहीं हैं, उतने पॉपुलर नहीं हैं आप। तो हम ये नहीं कर पाएँगे कि हम सीधे-सीधे भारत पर आक्रमण ही कर दें लेकिन इतना कर लीजिए, रोमेल का नाम सुना है आपने? द अफ़्रिकन फ़ॉक्स जर्मन जनरल?

रोमेल वो हैं जिनका नाम जो ब्रिटिश जनरल्स थे वो भी बड़ी इज़्ज़त से लिया करते थे। अफ़्रीका में एलाइड फोर्सेस की दुर्गती कर दी थी रोमेल ने। तो रोमेल ने बहुत सारे भारतीय भी पकड़ रखे थे, प्रिज़नर ऑफ़ वॉर। ये कौन से भारतीय थे? जो अंग्रेज़ों के लिए लड़ने गए थे अफ़्रीका में। तो उनको जर्मनों ने पकड़ लिया था और वो सब अभी जर्मनों के पास थे, तो ऐसे क़रीब तीन हज़ार भारतीयों को नेताजी को सौंप दिया गया।

जर्मनों ने उनको नेताजी को दे दिया, तो उससे उन्होंने जो है एक “इंडिया लीजन” की स्थापना करी। बोले, “ये है हमारी सेना, इंडिया लीजन।” और अब कुछ करते हैं, और फिर वहीं पर पहली बार उन्होंने “आज़ाद हिन्द रेडियो” की स्थापना करी, कि ये है। और वहाँ वो कोशिश करते रहे कि किसी तरह जर्मनों को समझा लें कि उन्हें भारत पर आक्रमण करना चाहिए, क्योंकि अंग्रेज़ों को बहुत विपुल संसाधन युद्ध में भारत से ही मिल रहे थे, मैनपावर ख़ास तौर पर। बोले, “अगर आप भारत को जीत लोगे, अंग्रेज़ों को भारत से भगा दोगे, तो अंग्रेज़ फिर पूरा विश्वयुद्ध भी हार जाएँगे।” अब वो अच्छा होता या बुरा होता, वो बड़ी बहस की बात रही है।

अगर जर्मन और जापानी मिलकर भारत पर आक्रमण करके भारत से अंग्रेज़ों को हटा देते और भारत पर क़ब्ज़ा हो जाता जर्मनों का और जापानियों का, तो क्या होता? और इसी बात को लेकर के क्रिटिसिज़्म भी मिला है, आलोचना भी मिली है नेताजी को, कि आप एक बीमारी को हटाने के लिए ज़्यादा बड़ी बीमारी को न्योता दे रहे थे।

तो तभी 1942 आ गया, और जर्मनों ने क्या कर दिया? वो रूस में घुस गए। नेताजी ने कहा, “अब इनसे कुछ नहीं हो सकता।” रूस तो हमारा दोस्त था। वो चाहते थे कि रूस भी सहायता करे भारत से अंग्रेज़ों को भगाने में। यहाँ जर्मनी रूस पर ही आक्रमण कर बैठा। बोले, “अब कुछ नहीं हो सकता।” तो हिटलर से मिले, एक ही बार मिल पाए हिटलर से। हिटलर से बोले, “कुछ हो सकता हो तो बता दीजिए।” हिटलर ने कहा, “अब तो मेरी सारी सेनाएँ रूस में व्यस्त हैं। भारत अब मेरे प्लान्स में नहीं है।” तो बोले, “मुझे जाने दो फिर।” और बड़ी मेहनत से उन्होंने वहाँ पर इतने सालों में अपना इंडिया लीजन की स्थापना करी थी।

उस आदमी का मैं आपको संघर्ष बता रहा हूँ। ऐसे ही नहीं, आप तो सोचते हो कि बस “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।” ऐसे ही कोई ड्रेस पहनकर खड़ा हो जाता है और ‘नेताजी’ कहलाता है, ऐसा नहीं होता, जान पर खेलना पड़ता है। किसी और से खून माँगने से पहले अपना खून बहाना पड़ता है।

तो बोले, “मुझे जाने दो।” और वहाँ वो जानते हो, पीछे क्या छोड़कर आए? वो पीछे उन सब सैनिकों को तो छोड़कर आए ही जो तैयार खड़े थे भारत के लिए लड़ने को और मरने को। उन्होंने जर्मनी में विवाह भी कर लिया था और उनकी बेटी भी हो गई थी। उन्होंने अपनी पत्नी और बेटी, दोनों को जर्मनी में ही छोड़ दिया। बोले, “जहाँ मैं जा रहा हूँ, वहाँ करोगे क्या?”

