
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। महिला आरक्षण बिल पर अभी संसद में चर्चा चल रही है। तो मैं सोच रहा था, एक ओर तो हमारा समाज है, हमारी व्यवस्था है, हमारी संस्कृति है, और इसी संस्कृति के कुछ प्रचलित गुरु लोग हैं। अगर हम इन गुरु लोगों को इस संस्कृति का प्रतिनिधि मानें, तो पिछले एक साल में, खासकर उत्तर भारत में, लगातार हम इनकी ओर से महिलाओं के प्रति पिछड़ी और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ सुनते आए हैं।
तो यही व्यवस्था है, जो एक तरफ़ इस तरह की टिप्पणियाँ करती है, और यही व्यवस्था, यही समाज, यही संस्कृति महिला आरक्षण की भी बात कर रही है और उसका समर्थन भी करती हुई दिख रही है। तो समझ नहीं आ रहा मुझे, ये बात मैं इसे समझना चाहूँगा आपसे, आप इस पर क्या कहना चाहेंगे?
आचार्य प्रशांत: नहीं, तुम्हें विरोधाभास दिख रहा है तुम इसलिए उलझ रहे हो। विरोधाभास है नहीं। देखो, 12–15% लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व रहता है, और ये वो हैं जो चुनकर आ पाती हैं। और टिकट भी जो बड़ी पार्टियाँ हैं, वे इसी अनुपात में देती हैं, 12, 13, 15% इसी रेंज में। बल्कि, जो वर्तमान लोकसभा है, इसमें तो पिछली लोकसभा से कम महिलाएँ हैं। अब क्या होने वाला है? अब अचानक से ये जो 60–70 महिलाएँ रहती आई हैं लोकसभा में आमतौर पर, इनकी संख्या हो जानी है लगभग 180।
प्रश्नकर्ता: नंबर बढ़ाने की बात चल रही है सीटों में।
आचार्य प्रशांत: मैं भी मान रहा हूँ कि 545 ही है, 545 भी है, तो 180 हो जानी है। रहती कितनी हैं आमतौर पर? 60–70। अब वो हो जानी हैं 180। तो बाक़ी ये जो 100 से ऊपर महिलाएँ हैं, ये कहाँ से आएँगी लोकसभा में? कहाँ से आएँगी?
*प्रश्नकर्ता: *अचानक से तो नहीं पैदा होंगी।
आचार्य प्रशांत: चलो, मैं तुम्हें एक हिंट देता हूँ। जो पुरुष एमपी होते हैं, उनमें बस 25% ऐसे होते हैं, जिनको आप किसी डायनेस्टिक लीनिएज से आया हुआ बोल सकते हैं, जिन्हें आप वंशवाद या परिवारवाद का परिणाम बोल सकते हो। ठीक है? ये पुरुष एमपी है और ये अभी लोकसभा में इसलिए मौजूद है क्योंकि इसके पिता, इसके ताऊ, या कोई और पहले से ही नेता हैं, या पार्टी में हैं, या एमपी हैं, वग़ैरह-वग़ैरह कुछ। तो पुरुषों में वो अनुपात रहता है 25% का, महिलाओं में वो अनुपात रहता है लगभग 50% का। जो महिला एमपी हैं, जो चुनकर आती हैं, वो लगभग 50%, माने, लगभग आधी ऐसी होती हैं, जो किसी राजनीतिक परिवार से ही उठकर आ रही होती हैं। वो किसी राजनीतिक परिवार की पत्नी, बेटी, बहू वग़ैरह हैं। ठीक है? तो ये मैंने तुम्हें *हिंट दे दिया।
अब बताओ कि अगर ये 33% आरक्षण हो गया, तो ये जो 100 से ऊपर अतिरिक्त महिलाएँ अब पहुँचेंगी संसद में, लोकसभा में विशेषकर, तो ये कहाँ से आएँगी?
प्रश्नकर्ता: यही अनुपात और बढ़ेगा, इन्हीं फ़ैमिलीज़ से आएँगी।
आचार्य प्रशांत: इन्हीं फ़ैमिलीज़ से आएँगी। तो ये जो इन फ़ैमिली से आ रही हैं, ये कोई महिला सशक्तिकरण की मिसाल तो है नहीं। ये तो बल्कि जो पुराना पारंपरिक ढाँचा रहा है, पितृसत्तात्मक, ये तो उसी का उदाहरण भी है और उसी को आगे बढ़ाने का काम भी करने वाली हैं। तो यही लोग हैं, जो और पहुँचेंगे। तुम्हें विरोधाभास ये दिख रहा था कि एक ओर तो ये व्यवस्था है, और संस्कृति है, और सत्ता है, ये तमाम तरीकों से महिलाओं को दबाने का काम करती है। ठीक है? यही कहा न तुमने? और तुमने उसके पक्ष में उदाहरण दिया, ये सब जो गुरु लोग हैं, कि देखो, यही संस्कृति, यही व्यवस्था इन गुरुओं का प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से इतना समर्थन करती रहती है, और गुरु लोग अभद्र टिप्पणियाँ करते रहते हैं महिलाओं के ऊपर, और पिछड़ी बातें करते रहते हैं महिलाओं को लेकर।
तो एक ओर तो व्यवस्था इन गुरुओं को प्रोत्साहित करती है और गुरुओं को नमन करती है, और गुरु महिलाओं को लेकर के पिछड़ी बातें करते हैं। और दूसरी ओर, तुमने ये देखा कि यही व्यवस्था है, जो अब ये आरक्षण का विधेयक लेकर आ रही है, और समाज उसका समर्थन कर रहा है, और इतनी आवाज़ें उठ रही हैं, जो कह रही हैं, हाँ, ये अच्छा काम हो रहा है। तो तुम्हें इसमें कंट्राडिक्शन नज़र आया। वहीं से तुम्हारा ये सवाल उठ रहा है कि भाई, ये कैसे हो सकता है? कि ये व्यवस्था, अगर वास्तव में महिलाओं की पक्षधर होती, तो महिलाओं को लेकर इतनी पिछड़ी बातें क्यों करती? लेकिन अब देखो, ये तो रिज़र्वेशन भी लेकर आ रहे हैं।
इसमें कोई कंट्राडिक्शन नहीं है, अच्छे से समझ लो ये। महिलाओं को बिल्कुल एक चेहरे की तरह मौजूद रखा जा सकता है संसद में, बिना किसी भी तरह के महिला सशक्तिकरण के। भाई, तुम्हें ‘सरपंच फ़िनॉमिना’ पता है न? कि जो सीटें पंचायतों में आरक्षित हो जाती हैं महिलाओं के लिए, तो वहाँ पर जो पुराने रसूखदार लोग होते हैं, वो अपनी बेटी, पत्नी, बहू, किसी को खड़ा कर देते हैं, वो सरपंच बन जाती है काग़ज़ी तौर पर, वास्तविक सरपंच तो पुरुष ही रहता है।
