
** प्रश्नकर्ता:** गुड इवनिंग, सर। मेरा नाम अंबिका है और मैं जयपुर, राजस्थान से हूँ। राजस्थान में बहुत सारे ऐसे इश्यूज़ हैं, जो मैं देखती हूँ। जैसे कि अभी भी घूँघट प्रथा चल रही है। मैं उन सब के बारे में अब आपसे डिस्कस मतलब नहीं बताना चाहूँगी, बिकॉज़ देयर आर अ लॉट ऑफ़ थिंग्स दैट आइ वुड लाइक टू से। सिविक सेंस ऑल्सो। वहाँ पर बहुत गुटखा और ये सब भी खाते हैं। बट व्हाट आई वुड लाइक टू टेल यू कि वहाँ पर जो वॉटर क्राइसिस है, वह काफ़ी ज़्यादा हद तक बढ़ चुका है और जो ग्राउंडवॉटर जो यूनिट्स हैं, वो अभी पूरी तरह से एक्सप्लॉइट हो चुकी हैं, लाइक 70%। तो उसको कैसे केटर किया जा सकता है?
और साथ ही साथ जो क्लाइमेट क्राइसिज़ हैं, जैसे टियर-वन सिटीज़, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, यहाँ पर तो इन सबके बारे में बातें की जाती हैं, बट टियर-टू, टियर-थ्री सिटीज़ के अंदर इनके ऊपर कोई डिस्कशन्स नहीं होते हैं। इन फ़ैक्ट, वीगनिज़्म भी काफ़ी बड़ा मुद्दा है। तो इन सब चीज़ों को कैसे केटर किया जा सकता है? एंड वी, ऐज़ राजस्थानीज़, हाउ कैन वी केटर दैट?
आचार्य प्रशांत: आप सवाल में ही ग़लती कर रहे हो। आप एक्सटर्नल क्राइसिस को एक्सटर्नल मान रहे हो। धरती में कोई बदलाव थोड़े ही आ रहे हैं कि पानी उसका सूखता जा रहा हो, कि वॉटर टेबल गिरता जा रहा हो। जितनी समस्याएँ हैं, वह सब इंसान के भीतर की हैं। बाहर आपको जब समस्या दिखाई देती है, तो बाहर लगती है, वो होती भीतरी है। और कई बार वो जो भीतरी समस्या है, वो बाहर तो समस्या की तरह भी नहीं दिखती; वो बाहर तरक़्क़ी और विकास और ख़ुशख़बरी की तरह दिखती है।
पर पृथ्वी में जो भी बदलाव आ रहे हैं, वह पृथ्वी के अपने थोड़े ही हैं। इसी तरह से समाज शब्द का हम बहुत ढीला इस्तेमाल कर लेते हैं। समाज में ऐसा हो रहा है। समाज में नशा है। समाज में घूँघट है। समाज में गुटखा-खैनी है। समाज में भ्रष्टाचार है। समाज माने क्या होता है? समाज माने कुछ नहीं। समाज क्या होता है? इंसान की बात है। पर हम क्या करें, उनके सब कॉलीग्स बोलेंगे कि मास एजुकेशन ऑफ द सेल्फ तो इम्प्रैक्टिकल है। और उसके बिना न आप पृथ्वी को बचा सकते हैं, न समाज को बचा सकते हैं। जब सारी गड़बड़ इंसान की करी हुई है, तो इंसान को बदले बिना गड़बड़ कैसे ठीक करोगे? मेरे छोटे-से भेजे में ये बात घुसती नहीं, आपके घुसती हो तो बता दो। घुसती है?
ये सारी गड़बड़ियाँ किसी पारलौकिक शक्ति द्वारा निर्देशित हैं क्या? वहाँ से आकाश से कोई बड़ा उल्कापिंड आकर के गिरा और पानी जो था, वो सारा भाप बन गया। ऐसा हुआ है क्या? कोई विदेशी ताक़त आई और उसने हमारा जेनेटिक कोड ख़राब कर दिया। ऐसा हुआ है क्या? किसी दुश्मन देश ने साज़िश करके इस देश के लोगों को गुटखे की लत लगा दी। ऐसा हुआ है क्या? ये सारी करतूतें किसकी हैं? किसकी हैं? हमारी अपनी हैं। और हम कहते हैं, हमें मत बदलो बस बाहर का नज़ारा बदल दो। मैं कैसे बाहर का नज़ारा बदल दूँ?