और कैसे आए? जर्मनों की यू-बोट होती थी। सुना होगा, कुख्यात थी उनकी यू-बोट्स। वो सारे जो अटलांटिक के जहाज़ होते थे अमेरिका और ब्रिटेन के बीच के, वो यू-बोट जाकर उनको मार दिया करती थी। तो जर्मनी की यू-बोट में बैठकर मेडागास्कर तक आए और सबमरीन, पनडुब्बी है; और वहाँ से जर्मन पनडुब्बी उनको लेकर के आगे गई, जाने इंडोनेशिया या सिंगापुर तक। यहाँ जर्मनों का उस समय कुछ जगहों पर क़ब्ज़ा था। पनडुब्बी से यात्रा देख रहे हो कितनी है? पूरी ऐसे (संकेत करते हुए) घूमकर के। मेडागास्कर तक एक पनडुब्बी, और वहाँ से उनको ट्रांसफ़र किया गया दूसरी पनडुब्बी में, जो उनको फिर लेकर आ रही है ईस्ट एशिया तक।

एक आदमी है जो एक ट्रेंड सोल्जर नहीं है, वो समुद्र के नीचे इतने दिनों तक रह रहा है। और ये उन दिनों की प्रिमिटिव सबमरीन्स हैं। उन्हें कैसा लग रहा होगा? ये सब बातें जब पता होती हैं न, तब महापुरुषों के प्रति सम्मान आता है, ऐसे ही नहीं आ जाता। और ये बातें हमें कभी बताई नहीं जाती। न हम श्रम करते हैं कि हम स्वयं इन्हें पढ़ें।

मैं कहीं किसी गुप्त स्रोत से थोड़े ही सारी बातें आपके सामने ला रहा हूँ, ये सारी बातें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। थोड़ी मेहनत करनी है, जाकर के पढ़िए। अब यहाँ आते हैं, तो फिर से इनके काम वही प्रिज़नर्स ऑफ़ वॉर आते हैं, युद्धबंदी। ये इस बार किसके युद्धबंदी हैं? पहले जो उन्होंने लीजन खड़ी करी थी, वो किसकी थी? जर्मनी ने जो युद्धबंदी बनाए थे। अब यहाँ जो जापानियों ने बनाए थे।

तो यहाँ पर रास बिहारी बोस ने पहले ही टोक्यो को केंद्र बनाकर के एक “इंडिया इंडिपेंडेंस लीग” स्थापित कर रखी थी। ये उनसे मिले, और फिर वहाँ आपने ये सब नाम तो सुने होंगे, भाई मोहन सिंह का नाम सुना होगा। तो इन सब लोगों को उन्होंने साथ लिया, और फिर उससे “इंडियन नेशनल आर्मी” की स्थापना होती है।

अंडमान-निकोबार को नाम दिया था उन्होंने, ‘शहीद’ और ‘स्वराज’। और मणिपुर में पहली बड़ी जीत थी, जिसके बाद वहाँ भारतीय ध्वज उन्होंने फहराया था। इरादा यही था कि जापानियों की मदद से भारत में प्रवेश करके अंग्रेज़ों को खदेड़ देंगे, वो हो नहीं पाया। व्यावहारिक रूप से देखें तो बड़ा मुश्किल भी था, हो सकता भी नहीं था। पर उससे लहर बड़ी ज़बरदस्त पैदा हुई।

देखो, वही वाली बात, अर्जुन, तू अपना कर्म कर; परिणाम किस रूप में आता है, कैसे आता है, तू फ़िक्र मत कर, क्योंकि तुझे कभी पता चल भी नहीं सकता। अब देखा जाए अगर सिर्फ़ देखोगे, पूछोगे कि अच्छा बताओ टैंजिब्ली क्या पाया आईएनए ने? तो टैंजिब्ली तो कुछ भी नहीं पाया। मणिपुर में घुसे थे, उसके बाद वहाँ भी हार हो गई, तो बर्मा में चले गए। बर्मा में जापानियों के साथ मिलकर अंग्रेज़ों से थोड़ा लोहा लिया, फिर वहाँ भी हार गए। और फिर जब सिंगापुर भी छिन गया जापानियों के हाथ से, तो आईएनए पूरी तरह से समाप्त ही हो गई। और उसके बाद, 18 अगस्त 1945; ये अगस्त 1945 सुनते ही क्या याद आता है?

श्रोता: विमान दुर्घटना।

आचार्य: हाँ! तो उसके बिल्कुल बाद, उसके तुरन्त बाद। एक दिन वायुयान से जा रहे थे। और संघर्ष उनका, जापानियों पर परमाणु बम हमला हो चुका है। उनमें क्या दम बचा है! आईएनए की हार हो चुकी है, वहाँ भी क्या दम बचा है!

जो जापानियों ने अमेरिका के साथ करा था, उसके बाद ये सब, ये करते थे न कामिकाज़े अटैक्स करते थे, तो जो जापानी वायुसेना थी, वो पूरी ध्वस्त हो चुकी थी। जापानी लोग कैसे अमेरिका को लेकर आए थे द्वितीय विश्वयुद्ध में? पर्ल हार्बर। पर्ल हार्बर में क्या करा था उन्होंने?

