राष्ट्रविकास: क्या सिर्फ़ GDP तक सीमित?

Acharya Prashant

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राष्ट्रविकास: क्या सिर्फ़ GDP तक सीमित?
अर्थशास्त्र का साधारण-सा सिद्धांत है कि ग्रोथ और डेवलपमेंट एक चीज़ नहीं होते। जीडीपी माने बाहरी तरक़्क़ी: सड़क बन गई, फ़ैक्ट्रियाँ ज़्यादा उत्पादन कर रही हैं, इन सब से जीडीपी बढ़ता है। लेकिन यह अपने-आप में अंत नहीं हो सकता, वह सब तभी तक अच्छा है जब तक उससे इंसान को लाभ हो रहा हो। और इंसान को लाभ हो रहा है कि नहीं, यह जानने के लिए इंसान को पहले यह पता करना पड़ेगा कि वह है कौन? ख़ुद को जानना विकास की दिशा में पहला कदम है। राष्ट्र के विकास का सबसे अच्छा तरीका है, राष्ट्र के लोगों को भीतरी तल पर बेहतर बनाना। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: हमारे साथ आचार्य प्रशांत जी हैं। बहुत-बहुत शुक्रिया हमें समय देने के लिए। सबसे पहले जब मैं यहाँ पर आ रहा था, तो मुझे बताया गया कि अभी; बिकॉज़ अगर आप में से वैसे ही शायद ही कोई हो, जिसको ये पता न हो कि आप आईआईटी, आईआईएम एलुमनाई हैं, तो “आईआईटी दिल्ली एलुमनाई एसोसिएशन” ने आपको एक अवार्ड दिया अभी। काफ़ी महत्त्वपूर्ण अवार्ड है; आपसे पहले जिन लोगों की लिस्ट में नाम आता है, बहुत बड़े-बड़े लोग हैं। राष्ट्रीय विकास में उत्कृष्ट योगदान का आपको पुरस्कार से नवाज़ा गया। तो मुझे लगा कि आज की चर्चा जो है, वो इन्हीं कुछ शब्दों के इर्द-गिर्द शुरू करते हैं। तो सबसे पहले कॉनग्रैचुलेशन आपको इस अवार्ड के लिए।

दूसरा, मैं आपसे जानना चाहूँगा कि राष्ट्र-विकास, नेशन-डेवलपमेंट (राष्ट्र-विकास) होता क्या है? क्या सिर्फ़ जीडीपी कहीं पहुँचना, ट्रिलियन्स में आपकी इकॉनमी पहुँच जाना; उससे लेबल लग जाता है विकसित देश, विकासशील देश या ग़रीब देश? या उसके लिए लोगों का एक आत्मचिन्तन, आत्ममन्थन, उनका ख़ुद का एक सेल्फ-डेवलपमेंट भी इम्पॉर्टेंट होता है किसी देश को विकसित होने के लिए?

आचार्य प्रशांत: देखिए, सबसे पहले तो हम जितनी भी बातें करें, वो सब इंसानों के लिए हैं। अब और व्यापक तौर पर देखें तो जितनी प्रजातियाँ हैं पृथ्वी पर, सबके लिए होनी चाहिए। पर उनको अभी अगर हम अलग भी रख दें, तो राष्ट्र इंसानों के लिए होता है जो लोग वहाँ पर रह रहे हैं। आप जीडीपी की बात कर रहे हैं, जीडीपी भी हमारे लिए होता है न।

तो जो कुछ भी है, जिसको हम वृद्धि का, ग्रोथ का सूचक मानते हैं, वो मुझे बेहतरी दे रहा है कि नहीं दे रहा है, इससे विकास निर्धारित होता है।

बाहर-बाहर जो चीज़ें चल रही हैं उनको हम बोल देते हैं ग्रोथ (वृद्धि), और उस वृद्धि का भीतरी तौर पर मुझ पर क्या असर पड़ रहा है वो कहलाता है विकास। वरना ऐसा बिल्कुल हो सकता है कि ग्रोथ है बहुत पर डेवलपमेंट नहीं है। इस अवार्ड का भी नाम ग्रोथ नहीं है डेवलपमेंट है न, “आउटस्टैंडिंग कॉन्ट्रिब्यूशन टू नेशनल डेवलपमेंट।”

ये बिल्कुल हो सकता है कि बाहर बहुत सारी चीज़ें हो गई हैं, ये वो, लेकिन मुझे पता ही नहीं कि उन चीज़ों से मुझे क्या मिलना है। मैं बस हो सकता है खुश हो रहा हूँ या कि एक बहुत बड़ा समुदाय हो, समूह हो, वो खुश हो रहा हो कि बाहर इतना कुछ हो गया है। पर भीतरी तौर पर मैं अभी भी बिल्कुल अपरिपक्व हूँ और बेचैन हूँ, और खोखला हूँ, और डरा हुआ हूँ। ये बिल्कुल हो सकता है।