दिक़्क़त यह है कि कई बार किसी क्षेत्र में, किसी सेक्टर में, कुछ अवधि के लिए नज़ारा बदल भी जाता है। तो इससे अहंकार को यह कहने का झूठा, नाजायज़ हक़ मिल जाता है, लाइसेंस मिल जाता है कि भीतर कुछ बदले बिना भी बाहर बदला जा सकता है। जैसे कि यह कैंपस है, जीबीयू का। सुबह-सुबह हम आपको ऐक्टिविटी करा देंगे कि चलो, यहाँ जितना प्लास्टिक-पन्नी पड़ी है, सब उठाकर इकट्ठा कर दो। कैंपस बिल्कुल साफ़ कर दो।
आप इतने सारे यहाँ पर लोग हो, आठ सौ, हज़ार जने हो, सुबह और भी आने वाले हैं लोग। वो सब लोग मिलकर के आप कैंपस को बिल्कुल चकाचक कर सकते हो। और उसकी आप फ़ोटो बना लो, वीडियो बना लो। और उससे आपको यह कहने का नाजायज़ हक़ मिल जाएगा कि देखो, कौन-सी हमारी एजुकेशन ऑफ द सेल्फ हुई? आत्मज्ञान की बात नहीं है। पॉलिसी और ऐक्टिविज़्म और मोटिवेशन की बात है। देखा, हमने कैंपस साफ़ करके दिखा दिया न? और कैंपस साफ़ करके क्या करोगे? सारा प्लास्टिक क्या करोगे? कहाँ ले जाओगे? जाकर कहीं डाल दोगे। और यहाँ साफ़ कर भी दिया, तो बाक़ी जगह करोगे क्या साफ़? और जीवन के एक हिस्से में सफ़ाई ले भी आए, तो बाक़ी और जगहों पर करोगे क्या सफ़ाई? अपने ही जीवन के अन्य क्षेत्रों में करोगे क्या सफ़ाई?
बस अपने आप को यह जता लोगे कि भीतरी बदलाव के बिना भी बाहरी सुधार, देखो, हम लेकर आ गए। और यह मानवता का सबसे बड़ा संयुक्त भ्रम है, द मास डिल्यूज़न: बिना ख़ुद को बदले हम पृथ्वी को बदल लेंगे, बिना ख़ुद को बदले हम समस्याएँ हल कर लेंगे।
और इसी डिल्यूज़न पर पॉलिटिक्स चल रही है, इंडस्ट्रीज़ चल रही हैं, ऐक्टिविज़्म चल रहा है, नॉन-प्रॉफ़िट्स चल रहे हैं, डेमोक्रेसीज़ चल रही हैं, अंतरराष्ट्रीय संस्थान चल रहे हैं। वहाँ भी समस्याओं को टैकल करने की बात होती है।
ये समस्या सुलझानी है, ये करना है। पर वो जो समाधान होता है उसमें द इनवर्ड ग्लांस, आत्मज्ञान, कहीं भी नहीं आता, बिल्कुल ही नहीं आता। हाँ, फंडिंग आती है बहुत सारी। क्या करने के लिए? बाहर की सफ़ाई करने के लिए। और जब बाहर की सफ़ाई करने के लिए इतनी बढ़िया फंडिंग आ रही हो, तो आत्मज्ञान याद आ भी रहा हो तो भुला दिया जाता है। मस्त दुनिया में इस वक़्त फंडिंग का बड़े-से-बड़ा एरिया है, क्लीन एनर्जी, ग्रीन एनर्जी। क्योंकि क्लाइमेट क्राइसिस सर पर खड़ी है, तो दुनिया की सारी सरकारें और कॉरपोरेट चैनल्स भी ग्रीन एनर्जी को इतना फंड कर रहे हैं।
अब सोचो, इतनी फंडिंग आ रही है, तो कितने हज़ारों-करोड़ों, लाखों के करियर बन रहे होंगे। खूब पैसा उनकी जेब में जा रहा होगा। अब उनको तुम बताओ अगर कि तुम्हारी ये क्लीन एनर्जी, ग्रीन एनर्जी से बात बनेगी नहीं, आत्मज्ञान चाहिए। तो वो तो तुम्हारी गर्दन पकड़ लेंगे न, उनका करियर ख़राब हो जाएगा पूरा। उनका पूरा करियर ही इसी बात पर बना है कि मैं एक नई टेक्नोलॉजी ले आ रहा हूँ। वो सफ़ाई कर देगा। लाओ, मुझे और पैसे दो। और तुम कह रहे हो, नहीं, ये वेस्टफुल एक्सपेंडिचर है। इससे 1% ख़र्चे में पूरी दुनिया की वो एजुकेशन करी जा सकती है, जिससे समाधान सचमुच हो जाएगा। वो कहेगा, "बाप रे बाप!"