श्रोता: आक्रमण।

आचार्य प्रशांत: तो एक काम जो अमेरिकियों ने किया था, वो ये था कि जापानीज़ एयर फ़ोर्स को पूरा बर्बाद कर दिया। उनकी बॉम्बिंग कैपेसिटी भी ख़त्म कर दी थी। सब उनके जो बॉम्बर्स थे, यहाँ तक कि ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ़्ट भी बहुत कम बचे थे। और उसी का एक नतीजा ये था कि जापानियों ने सुसाइडल अटैक शुरू कर दिए। वो कहते थे, “हमारे पास बम नहीं है, तो हम ले जाकर के प्लेन ही घुसेड़ देंगे तुम्हारे जहाज़ों पर, जहाज़ तो हट ही जाएगा।” और एक जहाज़ की बहुत ज़्यादा क़ीमत होती है एक बॉम्बर की तुलना में।

तो जापानियों के पास जहाज़ भी नहीं थे। हम 18 अगस्त 1945 की बात कर रहे हैं, जापान बिल्कुल हार चुका है। तो ऐसे ही एक ख़स्ताहाल जहाज़, और उसमें भी बहुत सारा सामान ले जाना था, तो उसको खूब लोड कर दिया गया। उसमें नेताजी भी बैठे हैं और उनके साथ उनके सहायक थे, रहमान नाम से थे शायद। ये लोग बैठे हुए हैं, और भी लोग थे।

तो वो प्लेन है, वो प्लेन चल रहा है। उस पर इतना वज़न था, वो टेक ऑफ़ ही नहीं कर पाया। वो उड़ा थोड़ा सा, और उसके बाद उसका इंजन ही निकलकर गिर गया, इतना लोड था। लेकिन बहुत ऊँचाई नहीं थी, तो वो गिरा तो बच गए नेताजी। वो ऐसा नहीं है कि प्लेन क्रैश में ही मर गए थे। वो पड़े हुए थे भीतर और बहुत ज़्यादा उनको चोट लगी नहीं थी, लेकिन प्लेन में लग गई थी आग, और बहुत सारा गैसोलीन गिर गया था उनके ऊपर। गैसोलीन जानते हो न, इन्फ्लेमेबल होता है।

पिछले दरवाज़े के सामने वहाँ बहुत सारा सामान रखा हुआ था, तो निकलने की कोशिश कर रहे हैं, पिछले दरवाज़े से निकल नहीं पा रहे। अगले दरवाज़े के सामने आग लगी हुई थी, तो उनके पास कोई रास्ता नहीं था। अब उनके ऊपर ये पूरा गिरा हुआ है, तो वो अगले दरवाज़े से अब कुछ नहीं कर सकते थे, तो भागते हुए गुज़रे वहाँ से। उतनी देर में कपड़ों ने आग पकड़ ली। कपड़ों ने आग पकड़ ली तो थर्ड डिग्री बर्न्स हुए।

अब ये सारी बातें कहीं किसी कैमरे में कैप्चर्ड नहीं हैं। ये सारी बातें भी हमें दूसरों ने बताई हैं, तो वहाँ से हमें पता चली हैं। ये सच भी हो सकती हैं, झूठ भी हो सकती हैं, पर जो हमारे पास वृत्तांत आया है, मैं आपके सामने इसलिए रख रहा हूँ कि देखो, इसमें कितना अपने आप को जलाया जाता है। एक आदमी जो वेदान्त के क्षेत्र में प्रवेश कर देता है, जो गीता को अपना आदर्श बना लेता है, वो कितने ज़बरदस्त संघर्ष को सुपुर्द कर देता है अपने आप को। वो दौड़ते हुए निकले, कि मैं अगले दरवाज़े से निकल जाऊँगा। वहाँ बीच में आग थी, उनके कपड़ों ने आग पकड़ ली। जब तक आग बुझाई गई, तब तक उन्हें थर्ड डिग्री बर्न्स हो गए थे, और वो भी बहुत सारे, सिर पर, चेहरे पर।

डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर बोले, “वो होश में थे।” और होश में ही नहीं थे, वो जो उनके लिए है आप लोग पढ़िएगा, देख लीजिएगा कि क्लियर माइंडेड थे। बोले, “इतने बर्न्स के बाद,” डॉक्टर कहता है, “मुझे पता था ये बच नहीं सकते, पर फिर भी वो साफ़ बात कर रहे थे। ऐसा नहीं लग रहा था कि दिग्भ्रमित हो गए हों,” जो कि होता है, हेलुसिनेशन, डिल्यूज़न सब होने लग जाते हैं जब आपको इतनी चोट लगी होती है। बिल्कुल साफ़ थे। उनका उपचार करने की जो कोशिश की जा सकती थी, की गई, पर कोमा में चले गए, और कोमा में जाने के कुछ देर बाद उनकी मृत्यु हो गई।

लेकिन ये जो बात है, ये हमको सेकंड हैंडेड तौर पर मिल रही है और इसका कोई बहुत साफ़ प्रमाण नहीं है। इस कारण बहुत बाद तक हमने ये उम्मीद बनाए रखी है कि नेताजी शायद जीवित हों। वो जो उम्मीद है, उसमें तथ्यात्मकता कुछ होगी, लेकिन आशा ज़्यादा है। आशा इसलिए ज़्यादा है क्योंकि हमें सचमुच ऐसे महापुरुष चाहिए होते हैं। तो फिर वो जो उम्मीद होती है, वो समझ में आती है कि हम चाहते हैं कि वो ज़िंदा रहें।

1912 के आसपास से, पन्द्रह साल के थे तब वो 1912 में; 1912 से लेकर 1945 तक लगातार, अड़तालीस के थे जब उनकी मृत्यु हुई, लगातार आप क्या देख रहे हो? संघर्ष, संघर्ष, संघर्ष।