इसी तरीके से तुमको अभी मैंने आँकड़ा दिया कि 50% तो जो महिलाएँ संसद पहुँच रही हैं, वो पहुँची ही इसीलिए रही हैं क्योंकि उनको पुरुषों ने भेजा हुआ है। उनके पिता के कारण पहुँच रही हैं, उनके पति के कारण पहुँच रही हैं। और ये 50% का आँकड़ा पुरुषों में 25% ही है। वंशवाद वहाँ भी चलता है पर इतना तगड़ा नहीं चलता वहाँ पर। और यही सब जो पितृसत्तात्मक वंशवाद है, ये और बढ़ जाएगा इस रिज़र्वेशन के बाद। तो इसमें जो पुरानी परंपरा और व्यवस्था है, उसको किसी तरह की हानि नहीं होने वाली बल्कि वो तो और प्रसन्न हो जाएगी क्योंकि अब उसको ये कहने को भी मिल जाएगा कि देखो, हम तो कितने उदारवादी हैं और हम महिलाओं के पक्षधर हैं, हमने उनको 33% आरक्षण दिया। इतना ही नहीं, विदेशों में भी अब जाकर के डुगडुगी बजाई जा सकती है कि देखो, भारत में तो संसद में महिलाओं की 33% उपस्थिति है।
लेकिन वो महिलाएँ होंगी वही सब, जो कहीं से भी किसी तरह का कोई डिसरप्शन नहीं लाने वाली पुरानी व्यवस्था में। वो ताक़तवर बाहुबली पुरुषों की पत्नियाँ, बेटियाँ, बहुएँ होंगी जो यहाँ पर आ जाएँगी; या फिर कई बार सजावटी शोपीस, जैसे अभिनेत्रियाँ वग़ैरह उनको लाकर के संसद में रख दिया जाएगा। मैं सब प्रकार की कलाओं का सम्मान करता हूँ, अभिनेत्रियों का भी सम्मान करता हूँ, लेकिन अभिनेत्री और अभिनेत्री में भी अंतर होता है। एक अभिनेत्री होती है, जो संसद में इसलिए पहुँचती है क्योंकि उसके भीतर कोई वास्तविक इच्छा होती है समाज-कल्याण की, देश को आगे बढ़ाने की; और एक अभिनेत्री होती है जिसको संसद में सिर्फ़ इसलिए पहुँचाया जाता है क्योंकि वो कद-काठी से आकर्षक है और एक तरह का ग्लैमर पॉइंट है। ये सुनने में थोड़ी सी कड़वी लग सकती है बात, पर जो तथ्य है, उसको बोलना पड़ेगा।
तो यही सब है महिलाओं के नाम पर, इस प्रकार के ही एक झुंड को संसद पहुँचाया जा सकता है, और मुझे बड़ी आशंका है इसकी। और कहने को ये भी हो जाएगा कि देखो, अब भारत की संसद में इतनी महिलाएँ आ गई हैं। हम तो वास्तव में बड़े उदार लोग हैं, बड़े अच्छे लोग हैं। लेकिन वो सब महिलाएँ वो गड़बड़ वाली ही होंगी। सब नहीं, तो उनमें से 70–80%। मैं सब क्यों बोलूँ? अपवाद हमेशा होते हैं। भारतीय संसद में कुछ बहुत अच्छी महिलाएँ भी पहुँचती रही हैं, हमें उनका सम्मान करना चाहिए। मैं उनका सम्मान भी करता हूँ। लेकिन दो-चार, आठ-दस सशक्त और जागृत महिलाओं के संसद में पहुँचने से बात नहीं बनती है। हमें और ज़्यादा महिलाएँ चाहिए, जो नई हों, विद्रोही हों, ख़ुद ताक़तवर हों; पुरुषों की बैसाखियों पर चलकर के संसद में न पहुँची हों, हमें ऐसी महिलाएँ चाहिए। और वैसी महिलाएँ तब तक नहीं पहुँचेंगी, जब तक समाज वैसी महिलाओं को जन्म लेने ही नहीं देगा और पनपने ही नहीं देगा।
भाई, इसी मिट्टी से वो महिला उठनी है न, जो कुछ भी करेगी आगे जाकर के। अब ऊपर वहाँ आसमान में आपने संसद बैठाई है वो तो एक वर्टिकल डेस्टिनेशन है। आप कह रहे हो, मैं वहाँ पर बैठा देना चाहता हूँ 33% महिलाओं को। लेकिन वहाँ कैसे बैठा दोगे, जब वो ज़मीन से उठ ही नहीं रही हैं? एक पेड़ है, आप कह रहे हो, वहाँ 33% जो फल हैं वो स्त्री-फल लगने चाहिए। और उस पेड़ की जो जड़ें हैं, वहाँ आप काटे दे रहे हो।
ज़मीन से जब सशक्त महिला उठेगी ही नहीं, तो संसद में भी जो महिला पहुँचेगी, भले ही वो 33% आरक्षण हो, तो संसद में भी जो महिला पहुँचेगी, वो अशक्त ही होगी, दुर्बल ही होगी, पुरुषों पर आश्रित ही महिला होगी, जो वहाँ पर पहुँच जाएगी। उसको भी एक तरह की कृपा दिखाकर वहाँ पहुँचा दिया जाएगा। और ये जो कृपा है, ये तो पुरानी पितृसत्ता की पहचान है ही, कि महिला को हम बहुत कुछ दे सकते हैं, पर हम देंगे; हमारी कृपा से उसको मिलेगा। तो भाई, वो कोई पुरानी पार्टी कैडर थी, तो सीट भरने के लिए उसको टिकट दे दिया। आप देखो न, बड़े-बड़े नाम जो आज भी संसद में हैं, महिला नाम, उनमें आप ज़रा-सा याद करोगे, और दिख जाएगा। तो ये तो सब वही हैं, पत्नियाँ, बेटियाँ ही हैं जो वहाँ पर हैं। तो वो तो पुरुषों का ही वर्चस्व है जो अभी आगे बढ़ाया जा रहा है स्त्रियों के माध्यम से। है न?
वास्तविक बदलाव वहाँ आ ही नहीं सकता। वास्तविक बदलाव ऊपर नहीं आ सकता आरक्षण देने से। यद्यपि मैं बहुत खुश होऊँगा, 33% क्या, वहाँ पर 40%, 50%, 60% हो जाएँ महिलाएँ। 60% से याद आया, रोहंडा, वहाँ 60% से ज़्यादा हैं महिलाएँ संसद में। लेकिन फिर भी वो देश महिलाओं के प्रति अपराध के मामले में बहुत पिछड़ा हुआ देश है। तो वहाँ ऊपर महिलाओं को बैठा देने से कुछ नहीं होता। वास्तविक बात ये है कि यहाँ ज़मीन से, हमारे घरों से, हमारे मोहल्लों से, हमारे परिवारों से ऐसी लड़कियाँ हम पैदा तो होने दें, उभरने तो दें, निकलने तो दें, जो इस लायक हों कि अपने बूते पर दुनिया में, ज़िंदगी में, समाज में, संसद में कुछ करके दिखाएँ। और वैसी बेटियाँ हम ज़मीन से उठने नहीं दे रहे हैं।
अब वहाँ परंपरा, संस्कृति और गुरु लोग आ जाते हैं, क्योंकि उनकी पहुँच सीधे घर के अंदर तक होती है। तो घरों से तो आप पैदा कर रहे हो बिल्कुल शांत, आज्ञाकारिणी, सुशील कन्याएँ। ये क्या चुनाव लड़ पाएँगी? ये क्या अपने बूते पर समाज की कुरीतियों से, और दमनकारी पुरुषों से, और दमनकारी स्त्रियों से भी, क्या ये लोहा ले पाएँगी अपने दम पर?