वो जैसे उछलती है न मीम कि "तो धोती खोल रहा है!" धोती ही खुल गई, माने ₹100 का काम ₹1 में हो सकता है। और ₹100 में भी वह हो नहीं रहा है काम, जो ₹1 में हो जाएगा। समस्या बाहर है, समस्या का बाप भीतर है। कर्म बाहर है, कर्ता तो भीतर है। उसको संबोधित किए बिना कर्म कैसे बदल दोगे? इतनी-सी बात है बस। इंसान बदले बिना तुमने उसका व्यवहार बदल भी दिया, तो वह एक क्षेत्र में बदलेगा बस, कुछ सीमा तक बदलेगा बस। और कुछ समय के लिए बदलेगा बस। इसीलिए यह जो सेक्टोरल ऐक्टिविज़्म होता है, यह बड़ा पाखंड है।
“मुझे सबको वीगन बनाना है।” अब वीगनिज़्म इनके ऐक्टिविज़्म का क्षेत्र है, पर फीमेल फेटिसाइड नहीं। ये कैसे हो सकता है? ये कह रहे हैं, "नहीं-नहीं, देखो, हम *वीगनिज़्म * वाले हैं। ये फेमिनिज़्म वाले हैं। ये पॉल्यूशन वाले हैं। और पॉल्यूशन में भी ये रिवर वाले हैं। ये एयर वाले हैं। ये फॉरेस्ट वाले हैं। ये अर्बन वाले हैं। ये रूरल वाले हैं।" और सब अपने-अपने क्षेत्र में काम करेंगे, जैसे कि ये सब अलग-अलग क्षेत्र हों। और ये टेररिज़्म वाले हैं। जैसे कि आतंकवाद और प्रदूषण दो अलग-अलग समस्याएँ हों। पर एक इनके खोपड़े में घुस नहीं रही बात कि आतंकवाद और प्रदूषण, दोनों एक ही जगह से आ रहे हैं।
और जब उनके खोपड़े में बात नहीं घुसती, तो आप मेरे पास आ जाते हो। "आचार्य जी, आपकी बात में कुछ लोचा है क्या? मेरे कॉलेज के *डायरेक्टर * ने आपकी बात नहीं मानी। ज़रूर आपकी बात में लोचा होगा।" शक द डायरेक्टर। उसको नहीं माननी। समय बहुत कम है, मेरे साथ आओ, कुछ करना है तो। उसको क्या कन्विंस कर रहे हो?
