
प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं

प्रश्नकर्ता: मेरा शरीर यादों से भरा हुआ है। यहाँ तक कि मैं अपने बालों के रंग, अपनी आँखों के रंग को भी स्मृति ही कहूँगा। और ये स्मृतियाँ मुझे पुरानी पीढ़ियों से मिली हैं क़रीब-क़रीब विरासत के तौर पर।

आचार्य प्रशांत: अगर हमारे बीच वास्तव में कोई रिश्ता है तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा कि आप वैसे ही कोई ज़िन्दगी जी रहे हो जैसे कोई आम आदमी जीता है। मुझे अपनेआप पर और अपनी बात पर घिन आएगी। आप अगर कहते हो आप दो साल से मेरे साथ


n some sense, spirituality is all about unleashing yourself, which is freedom from bondage. The leash is the bondage. Read more....

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि हमारे सामने जब कोई परिस्थिति आती है तो हम उसके तथ्य को देखने के बजाय, उसे उसके अतीत से जोड़कर देखते हैं। इसका कारण क्या है? जैसे कि कभी हम कोई लड़ाई हार जाते हैं तो आगे की लड़ाइयों में संशय और



आचार्य प्रशांत: खिंचाव है, आकर्षण है, किधर को जाने की इच्छा, बदल जाने का मन; कुछ अनजाना, कुछ नया पा लेने की अभीप्सा। कोई ऐसा है जिसको ये न होता हो? कोई ऐसा है जो किधर को खिंचता न हो? कोई है जिसको कुछ-न-कुछ आकर्षित न करता हो? सब हैं

मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है लेकिन स्वभाव में जीना है या नहीं जीना — ये तुम्हारा चुनाव है। आवश्यक नहीं है कि सब मुक्ति को चुनें। मुक्ति स्वभाव है इसीलिए सदा उपलब्ध है पर तुम उसको चुनोगे ही, ये कोई आवश्यक नहीं है। तुम कुछ और भी चुन सकते हो। ये इंसान पैदा होने की विडंबना है। जो इंसान पैदा हुआ है उसको दुर्भाग्यवश ये विकल्प मिला हुआ है कि स्वभाव में चाहे तो जिए और न चाहे तो न जिए।







प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज़ाद मन को पुन: कैसे प्राप्त करूँ? यदि मेरा आनन्द खो गया है, तो पुनः उस आनन्द को कैसे प्राप्त करूँ?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने कहा था कि किसी को बचाने से पहले ख़ुद पहले योग्यता अर्जित करो। तो विवाह के लिए क्या योग्यता अर्जित करें और कब माने कि कोई विवाह के योग्य भी है।

प्रश्नकर्ता: आपकी वीडियो देखती हूँ मैं हमेशा। और आपने बहुत लोगों को इस राह पर लगाया है, सत्य की राह पर। मैं भी बहुत महीनों से आपको सुन रही हूँ। और ऐसे जीवन को देखने लगी हूँ अभी। विवेक थोड़ा-थोड़ा जाग्रत होने लगा है, क्या सत्य है, क्या असत्य है।




प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो मौन और आनन्द के क्षण रहते हैं, उनमें भी भय बना रहता है। ये क्या है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जीवन में आनन्द की परिभाषा हर रोज़ बदलती रहती है, हर पल भी बदलती रहती है। कई गुरु आये और चले गये, ऐसा क्यों कि किसी को भी मृत्यु से पहले परमानन्द नहीं मिल पाता? क्या परमात्मा ऐसा नहीं चाहता? या हमारे भ्रम हैं? बहुत ही




Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…
तो हम इन मेमोरीज़ को, स्मृतियों को फॉरमैट कैसे कर सकते…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न विज्ञान से सम्बन्धित है। तो काफ़ी समय से वैज्ञानिक समुदाय और प्रकृति में एक तरीक़े का एक तकरार चल रहा है और काफ़ी हद तक विज्ञान सफल भी हुआ है, कोविड वैक्सीन का उन्होंने निर्माण किया और शायद प्रकृति की जो योजना थी उसको…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न मेरे वैवाहिक जीवन से है। किसी भी अन्य रिश्ते में मुझे अभिव्यक्ति करना सरल लगता है पर अपनी बातें अपनी पत्नी तक पहुँचाना बहुत ही कठिन लगता है। यह रिश्ता इतना गहरा है फिर इतनी मुश्किल क्यों?
आचार्य प्रशांत: अब तुम्हें यहाँ पर एक…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ और आपकी अनुकम्पा से ग्रन्थ भी पढ़ने शुरू किये हैं तो अभी प्रतिदिन कुछ नया सीखने को मिलता है, मन बिलकुल लगा रहता है और जैसा पहले चला करता था, उससे बिलकुल बदल गया है जीवन।…
आचार्य प्रशांत: कंडिशनिंग से अहम् का निर्माण नहीं है, कंडिशनिंग से…
प्रश्नकर्ता: अब मेरा रोज़ का देखना होता है कि मेरे पीछे कोई बल है, कोई फोर्स है जो मुझे संचालित करता है। जैसे मैं सुबह उठा और मैं ऑफ़िस की तरफ़ चल दिया। बैग लिया और चल दिया। तो एक डर है पीछे जो मुझे उधर जाने के लिए विवश…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारतीय दर्शन में वेदों के आधार पर आस्तिक और नास्तिक का विभाजन किया गया। उसमें बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन को नास्तिक बोल दिया गया; जिसमें से मुख्यत: बौद्ध और जैन धर्म ने वेदों की सत्ता को माना नहीं, इस वजह से उसमें वर्गीकरण किया गया।
तो…
Questioner: Why think so much about decisions? Shouldn’t our decisions be spontaneous? I like to decide in a free flow.
Acharya Prashant: So the questioner is stressing on the spontaneity of decisions. He says that he likes to decide in a flow. It's a good thing, your intention is good.…
प्रश्नकर्ता: जो अद्वैत बोधस्थल में आप लोग बंधनों की बात करते हैं और उनके सॉल्यूशंस (समाधान) की बात करते हैं…
आचार्य प्रशांत: बंधनों की बेटा, बात नहीं करनी पड़ती। बंधन में तो सब हैं ही न! तो जो यथार्थ है उसकी बात होती है। यथार्थ ऐसा नहीं है कि अलग…
आचार्य प्रशांत: वह तो आप पर निर्भर करता है न। अगर बिलकुल खरी बात पूछेंगे तो जीवन को किसी लक्ष्य कि ज़रूरत ही नहीं है। पर वह इतनी…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ ख़ास दिन जैसे नवदुर्गा के नौ दिनों में सब द सेक्रेड फेमिनिन (पवित्र स्त्रीत्व) वगैरह की बहुत बातें करते हैं। हर जगह स्त्री शक्ति का ही ज़ोर रहता है। पंडालों में भी देवी और अखबारों में भी नारी का, स्त्री का महिमामंडन रहता है और तब…
आचार्य प्रशांत: नहीं, तो उनसे आप…
Questioner: You have said that individual liberation is not possible: that either we go together, or nobody can go. So, we have to help others to cross over. But I can’t help even the people close to me; they are caught up in routine work or indulge in entertainment; no…
करीब-करीब हर कोई बंधन में है और मुक्ति चाह रहा है; बंधनों से मुक्ति चाह रहा है न और कई बार कुछ बंधनों से मुक्ति मिल भी जाएगी, इसीलिए तो आपका अपने पुरुषार्थ पर इतना भरोसा है। इंसान ने अपने ऊपर के कई बंधनों पर फ़तह हासिल की भी है, तो उसका भरोसा कायम रहता है उसे लगता है कि कुछ बंधन तो पीछे छोड़ ही दिये, तोड़ ही दिये और भी छोड़े जा सकते हैं। वो ये नहीं देख पाता कि पुराने को छोड़कर जो नये बंधन वो धारण कर लेता है वो और कुछ नहीं है पुरानों का ही एक नया रूप है और वो होना ही था क्योंकि बंधन बने रहें इसकी प्यास हममें है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपने पढ़ने के लिए एक किताब सुझाई था जिसका नाम था ‘लस्ट फ़ॉर लाइफ़’ बाय इरविन स्टोन, जो कि विन्सेंट वैन गॉग जी की बायोग्राफ़ी थी। सर, उन्होंने जो संघर्ष किया अपनी पूरी ज़िन्दगी में और वो बहुत कम आयु पर ही चले गये थे। क्या उनका…
आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिस व्यवसाय में हूँ, मैं जानता हूँ कि इस व्यवसाय में छलकपट, झूठ बड़ी आम बात है। परंतु ये जानने के बावज़ूद भी जो बेहतर से बेहतर मैं कर पा रहा हूँ वो ये है कि मैं इस काम को पूरी ईमानदारी से कर रहा हूँ।…
आचार्य जी: खोता नहीं है। अगर होता है, नहीं खोता है। अगर खोया है तो खोने लायक़ ही था, असली नहीं था। आने-जाने वाली चीज़ थोड़े…
आचार्य प्रशांत:देखो, अभी- अभी हमने बात करी कि जीवन में कोई भी निर्णय करना…
प्रश्नकर्ता: “अहिंसा परमो धर्म:।” श्लोक के इस अंश में एक तरफ़ तो भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा परमो धर्म:” और दूसरी तरफ़ वो गीता का ही इस्तेमाल कर रहे हैं, अर्जुन से हिंसा करवाने के लिए। तो ये बात तो सरासर गलत है। कृष्ण हिंसा करवा रहे हैं और…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमन। चेतना के विषय में सन्तों से शास्त्रों में बहुत सुना है, दर्शनशास्त्रियों ने भी इस मुद्दे पर बहुत गहन चर्चाएँ करी हैं, किताबें लिखी हैं। कभी चेतना को न्यूरोसाइंस (तन्त्रिका विज्ञान) से तो कभी फिज़िकल साइंस (भौतिक विज्ञान) से जोड़कर देखा जाता है, और कभी ये…
आचार्य प्रशांत: लड़की-लड़का साथ रहेंगे, तो उसमें एक सेक्सुअल डायमैन्शन (यौन आयाम) हमेशा रहेगा। इस बात को न नकारने से कोई फ़ायदा है, न इस बात का विरोध करने की कोई ज़रूरत है। ठीक है?
हाँ, अब आपको क्या करना है, आपको याद रखना है कि आप कौन हो, आप…
आचार्य प्रशांत: जिसने बोझ उठा रखा हो, उसके लिए एकमात्र कर्तव्य क्या है? बोझ उतार दे। जिसने कोयला पकड़ रखा है जलता हुआ, उसके लिए करणीय क्या है? कोयला छोड़ दे।…
आचार्य प्रशान्त: वो आनन्द का क्षण है ही नहीं।
प्र: ऊपर से ऐसा लगता है कि आनन्द-ही-आनन्द है।
आचार्य: आनन्द की किसी कृत्रिम परिभाषा से, उन क्षणों का मिलान हो…
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग। ~ जपुजी साहिब (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: फ़्री विल (मुक्त इच्छा) भी एब्सोल्यूट्ली फ़्री (पूर्णत: मुक्त) है। आपकी जो फ़्री विल है, वो भी इस मामले में तो बाउन्डेड (सीमित) है ही कि वो आपकी नहीं है। जो आपकी इच्छा है वो तो…
आचार्य प्रशांत: इस दुनिया में मज़े मारने नहीं आते हैं आप, लुटने आते हो। ये जगत है ही इसीलिए कि हमको मूर्ख बना-बनाकर हमें लूटता जाए। एक-एक चीज़, एक-एक व्यवस्था, आप जिसमें शामिल हैं, आप अगर देख पायें तो दिखेगा कि कैसे उसमें आपका शोषण होता है। एक अस्पताल में…
प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी प्रणाम। गीता आदि ग्रन्थों को दूर से ही पढ़ने का मन करता है, क़रीब से पढ़ने पर शान्ति की जगह अशान्ति मिलती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार का मूल कृष्ण ही है। कबीर साहब भी कहते हैं:-
कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूँढे वन माही। घटघट…
Questioner: Namaskar Acharya Ji. You talked of Mukti. So, I would like to know, is it a Mukti from life and birth? I mean, more, If you can elaborate?
Acharya Prashant: Mukti from internal compulsions. The goal of life can be talked of as Mukti which is Liberation, which is…
‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।