जब आप उनको कह रहे हो कि तुम्हें बाहर नहीं निकलना, तुम्हें ये नहीं करना, तुम्हें वो नहीं करना; तुम्हारी अपनी कोई आवाज़ नहीं, तुम्हारी अपनी कोई पहचान नहीं; तुम्हारे जीवन के सारे निर्णय तुम्हारा परिवार लेगा, तुम कहाँ पढ़ोगी, कहाँ जाओगी, क्या पहनोगी, किससे विवाह करोगी, ये तुम्हारे सारे निर्णय कोई और लेगा। इस तरह की लड़कियाँ तो आप समाज से चाह रहे हो कि पैदा हों। और इसी को फिर आप कहते हो कि हमारी संस्कृति की महानता है कि लड़की तो दबी हुई ही रहे। कभी वो पिता पर आश्रित रहे, कभी पति पर आश्रित रहे, कभी पुत्र पर आश्रित रहे, इसको आप कहते हो, “ये हमारी संस्कृति की महानता है।”
ऐसी लड़कियाँ तो आप ज़मीन से पैदा कर रहे हो, और आपने अब ये व्यवस्था कर दी कि संसद में 33% महिलाएँ होंगी। तो ये तो विचारणीय है फिर कि जब ज़मीन से ऐसी महिलाएँ उठेंगी ही नहीं, तो संसद में वो 33% पहुँच कौन रही हैं? वो कोई नहीं पहुँच रही हैं, वो पुरुषों द्वारा ही नॉमिनेटेड, पुरुषों द्वारा ही तैनात महिलाएँ हैं जो वहाँ पहुँच जाएँगी, जिनको पुरुषों ने ही नियुक्त कर दिया है कि तुम वहाँ जाकर के अब बैठ जाओ।
तो दिखाई ऐसा देगा कि महिला बैठी हुई है, पर वो महिला कुछ नहीं होगी वो कठपुतली होगी, और उस कठपुतली की डोर पुरुषों के ही हाथ में होगी या पुरानी परंपरा के ही हाथ में होगी। हाँ, जब वो वहाँ बैठ जाएगी, तो नज़ारा अच्छा लगेगा; ऑप्टिक्स अच्छी हो जाएँगी। देखने में ऐसा लगेगा कि देखो, इतनी सारी महिलाएँ वहाँ संसद में पहुँच गईं, पर वो महिलाएँ अपने आप में जागृत महिलाएँ नहीं होंगी। वो अपने आप में ऐसी नहीं होंगी कि जिनको आप कह सको कि वो किसी भी पुराने ढाँचे को गिराकर एक नई, ताज़ी खुशबू लाने में यक़ीन रखती हैं।
प्रश्नकर्ता: जो महिलाओं के वास्तविक मुद्दे होते हैं, उस पर जो अभी भी महिला एमपीज़ हैं, उनका जो रवैया रहता है वो ऐसा कुछ नहीं रहता, समर्थन ही नहीं करतीं। पहले तो उठती नहीं हैं। इस तरह के मुद्दे हैं।
आचार्य प्रशांत: देखो, एक स्वतंत्र महिला को भारतीय व्यवस्था स्वीकार ही नहीं करेगी, न समाज स्वीकार करता है, न परिवार स्वीकार करता है; और ये जो राजनीतिक दल हैं, ये तो कतई स्वीकार नहीं करेंगे। एक आत्मनिर्भर, जागरूक, स्वतंत्र महिला के लिए संसद पहुँचना ही बड़ा मुश्किल है। और दूसरी ओर, ऐसी महिला हो जो ख़ुद ही पुरुषों से दबकर रहती हो, पुरुष सत्ता के सामने झुककर रहती हो, उसको पुरस्कार के तौर पर सांसद बना देगी पुरुष सत्ता। उसको पुरस्कार दिया जा रहा है कि तुम हमारे सामने झुककर रहती हो, तो पुरस्कार के तौर पर आओ तुमको एमपी बना देते हैं।
मैं नहीं कह रहा हूँ कि सारी जो विमेन एमपीज़ हैं, वो ऐसी होती हैं, बिल्कुल ऐसा नहीं कह रहा हूँ। लेकिन उनका एक बड़ा अनुपात ऐसा होता आया है, और वो अनुपात इस आरक्षण के बाद और बढ़ जाएगा, यही देश को लेकर के मेरी आशंका है।
प्रश्नकर्ता: तो वास्तविक चर्चा भी संसद में यदि कोई…
आचार्य प्रशांत: देखो, संसद में तो सशक्त महिला अपने आप पहुँच जाएगी न, अगर पहले समाज में सशक्त महिला हो। अगर समाज में और सड़क पर जो महिला है, वो अगर सशक्त हो, तो संसद की तो महिलाएँ अपने आप सशक्त हो जाएँगी, आरक्षण की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।
अब हम कर क्या रहे हैं? हम कह रहे हैं, मैं उसे घर में, परिवार में, समाज में और सड़क पर सशक्त होने नहीं दूँगा लेकिन एक डेकोरेटिव आइटम की तरह संसद में 33% कर दूँगा। ये बात तो कुछ जमी नहीं; ये बात तो बेईमानी की हो गई। और इतना ही नहीं है, जब आप ये 33% कर दोगे, तो इतने लोग तालियाँ बजाने लग जाएँगे, ख़ुद महिलाएँ ताली बजाना शुरू कर देंगी। महिलाओं को लगेगा, देखो, हमारे लिए कितना अच्छा काम किया जा रहा है, हमें वहाँ 33% आरक्षण दे दिया गया है। पर उस 33% में वहाँ पहुँचेंगी कौन, तुम ये तो देखो। कोई बुलंद आवाज़ हो, क्या वो ख़ुद वहाँ पहुँच पाएगी? उसको घर में ही बुलंदी से बोलने नहीं दिया जाता।
और अब एक नया टूल भी आ गया है, महिला की आवाज़ को बिल्कुल ज़मीन पर ही रोक देने के लिए, दम घोंट दो। वो कुछ बोले पुरानी दमनकारी व्यवस्था के ख़िलाफ़ तो उसको बोल दो, ये तो पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित है। ये तो वेस्टर्नाइज़्ड है, या एक और कि एंटी-हिंदू है, एंटी-नेशनल है। घर में ही वो चुनाव नहीं कर सकती। उसका सबऑर्डिनेशन हो रहा है। उसके पास प्रोडक्टिव चॉइस नहीं है।
घर के ही जो कामकाज हैं, उसमें उसकी आवाज़ नहीं है। पर अगर वो किसी तरीके से अपनी आवाज़ उठाना शुरू करे, मान लो जाकर सोशल मीडिया पर कुछ लिख दे, तो तमाम उसके नीचे कमेंट आ जाएँगे कि ये तो पश्चिमी संस्कृति का कुप्रभाव पड़ रहा है। देखो, हमारी बेटियों पर वो कैसे आकर के यहाँ पर बोल रही हैं। और फिर कुछ और आ जाएँगे, वो कह देंगे कि ये तो हिंदू-विरोधी बात चल रही है यहाँ पर। और वो जो पूरा माहौल तैयार किया जाता है, वो इसी व्यवस्था द्वारा तैयार किया जाता है।
वही एक ही व्यवस्था है, एक ही केंद्र है, एक ही ताक़त है, एक ही सत्ता है, जो घर के भीतर महिलाओं का दमन करना चाहती है, पर एक डेकोरेटिव आइटम की तरह उनको संसद में 33% की संख्या में रखना चाहती है। ये बात कुछ जमी नहीं।
वास्तविक सशक्तिकरण इसमें है कि वो पढ़ पाए, बिना डर के जी पाएँ, जागरूक रहकर अपने निर्णय स्वयं ले पाएँ। कोई उनका भाग्य-विधाता न बने।
कोई निर्धारण करने के लिए न बैठा हो कि हम बताएँगे कि तुम्हें कैसे जीना है। खेलों में, विज्ञान में, शिक्षा में लगातार नज़र रखी जाए कि आगे बढ़ पा रही हैं या नहीं बढ़ पा रही हैं। अपने बूते खेल पा रही है कि नहीं। उनकी जीत की राह में क्या बाधाएँ आ रही हैं।
शिक्षा सबसे बड़ी चीज़ है। शिक्षित हो गई एक बार महिला, तो उसके बाद ज़रूरत ही नहीं पड़ती कि कोई और आकर सहारा दे। फिर कोई और होता कौन है उसके जीवन में हस्तक्षेप करने वाला। उसके पास शिक्षा है, वो अपनी ज़िंदगी खुद देख लेगी। शिक्षा तो छोड़ो, हम तो उसे जन्म लेने का भी अधिकार नहीं देते हैं, वो जन्म भी कहाँ पाती है। हम जानते हैं भ्रूण-हत्या की दर। अभी अब census होगा, आँकड़े आएँगे कि भारत में कितनी करोड़ महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा ग़ायब हैं। तीन करोड़ भी हो सकती हैं, पाँच करोड़ भी हो सकती हैं। भारत में पुरुषों और महिलाओं की संख्या में जो अंतर है वो देख लेना अभी जब जन गणना के आँकड़े आएँगे। नहीं तो 2011 के तो उपलब्ध हैं, उनको ही देख लो।
ज़मीन से उठेगी तब न आसमान तक पहुँचेगी। ज़मीन से उसको उठने नहीं दे रहे, और आसमान पर उसको आरक्षण दे रहे हो, ये कौन-सी बात है?