हम जो कुछ भी करें ज़िंदगी में, उसका उद्देश्य मनुष्य होता है। मनुष्य भीतर से बेहतर हो पा रहा है कि नहीं हो पा रहा है; हम बाहर भी जो कुछ करें, उसका उद्देश्य आंतरिक बेहतरी ही होता है। तो विकास माने, कि मैं जिस अपूर्णता के साथ पैदा हुआ था, मैं जिस अँधियारे के साथ पैदा हुआ था; सभी होते हैं, बच्चा छोटा पैदा होता है तो वो तो बस ऐसे ही साधारण वृत्तियों का, जानवर जैसी पाश्विक वृत्तियों का एक पुतला ही होता है। विकास का मतलब होता है कि मैं अपनी चेतना को ऊँचाइयाँ दे पाया कि नहीं। मैं भीतर के अपने सब बंधनों को काट पाया कि नहीं।

और इस विकास के लिए ज़रूरी हो जाता है कि बाहर भी कुछ परिवर्तन किए जाएँ। तो बाहर-बाहर जो परिवर्तन होते हैं, वो आख़िरी चीज़ नहीं होते; उनको हम एन एंड इन देमसेल्व्स नहीं कह सकते। वो इसलिए हैं, ताकि हम भीतर से ठीक हो पाएँ। तो ये तो चीज़ हुई विकास की।

दूसरा, आपने बड़ा सुंदर कहा कि राष्ट्र, “राष्ट्र माने क्या?”

कुछ लोग हैं, वो कहते हैं कि हम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। हम एक-दूसरे से एक फ्रेटरनिटी, बंधुत्व अनुभव करते हैं। उनको हम कहते हैं, नाउ दे कॉन्स्टिट्यूट अ नेशन। अभी एक राष्ट्र हैं, तो हम आप यहाँ पाँच, सात, दस, बीस या दस-बीस लाख या दस-बीस करोड़ लोग हो जाएँ, और हम सब आपस में किसी आधार पर एक एकत्त्व अनुभव करते हों, तो हम अपने आप में एक राष्ट्र कहलाएँगे, राष्ट्र।

प्रश्नकर्ता: अगर मैं इससे पूछूँ तो फिर, तो क्या जिस तरीके का एक पैमाना जीडीपी और इकॉनमिक ग्रोथ को मान लिया गया है; किसी भी देश को डेवलप, डेवलपिंग या अंडर-डेवलप्ड देश बोलने के लिए, उस पर भी एक पुनर्विचार की आवश्यकता है?

आचार्य प्रशांत: नहीं, देखिए, ये तो इकॉनमिक्स भी साफ़-साफ़ कहती है कि ग्रोथ और डेवलपमेंट एक चीज़ तो होते नहीं। ये तो बहुत साधारण-सा सिद्धांत है अर्थशास्त्र का भी। दिक़्क़त ये है कि जब हम एक बेहोश बहाव में होते हैं न, तो हमें लगने लग जाता है कि ग्रोथ ही डेवलपमेंट है और हम जीडीपी-जीडीपी करते रहते हैं। जबकि जो ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स है, जीडीपी उसका एक बहुत छोटा-सा हिस्सा है।

और ऐसे दुनिया में कई उदाहरण हैं जहाँ जीडीपी अच्छा है लेकिन फिर भी ह्यूमन डेवलपमेंट के जितने भी कारक हैं और सूचकांक हैं, वो अच्छे नहीं हैं। वहाँ पर आप पाएँगे कि इनकम-डिस्पैरिटी बहुत ज़्यादा है, जेंडर-डिस्पैरिटी बहुत ज़्यादा है, जेंडर-एम्पावरमेंट बहुत पुअर है। और अब तो एक हैप्पीनेस-इंडेक्स भी आ गया है। बहुत-सारे ऐसे देश हैं जिनका पर-कैपिटा जीडीपी भी बहुत अच्छा है, पर वहाँ पर हैप्पीनेस-कोशंट जो है वो बहुत पुअर है।

प्रश्नकर्ता: या उल्टा भी है कुछ जगह पर, जैसे भूटान में है।

आचार्य प्रशांत: बिल्कुल-बिल्कुल, बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया। तो इससे हमें ये पता चलता है कि जीडीपी अपने-आप में कोई अंत, कोई लक्ष्य नहीं हो सकता। जीडीपी माने बाहरी तरक़्क़ी: मेरी सड़क बन गई, मेरी फ़ैक्ट्रियाँ ज़्यादा उत्पादन कर रही हैं, मैं ज़्यादा दुनिया के साथ व्यापार कर रहा हूँ, इन सब से जीडीपी बढ़ता है। लेकिन ये अपने आप में अंत नहीं हो सकता, वो सब तभी तक अच्छा है जब तक उससे इंसान को लाभ हो रहा हो। और इंसान को लाभ हो रहा है कि नहीं, ये जानने के लिए इंसान को पहले ये पता करना पड़ेगा कि वो है कौन?