और उनके और महात्मा गाँधी के रिश्तों को भी लेकर के बहुत कुछ कहा जाता है, लेकिन कहते हैं कि उनकी मृत्यु पर महात्मा गाँधी को शोक बहुत हुआ था। पर जैसे सुभाष बोस ये कहने में नहीं कतराते थे कि मैं महात्मा गाँधी के जो आदर्श हैं उनसे सहमत नहीं हूँ, वैसे ही महात्मा गाँधी ने भी ये कहा कि हाँ, बहुत बड़े देशभक्त थे, भले ही उनकी दिशा से मैं सहमत नहीं हूँ।

असल में, जैसे 1942 में ‘नेताजी’ कहकर के सुभाषचन्द्र बोस को विभूषित किया गया, उसी तरह 1944 में मोहनदास करमचंद गाँधी को ‘महात्मा’ भी सुभाषचन्द्र बोस ने बनाया था। तो उनकी आपस में बड़ी अद्भुत कैमिस्ट्री थी, ज़बरदस्त समीकरण। ब्रिटेन से आते ही सबसे पहले बम्बई में जाकर के मिले थे बोस गाँधीजी से ही, और इनमें आपस में असहमति लगातार बनी रही।

बीस साल तक गाँधीजी के साथ कांग्रेस में रहे सुभाष बोस, और फिर छोड़-छाड़ दिया। क्या ज़रूरत थी उन्हें ये सब करने की, खाते-पीते घर से थे? उस समय बहुत लोग शिक्षित नहीं होते थे। वो शिक्षा में अव्वल नम्बर पर थे; शिक्षित ही नहीं थे, आईसीएस जैसी परीक्षा उन्होंने पास कर ली। सब कुछ तो उनको मिला हुआ था, सब कुछ मिला हुआ है। क्या ज़रूरत थी छोड़ने-छाड़ने की? क्योंकि अध्यात्म का अर्थ ही होता है, आगे बढ़ते रहो, चरैवेति-चरैवेति।

जब मुक्ति नहीं है अभी, तो यात्रा कैसे रुक गई अभी? तो यात्री ही रहे जीवन भर, और उनके जैसी यात्रा बहुत कम लोग करते हैं।

भारत का संघर्ष, भारत की लड़ाई उन्होंने पूरी दुनिया में जाकर लड़ी। लड़ाई भारत की, लड़ वो भारत से बाहर जहाँ-जहाँ हो सकता, हर जगह रहे हैं।

दुनिया भर में हर जगह जहाँ हो सकता था, वहाँ से सहायता पाने की कोशिश की। कहीं मिली, कहीं नहीं मिली, पर उनका संघर्ष यथावत रहा। और हम कह रहे थे कि यही नहीं देखा जाना चाहिए कि आईएनए की पराजय हो गई या नेताजी का देहांत हो गया। तीन-सौ आईएनए के क़ैदी थे, अंग्रेज़ों को उन्हें छोड़ना पड़ा। क्यों छोड़ना पड़ा? क्योंकि भारत में ज़बरदस्त आक्रोश उठ रहा था कि इनको कुछ नहीं होना चाहिए।

दिल्ली में मुकदमा चल रहा था, उन सबको फिर माफ़ी दी गई। इन्हें कुछ नहीं होना चाहिए। कहते हैं कि जो कारण थे, जिनकी वजह से अंग्रेज़ों ने भारत को छोड़ा, कई कारण थे। एक तो ये कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन दुर्बल हो गया था। एक ये कि लेबर पार्टी की सरकार आ गई थी, एटली का नज़रिया दूसरा था। और एक बड़ा कारण ये भी था कि जो ये ट्रायल हुआ था आईएनए के प्रिज़नर्स का, उसमें भारत का जो आक्रोश था उसने अंग्रेज़ों को दहला दिया था। और भी हुआ था, नेवल म्यूटिनी एक हुई थी।

तो हम कैसे जान लें कि आईएनए सफल रहा कि असफल रहा, बताओ तो?

दिनकर कहते हैं न:

“विजय, क्या जानिये, बसती कहाँ है? विभा उसकी अजय, हँसती कहाँ है? भरी वह जीत के हुङकार में है, छिपी अथवा वो लहू की धार में है?”

कई बार विजय जीत के हुंकार में नहीं होती। कई बार विजय लहू की धार में छुपी होती है। हमको देखकर लगेगा कि हार हो गई, हार नहीं हुई है, जीत हुई है। वो आपको बाद में पता चलता है, जीत कैसे हुई है।

हमसे हमारे छोटे-छोटे सुख और क्षुद्र सुविधाएँ नहीं छोड़ी जातीं। “हम देर से सोए थे, इसलिए उठ नहीं पाए। हमें जल्दी सोना है, क्योंकि हमें सुबह फ़लाना काम करना है।” ऐसे थोड़े ही होता है! और साधना माने ये थोड़े ही होता है कि तुम कहीं बैठ गए हो और आँख बंद करके जप रहे हो। साधना ये होती है जो अभी आपने सुनी, इसको साधना बोलते हैं। वेदान्त ये साधना सिखाता है। वेदान्त में कोई आपको नहीं मिलेगा मेथड ऑफ़ मेडिटेशन।