संसद में भी जाकर बैठना काम ही है, फुल-टाइम काम है। एफएलपीआर जानते ही हो, फ़ीमेल लेबर पार्टिसिपेशन रेट, * वो भारत में लगातार गिर रहा है। वर्कप्लेस पर महिलाओं का अनुपात आज उतना भी नहीं, जितना आज पच्चीस साल पहले हुआ करता था। तो तुमको ये विडंबना नहीं दिखाई दे रही है, ये कंट्राडिक्शन, ये त्रासदी नहीं दिखाई दे रही है कि यही वही समाज है जो महिलाओं को घर से बाहर निकलकर काम भी नहीं करने दे रहा। हम पच्चीस साल पहले भी महिलाओं के प्रति जितने उदार हुआ करते थे, हम आज उससे भी कम उदार हो गए हैं। और दूसरी ओर हम कह रहे हैं कि हम महिलाओं को, ये दूसरी वर्कप्लेस जिसका नाम पार्लियामेंट है, वहाँ उनको आरक्षण दे रहे हैं।
माँ-बाप, आज का जो माँ-बाप है, वो पच्चीस साल पहले के माँ-बाप यानी पिछली पीढ़ी की तुलना में कम उत्सुक हैं कि उनकी लड़की कहीं काम करे। वो कह रहे हैं, कहीं बहू बन जाए किसी बड़े घर की, किसी अच्छे घर की। तो एक ओर तुम चाह नहीं रहे कि तुम्हारी लड़की कहीं जाकर काम करे, और दूसरी ओर तुम कह रहे हो कि मैं पार्लियामेंट में उसको रिज़र्वेशन दे रहा हूँ, वो वहाँ पर जाकर के काम करे। निश्चित रूप से इसमें कुछ-न-कुछ पाखंड चल ही रहा है।
इसमें कुछ होने वाला नहीं है, नेपोटिज़्म को ही और बढ़ावा मिलने वाला है। वो जो 67% पुरुष बैठे होंगे, उन्हीं से संबंधित वो 33% महिलाएँ बैठी होंगी, कुछ अपवादों को छोड़कर। और नज़ारा बस ऐसा हो जाएगा, कि वाह! ऐसा लगेगा कि देखो, हम कितने विकसित हो गए हैं, और हम कितने उदारवादी हो गए हैं, कितने प्रगतिशील हो गए हैं। भीतर हमारे महिलाओं के लिए कितनी समता और सम्मान है, ये देखो, इतनी महिलाएँ दिखाई दे रही हैं।
देखो, तुम महिला होकर भी महिला-विरोधी हो सकते हो, ये बात समझना। इतना ही नहीं है कि तुम महिला होकर महिला-विरोधी हो सकते हो, तुम फेमिनिस्ट होकर भी मिसोजिनिस्ट हो सकते हो। ये अच्छे से समझ लो। वास्तविक महिला सशक्तिकरण बिल्कुल अलग बात है, वो दूसरी बात है बिल्कुल। उसके लिए बहुत भीतर तक पहुँचना पड़ता है और देखना पड़ता है कि इस महिला को भीतरी तौर पर रोगी और दुर्बल बना किसने दिया। वो काम न तो संसद में आरक्षण से होता है और न फेमिनिज़्म जैसी किसी विचारधारा से होता है। विचारधाराएँ बहुत बाहरी चीज़ होती हैं, वो मनुष्य के उस भीतरी केंद्र तक पहुँच ही नहीं पातीं, जहाँ उसका सबसे गहरा ज़ख्म है। हर महिला ज़ख्मी है और उसको पता भी नहीं है कि वो कितना बड़ा ज़ख्म अपने भीतर लेकर के जी रही है।
आप बाहर-बाहर से चीज़ें करना चाहते हो, महिला के ज़ख्म बाहरी उतने नहीं रहे, हैं अभी भी बहुत बाहरी ज़ख्म हैं और उनका इलाज भी होना चाहिए, बिल्कुल। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, जो महिला का ज़ख्म है, वो भीतर है। वो सब बातें जो समाज उसके बारे में कहता था, वो नज़र जिससे पुरुष उसको देखता था, वो बातें और वो नज़र महिला के भीतर अब घुसकर बैठ गई है, और वहीं से उसको खाए जा रही है। इलाज वहाँ होना चाहिए। मुझे आरक्षण से कोई समस्या नहीं है आरक्षण बहुत अच्छी बात है, लेकिन आरक्षण और बाकी बहुत सारी बातें, अगर आँखों में धूल झोंकने जैसी हो जाएँ; अपनी आँखों में धूल झोंकने जैसी तो फिर बेईमानी हो जाती है, और घातक बेईमानी हो जाती है देश के साथ, महिला ही नहीं, पुरुष के साथ भी, सबके साथ गड़बड़ हो जाती है।
प्रश्नकर्ता: तो सत्ता और राजनीतिक पार्टियाँ फिर महिला आरक्षण की बात बार-बार ले क्यों आती हैं? उनको क्या मिल रहा है?