मुझे यही नहीं पता कि मैं कौन हूँ, मेरी बीमारी क्या है, तो मुझे ये कैसे पता चलेगा कि मेरी दवाई क्या है?

तो ख़ुद को जानना, ये नज़रें जो लगातार बाहर को देखती रहती हैं इनको ख़ुद की ओर मोड़ना, विकास की दिशा में पहला क़दम है। क्योंकि अगर मुझे यही नहीं पता, फिर कह रहा हूँ, कि मेरे बंधन कहाँ हैं, तो मैं फिर मुक्ति की, आज़ादी की या स्वतंत्रता की ओर कैसे बढ़ सकता हूँ? तो इसलिए न तो राष्ट्रीयता पनप सकती है, अच्छी राष्ट्रीयता, सुंदर राष्ट्रीयता, और न राष्ट्र का विकास हो सकता है। जब तक हम इस इकाई, मनुष्य के तल पर जो यूनिट है: द ह्यूमन बीइंग, उसके तल पर उसको बेहतर नहीं बनाते। तो राष्ट्र के विकास का सबसे अच्छा तरीका है, राष्ट्र के लोगों को भीतरी तल पर बेहतर बनाना।

प्रश्नकर्ता: क्या आपको लगता है कि उस जन-चेतना में, या लोगों को अपने ऊपर, कम-से-कम ख़ुद पर ध्यान देने में, अंदर देखने में, क्योंकि ये एक बड़ा मुश्किल काम होता है; और बहुत लोगों को जो आपसे बात करते होंगे या आपको सुनते हैं, उनको लगता है कि शायद उसमें आप उनकी मदद कर पाते हैं, अपने ख़ुद के अंदर देखने में। तो क्या आपको लगता है कि वो जो आपाधापी है, एक ट्रेडिशनल सेंस में तरक़्क़ी की, उसमें पीछे छूटती जा रही है जन-चेतना? ख़ुद के अंदर देखना, ख़ुद से सवाल पूछना?

आचार्य प्रशांत: नहीं देखिए, भीतर हमारे एक खोखलापन है, भीतर एक बेचैनी है। तभी तो हम बाहर भी इतना भागते हैं न। जितना आदमी परेशान होता है, उतना वो बाहर की दिशा में भागता है। तो मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि बाहर की दिशा में भागना बंद करो। मैं तो कहता हूँ कि बाहर जिस दिशा में भाग रहे हो, पूछो अपने-आप से कि क्या तुम्हें वहाँ वो मिल रहा है जो तुम चाहते हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि भागते-भागते तुम ये भूल ही गए हो कि भाग क्यों रहे हो। भाग अपनी ख़ातिर रहे हो, मैन इज द एंड, एंड मेज़र ऑफ़ एवरीथिंग। है न? हम जो भी कर रहे हैं, अपने लिए ही कर रहे हैं। अपने लिए कर रहा हूँ, तो जो कर रहा हूँ उसमें से मुझे कुछ मिल भी रहा है क्या? ये पूछना बहुत ज़रूरी है।

तो ख़ुद को देखना माने और क्या होता है? मैं इन आँखों को मोड़कर भीतर तो लगा नहीं सकता। और कोई आप एक्स-रे वग़ैरह कर भी लें इस शरीर के भीतर का यदि, तो उसमें से क्या निकलेगा? ख़ुद को देखना माने यही होता है: अपने विचारों, अपनी भावनाओं, अपने कर्मों को साफ़-साफ़ देखना, उनको ऑब्ज़र्व करना, अवलोकन करना, यही है।

तो आप ऑफ़िस जा रहे हो, भागे जा रहे हो। थोड़ा-सा पूछना: ऑफ़िस जा रहे हो; समय लगा रहे हो, ऊर्जा लगा रहे हो; कब से किए जा रहे हो, आगे भी यही करने का इरादा है; मिल क्या रहा है? और हम ये नहीं कह रहे कि कुछ नहीं मिल रहा है। हम तो बस पूछ रहे हैं, कि मिल क्या रहा है? एक बहुत मासूम-सा सवाल है, कि क्या मिल रहा? और कुछ तो मिल ही रहा है। देखिए, आदमी को सैलरी मिलती है, पैसा मिलता है। पैसा भी ज़रूरी है। पैसा न हो तो आदमी को शिक्षा भी न मिले, रोटी-पानी में समस्या आ जाए। लेकिन, किस हद तक वो जो पैसा है हमारे काम आ रहा है, हमें स्वयं से पूछना पड़ेगा।