अपोलॉजिस्ट्स बन के जाते हो तुम लोग। अपने-अपने दायरों में, अपने-अपने क्षेत्रों में, व्हेदर इन वर्कप्लेस एंड इन फैमिली, अपोलॉजिस्ट्स। अपोलॉजिस्ट्स समझते हो? आचार्य जी के याचक प्रतिनिधि। कि, "हाँ-हाँ, वो न, ये नहीं। आप लोग तो बहुत अच्छा काम कर रहे हो। वो एक्चुअली ये-ये हैं, ये न, ये सर हैं मेरे। ये आईआईटी-आईआईएम के पढ़े हुए हैं, मतलब टोटली क्रैक नहीं हैं। मतलब, तो ये न, इन्होंने ऐसी कुछ बात बोली थी..." और वो फिर ऐसे देखते हैं, "हाँ, हाँ, हाँ, सबमिट द पिटीशन। आई लुक्ड ऐट इट। या, देयर इज़, यू नो, 2% मेरिट इन इट एंड द रेस्ट ऑफ इट इज़ जंक।" और फिर तुम मेरे पास आ जाते हो, "कोई आपकी बात नहीं सुनता।"
तुम्हें कहा किसने था कि उस बात को वहाँ ले जाकर के उस मूर्ख के आगे रखो? और वो भी उस तरीके से, जैसे रख रहे हो। मुझे देखा है कहीं जाकर पिटीशन देते हुए? जहाँ जाता हूँ, वहाँ दहाड़ के बोलता हूँ, सर पर चढ़ के बोलता हूँ। और नहीं जाता तो फिर नहीं जाता। तुम्हें नहीं सुननी मेरी बात तो नहीं बोलूँगा। पर मैं याचना करने नहीं आऊँगा, कि "प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़, यह बात ऐसे थोड़ा-बहुत, यू नो, थोड़ा बजट इधर भी दे दीजिए सेल्फ-एजुकेशन का।"
मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा बजट। जो करना है, ख़ुद कर लूँगा। अकेले कर लूँगा। वन-मैन आर्मी बन लूँगा, अपना अलग इंस्टिट्यूशन बना लूँगा। पर तुम्हारे सामने याचना करने नहीं आ रहा। पर तुम लोगों के बड़े स्वार्थ, ताने-बाने जुड़े हुए हैं दुनिया से। तो जगह-जगह जाकर के मेरे नाम पर भी मत्था टेकना शुरू कर देते हो। "प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़, थोड़ा हमारे...।”
आज मैंने आचार्य जी की पुस्तक अपनी प्रिंसिपल को भेंट करी।” क्यों भेंट करी? मत करो। वो अंधी है, वो पागल है, उसे ख़ुद नहीं पता। आठ साल से संस्था ने कितने करोड़ जला दिए भारत के एक-एक इंसान तक पहुँचने के लिए। और हो नहीं सकता कि तुम्हारी प्रिंसिपल अगर कहीं गुफा में छुपी नहीं बैठी है, या हिमालय के किसी पेड़ पर नहीं टँगी हुई है, तो आचार्य जी को नहीं जानती। तुम काहे ले आई हो उसको, प्रिंसिपल को किताब देने के लिए? जैसे वह एहसान कर रही है किताब ग्रहण करके। और कई लोग तो कम्युनिटी पर इसी भाव से पोस्ट करते हैं, "आज न, मेरी प्रिंसिपल ने आचार्य जी की किताब ले ली। आचार्य जी धन्य हो गए।”
और अगर कोई सरकारी अफ़सर या नेता तुम्हारी किताब ले ले, तब तो ऐसा हो जाता है जैसे आज तुमने आचार्य जी का बिल्कुल झंडा ही गाड़ दिया। "मेरे क्षेत्र के पार्षद ने किताब ले ली।" तुम्हारे पार्षद को हम घुसने न दें यहाँ। और तुम ऐसे हो जाते हो कि बिल्कुल लौट जाते हो, कि "हाँ, क्योंकि स्वार्थ जुड़े हुए हैं। क्योंकि तुम भी उन्हीं के जैसे हो। नहीं तो उनकी करतूतें तुम्हें साफ़ दिखाई देतीं, नहीं तो उनकी व्यर्थ बातों को ले मेरे पास नहीं आते कि "आप जवाब दीजिए।"
कितनों के, आप लोगों ने पढ़े होंगे। हाथ उठाइएगा। कितनों के इस तरह के आते हैं कम्युनिटी पर रिफ्लेक्शन? कि नहीं? "आज मेरे पापा और भाई खाने की टेबल पर बैठ गए और वो आचार्य जी पर ऐसे-ऐसे इल्ज़ाम लगाने लगे। कुछ देर तक तो मैं बोलती रही, लेकिन उसके बाद मेरी बातों का उनके पास कोई उत्तर नहीं था।" और वो जो बातें हैं उनकी, वो बिल्कुल एकदम महामूर्खता की बातें। कितने लोगों ने ऐसा कोई-न-कोई रिफ्लेक्शन पढ़ा है कम्युनिटी पर? "मैं हार गई, आचार्य जी। अब मैं हार गई।"
