तुमने विश्वकप उठाया है, और उसके साथ सदियों से झुके हुए करोड़ों सिरों को भी। ऐसी जीतें मैदान की सीमाओं से आगे जाती हैं, वे दिखाती हैं कि जब तुम आदिम भूमिकाएँ लाँघती हो, तो क्या संभव हो जाता है। मैदान पर बना हर रन, उस रण की याद दिलाए जो स्त्री आज भी हार रही है। मैदान पर लगा हर चौका, उस चौके की याद दिलाए जो रसोई से ज़्यादा जेल है। गेंद तो सीमा रेखा पार कर गई, पर याद रखना कोई अभी भी सीमा में ही कैद है।
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(2025 आईसीसी महिला क्रिकेट विश्व कप में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ऐतिहासिक जीत के लिए।)
तुमने विश्वकप उठाया है, और उसके साथ सदियों से झुके हुए करोड़ों सिरों को भी। ऐसी जीतें मैदान की सीमाओं से आगे जाती हैं, वे दिखाती हैं कि जब तुम आदिम भूमिकाएँ लाँघती हो, तो क्या संभव हो जाता है।
युगों से तुम्हें कविता में पूजा गया, जीवन में दबाया गया। मंचों पर गाया गया, पर मैदान से वंचित रखा गया। आज समय ने फिर देखा कि क्या होता है जब तुम न कठपुतली बनती हो न देवी, बल्कि जूझती हो खिलाड़ी, योद्धा, विजेता बनकर।
देखे दुनिया कि दैवीयता किसी ठहरे हुए चलन का नहीं, बल्कि मानवीय क्षमता के पूर्ण प्रस्फुटन का नाम है। कि पवित्रता रीतियों के पुरातन जाल में नहीं बसती, पवित्र वो है जो जंग-खाई जंज़ीरों को बेधड़क उखाड़ फेंके।
सच्ची जीत प्रतिद्वंद्वी पर नहीं, अपने ही बेड़ियों पर होती है: व्यक्तिगत, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक। जब स्त्री स्वतंत्र होकर खेलती है, तब राष्ट्र स्वतंत्र होकर साँस लेता है। जब स्त्री निर्भय होकर नाचती है, तब पृथ्वी पर जीवन प्रश्रय पाता है।