आत्मज्ञान और सार्थक कर्म, यही ध्यान की विधि है।

अपने बंधनों को जानना और जीवन भर मुक्ति के लिए संघर्षरत रहना, यही ध्यान है, बस, और कुछ नहीं। मुक्ति ध्येय है तो जीवन ही ध्यान है।

प्रश्नकर्ता: सर, जैसे आपने अभी पूरी उनके संघर्ष की कहानी बताई, तो मुझे उसमें दो-तीन चीज़ें आपसे और पूछनी थी, जैसे नेताजी को भारत को बचाने के लिए भारत से ही बाहर जाना पड़ा। ये मतलब थोड़ा अजीब लगता है सुनने में।

आचार्य प्रशांत: क्या करें अगर भारत ने अपनी सत्ता ऐसों को सौंप दी हो जो भारत में आज़ादी का काम होने ही न दें! क्या करें अगर भारत के प्रेमी को सबसे ज़्यादा विरोध भारतवासियों से ही मिल रहा हो तो! क्या करें? ये तभी थोड़े ही हुआ है, ये लगातार हुआ है। उतना बड़ा, तब भी चालीस करोड़ की आबादी थी भारत की! इतना बड़ा देश ग़ुलाम कैसे हो गया होता अगर देशवासी ही ग़ुलाम होने को तैयार न होते तो?

सुना है न कि सब भारतीय एक जगह मिलकर भी थूकें तो इतना बड़ा वहाँ पर तालाब तैयार हो जाएगा कि भारत में जितने मुट्ठी-भर अंग्रेज़ हैं सब जाकर डूब मरें! भारतीय ख़ुद तैयार थे ग़ुलाम बनने को, तो फिर भारत में रहना सुरक्षित कैसे? भारत के सबसे बड़े दुश्मन तो ख़ुद भारतीय! जब भगत सिंह को फाँसी हुई थी, 1921 में मिलते हैं बोस वापस आकर के, और वही समय था जब भारत में हथियारबंद क्रांतिकारी आंदोलन भी शुरू हो रहे थे। और फिर वो चले हैं लगभग बीस साल तक। तो भगत सिंह को जब फाँसी हुई है, बाहर भीड़ खड़ी हो गई थी।

जिसने फाँसी दी, वो एक हिंदुस्तानी था; उसके बाद भगत सिंह के शव को कई हिस्सों में काटा गया, जिसने काटा वो भी एक हिंदुस्तानी था! उसके बाद उनके शव को पिछले दरवाज़े से ले जाकर के नदी किनारे चुपचाप जला दिया गया; जिन सबने मिलकर जलाया, वो भी हिंदुस्तानी!

हम क्या करें अगर भारतीयों को समझ ही नहीं आ रहा कि भारत राष्ट्र तभी राष्ट्र है जब वो वेदान्त के आधार पर खड़ा हो? नहीं तो हम बस छितराए हुए लोगों का एक गुट मात्र हैं, एक क़बीले जैसे हैं, जो किसी संयोग से कुछ लोग हैं साथ-साथ रह रहे हैं; उनमें भौगोलिक कुछ निकटता है बस, मानसिक कोई निकटता नहीं! मानसिक निकटता तो वेदान्त से ही आएगी न।

भारत बिखरा हुआ देश है क्योंकि भारत विश्वासों और मान्यताओं पर चलने वाला देश है, और विश्वास तो सबके अलग-अलग होते हैं। विश्वास कैसे आपको संगठित करेंगे? विश्वास कैसे आपको एक करेंगे? एकत्व पर, एकता पर भी नेताजी ने एक अद्भुत नारा दिया था। जैसे हम कहते हैं न कि उनका नारा है “दिल्ली चलो!” वैसे ही एक नारा था। वो उर्दू में नारा है और उसमें एकता की बात है। तीन शब्द हैं उसमें, जिसमें से एक शब्द एकता की तरफ़ है।

तो एकता, सच्ची राष्ट्रीयता तो वेदान्त से ही आएगी न, और भारत को वेदान्त के अलावा सब कुछ प्रिय है। कहने को हम धार्मिक देश हैं, पर धर्म के नाम पर रीति-रिवाज़, रूढ़ियाँ, परंपराएँ, मान्यता, विश्वास, कर्मकांड और जितना कुछ कराना है, करा लो। समझदारी नहीं चाहिए, बोध नहीं चाहिए, ज्ञान नहीं चाहिए, ख़ुद की ज़िंदगी को नहीं देखना है, आत्मावलोकन नहीं करना है। नतीजा ये रहा है कि भारत राष्ट्र का सबसे बड़ा दुश्मन भारतीय स्वयं रहा है!

देखो, राष्ट्रीयता जो होती है न, नेशनलिज़्म उसका कोई आधार होता है। जर्मन नेशन का क्या आधार है? वो कहते हैं, “साहब, हम सब आर्यन हैं।” असल में उन्होंने नेताजी की भी मदद इसी नाते करी थी; बोलते थे, “ये भारतीय हैं, ये भी आर्यन हैं, ये हमारे भाई जैसे हैं, तो चलो मदद कर देते हैं।” ख़ैर, वो अलग बात है, वो उनकी ओर से रहा होगा। तो उनके पास एक आधार है, वो बोलते हैं, “साहब, हम आर्यन हैं।” अब वो आधार गड़बड़ आधार था, तो इसीलिए वो हिंसा में तब्दील हुआ न, ठीक?