तुझसे कहा किसने था कि उन दो मूढ़ों के सामने जाकर मेरी बात कर? पर तेरे स्वार्थ हैं। "मेरे पप्पा, मेरा भैया।" और अहंकार गहरा है कि मेरे पापा हैं, मेरे भैया हैं। तो थोड़ा तो उनमें दम-दिलाशा होगा। कुछ तो ढंग के होंगे, कोई ढंग के नहीं हैं। जो मेरी इतनी सीधी बातों पर भी कुतर्क करे, आक्षेप करे, वो आदमी ढंग का हो सकता है? मैं कोई जटिल बात बोलता हूँ? मैं दार्शनिक सूत्रों में बोलता हूँ? मैं सैद्धांतिक जटिलताओं में बोलता हूँ? मैं बात को आईने की तरह साफ़ करके रख देता हूँ। उसके बाद तुम्हारे पापा और तुम्हारा भैया, उनको मेरी बात समझ में नहीं आ रही है, तो तुम उनसे बात कर भी क्यों रहे हो। नराधम हैं। बात इतनी-सी है, बस। जटिलता कुछ नहीं है। बदनीयत हैं।
मैं आपसे ही प्रार्थना कर रहा हूँ, डोंट डिस्क्लोज़ मी टू इनसेंसिटिव आइज़। वह जो डिस्क्लोज़र है, वो संस्था ख़ुद कर रही है, हमारे पास उसके तरीके हैं। हम प्रचार करना जानते हैं। आप जाकर के मेरे प्रतिनिधि बनकर मेरा मान मत घटाइए, मूर्खों के सामने मेरी बात रखकर, और फिर मुँह की खाकर। कि "चार मेरे नशेड़ी यार और उनके सामने मैंने आचार्य जी की गीता खोल दी, और वह हँसने लग गए, और मैं अपना-सा मुँह लेकर रह गया।” कोई ज़रूरत नहीं, तुम मत करो चर्चा। मुझे तुम्हारे वो चार नशेड़ी यार नहीं चाहिए।
उनको ढूँढ़ो जो योग्य हैं। उनको ढूँढ़ो जो लायक हैं। और उनसे मेरी बात वैसे करो, जैसे मंदिर में बात की जाती है। कैसे? मंदिर में चिल्लाते हैं? कैसे बात की जाती है मंदिर में? एक झीनी, मंद,सेक्रेड व्हिस्पर।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मेरा नाम आकांक्षा है, मैं आपसे पिछले डेढ़ सालों से जुड़ी हुई हूँ। अभी रीसेंटली, कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड में हुए सेशन्स में आपने मास एजुकेशन ऑफ द सेल्फ की बात की थी। तो जब मैं अपने आसपास अपने फ्रेंड्स, रिलेटिव्स या फैमिली से बात करती हूँ कि विमेन एंपावरमेंट, क्लाइमेट चेंज और “ऑपरेशन 2030” की, तो वो इससे रिलेट कर पाते हैं कि इसका इम्पैक्ट क्या है। बट व्हेन इट कम्स टू मास एजुकेशन ऑफ द सेल्फ, तो ये उन्हें इम्प्रैक्टिकल लगता है कि इतने ढेर सारे लोगों की कॉन्शियसनेस एक साथ रेज़ नहीं हो सकती।
तो मेरा क्वेश्चन आपसे यह था कि इस तरीके का जो सिनिसिज़्म है, इसका रिस्पॉन्स क्या होना चाहिए?
प्रश्नकर्ता: करके दिखाइए और क्या। इतने सारे लोग एक साथ साँस ले लेते हैं। बड़े-बड़े रेस्टरूम्स होते हैं, एयरपोर्ट्स वग़ैरह पर। वहाँ इतने सारे लोग एक साथ पेशाब कर लेते हैं। माने, इतने सारे लोग एक साथ पेशाब तो कर सकते हैं, पर पढ़ नहीं सकते? इतने सारे लोगों का दिल एक साथ धड़क लेता है। यह काहे का कुतर्क है कि मास एजुकेशन ऑफ द सेल्फ, इतने सारे लोगों की...। माने, आप ही स्पेशल हो कि आपकी चेतना का तो उत्थान कराया जा सकता है, पर बाक़ी सब लोगों का नहीं कराया जा सकता? क्यों? क्यों? इतने सारे लोग एक साथ फॉर्मल स्कूलिंग में हैं कि नहीं हैं?
