आप सोचते हैं कि संसद में 33% महिलाएँ आ जाएँगी तो सशक्तिकरण हो जाएगा, लेकिन जब ज़मीन पर ही लड़कियों को स्वतंत्र होने नहीं दिया जाता, तो संसद तक पहुँचेंगी कौन? वही महिलाएँ जो पहले से सत्ता के सहारे हैं। असली बदलाव आरक्षण से नहीं, घर और समाज में महिला की स्वतंत्रता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता से आएगा। वरना यह सिर्फ़ एक सजावटी परिवर्तन रह जाएगा।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। महिला आरक्षण बिल पर अभी संसद में चर्चा चल रही है। तो मैं सोच रहा था, एक ओर तो हमारा समाज है, हमारी व्यवस्था है, हमारी संस्कृति है, और इसी संस्कृति के कुछ प्रचलित गुरु लोग हैं। अगर हम इन गुरु लोगों को इस संस्कृति का प्रतिनिधि मानें, तो पिछले एक साल में, खासकर उत्तर भारत में, लगातार हम इनकी ओर से महिलाओं के प्रति पिछड़ी और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ सुनते आए हैं।
तो यही व्यवस्था है, जो एक तरफ़ इस तरह की टिप्पणियाँ करती है, और यही व्यवस्था, यही समाज, यही संस्कृति महिला आरक्षण की भी बात कर रही है और उसका समर्थन भी करती हुई दिख रही है। तो समझ नहीं आ रहा मुझे, ये बात मैं इसे समझना चाहूँगा आपसे, आप इस पर क्या कहना चाहेंगे?
आचार्य प्रशांत: नहीं, तुम्हें विरोधाभास दिख रहा है तुम इसलिए उलझ रहे हो। विरोधाभास है नहीं। देखो, 12–15% लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व रहता है, और ये वो हैं जो चुनकर आ पाती हैं। और टिकट भी जो बड़ी पार्टियाँ हैं, वे इसी अनुपात में देती हैं, 12, 13, 15% इसी रेंज में। बल्कि, जो वर्तमान लोकसभा है, इसमें तो पिछली लोकसभा से कम महिलाएँ हैं। अब क्या होने वाला है? अब अचानक से ये जो 60–70 महिलाएँ रहती आई हैं लोकसभा में आमतौर पर, इनकी संख्या हो जानी है लगभग 180।