पाकिस्तान बना; पूर्वी पाकिस्तान, पश्चिमी पाकिस्तान। उनकी राष्ट्रीयता का क्या आधार था? बोले, “साहब, हम सब एक मज़हब के मुसलमान हैं, तो हम तो एक राष्ट्र के।” वो फिर गड़बड़ हो गई! फिर गड़बड़ हो गई, क्योंकि ज्ञान तो वहाँ भी नहीं है। वहाँ भी बात है कि मेरी एक पहचान है, तू बंगाली मुसलमान, मैं पंजाबी मुसलमान, तो हम एक राष्ट्र हो गए। वो एक राष्ट्र चल पाया क्या? नहीं चल पाया न?

तरह-तरह के आधारों से नेशन्स तैयार होते हैं और वो आधार ज़्यादातर गलत ही होते हैं। इसीलिए लोगों ने कहा है, समझदार लोगों ने, जिनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर भी शामिल हैं, कि नेशनलिज़्म बड़ी गड़बड़ बात है, राष्ट्रवाद बड़ी हिंसक बात है!

भारत में तुम किस बात को आधार बनाकर राष्ट्रीय एकता लेकर आओगे, बताओ तो? खाल को बना सकते हो? नहीं बना सकते। जाति के आधार पर हम वैसे ही बँटे हुए हैं। धर्म भी यहाँ एक प्रमुख धर्म है और उसके अलावा तीन-चार और हैं धर्म, और वो भी कोई बहुत छोटी तादाद में नहीं हैं।

नाक उधर चले जाओ तो चपटी है और पंजाब चले जाओ तो ऐसी तीखी है, अक्विलाइन नोज़। कहीं ये बड़ी-बड़ी आँखें, कहें, मृगनयनी! बंगाल की तरफ़ जैसे जाओ तो…। हमारा क्या है एक जैसा? न खाल, न बाल, न नाक, न आँख। किस आधार पर तुम कहोगे कि हम एक हैं? खान-पान भी अलग है। हम कहते हैं न, भारत में डायवर्सिटी-डायवर्सिटी विविधता, तो सब कुछ तो विविध है बाबा! बताओ फिर राष्ट्र एक कैसे होगा?

राष्ट्र एक, एक ही तरीके से हो सकता है, वेदान्त के तरीके से। और वेदान्त को भारतीय सम्मान देता नहीं; धर्म के नाम पर और ही पता नहीं कितनी चीज़ें चला रखी हैं। तो इसलिए भारतीय में, सच पूछो तो, असली राष्ट्रीयता होती नहीं है। इसलिए कह रहा हूँ कि भारतीय ही भारत राष्ट्र का दुश्मन होता है।

और दूसरे किसी आधार पर राष्ट्र बनाओगे वेदान्त के अलावा, तो वो राष्ट्र घातक हो जाएगा। पाकिस्तान ने धर्म के आधार पर बनाया, घातक हुआ न? देखा, बांग्लादेश में कितनी हिंसा हुई थी 1971 में? और वो हिंसा ऐसा नहीं कि बांग्लादेशी हिंदुओं पर ही हुई थी; पंजाबी-मुसलमान बंगाली-मुसलमान को काट रहा था! बताओ धर्म कहाँ गया? मुसलमान ही मुसलमान को काट रहा था।

तो धर्म के आधार पर नहीं चलता, ज्ञान के आधार पर चलता है। और धर्म की बात कर रहे हो तो जर्मन ईसाई, ब्रिटिश ईसाई को क्यों काट रहा था? द्वितीय विश्वयुद्ध में जिन्होंने जिनको काटा, वो सबके-सब क्या थे? सत्तर-अस्सी प्रतिशत मौतें तो उसमें ईसाइयों की हुई हैं; सब ईसाई एक-दूसरे को काट रहे हैं।

खाल का रंग भी नहीं चलता है। रूसी और जर्मन भिड़े हुए हैं, दोनों की खाल का रंग बोलो? एक सा। बता नहीं पाओगे, तुम्हारे आमने सामने खड़े कर दिए जाएँ, कि रूसी कौन है? जर्मन कौन है? फ़्रेंच कौन है इसमें बताओ? बुल्गेरियन कौन है? डच कौन है? क्या पता? उन्हें फिर भी पता चल जाता है थोड़ा-बहुत; हमें तो एकदम ही न पता चले।

तो सच्चा बंधुत्व, राष्ट्रीयता का अर्थ होता है, “हम बंधु हैं,” हम एक हैं। हम किस नाते एक हैं? कि तुम भी समझदार हो और हम भी समझदार हैं। और समझ को ही कहते हैं बोध, और बोध का स्रोत है वेदान्त!