तो जब उनकी एक साथ फॉर्मल स्कूलिंग हो सकती है, तो उनकी एजुकेशन सेल्फ में क्यों नहीं हो सकती? इतने सारे लोगों की! पूछ रहा हूँ। अब यह देखो कि प्रतिवाद करने वाला कौन है? कौन कर रहा है? कौन कह रहा है कि, "नहीं, नहीं, नहीं। यह आत्मज्ञान बेकार की चीज़ है, आत्म-शिक्षा अव्यावहारिक है।" यह कौन कह रहा है?
प्रश्नकर्ता: अहंकार।
आचार्य प्रशांत: अहंकार। तो और क्या कहेगा? व्हाट एल्स डू यू एक्सपेक्ट? वो यह बोलेगा, "हाँ, हाँ, हाँ, चलो सबको जल्दी-से-जल्दी आत्मज्ञान की ओर लेकर के, ताकि मैं मर जाऊँ।" तो उससे आप यह उम्मीद रख रहे थे क्या? वो तो यही बोलेगा न।
और देखो, एक बात और मुझे बोलनी है। ये सब न, मत बताया करो कि मैं अपने दोस्तों से बात करती हूँ और अपने कलीग्स से, और क्या बोला किस-किस से करते हो आप?
प्रश्नकर्ता: रिलेटिव्स से।
आचार्य प्रशांत: रिलेटिव्स से बात करते हैं। गिरे हुए लोग हैं, यार। मेरे मुँह से क्यों कहलवाना चाहते हो? आप लोग ऐसे बताते हो जैसे कि वो न, किसी स्टैंडर्ड के लोग हैं, और मैं न उनको कन्विंस कर रही थी। पर उन्होंने न, एक बहुत ही साउंड और जस्टिफ़ाइड आर्ग्युमेंट दिया। वो आर्ग्युमेंट इतना अच्छा था कि, "आचार्य जी, मुझसे न, टैकल नहीं हुआ, तो मैं आपके पास ले आई हूँ।"
आपका अहंकार है कि आप बड़े किसी अच्छे स्तर के आदमी हो। तो इसीलिए आपको लगता है कि आपके आसपास के भी जो लोग हैं, वो किसी स्तर के हैं। मैं कह रहा हूँ, गिरे हुए लोग हैं। तो यह तो कभी अपने लिए समस्या बनने ही मत दिया करो कि मेरी बात मेरे घर वालों ने नहीं सुनी, या सहपाठियों ने नहीं सुनी, या सहकर्मियों ने नहीं सुनी। वो नहीं सुनेंगे। क्योंकि आप जिन माहौल़ों में काम कर रहे हो, वो अच्छे माहौल नहीं हैं। वो लोग अच्छे नहीं हैं। पर आप ये मानने को तैयार नहीं होते। उल्टे आपका तर्क क्या होता है?
“हाँ, आचार्य जी, आपकी बात मैं लेकर के गई थी। मैंने न, अपने ऑफिस के दस कलीग्स से बात करी। किसी ने भी आपकी बात नहीं मानी।" इससे क्या प्रूव होता है? कि पहली बात तो आपकी बात कुछ ठीक नहीं है। क्योंकि मेरे महान कलीग्स आपकी बात मान नहीं रहे। और दूसरा, कोई नहीं मान रहा आचार्य जी आपकी बात। बस मैं आ रही हूँ आपकी तरफ़। देखा, मैं एहसान कर रही हूँ आपके ऊपर। कोई भी नहीं आना चाहता आपकी ओर, और मैं आ रही हूँ बस, मैं एहसान कर रही हूँ आपके ऊपर।
आपके आसपास के जो लोग हैं, वो अच्छे लोग नहीं हैं। और यह बात आपको पता है, इसीलिए आप मेरे पास आए हो। आप जिन माहौल़ों में हो, अगर वो माहौल आपके लिए अच्छे ही होते न, तो आप यहाँ नहीं बैठे होते।
कड़वा? ग़लत?