क्योंकि आज भारत में भी बहुत एक बड़ा तबक़ा उभरकर आ रहा है, जिसको अब आप और ज़्यादा पैसा दे दें तो इससे ऐसा नहीं है कि उसकी जो बेसिक-वेल्फ़ेयर या नीड्स हैं, वो पूरी होंगी, वो सब पहले ही पूरी हो चुकी हैं। तो उन्हें अपने-आप से पूछना पड़ेगा, कि हम जो कर रहे हैं उसमें अब मेरे लिए है क्या? काफ़ी सीधा, स्पष्ट और स्वार्थी सवाल है। और इस हद तक स्वार्थी हमें होना पड़ेगा, अध्यात्म यही सिखाता है; पूछो तो, कि इसमें तुम्हें मिल क्या रहा है?

प्रश्नकर्ता: मतलब शून्य सिर्फ़ बढ़ाते न जाएँ अपनी इनकम में और सोचें कि उससे…।

आचार्य प्रशांत: हाँ, भीतर की शून्यता का क्या हाल है? बाहर आप किन्हीं भी चीज़ों में और शून्य, शून्य, शून्य बढ़ा के, दस, सौ गुना, हज़ार गुना। लेकिन भीतर जो बैठा हुआ है खालीपन, रिक्तता, एम्प्टीनेस, एक वॉइड बैठा है भीतर, वो तो वैसे-का-वैसा है और वो परेशान बहुत कर रहा है। और जितना परेशान करता है, हम उतना बाहर की ओर भागते हैं। ये तो कोई तरीका नहीं हुआ।

प्रश्नकर्ता: अगर कोई अभी इसको देख रहा होगा, कहेगा कि, जैसे हमने “आउटस्टैंडिंग कॉन्ट्रिब्यूशन इन नेशनल डेवलपमेंट” से बात शुरू करी थी। तो उसको लगेगा कि देखिए, मैं टैक्स देता हूँ, मेरा भी तो डेवलपमेंट में कॉन्ट्रिब्यूशन हो रहा है। लेकिन हम फिर उस ट्रेडिशनल सेंस में बात कर रहे हैं। तो अगर मैं अभी आपसे पूछूँ, कि मैं कैसे, जिस राष्ट्र की हम बात कर रहे हैं, जिस नेशनल डेवलपमेंट की हम बात कर रहे हैं सिर्फ़ जीडीपी नंबर्स की नहीं, उसमें मैं कैसे योगदान दे सकता हूँ?

आचार्य प्रशांत: ख़ुद बेहतर होकर। आज हम सारी बात यही कर रहे हैं कि जो इकाई है राष्ट्र की भी और विकास की भी, वो इंसान है: द ह्यूमन बीइंग।

अगर मैं बेहतर नहीं हूँ और मैं कहूँ कि मैं बहुत बड़ा राष्ट्रप्रेमी हूँ, या देशभक्त हूँ, पैट्रिअट हूँ, नैशनलिस्ट हूँ, तो ये बात बहुत खोखली है और पाखंड की है।

एक इंसान जो अपने भीतर उलझा हुआ है, वो किसी के लिए अच्छा नहीं हो सकता। तो फिर वो देश के लिए, राष्ट्र के लिए कैसे अच्छा हो जाएगा? एक इंसान जो अपने ही भीतर बिल्कुल परेशान है और झूठ से भरा हुआ है, वो अपने माँ-बाप, अपने बच्चों, अपने पड़ोसी, अपनी पत्नी, अपने पति, वो किसी के लिए अच्छा नहीं हो सकता। तो फिर वो एक वृहदत्तर समुदाय, एक ब्रॉडर कम्युनिटी, जिसको आप नेशन कह रहे हो, उनके लिए भी अच्छा कैसे हो सकता है?

तो ये सोचना, कि मैं आदमी तो गड़बड़ हूँ; मुझे कोई होश नहीं रहता; मैं कैसे जी रहा हूँ, क्या कर रहा हूँ, क्यों कर रहा हूँ; इधर-उधर भागता रहता हूँ; भीड़ के पीछे ठोकरें खाता रहता हूँ, मैं आदमी तो ऐसा हूँ; बट आय लव कॉलिंग मायसेल्फ अ नैशनलिस्ट। मुझे बड़ा अच्छा लगता है जब कोई कहता है, “इनसे मिलिए ये राष्ट्रप्रेमी हैं।”

तो आप राष्ट्रप्रेमी नहीं हो सकते, अगर अभी आप एक सुलझे हुए इंसान ही नहीं हैं तो। तो शायद यही जो उन्होंने अवॉर्ड भी मुझे दिया है, यही देखकर और समझकर दिया है कि: अगर आप इंसान को बेहतर बना रहे हो, तो ये राष्ट्र को बेहतर बनाने का सबसे अच्छा तरीका है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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