धर्म तो सबसे ऊँची बात होनी चाहिए न? तो धर्म के नाम पर ऐसे काम क्यों कर रहे हो, जो एक छोटे बच्चे को भी दिख रहा है कि गलत है? और सबसे खौफ़नाक बात ये है, कि हमारे बच्चों को धीरे-धीरे झटका लगना बंद हो जाता है। वो इसी माहौल के हो जाते हैं, रच-बस जाते हैं। ज़िंदगी हिसाब करेगी, जवाब माँगेगी और तब लज्जित होने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: जी।
प्रश्नकर्ता: मेरा नाम देवाँशी है। मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ, पर्व के बाद सारी मूर्तियों को इतनी गंदी तरह से विसर्जन क्यों किया जाता है?
आचार्य प्रशांत: जैसे तुम्हें बुरा लग रहा है, मुझे भी लगता है। मैं क्या करूँ? मैं तो करता नहीं, ये लोग करते हैं, ये सब बैठे हैं न अंकल, आन्टी; इनको पूछो, ये करते हैं। मैं नहीं करता। मैं कैसे बताऊँ? जिससे प्यार होता है, जिसको इज़्ज़त देते हैं, उसके साथ तो अच्छा व्यवहार करते हैं न? करते हैं न? है न? तो मैं तो कभी न करूँ गंदा व्यवहार। ये लोग जो करते हैं, इनको पकड़ो। यही सब हैं, गंदे हैं ये सब, छी-छी। इन्हीं लोगों ने कर रखा है।
इनको सबको पकड़ा करो और पूछा करो, कि “मैं तो पहले थी नहीं, ये दुनिया तो तुमने बनाई। तुमने ऐसी ये दुनिया क्यों बना रखी है कि उसमें फिर देवाँशी जैसी आती है छोटी बच्ची, और उसको सब गंदी-गंदी चीज़ें ही दिखाई देती हैं?” पूछो इनसे।




