एक कागज़ पर समानता शब्द लिख भर देने से समानता नहीं आ जाएगी। जो समानता के आदर्श को पसंद करते हों, उनकी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वो समझें, सर्वप्रथम, कि असमानता, भेद कहाँ से आते हैं। वो आते हैं, अहम् से। अहम् विभाजन पर पलता है। उसको जीने के लिए सीमाएँ चाहिए, वर्ग चाहिए, कुछ ऊँचा, कुछ नीचा चाहिए। सिर्फ़ आत्मा वो बिंदु है, जहाँ सब एक और एक समान हैं। इसीलिए, अगर भारत को या दुनिया के किसी भी राष्ट्र को समानता चाहिए, तो उसे आत्मिक होना पड़ेगा।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, इतने वर्ष हो गए हैं हमारे देश को आज़ाद हुए। बाबा भीमराव अंबेडकर द्वारा हमारे समाज के हर वर्ग के लिए समानता का अधिकार देकर हमारा संविधान बनाया गया। हर एक समाज सुधारक ने अपने-अपने तरह से समानता लाने के लिए हर संभव प्रयास किए। कई कानून बने हैं। इसके बावजूद आज भी जन्म के आधार पर ब्राह्मणवाद क्यों इतना हावी है? समाज में समानता कैसे लायी जा सकती है? इस विषय पर कुछ बोलने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: अहम् विभाजन पर पलता है। उसको जीने के लिए, बने रहने के लिए सीमा रेखाएँ चाहिए, वर्ग चाहिए; कुछ ऊँचा, कुछ नीचा चाहिए। उसको जो सीमाएँ चाहिए, जो दायरे चाहिए, उनको वो एक नहीं अनेक नामों से गढ़ता है, एक नहीं अनेक तरकीबों से क़ायम रखता है। बहुत सारे नाम देता है पर उन सब नामों का, तरकीबों का, रूपों का, कारणों का, आदर्शों का, विचारधाराओं का छुपा हुआ उद्देश्य एक ही होता है: किसी तरह का विभाजन बना देना, वर्गीकरण कर देना, कैटेगराइज़ेशन; एक को दूसरे से अलग बता देना।
क्योंकि एक अगर दूसरे से अलग नहीं है तो अहम् पलेगा कैसे? एक अगर दूसरे से नहीं है अलग तो अद्वैत हो गया न। फिर तो खेल ही ख़त्म! किसी न किसी तरीके से दूसरे को अलग करना है। अलग करने का वो काम, वो साज़िश आदमी के इतिहास में पचासों तरीकों से होती रही है। उनमें से सिर्फ़ एक तरीका है, ब्राह्मणवाद। हज़ारों अन्य तरीके भी हैं जो प्रचलित हैं और उन सब तरीकों का उद्देश्य सिर्फ़ एक है: इंसान को ये एहसास दिलाना कि वो दूसरे से किसी न किसी तरीके से भिन्न है; ऊँचा है नीचा है, अलग भावनाएँ रखता है, अलग इतिहास रखता है, अलग प्रेरणाएँ रखता है, अलग भविष्य चाहता है।




