प्रकृति ने इंसान को ऐसा बनाया नहीं है कि कोई भी दो व्यक्ति ताउम्र एकसाथ चल सकें। पहले रिश्ता चल जाता था, क्योंकि बहुत तरीके के डर होते थे। अब लोगों को हक आ गया है कि वो अलग हो सकते हैं, और जब लोगों को अधिकार रहेगा कि वो अलग हो सकते हैं, तो अलग होंगे। मैं नहीं कह रहा हूँ कि जितने लोग हैं, सब अपने रिश्ते तोड़ लें। गलती हो गई है तो उसका सुधार करो। सुधार पहले तो ऐसे किया जाता है कि बातचीत की, रिश्ता बचाने की कोशिश की, लेकिन अगर वो तरीका नहीं चलता, तो आवश्यक नहीं है कि एक-दूसरे के साथ बंधे रहकर यंत्रणा भोगो जीवनभर।
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प्रश्नकर्ता: सर, एक ज़माना था जब बिना देखे शादी हो जाया करती थी और बुढ़ापे तक टिकाऊ रहती थी। आजकल लोग लिव-इन (बिना शादी के दो वयस्कों का साथ रहना) में भी रहते हैं, घूमते भी हैं और फिर शादी के कुछ वक्त के बाद डाइवोर्स ले लेते हैं। तो ये डाइवोर्स केस क्यों बढ़ते जा रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: देखिए, बढ़ते इसलिए जा रहे हैं, अब बात हो सकता है आपको बहुत प्यारी न लगे, पर आपने इसलिए तो नहीं पूछा कि मैं आपको कुछ दबा, छुपा, ढका हुआ ज़वाब दे दूँ, तो खुली बात बोलता हूँ। बढ़ते इसलिए जा रहे हैं क्योंकि प्रकृति ने इंसान को ऐसा बनाया नहीं है कि कोई भी दो व्यक्ति ताउम्र एकसाथ चल सकें, चाहे वो दो बच्चे हों, चाहे दो पुरुष हों, दो स्त्रियाँ हों, या फिर स्त्री और पुरुष हो। तो ऐसा कोई प्रकृति में न बंधन है, न व्यवस्था है कि दो लोगों को साथ हमेशा चलना ही है। ठीक है?
पहले चल जाता था, क्योंकि बहुत तरीके के डर होते थे। हो तो ये भी जाता है कि आप किसी को उम्रकैद की सज़ा दे दें तो वो जीवनभर जेल में चल जाए, उसको आप ये थोड़े ही कहेंगे कि बहुत प्यार की बात है।