यहाँ जो भी आता है, थोड़ा तो यह एहसास लेकर के आता है कि ज़िंदगी बेवकूफ़ बना रही है। नहीं तो सैटरडे नाइट है, भाई। सैटरडे नाइट यहाँ कौन आएगा ऐसे बैठने के लिए? यहाँ वही आएगा, जिसको पता है कि सैटरडे नाइट पर आपकी दुनिया जो कर रही है, वो आपके लिए ठीक नहीं है। तो यह तो बड़ा विरोधाभास हो गया, आप ही की ओर से। उन्हीं लोगों ने आपको दुखी करा है इसीलिए आप यहाँ आए हो। स्वीकारो इस बात को साफ़-साफ़। और फिर यहाँ आकर कहते हो, "आचार्य जी, आपकी बात वो लोग नहीं मानते, कहीं आपकी बात ग़लत तो नहीं?"
मेरा सिद्धांत खरगोश को बचाने का है, खरगोश को बचाने का सिद्धांत खरगोश का शिकारी क्यों मानेगा, भला? मेरी बात और कोई मान भी ले, तुम्हारे आसपास के लोग तो बिल्कुल नहीं मानेंगे। क्योंकि उन्हीं से तो तुमको बचाया है मैंने। जताना ज़रूरी है, जताता कम हूँ पर ज़रूरी है कि जताऊँ। नहीं तो आप लोग बड़े मुग़ालते, बड़ी ग़लतफ़हमी में रहते हो। आप रेस्क्यूड लोग हो। और जिनसे रेस्क्यू किया है, उन्हीं के पास जाकर के मासूम बन के जाते हो। कहते हो, "यू नो, यू मस्ट लाइक माई आचार्य।" वो कह रहा है, “आई विल किल दैट बास्टर्ड। ही स्टोल माई मील।”
ये अच्छे लोग नहीं हैं, गेट दैट स्ट्रेट। और वो अच्छे लोग होते, तो मैं भी उन्हीं के बीच होता।
स्टॉकहोम सिंड्रोम जानते हो न? अपने ही ओप्रेसर से प्यार करने लग जाना। जिन्होंने तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद करी है, उन्हीं का महिमामंडन करने लग जाना। उन्हीं का पक्षधर बन जाना। उन्हीं को कहना, "नहीं, वो आदमी अच्छा ही है।" और बात ज़रा नज़ाकत के साथ किया करो मेरी, जब किसी से करो। यह मेरा-तुम्हारा प्रेम-प्रसंग है, इसको अजनबियों के सामने ऐसे नहीं खोलते। बताया भी जाता है, तो शऊर होता है एक बताने का। एक तरीका होता है, एक टेंडरनेस होती है। बड़ी कोमलता से, फुसफुसाकर बताया जाता है, चौराहे पर नगाड़ा नहीं पीटा जाता।
इस भाव से बोलते हो न, "मेरे कलीग्स, मेरे फ्रेंड्स, मेरे रिलेटिव्स" जैसे पता नहीं कौन-से महानुभाव की बात कर रहे हो। और बात जिसकी हो रही है, वो वो है कि जिसको झुनू भी झुन्नू बोले। पर आदत लग गई है न। "यू नो, माई जीजा जी? बड़ी एमएनसी में जॉब करते हैं।" जीजा! बच के रहना।
पर अब स्वार्थों पर आँच आती है। अगर मान लें कि ये अच्छे लोग नहीं हैं, तो बड़े स्वार्थ टूटेंगे। क्योंकि मक्खन-मलाई तो सब इन्हीं लोगों से हासिल कर रहे हो। बस यहाँ फँस जाता है मामला। अब आ गई है कॉग्निटिव डिसोनेंस। यहाँ हो, तो तुम्हें मेरी बात ठीक लग रही है। पर यही बात ले जब उनके पास जाते हो, जिनसे तुम्हारे स्वार्थ जुड़े हुए हैं तो इन बातों को नकार देते हैं। तुम फँस जाते हो, तुम कहते हो, "फिर क्या सही है? क्या ग़लत है?" जानते तो हो ही क्या सही है, क्या ग़लत है। अब बात यह नहीं है कि सत्य इधर कि सत्य उधर। अब बात है सत्य और स्वार्थ के बीच की, चुन लो।