विवेकानन्द कहा करते थे, “वेदान्त धर्म को धर्म कहलाने की तमीज़ देता है। वेदान्त नहीं हो तो धर्म बस अंधविश्वास का पिटारा है। वेदान्त हटा दो धर्म में से, तो बस अंधविश्वास बचेगा।” वेदान्त है जो धर्म को तार्किकता देता है, सच्चा आधार देता है। नहीं तो फिर तो मान्यता है, मानते रहो। मैं भी मानता हूँ, तुम ये मानते हो, मानते रहो। उसमें फिर कहा कौन किसी को भाई मानेगा? कौन, कैसे कह दोगे? पंजाबी और उड़िया में क्या तुम लेकर आओगे संबंध, बताओ? और जो हमारे उत्तर-पूर्व के भाई-बहन हैं, उनका तुम किसी राजस्थानी से कैसे कोई रिश्ता बैठाओगे, बताओ?

कोई नागालैंड से है, मणिपुर से है; वहाँ इतनी हिंसा भी चल रही है उत्तर-पूर्व में। शेष भारत को बहुत अंतर पड़ रहा है क्या? नहीं पड़ रहा है, क्योंकि तुम्हें उनसे कोई रिश्ता नहीं दिखाई देता! कहते हो, “वो उतनी दूर के हैं, ऊपर से उनकी भाषा अलग है, हम उनको जानते नहीं, हम उनके प्रांत में गए नहीं, छोटा-सा उनका प्रांत है, हम उनको कभी देखते भी नहीं। उनका धर्म भी बहुत अलग है, क्योंकि उनमें बहुत सारे ईसाई हैं। हमें क्या पता? हमें क्या लेना-देना? मीडिया भी उनको नहीं दिखाता बहुत।”

भारत राष्ट्र तभी बन सकता है जब भारत के पास वो हो जो स्वामी विवेकानन्द और नेताजी बोस के पास था। क्या? उपनिषद् और गीता! इन्हीं के आधार पर भारत राष्ट्र बन सकता है। और जब मैं उनकी बात कर रहा हूँ, तो मेरा आशय किससे है? मैं शब्दों की नहीं बात कर रहा; मैं ज्ञान की और बोध की बात कर रहा हूँ। कौन-सा ज्ञान? ये ज्ञान नहीं, आत्मज्ञान। कौन-सा बोध? ये सब नहीं, आत्मबोध, स्वयं को जानना।

जब हम स्वयं को जानेंगे, तो फिर हम गर्व से कह पाएँगे, “मैं भी भारतीय और तुम भी भारतीय हो। क्योंकि हम दोनों में कुछ साझा है। क्या साझा है? तुम भी ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा महत्त्व देते हो आत्मज्ञान को, और मैं भी जीवन में सबसे ज़्यादा महत्त्व देता हूँ आत्मज्ञान को। इस नाते हम में बंधुत्व है।” अब भारत राष्ट्र हुआ!

इसके अलावा और कोई आधार बनाओगे राष्ट्रीयता का, तो गड़बड़ हो जाएगी। इसलिए फिर नेताजी जैसे लोगों को भारत से ही भागना पड़ता है। भारतीयों से ही समर्थन न मिले, भारतीय ही चुगली कर दें! ये जो इन्फॉर्मर्स होते थे ब्रिटिश के, कौन होते थे? भारतीय ही तो होते थे! यही जाकर के वहाँ पर मुख़बिरी करके आते थे और क्रांतिकारियों को फाँसी करवाते थे। भारतीय ही मुख़बिरी करके भारतीयों को फाँसी करवा रहे हैं! तभी तो आईसीएस को उन्होंने मना करा था। बोले, “मैं इन्हीं की सत्ता बढ़ाने के लिए, मैं इनका एजेंट बन जाऊँ! मैं नहीं बन रहा आईसीएस! जाना नहीं मुझको।”

प्रश्नकर्ता: सर, एक प्रश्न और भी था, जैसा आपने अभी बात करते हुए बताया था कि वो नेताजी ही थे जिन्होंने गाँधी जी को ‘फ़ादर ऑफ़ द नेशन' या ‘बापू’ की उपाधि दी थी।

अब ऐसा बहुत बार होता है कि जितने भी बड़े-बड़े लोग हैं जो हमारे इतिहास में रहे हैं, चाहे वो भगत सिंह हों, नेताजी हों, महात्मा गाँधी जी हों, इनके व्यक्तित्व इतने विराट हैं कि उसमें ये बात भी शामिल है कि वो एक-दूसरे का आदर करते हैं, और साथ में कुछ बातों पर एक दूसरे से असहमति भी रखते हैं। पर मैंने ऐसा बहुत बार देखा है कि एक अलग तरह का डिवाइड ऐंड रूल शुरू हो गया है। जहाँ पर नेताजी के कुछ वक्तव्य उठाए जाते हैं, जहाँ पर उन्होंने गाँधी जी के विपरीत कोई बात कही थी।

और गाँधी जी की कोई ऐसी बात उठाई जाती है, जहाँ पर उन्होंने देखने पर नेताजी के विरोध में बात कही थी, और ऐसे दिखा दिया जाता है कि ये दो अलग-अलग गुट हैं, और इनका आपस में कोई परस्पर संबंध नहीं है।

