अर्थशास्त्र का साधारण-सा सिद्धांत है कि ग्रोथ और डेवलपमेंट एक चीज़ नहीं होते। जीडीपी माने बाहरी तरक़्क़ी: सड़क बन गई, फ़ैक्ट्रियाँ ज़्यादा उत्पादन कर रही हैं, इन सब से जीडीपी बढ़ता है। लेकिन यह अपने-आप में अंत नहीं हो सकता, वह सब तभी तक अच्छा है जब तक उससे इंसान को लाभ हो रहा हो। और इंसान को लाभ हो रहा है कि नहीं, यह जानने के लिए इंसान को पहले यह पता करना पड़ेगा कि वह है कौन? ख़ुद को जानना विकास की दिशा में पहला कदम है। राष्ट्र के विकास का सबसे अच्छा तरीका है, राष्ट्र के लोगों को भीतरी तल पर बेहतर बनाना।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: हमारे साथ आचार्य प्रशांत जी हैं। बहुत-बहुत शुक्रिया हमें समय देने के लिए। सबसे पहले जब मैं यहाँ पर आ रहा था, तो मुझे बताया गया कि अभी; बिकॉज़ अगर आप में से वैसे ही शायद ही कोई हो, जिसको ये पता न हो कि आप आईआईटी, आईआईएम एलुमनाई हैं, तो “आईआईटी दिल्ली एलुमनाई एसोसिएशन” ने आपको एक अवार्ड दिया अभी। काफ़ी महत्त्वपूर्ण अवार्ड है; आपसे पहले जिन लोगों की लिस्ट में नाम आता है, बहुत बड़े-बड़े लोग हैं। राष्ट्रीय विकास में उत्कृष्ट योगदान का आपको पुरस्कार से नवाज़ा गया। तो मुझे लगा कि आज की चर्चा जो है, वो इन्हीं कुछ शब्दों के इर्द-गिर्द शुरू करते हैं। तो सबसे पहले कॉनग्रैचुलेशन आपको इस अवार्ड के लिए।
दूसरा, मैं आपसे जानना चाहूँगा कि राष्ट्र-विकास, नेशन-डेवलपमेंट (राष्ट्र-विकास) होता क्या है? क्या सिर्फ़ जीडीपी कहीं पहुँचना, ट्रिलियन्स में आपकी इकॉनमी पहुँच जाना; उससे लेबल लग जाता है विकसित देश, विकासशील देश या ग़रीब देश? या उसके लिए लोगों का एक आत्मचिन्तन, आत्ममन्थन, उनका ख़ुद का एक सेल्फ-डेवलपमेंट भी इम्पॉर्टेंट