और एक काम और मत कहा करो। तुम्हारे घर वालों में जो लोग गीता-प्रतिभागी नहीं हैं, उनको बुक साइनिंग वग़ैरह में मेरे सामने लेकर मत आ जाया करो। यहाँ मैं मंच से आपसे थोड़ा कटु हो लेता हूँ। नहीं तो मैं जब नीचे होता हूँ न, तो मैं भी बड़ा संस्कारी आदमी हूँ। कोई मुझसे मिलने आता है, तो मैं भी नमस्कार कर लेता हूँ। उनको भी कर लेता हूँ, जिनको करना नहीं चाहिए। आप लेके आ जाते हो। "आचार्य जी, ये मेरे पति हैं। मिलिए।" मैं क्यों मिलूँ? वो गीता-छात्र हों, तो मिलूँगा; नहीं तो क्यों मिलूँ? और फिर वह कोई बकवास-सी बात करके चला जाएगा।
"हाँ, हाँ, हाँ, हाँ... नहीं, मैंने सुना था एक दिन आपको डेढ़ मिनट के लिए और मुझे लगा कि आदमी कुछ बातें ठीक कर रहा है। और इसके अलावा वो फलाने-वो हैं, वो फलाने-वो गुरु, वो योगाचार्य, महाशास्त्री, मैं उनको सुनता आया हूँ।"
तुम यह क्यों कर रहे हो, अत्याचार मेरे ऊपर? सिर्फ़ इसलिए कि "मेरे पापा हैं", "मेरे पति हैं"। तो इसीलिए अच्छे ही आदमी होंगे न? "चलो, आचार्य जी से मिलो।" और जलील आदमी है। जिसके घर में कोई व्यक्ति गीता-छात्र है, उसके बाद भी वो गीता-छात्र नहीं बन रहा, उससे गिरा कोई हो सकता है? जिन तक ख़बर पहुँची ही नहीं, उनको तो फिर भी माफ़ कर सकते हैं।
पर जिनके घरों तक डंका पिट चुका है, जिनके घरों में ख़ुद गीता-छात्र बैठा हुआ है, और फिर भी वो गीता नहीं सुनते, वो आदमी जलील नहीं है तो क्या है?
और ऐसे आदमी को क्यों मेरे सामने लेकर आते हो? पर खूब करते हो। जैसे फैमिली अफेयर हो। "आचार्य जी, प्लीज़ मीट माई वाइफ़।"
ओह, व्हाइ शुड आई मीट योर वाइफ़? एंड इफ़ आई ट्रूली मीट हर, व्हाट इफ़ शी लीव्स यू बिकॉज़ शी विल? ये अच्छे लोग नहीं हैं। जिसके घर में कोई व्यक्ति गीता-छात्र है और वो फिर भी नहीं सुन रहा, वो तो ख़ासतौर पर गिरा हुआ आदमी है। जिसके ऑफिस में कोई कॉलीग है, जो उन्हें साफ़-साफ़ दिखा रहा है कि ये गीता सत्र हैं, ये ऐप है, और ऐसा होता है; उसके बाद भी वो डिसमिसिव है, कन्टेम्प्चुअस है, वो आदमी नहीं है। वो नराधम कीड़ा है। तुम उसके बात मुझे क्या बताने आए हो कि "मेरे कॉलीग्स ऐसा नहीं मानते। मास एजुकेशन ऑफ द सेल्फ को समझते नहीं हैं।"
आपके लिए कोई होगा इंसान बड़ा, मेरे लिए दो ही तरह के लोग होते हैं, जो सच के साथ हैं, जो सच के ख़िलाफ़ हैं। और जो राम का नहीं, वो मेरा नहीं। आपके होते हैं बहुत तरीके के हाइड्रा-हेडेड रिश्ते, कि एक रिश्ता इससे ही बना लो, एक उससे भी बना लो, एक उससे भी बना लो। मेरे सारे रिश्ते एक फ़िल्टर से होकर गुज़रते हैं। जो उस फ़िल्टर को पार कर जाएगा, उससे मेरा रिश्ता बनेगा। जो नहीं करेगा, नहीं बनेगा। मेरा खेल बहुत सीधा है।
और अभी मेरी बात जैसे भी लग रही हो, अगर तुम ज़िंदा रहे और मैं ज़िंदा रहा, तो एक दिन धन्यवाद दोगे कि "आचार्य जी, आपने बिल्कुल ठीक बोला था। यह आदमी अच्छा नहीं था।"