आचार्य प्रशांत: वोट। कोई भी राजनीतिक पार्टी और क्या चाहती है, वोट। देखो, कोई भी राजनीतिक पार्टी हो, यहाँ से लेकर वहाँ तक, और हिंदुस्तान से लेकर अमेरिका तक, वो कुछ भी कर रही हो, कुछ भी, तो कभी ये सवाल मत पूछना कि क्या ये बात, क्या ये कदम इसकी विचारधारा से मेल खाता है। ये सवाल ही ग़लत है पूछना। सवाल असली बस एक होता है, क्या ये काम करके इसका वोट बैंक, वोटर बेस बढ़ता है? बढ़ता है, तो वो काम करेगी। दुनिया की कोई भी पार्टी हो, यही काम करेगी।
भाई, बड़ा अच्छा लगता है न कि देखो, हमने महिलाओं के लिए ये किया, महिलाएँ आकर के वोट देंगी। और याद रखना, महिलाओं का जो टर्नआउट है इलेक्शंस में, वो लगातार बढ़ता जा रहा है, वो बढ़ता जा रहा है। तो कई-कई कारण हैं; उसके अलावा, ये एक पुरानी माँग भी थी। दिखने में बड़ा अजीब लगता है कि संसद में सिर्फ़ 12–15% महिलाएँ हैं, जबकि दुनिया में अब बहुत सारी संसदें ऐसी हो गई हैं, जिनमें 30–40–50, पचास से भी ज़्यादा प्रतिशत महिलाएँ बैठी हुई हैं। दिखने में भी लगता था।
तो बहुत सारे कारण हैं। उन कारणों से अब आप महिलाओं को आरक्षण दे देंगे और उसको तो अक्रॉस द बोर्ड एक्सेप्टेंस है। सारी ही पॉलिटिकल पार्टिज़ उसको एक्सेप्ट कर रही हैं और सपोर्ट कर रही हैं। और समाज में भी उस चीज़ को लेकर एक व्यापक समर्थन ही है। समाज में और सब राजनीतिक दलों में उसका समर्थन ही है, मैं उसको लेकर थोड़ा-सा आशंकित हूँ। ये जो सीटें बढ़ने वाली हैं महिलाओं के लिए, इन पर कुछ नहीं है नेताजी की बेटी आकर बैठने वाली है, या कोई क्रिकेटर होगा, कोई सेलिब्रिटी होगी, कोई अदाकारा होगी, सिनेकारिका होगी, इनको लाकर के बैठा दिया जाएगा।
ये वो महिलाएँ नहीं हैं जिनके पास अपना केंद्र और अपनी सोच है, जो महिला से पहले एक स्वतंत्र और चैतन्य मनुष्य हैं। उन स्वतंत्र और चैतन्य मनुष्यों को, जो कि नारी देह में हैं, उनको कोई राजनीतिक दल बर्दाश्त नहीं करने वाला, और वही भारत की त्रासदी है।
प्रश्नकर्ता: इस पर कोई कुछ भी कहता है अलग तरीके से, तो तुरंत “एंटी-वुमन!”
आचार्य प्रशांत: हाँ, बिल्कुल, मैं जो बात बोल रहा हूँ, इसको ऐसे भी सुना जा सकता है कि ये तो आरक्षण के विरोध में बात कर रहे हैं। मैं आरक्षण के विरोध में बात नहीं कर रहा हूँ, मैं सवाल उठा रहा हूँ कि जब आप ज़मीन से बुलंद महिलाओं को पैदा ही नहीं होने दे रहे और उठने ही नहीं दे रहे, तो आरक्षण देकर जिनको वहाँ पहुँचाओगे, वो होंगी कौन? मैं तो ये सवाल उठा रहा हूँ। और दोनों काम करने वाली हमारी ही व्यवस्था है, हमारी ही संस्कृति है, हमारा ही समाज है। वो ज़मीन पर महिलाओं को ताक़तवर होने नहीं देता, और वहाँ पर कह रहा है कि तुमको आरक्षण देकर पहुँचा दूँगा। तो ये तो पाखंड हो गया न, हिपोक्रेसी हो गई।
आप कह रहे हो, वो घर से बाहर नहीं निकल सकती शाम को, ठीक है? आप कह रहे हो कि वो क्यों बाहर जाकर के काम करा करती है, वो बाहर जाकर काम करे इससे अच्छा है कि वो घर की देवी बनकर रहे। आप बार-बार उसका वंदन करने के लिए उत्सुक हो रहे हो, उसको मनुष्य की तरह नहीं देख रहे। देवी बनाने में आपको कोई समस्या नहीं है, पर इंसान मानने में आपको बड़ी समस्या है। आप उसको न दुनिया देखने दे रहे हैं, न अनुभव लेने दे रहे हैं, न कमाने दे रहे हैं, न जीने दे रहे हैं। उसके बाद आप कहते हो, अब तू गूंगी गुड़िया बन जा, और अब मैं तुझे संसद में आरक्षण के थ्रू बैठा दूँगा। ये क्या है?
प्रश्नकर्ता: मुझे लगता है कि असली बात ये है कि परिवार में और घरों में महिलाओं के साथ क्या हो रहा है।
आचार्य प्रशांत: असली बात वो है, परिवारों, घरों और समाज की बात करो, और वहाँ पर तो यही पूरी व्यवस्था और यही समाज एकदम लगा हुआ है महिलाओं को दबाकर रखने में।
प्रश्नकर्ता: और महिलाएँ भी।
आचार्य प्रशांत: हाँ। और ख़ुद महिलाएँ भी महिलाओं को दबाकर रखने में लगी हुई हैं। तो पब्लिकली अगर आप एक कठपुतली को कहीं खड़ा कर दो, इसमें तो कोई प्रॉब्लम ही नहीं है। वो जो उसका प्राइवेट स्फीयर है, वो जो उसका घर है, उसका चूल्हा-चौका है, और उसका जो शयन-कक्ष है, बेडरूम है, वहाँ तो आप उसे हक़ देने को तैयार नहीं हो, ठीक है न? आप ये तक मानने को तैयार नहीं हो कि पति बलात्कारी हो सकता है। आप मैरिटल रेप को अपराध भी मानने को तैयार नहीं हो, वो भी एक लेजिसलेशन की ही बात है, वो लेजिसलेशन आप लाने को तैयार नहीं हो।
प्राइवेट स्फीयर में जब तक महिला दबी हुई है, और वो अपने दमन को स्वीकार कर रही है, और वो घुटनों पर गिरी हुई है, तब तक आपको कोई समस्या नहीं है। पब्लिकली उसे किसी मंच पर मूर्ति की तरह खड़ा कर दो और बोल दो, “वंदन कर दिया हमने उसका।”
असली जो लिबरेशन होता है न, वो घर से शुरू होता है; जो उसका व्यक्तिगत क्षेत्र है, वहाँ से शुरू होता है। और अपने व्यक्तिगत क्षेत्र में अगर वो स्वतंत्र है, तो फिर संसद है या कॉर्पोरेट बोर्डरूम है, वहाँ तक वो स्वयं पहुँच लेगी। पहला काम तो होना चाहिए कि उसको जन्म लेने दो। दूसरा काम होना चाहिए, उसको शिक्षित होने दो। तीसरा काम होना चाहिए कि समाज में किसी भी तरह की गुंडागर्दी मत चलने दो, क्योंकि महिलाओं को दबाकर रखने का बहुत बड़ा कारण यही रहता है कि “बाहर गुंडागर्दी बहुत है, तू बाहर निकलेगी तो तुझे हानि हो जाएगी। हम इसीलिए तुझे बचाकर रखने की ख़ातिर, तुझे सुरक्षा देने की ख़ातिर तुझे कमरे में बंद कर रहे हैं।”