आचार्य प्रशांत: सुभाष चन्द्र बोस ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में बीस साल तक काम किया है, बीस साल तक। और हमें ये तो पता है कि जब वो दूसरी बार अध्यक्ष बने हैं, तब गाँधी जी की असहमति हो गई थी, पर वो दूसरी बार था, एक बार बन चुके थे! वो री-इलेक्शन था उनका, और जब पहली बार बने थे तो गाँधी जी के समर्थन से बने थे। गाँधी जी के समर्थन के बिना कांग्रेस में कोई कुछ न बनता।

तो गाँधी जी का आशीर्वाद उनके साथ था। असहमति भी थी, इसमें कोई शक नहीं, क्योंकि सुभाष चन्द्र बोस का तरीका संघर्ष का था; और वो वायलेंट मेथड के भी कुछ विशेष ख़िलाफ़ नहीं थे। वो कहते थे, “अगर ज़रूरत पड़े, तो सशस्त्र क्रान्ति भी होनी चाहिए!” गाँधी जी कहते थे, “सशस्त्र क्रान्ति भारत में बिल्कुल महँगी पड़ेगी, उलटी पड़ेगी।” तो मतभेद थे दोनों में, लेकिन बीस साल का अरसा समझते हो? दो दशक। दो दशक तक दोनों ने साथ काम भी किया है।

अब आज के समय में राजनीतिक लाभ उठाने के लिए तुम दिखा दो कि नहीं-नहीं-नहीं, ये दोनों तो एक-दूसरे के दुश्मन थे। तो तुम सफल तभी हो सकते हो, जब लोगों ने इतिहास पढ़ा ही न हो। और इतिहास पढ़ने के लिए कोई आपको कहीं जाकर आर्काइव्स नहीं निकलवाने होते। जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री है, आप उसको ही पढ़ लीजिए, तो भी पता चल जाता है।

भारत को छोड़े हुए, कांग्रेस को छोड़े हुए पाँच साल बीत चुके थे। उसके बाद नेताजी ने कहा, “ओ फ़ादर ऑफ़ द नेशन!” कोई ये भी नहीं आप कहोगे कि जब अच्छे दिन चल रहे थे, जब दोनों के बीच मिठास थी, तब संयोग से या धोखे से बोल दिया होगा ‘राष्ट्रपिता।’ कांग्रेस को छोड़े हुए, भारत को छोड़े हुए पाँच साल बीत चुके थे, उसके बाद उन्होंने कहा था कि गाँधी राष्ट्रपिता हैं। अब ऐसे में कोई कहे कि नहीं, इन दोनों में तो लगातार बस छत्तीस का ही आँकड़ा है, तो वो इंसान और इंसान के रिश्ते को समझता नहीं है।

कोई भी दो इंसान होते हैं, वो आवश्यक नहीं है कि एक-दूसरे से हर बात में सहमत हों। कहीं सहमति भी है, कहीं असहमति भी है। जो चीज़ जैसी है, तथ्य को वैसा-का-वैसा देखना चाहिए। जहाँ ‘अ’ है, उसको ‘अ’ बोलो; जहाँ ‘ब’ है, उसको ‘ब’ बोलो। ‘ब’ को ‘अ’ मत बनाओ, एंड वाइस वर्सा हमें दोनों को देखना है; सहमति भी थी, असहमति भी थी।

प्रश्नकर्ता: सर, जैसा आपने भी कहा था, कि हम नेताजी के बारे में और ख़ुद भी पढ़ें, तो आपने जो उनके जीवन के बारे में बातें बताई थी, वो कहाँ से मतलब पढ़ सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: “इंडियन पिलग्रिम” जो उनकी आत्मकथा है। लेकिन वो सारी बातें वहाँ समाप्त हो जाती हैं, उनके ब्रिटेन प्रवास के साथ, अपने बारे में उन्होंने उतना ही बोला है। जो आइसीएस वाला उनका एग्ज़ाम था न, वहाँ तक, उन्होंने स्वयं लिखा है आत्मकथा में। उसके बाद का तो अन्य विविध स्रोतों से ही पता लगेगा। आप इंटरनेट से शुरुआत कर सकते हैं, इंटरनेट माने सोशल मीडिया नहीं बाबा! फेसबुक मत पढ़ने लग जाना!

इंटरनेट पर भी इतनी हमें अक्ल होनी चाहिए कि रिलायबल सोर्सेस कौन से हैं, वहाँ से शुरुआत कर सकते हो और उसके बाद बहुत किताबें हैं जो उनके ऊपर लिखी गई हैं, आप जाइए और उनको पढ़िए, प्रेरणा मिलेगी, बहुत अच्छा लगेगा और बहुत सारे भ्रम टूटेंगे और बड़ा उत्साह आएगा कि हम भी क्यों न जीवन को सार्थक बनाएँ।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

आचार्य प्रशांत: और संगति भी अच्छी करनी होती है, मैंने उनका नाम लिया न, जिनके साथ वो घर से भागे थे? आप ख़ुद पता करें। मैंने नाम वैसे बता दिया था तब, हेमंत कुमार। तो वो अपने आप में एक अलग बड़े नेता बनकर निकले, ये होता है संगति का असर।

छोटों की संगति करोगे छोटे ही रह जाओगे! क्या बोलते हैं अंग्रेज़ी में? “बर्डज़ ऑफ़ द सेम फेदर…।” बस, तो गलत संगति मत करना।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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