ये मत कहिए कि पीछे से कुछ आ जाता है और आपको ले जाता है। जो सामने है, आप अपने आप को उससे बचा लेते हो। अगर आपने अपने आप को पूरा-पूरा जीवन को सौंप दिया होता, तो फिर कुछ बचता ही नहीं, जिसको भूत या भविष्य ले जाए। 'लैक ऑफ इंटरेस्ट' चाहिए और वो तब होता है, जब सामने कुछ होता है जो आपका पूरा अटेंशन ले ले। ज़िंदगी में जो ज़रूरी है, उसको स्वीकार करिए और उसमें कूद जाइए, फिर इधर-उधर की झंझटें ख़ुद ही याद आनी बंद हो जाएँगी।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चेप्टर 158: “द वन हू नोज़ दैट द क्लॉक इज़ टिकिंग विल नॉट लैट द मोमेंट रिटर्न एम्प्टी। टू रिस्पेक्ट लाइफ़ इज़ टू रिस्पेक्ट टाइम।” जब मैं ख़ुद का जीवन देखती हूँ, मैं मिड-थर्टीज़ में हूँ अपने, तो पूरा लाइफ़ जैसे फ़ेल्यर ही दिखता है पास्ट, और रिलेशनशिप हो, चाहे करियर हो। और अब भी जब आपको सुनना शुरू किया, तो काफ़ी कुछ समझ में आ रहा है, उसको सुधारने की कोशिश करती हूँ। टाइम को ट्रैक करने की कोशिश करती हूँ। कॉन्शस हूँ उसको लेके।
लेकिन जो पास्ट लूप ऑफ थॉट प्रोसेस है, वो बार-बार आ रहा है। खो जाती हूँ मैं उसमें, और जब बार-बार ऐसा होता है, तो काफ़ी निराशा हो जाती है। लगता है कि मैं कर ही नहीं पाऊँगी। और एक भय हो गया है कि आधा जीवन तो ऐसे ही निकल गया, अगला भी ऐसे ही निकल जाएगा क्या? मतलब डर-सा हो गया है।
आचार्य प्रशांत: आप किसी गर्म सतह को छूते हो, तो तुरंत हाथ पीछे खींच लेते हो न? ऐसे ही होता है न? और अगर नहीं खींच रहे, तो इसका क्या मतलब है?