अच्छी बात है, महिलाएँ संसद में हों, अच्छी बात है, मैं नहीं विरोध कर रहा। पर मैं तो बस जानना चाह रहा हूँ, वो कौन-सी महिलाएँ होंगी जो बैठ जाएँगी, और क्या वो महिलाएँ वास्तव में हमारी प्रतिनिधि होने वाली हैं? क्या वो सामान्य जनता की प्रतिनिधि होने वाली हैं, या वो बस पुरुषों द्वारा चुनी गई और नियुक्त आवाज़ें होंगी, जिनके पास अपना कोई दम नहीं होगा, अपनी पहचान नहीं होगी। उनको तो बस कह दिया कि “बेटी, चलो तुम खड़ी हो जाओ, तुम्हें हम जिता देंगे।”
प्रश्नकर्ता: ये लोग ये कह सकते हैं कि “चलो, अभी जो है, उससे तो कुछ बेहतर ही होगा।”
आचार्य प्रशांत: मुझे नहीं मालूम, बेहतर होगा कि नहीं, क्योंकि जो ये मनुष्य नाम का जीव होता है, इसमें सेल्फ-डिसेप्शन की, आत्म-प्रवंचना की बड़ी अद्भुत क्षमता होती है। हम अपने-आप को बता देंगे कि हम तो महान हैं, क्योंकि हमारी संसद में 33% महिलाएँ हैं। वहाँ संसद में महिलाएँ बैठी होंगी और ज़मीन पर हिंसक, क्रूर, रक्त-रंजित भ्रूण-हत्या का कुकृत्य चलता रहेगा, लाखों-करोड़ों की तादाद में होता रहेगा। दहेज-हत्याएँ होती रहेंगी, और जितने तरीके के, आप आज भी आँकड़े उठाकर देख लो, कोई मेरा पर्सनल ओपिनियन नहीं है, तो आपको पता चलेगा कि स्कूल ड्रॉपआउट्स में ज़्यादा कौन है। आपको दिखाई देगा, ये लड़कियाँ हैं जो स्कूल ड्रॉपआउट हो रही हैं। उसके कारणों की आप जब तहक़ीक़ात करोगे, तो आपको झटका लग जाएगा कि ये चल क्या रहा है भारत में आज भी।
दूसरे छोर पर वो हार्ड-कोर फ़ेमिनिस्ट बैठ गई हैं, ख़ासकर ये जो फ़ोर्थ-वेव वाली हैं, जिनको लग रहा है कि आज़ादी का मतलब होता है “माय वे, माय वॉइस, माय चॉइस, स्पेशली डिजिटल एक्सप्रेशन ऑफ माय चॉइस।” ये फ़ोर्थ-वेव फ़ेमिनिज़्म है। उनको भी नहीं पता कि उनकी जो चॉइस है, वो आ कहाँ से रही है; वो भी पुरानी व्यवस्थाओं से आ रही है। उन्होंने भी जो मेल-गेज़ है उसको इंटरनलाइज़ कर लिया है, और ये बात उनको पता भी नहीं है। जो बातें परंपरा से चली आ रही थीं, उन्हीं का एक वर्ज़न ये जो मॉडर्न फ़ेमिनिस्ट्स हैं, इन्होंने अपने भीतर डाल लिया और इसको ये बोलती हैं, “माय विल, माय वॉइस, माय चॉइस।”
ये न तुम्हारी विल है, न तुम्हारी वॉइस है, न तुम्हारी चॉइस है। तुम कुछ नहीं कर रही हो, तुम अभी भी जो नारी है उसको उसकी देह की तरह ही देख रही हो। पुरुष भी नारी को देह की तरह ही देखता है और नारी भी नारी को देह की तरह देख रही है, स्वयं को भी देह की तरह ही देख रही है। और ये बात, जो उसके प्राइवेट मूवमेंट्स होते हैं, इसमें वो बहुत अच्छे से जानती है। वो किस तरह से अपने-आप को दर्पण निहार रही है। वो एक कमरे में बैठी हुई है, कोई और महिला घुसती है, वो सबसे पहले उसको किस तरह से देखती है।
तो वो जो पितृसत्तात्मक सत्ता है, उसने तो जो महिलाओं के साथ किया है, हम जानते ही हैं। और जो ये फ़ेमिनिस्ट हैं, ये भी ले-देकर वही काम आगे बढ़ा रहे हैं। थोड़ी देर पहले मैंने कहा था न, तुम फ़ेमिनिस्ट हो सकते हो और साथ में मिसोजिनिस्ट भी हो सकते हो। तो ये बड़ी विकट स्थिति है, इसका जो समाधान है, समाधान तो वास्तविक अध्यात्म ही है।
जब तक जेंडर इर्रेलेवेंट नहीं हो जाता, जब तक नर होना या नारी होना एक छोटी बात नहीं हो जाती, जब तक हम किसी भी होमो सेपियन्स को सीधे-सीधे इंसान की तरह देखने के क़ाबिल नहीं हो जाते, तब तक बात नहीं बनेगी।
इक्वलिटी वग़ैरह की बातें भी बहुत उथली हैं। इक्वलिटी यद्यपि होनी चाहिए, लेकिन इक्वलिटी मात्र से कुछ नहीं हो जाता। इक्वलिटी बहुत बाहरी बात होती है। जेंडर इर्रेलेवेंस चाहिए, जेंडर इक्वलिटी एक आरंभिक बात हो सकती है, पर उसके बहुत आगे जाकर जेंडर इर्रेलेवेंस चाहिए, जहाँ आप महिला को भी देखो तो आपको महिला बाद में दिखाई दे, मनुष्य पहले दिखाई दे।
प्रश्नकर्ता: तो आपने अध्यात्म की बात की, मुझे धर्म-गुरुओं वाली बात याद आई। जैसे शुरू किया। तो इनका क्या रोल है?
आचार्य प्रशांत: इनका कोई रोल नहीं, इनको अध्यात्म से कोई लेना-देना भी नहीं है।
प्रश्नकर्ता: अध्यात्म के पक्षधर तो…।
आचार्य प्रशांत: वो अध्यात्म के नहीं हैं, जिनको आप धर्म-गुरु बोलते हो असल में धर्म का नाम इतना ख़राब कर दिया इन लोगों ने। जिसको आप धर्म बोलते हो, वो बस पुराने रीति-रिवाज़ों का, रूढ़ियों का और कुप्रथाओं का, प्रथा भी नहीं बोल रहा, कुप्रथाओं का ही पुलंदा मात्र है। वास्तविक धर्म तो अध्यात्म से अभिन्न होता है, और अध्यात्म का तो मतलब ही होता है, उस शब्द में ही लिखा हुआ है अधि आत्म, स्वयं को जानना। स्वयं को जानना, स्वयं को देह से आगे जाकर के जानना। तुम अपना लिंग मात्र थोड़ी ही हो।
जिसको आप धर्म-गुरु वग़ैरह बोलते हैं, वो कहीं से भी आध्यात्मिक नहीं होते हैं। वो तो परंपरावादी होते हैं, कहते हैं, पुराने ऐसे चल रहा था, हम पुराने समय के ही कपड़े पहनेंगे। पुराने जैसी ही बातें करेंगे। पुरानी ही भाषा में बोलेंगे। पुरानी शब्दावली रखेंगे। पुराने ही चिन्ह और प्रतीक धारण करेंगे। और हज़ार साल पहले जैसा भारत था, पुराना; उसी पुराने भारत को वापस लाने की यथासंभव कोशिश करेंगे। ये नहीं देखते हैं कि वही जो पुराना भारत जैसा था, उसी के कारण इतनी ग़ुलामी झेलनी पड़ी, इतनी यातना सहनी पड़ी, इतनी बर्बादी और इतनी ग़रीबी आई। इन्हें नहीं समझ में आता कि जो तुमने पुराना काम चला रखा था, उसी पुराने काम की वजह से भारत बर्बाद हुआ। ये उसी पुराने भारत को वापस लाना चाहते हैं।
इनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, ये सब पुरातन-पंथी हैं बस। इन्हें पुराना समय वापस चाहिए। क्यों? क्योंकि उस पुराने समय में समाज के कुछ वर्गों को बड़ी मलाई मिली हुई थी खाने के लिए। और समाज के वही वर्ग हैं, फिर जो इन गुरुओं को हर तरीके से समर्थन देते हैं, इनकी फ़ंडिंग भी करते हैं और इनके पक्ष में प्रोपेगेंडा भी चलाते हैं। पुराने समय को वापस लाने के पीछे कोई एंशिएंट रोमांस नहीं है कि “पुराना समय तो बहुत अच्छा था,” कुछ भी नहीं है। बस, पुराने समय में जिनका मलाई-मक्खन था, वो चाहेंगे ही कि वो पुराना समय फिर से वापस आ जाए। इतनी-सी बात है।
प्रश्नकर्ता: महिलाओं को तो ख़ासकर, मेरे ख़याल से, दूर ही रहना चाहिए।
आचार्य प्रशांत: महिलाओं को अध्यात्म के पास से पास आना चाहिए, और ये जो पारंपरिक क़िस्म का लोकधर्म है, इससे जितना दूर हो सके, दूर होकर चलना चाहिए। आप उपनिषदों के पास आइए, आप भगवद्गीता के पास आइए। आप षड्दर्शन के पास आइए। भारत की मनीषा ने, भारत की चेतना ने, न जाने कितने अद्भुत ग्रंथ पैदा किए हैं, वही वास्तविक धर्म है, वही वास्तविक अध्यात्म है। आप उनके पास जाइए।
ये सब जो इधर-उधर अंधविश्वास की बातें करेंगे, भूत-प्रेत, टोना-टोटका की बातें करेंगे, और आपको चरित्र और आचरण के ढकोसलों में बाँधेंगे, ये थोड़े ही गुरु होते हैं। ये तो पिछड़ेपन के प्रतिनिधि हैं, बस। इनके पास न महिलाओं को कुछ मिलना है, न पुरुषों को कुछ मिलना है, और ये बस राष्ट्र को भी डुबोकर ही मानेंगे।
प्रश्नकर्ता: जो हमारे परंपरा में भी जो कुछ सही उदाहरण रहे हैं महिलाओं को लेकर, संत ललेश्वरी हों…
आचार्य प्रशांत: वो हमारी परंपरा में कुछ नहीं, बहुत-बहुत अच्छे-अच्छे उदाहरण हैं। हमारी परंपरा ने, हमारे अतीत ने बहुत ऊँचाइयाँ भी छुई हैं। लेकिन जो ये वर्तमान धर्मगुरु हैं, इन्हें उन ऊँचाइयों से प्यार ही नहीं है। देखो, भारत का बहुत विशाल अतीत रहा है और विस्तृत भूगोल रहा है। तो इसमें बहुत ऊँची बातें भी हैं और बहुत नीची बातें भी हैं। जो सब नीचे-नीचे की बातें हैं, उनको तो ये उठाकर पकड़ लेते हैं और कहते हैं, “यही हमारी संस्कृति है।” और जो उच्चतम बातें भारत ने जानीं, भारत ने कही, जिसके नाते वो वास्तव में ‘विश्वगुरु’ कहलाने का अधिकारी हुआ, उन उच्चतम बातों की ये चर्चा ही नहीं करते, क्योंकि वो उच्चतम बातें इन्होंने न कभी ख़ुद पढ़ी हैं, न इन्हें कभी समझ में आई हैं।
तो ये बस इधर-उधर की छिटपुट बातें ले आएँगे, बिल्कुल स्तरहीन, और उन्हीं बातों को ये धर्म बताकर प्रचलित करते रहते हैं। महिलाओं को इनसे सावधान रहना चाहिए, पुरुषों को भी सावधान रहना चाहिए।
प्रश्नकर्ता: आप लगातार महिलाओं को लेकर जो वास्तविक मुद्दे हैं, वास्तविक बातें हैं लगातार उठाते रहते हैं। यहाँ तक कि अभी कल एक, शायद, कमेंट भी आया था, “आचार्य जी, आप महिलाओं को लेकर इतनी बातें क्यों कर रहे हैं?” मैंने पढ़ा था।
आचार्य प्रशांत: नहीं, महिलाओं को ही तो लेकर के सारा प्रपंच फैला हुआ है। ज़्यादातर जो ये काम होते हैं, जिसको आप व्यवस्था बोलते हो, वो इसलिए तो होते हैं कि मनुष्यों की आधी आबादी पर क़ब्ज़ा रखा जा सके। ये कोई छोटा-मोटा लक्ष्य तो होता नहीं है न। मनुष्यों की आधी आबादी महिलाओं की है, तो बाक़ी आधी आबादी उनको अपने स्वामित्व में रखने के लिए न जाने क्या-क्या करती है। तब तो आप नहीं बोलते कि “तुम्हारे दिमाग़ में हर समय महिला ही क्यों चल रही होती है?” आप अगर देखेंगे न ग़ौर से, तो सत्ता हो, लोकधर्म हो, पारिवारिक व्यवस्था हो, इन सबके केंद्र में आपको एक बड़ा उद्देश्य ये नज़र आएगा कि किसी तरह स्त्री को दबाकर रखो, ताकि उसका उपभोग किया जा सके, उसके शरीर को, उसके गर्भ को क़ाबू में रखा जा सके, मालिकियत उस पर स्थापित रहे।
तो महिला तो लगातार नाचती ही रही है पुरुष के दिमाग़ में। इन पुरुषों को ये आपत्ति कैसे हो जाती है कि मैं महिलाओं के बारे में बोल रहा हूँ। महिलाएँ तो तुम्हारे दिमाग़ में नाच रही हैं, मैं तो बस बोल दे रहा हूँ, कभी-कभार। तुम्हारे दिमाग़ में तो लगातार नाचती ही रही हैं। देखते हो ना हालत क्या हो जाती है, पुरुषों से भरा एक कमरा हो उसमें एक महिला घुस आए, पुरुषों की हालत देखो। सब कामधाम भूल जाएँगे। बातचीत ही पूरी बदल जाएगी।
तो हम समझ ही नहीं रहे हैं कि ये जो दो लिंग हैं, इनका आपसी रिश्ता क्या है। हम नहीं समझ रहे, और इसीलिए ये रिश्ता बहुत ख़राब हो चुका है। इंसान, इंसान को देख ही नहीं रहा। स्त्री-पुरुष में, बाप-बेटे में, पति-पत्नी में, पड़ोसी-पड़ोसी में मित्रवत व्यवहार हो ही नहीं पा रहा है। हमेशा कोई ऊपर है, कोई नीचे है। हमेशा दोनों के काम उनकी आइडेंटिटी से जोड़ दिए गए हैं, तुम ये हो, तुम्हें करना पड़ेगा; तुम ये हो, तुम्हें ये करना पड़ेगा; बदले में तुम्हें ये मिलेगा, बदले में तुम्हें ये मिलेगा। ये कोई तरीका नहीं होता है रिश्ते रखने का।
रिश्ते प्रेम पर आधारित होने चाहिए, समझ पर आधारित होने चाहिए।
पुरुष और स्त्री हैं, दोनों मनुष्य हैं। दोनों को साथ तो रहना ही पड़ेगा। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था करी है कि इनको संगति में तो रहना ही पड़ेगा एक-दूसरे की। जब एक-दूसरे की संगति में रहना है, तो एक-दूसरे को समझ कर रहो, एक-दूसरे को जानो। फिर उसको मित्रता बोलो, प्रेम बोलो, जो बोलो, सब शुभ होगा।
प्रश्नकर्ता: आजकल, ख़ासकर महिलाओं के प्रति वायलेंट क्राइम्स, अब पता नहीं बढ़े हैं या न्यूज़ में ज़्यादा आ रहे हैं, लेकिन आए दिन कोई सेक्सुअल वायलेंस हो, या कुछ ऑनर किलिंग हो, इस तरह की चीज़ें भी आजकल आ रही हैं, उनका भी कोर यही कारण है।
