डाइवोर्स केस क्यों बढ़ रहे हैं?

Acharya Prashant

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डाइवोर्स केस क्यों बढ़ रहे हैं?
प्रकृति ने इंसान को ऐसा बनाया नहीं है कि कोई भी दो व्यक्ति ताउम्र एकसाथ चल सकें। पहले रिश्ता चल जाता था, क्योंकि बहुत तरीके के डर होते थे। अब लोगों को हक आ गया है कि वो अलग हो सकते हैं, और जब लोगों को अधिकार रहेगा कि वो अलग हो सकते हैं, तो अलग होंगे। मैं नहीं कह रहा हूँ कि जितने लोग हैं, सब अपने रिश्ते तोड़ लें। गलती हो गई है तो उसका सुधार करो। सुधार पहले तो ऐसे किया जाता है कि बातचीत की, रिश्ता बचाने की कोशिश की, लेकिन अगर वो तरीका नहीं चलता, तो आवश्यक नहीं है कि एक-दूसरे के साथ बंधे रहकर यंत्रणा भोगो जीवनभर। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: सर, एक ज़माना था जब बिना देखे शादी हो जाया करती थी और बुढ़ापे तक टिकाऊ रहती थी। आजकल लोग लिव-इन (बिना शादी के दो वयस्कों का साथ रहना) में भी रहते हैं, घूमते भी हैं और फिर शादी के कुछ वक्त के बाद डाइवोर्स ले लेते हैं। तो ये डाइवोर्स केस क्यों बढ़ते जा रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: देखिए, बढ़ते इसलिए जा रहे हैं, अब बात हो सकता है आपको बहुत प्यारी न लगे, पर आपने इसलिए तो नहीं पूछा कि मैं आपको कुछ दबा, छुपा, ढका हुआ ज़वाब दे दूँ, तो खुली बात बोलता हूँ। बढ़ते इसलिए जा रहे हैं क्योंकि प्रकृति ने इंसान को ऐसा बनाया नहीं है कि कोई भी दो व्यक्ति ताउम्र एकसाथ चल सकें, चाहे वो दो बच्चे हों, चाहे दो पुरुष हों, दो स्त्रियाँ हों, या फिर स्त्री और पुरुष हो। तो ऐसा कोई प्रकृति में न बंधन है, न व्यवस्था है कि दो लोगों को साथ हमेशा चलना ही है। ठीक है?

पहले चल जाता था, क्योंकि बहुत तरीके के डर होते थे। हो तो ये भी जाता है कि आप किसी को उम्रकैद की सज़ा दे दें तो वो जीवनभर जेल में चल जाए, उसको आप ये थोड़े ही कहेंगे कि बहुत प्यार की बात है।

तो क्यों बढ़ने लगा है? क्योंकि अब लोगों को हक आ गया है कि वो अलग हो सकते हैं। और लोगों को अधिकार रहेगा कि वो अलग हो सकते हैं, तो अलग होंगे। मैं बिल्कुल मानता हूँ और अच्छी तरह मैंने देखा भी है कि जब माँ-बाप अलग होते हैं तो उसका परिवार पर, विशेषकर बच्चों पर बहुत बुरा असर पड़ता है।

ये बिल्कुल देखा है, लेकिन मैंने ये भी देखा है कि उतना ही बुरा असर, और उससे ज़्यादा बुरा असर उन परिवारों में भी पड़ता है जहाँ माँ-बाप में दिन-रात की कलह रहती है। और जहाँ दो ऐसे व्यक्ति, एक स्त्री-एक पुरुष साथ रह रहे होते हैं जिनमें आपस में कोई संगति हो ही नहीं सकती, लेकिन ये दोनों ज़बरदस्ती एक-दूसरे के साथ हैं, और ऐसे परिवारों से भी बच्चे बहुत बर्बाद निकलते हैं। तो कुछ हद तक संबंध विच्छेद होना कोई आवश्यक रूप से बुरी बात नहीं है।

मैं नहीं कह रहा हूँ कि जितने लोग हैं सब अपने रिश्ते तोड़ लें। लेकिन अगर, अब आप यहाँ पर बैठे हुए हैं, लोग हैं, अपनी-अपनी कंपनियों में, ऑर्गनाइज़ेशंस (में) सीरियस पदों पर होंगे। आप जो भी निर्णय लेते हो वो सौ प्रतिशत सही निकलता है क्या? आप हायरिंग (नियुक्ति) करते हो, वो सारी फ़ूलप्रूफ़ (विश्वसनीय) होती हैं, या हायरिंग मिस्टेक्स भी होती हैं?

प्रश्नकर्ता: गलतियाँ होती हैं।

आचार्य प्रशांत: आप किसी को प्रमोशन दे देते हो, आपको फिर ऐसा नहीं होता है क्या कि एक साल बाद पता चले एक गलत आदमी को प्रमोशन दे दिया। इंसान हैं न हम, भगवान थोड़े ही हैं कि गलती नहीं कर सकते। जब गलती नहीं कर सकते, तो शादी के लिए भी आप जिसको चुनते हो उसमें भी गलती हो सकती है। और अगर वो गलती हो गई है तो उसका सुधार करो।

सुधार पहले तो ऐसे किया जाता है कि बातचीत करी, रिश्ता बचाने की कोशिश करी, वो भी सुधार का ही एक तरीका है। लेकिन अगर वो तरीका नहीं चलता तो आवश्यक नहीं है कि एक-दूसरे के साथ बंधे रहकर यंत्रणा भोगो जीवनभर।

प्रश्नकर्ता: तब अलग रहना ही सही रहेगा, ऐसा आपका मानना है?

आचार्य प्रशांत: देखिए, मैं आपको एक आँकड़ा बताता हूँ। मेंटल डिज़ीज़ (मानसिक रोग) जो है दुनिया में, अगर आप थोड़ा सा रिसर्च करेंगे तो आपको पता चलेगा कि दिमागी बीमारी का दुनिया में सबसे बड़ा कारण विवाह है, ये जो बेमेल रिश्ते हैं। ये सिर्फ़ हँसने की बात नहीं है, ये यथार्थ है, ये फ़ैक्ट है।

आप जाएँ अगर किसी साईकोलॉजी (मनोविज्ञान) के ज्ञाता के पास या किसी साइकैट्रिस्ट (मनोचिकित्सक) के पास, तो आपको बताएगा कि ये जितना दिमाग का बिल्कुल ज्वालामुखी बनता है, उसका बहुत बड़ा कारण ये है कि आपको एक ऐसे व्यक्ति के साथ रहने पर विवश होना पड़ रहा है जिसके साथ आपका कोई मेल बैठ ही नहीं सकता।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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