आचार्य प्रशांत: और क्या है। ऑनर किलिंग कर देंगे, वो अगर अपने हिसाब से अपने लिए किसी लड़के का चयन कर ले, तो उसको जान से मार दो, ठीक है? जीने मत दो। और वही व्यवस्था, वही हमारा समाज फिर कहता है कि हम उसको संसद में बैठा देंगे, तो फिर संदेह होना चाहिए कि नहीं? बोलो, संदेह तो हो गया होगा न। वो ज़रा-सा अपने हिसाब से जीने लगे तो तुम उसे घर से भी बाहर निकाल देते हो; और दूसरी ओर तुम कह रहे हो, नहीं-नहीं, संसद में आपका स्वागत है। तुम उसे घर तक में तो रहने नहीं देते, अगर वो आज़ाद हो जाए, स्वतंत्र हो जाए, व्यक्ति बन जाए, तो तुम उसे घर में भी नहीं रहने देते, और संसद में तुम उसके लिए आरक्षण दे रहे हो, संसद में उसको कुर्सी दे रहे हो। घर में तुम उसको कोना भी नहीं दे सकते।
लड़की अगर स्वतंत्र हो जाए, तो घर में उसको कोना भी नहीं दोगे, और संसद में तुम किसी लड़की को कुर्सी दे रहे हो। निश्चित रूप से जिस लड़की को तुम संसद में पहुँचाना चाहते हो, वो लड़की वही होगी ज़्यादातर जो तुम्हारे आधिपत्य में है, जो तुम्हारे कंट्रोल में है। तुम उसी लड़की को संसद में आकर बैठा दोगे, वो कठपुतली समान होगी। और वर्तमान महिला एमपीज़ को लेकर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ, कोई ख़फ़ा ना हो जाए। देश के भविष्य को लेकर के आशंकित हूँ, तो इस नाते जो बात है, वो सामने रख रहा हूँ।
स्वतंत्र महिलाएँ भी संसद पहुँची हैं, बुलंद आवाज़ें महिलाओं की भी संसद में कुछ गूँजी हैं, उनका सम्मान है। पर दुख ये है कि वैसी आवाज़ें बहुत कम रही हैं। वैसी आवाज़ें हमें और चाहिए, और वैसी आवाज़ें आरक्षण से ही नहीं आने वाली। वो आवाज़ें तब आएँगी, जब पहले इस देश की मिट्टी मज़बूत लड़कियों को पैदा करे। और वो मिट्टी नहीं पैदा करेगी, जिस तरीके का माहौल चल रहा है और, और ज़्यादा बनाया जा रहा है।
प्रश्नकर्ता: अभी तो विधेयक पास हो तो फिर…
*आचार्य प्रशांत: *नहीं, पास तो हो ही जाएगा, उसका कौन विरोध करेगा, वो तो अच्छी बात है। मैं भी उसका विरोध नहीं कर रहा, वो अच्छी बात है। लेकिन जब वो पास हो जाएगा और 33% आरक्षण हो जाएगा, तो फिर मैं ऐसे करके देखूँगा और मैं कहूँगा कि ये 33% कौन है जो वहाँ पहुँचा दी गई? क्योंकि वहाँ अच्छी महिलाएँ पहुँचें, इसके लिए पहले ज़मीन से अच्छी महिलाएँ उठनी चाहिए। ज़मीन माने, हमारे घरों से। हमारे घरों में तो तुम उनकी चेतना और उनकी आज़ादी का गला घोंट देते हो, तो संसद में आज़ाद महिला कहाँ से पहुँच जाएगी?
और घरों में गला घोंटने वाली जो ताक़त है, और संसद में बैठाने का समर्थन करने वाली जो ताक़त है, वो एक ही है; ये बात बड़ी रोचक हो गई।
प्रश्नकर्ता: तो ये बात अब इसके बाद कुछ समय तक, ये बात, इसी का जश्न मनाएँगे।
आचार्य प्रशांत: हाँ, हाँ, जश्न मनाएँगे, अपनी ऐसे पीठ थपथपाएँगे, कि देखो भारत महान है, यहाँ तो हम महिला को देवी की तरह रखते हैं और हम संसद में उनको 33% का आरक्षण भी देते हैं। कुछ भी नहीं है, रहना हमको वैसे ही है जैसे हम रहे आए हैं। लेकिन हमें एक मॉडर्न फ़ेस भी दिखाना है, मॉडर्न, एजुकेटेड, लिबरल फ़ेस दिखाना है, ताकि हम दुनिया के सामने बोल सकें, और पॉइंट्स बटोर सकें, और वोट भी बटोर सकें, कि देखो, मैं तो महिलाओं का मित्र हूँ। नहीं, नहीं, हमारा जो समाज है, वो ऊपर उठ रहा है, हम बड़े फीमेल-फ़्रेंडली लोग हैं। हमें ऐसा दिखाना भी है और ऐसा दिखाते हुए अच्छा लगता है, कि नहीं, नहीं, हम पिछड़े हुए नहीं हैं, हम अशिक्षित नहीं हैं, हमारा कोई रिग्रेसिव समाज नहीं है। हम मॉडर्न लोग हैं और हम महिलाओं को बराबरी देना जानते हैं।
हमें ऐसा दिखाना भी है और घर में महिला का दमन भी करना है; रिश्तों में महिला का दमन भी करना है। साइकोलॉजिकली हमें उसके ऊपर चढ़कर भी बैठना है। तो कुल मिलाकर यही दोनों काम हैं जो साथ-साथ हो रहे हैं, बाहर-बाहर ऐसे दिखाओ जैसे कि हमने उसको बड़ा सम्मान दे रखा है, उसको ऐसे उठा दो, एलिवेट कर दो, और घर के भीतर उसको दबाकर रखो।
ये तक हो सकता है कि वहाँ मंच पर उसको तुमने चढ़ा दिया है, नेता बनाकर, वहाँ से वो भाषण दे रही है। वो मंच पर खड़ी हुई है। तुमने उसको नेता बनाकर चढ़ा दिया है, क्योंकि उसके पिता, और भाई, और पति, तीनों पॉलिटिक्स में थे, तो तीनों ने अब उसको भी पॉलिटिक्स में डाल दिया। फिर रिज़र्वेशन आ गया है, इतनी सीटें अब महिलाओं के लिए हो गईं, तो अब इसको, घर की बहू को या बेटी को, इसको भी जल्दी से खड़ा करो पॉलिटिक्स में। तो तुमने उसको वहाँ पॉलिटिक्स में खड़ा कर दिया और वो वहाँ पर खड़ी हुई है और वो मंच से भाषण दे रही है, और तभी कोई नालायक कैमरामैन कैमरा उसके पीछे ले जाता है और दिखाई देता है कि यहाँ उसकी पीठ पर मार खाने के निशान हैं।
लोग अगवाड़ा देख रहे हैं बस उसका, वो मंच से खड़ी होकर भाषण दे रही है और ऐसा लग रहा है, कितनी कुशल नेत्री है, कितना अद्भुत भाषण दे रही है, क्या इसकी ऊँची आवाज़ है, क्या स्वतंत्र इसकी चेतना है, क्या भाषण दे रही है! और कैमरा यहाँ पीछे की तरफ़ जाए तो हो सकता है कि दिखाई दे कि यहाँ पर पिटाई के निशान हैं, आज ही पति ने उसको मारा है। ज़रूरी नहीं है कि शरीर पर ही निशान हों, ज़्यादा गहरे ज़ख्म यहाँ होते हैं, भीतर। और वो ज़ख्म भारत ही नहीं, दुनिया की 99% महिलाओं की छातियों पर हैं। बहुत पुराना शोषणकारी इतिहास है।
लेकिन उसका इलाज फ़ेमिनिज़्म नहीं है, ये भी बता ही देता हूँ। उसका इलाज तो अध्यात्म है, स्वयं को जानना। महिला जब तक अपने आप को, अपने कपड़ों, अपने मेकअप, अपनी आइडेंटिटीज़, अपने शरीर से गहरे जाकर, नहीं जानेगी, “कोऽहम्?” हू एम आई? ये प्रश्न जब तक उसके लिए प्रासंगिक नहीं होगा, तब तक वो किसी-न-किसी तरीके की ग़ुलामी करेगी।