
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम सत्यम है और मैं यहाँ पर सेकंड ईयर का बीटेक का स्टूडेंट हूँ। और मैं लगभग आपको दो-ढाई साल से इदर ऑन यूट्यूब और ऑन द ऐप सुन रहा हूँ। और बहुत सारे चेंजेस आए हैं। एंड आई कांट बिलीव कि मैं स्क्रीन पर देखते-देखते पहली बार आपको आज लाइव देख रहा हूँ।
तो आपको सुन के आचार्य जी बहुत सारे चेंजेस आए हैं, बहुत सारी क्लैरिटी आई। तो मेरा प्रश्न बस ये है कि मैंने बहुत सारे फ्रेंड्स बनाए हैं अपने। बहुत मेरा एक बहुत ही अच्छा पीयर ग्रुप रहा है। बहुत सारे स्किल्ड लोग हैं यहाँ पर आईआईटी में, और बहुत सारी मल्टिपल जगहों पर वो लोग स्किल्ड हैं, बी इट स्पोर्ट्स ऑर बी इट अदर कल्चरल एक्टिविटीज। एंड मैंने उनके साथ बहुत अच्छी मेमोरीज़ और गोल्डन मेमोरीज़ भी अभी तक बनाई हैं। एंड आई विश कि आगे बनाते रहूँ।
बट अभी धीरे-धीरे आपको सुनते-सुनते, जिस तरीके की टीचिंग्स आपने दी हैं और जो चीज़ें आप बताते हैं, बी इट बाय द सेल्फ-इंट्रोस्पेक्शन, और भी अपने जो हमारे व्यूज़ हैं, वो कहाँ से आ रहे हैं, सब पता करना, तो अभी जो मेरा पीयर ग्रुप है या जिन लोगों के साथ मैं इंटरैक्ट करता हूँ, उसमें मुझे यह पर्सनली ये चीज़ लैक होती हुई दिखती है, या ये चीज़ नहीं मिल पाती है मुझे। तो अभी मुझे मुश्किल होता है कि आगे कि मैं ऐसे दोस्त और कनेक्शंस एंड ऑल बनाऊँ। तो इस पर पूछना चाहूँगा।
आचार्य प्रशांत: तो तुम चाहते हो कि मैं जो तुमसे कहता हूँ, तुम्हें बताता हूँ, वैसा ही कुछ तुम्हारा पीयर ग्रुप भी तुमको बता पाए?
प्रश्नकर्ता: सीख सकूँ मैं, या उस सत्य की दिशा में थोड़ा और आगे बढ़ सकूँ।
आचार्य प्रशांत: तो मैं तो फ़िज़ूल ही अपनी ज़िंदगी ख़राब कर रहा हूँ, पीयर ग्रुप से ही सीख लो।
प्रश्नकर्ता: मिलता नहीं है, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: मिलना चाहिए भी नहीं। ख़तरे की बात तब होगी, जब यह लगने लगे कि पीयर ग्रुप ही बहुत बड़ा शिक्षक हो गया। कारण बता देता हूँ। वो पीयर ग्रुप चुना किसने है? वो मित्र-मंडली चुनी किसने है? तुमने चुनी है न? और अहंकार जो कुछ चुनता है वो अपने ही तल का चुनता है। तो तुम्हारे दोस्त भी ले-देकर के, होंगे तुम्हारी ही रेंज में। तो थोड़ा ऊपर, कोई थोड़ा नीचे, उतना हो जाएगा; पर आयामगत अंतर नहीं हो सकता।
ऐसे दोस्तों से बचना, जो गॉडफ़ादर बनकर घूमते हैं कैंपस में। ऐसे हर कैंपस में होते हैं कि, “भाई, उसके पास जाओ, ज्ञान देगा बढ़िया वाला।” और हमारे यहाँ चलता भी रहा है कि अपने आसपास में ही गुरु क्या, भगवान को ही खोज लो। बड़ी बेक़दरी है ज्ञान की, है न? बड़ी बेक़दरी है।
कोई ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त करता है, तो उसको हम बोल देते हैं रियल एस्टेट गुरु। किसी को बोल देते हैं स्टॉक्स गुरु, है न? महिलाओं के लिए तो चला आया कि तुम्हें किसी ज्ञान की ज़रूरत ही नहीं है, पति परमेश्वर ही तुम्हारे गुरु हो जाएँगे। और ऐसा तो लिखा भी हुआ है कहीं-कहीं कि अगर पति को छोड़कर के किसी और के पास गई, पढ़ने-लिखने, समझने कुछ, तो तुझे तो पाप पड़ेगा ही; जो तुझे पढ़ा रहा है, वह नर्क में सड़ेगा।
तुम उसी परंपरा से अपना प्रश्न पूछ रहे हो। कभी कह देंगे, माँ-बाप ही पहले गुरु होते हैं। भाव यह आ गया है भीतर कि आसपास ही सब मिल जाएगा। कोई छोटा बच्चा होगा, उसको बोल देंगे, “यही तो भगवान है।” छोटा बच्चा है, तो भगवान हो गया वो तो उसको, बाल गोपाल है। बेटी है छोटी, तो कह देंगे, “नौ दुर्गा के आसपास की यही देवी है।”
तुम उसी भाव से आ रहे हो कि आसपास जो मेरी मित्र-मंडली है, उसमें ही कोई मिल जाए महाज्ञानी। यह ज्ञान की बेक़दरी है। ज्ञान कोई किताबी बात नहीं होती कि किसी ने जाकर के दो-तीन चीज़ें पढ़ ली होंगी तो हो गया, किताबें भी पढ़नी पड़ती हैं।
पर किताबें सिद्धांत दे सकती हैं, स्वयं को गलाने का साहस नहीं। वह अपना फ़ैसला होता है।
तीस साल पहले तुम्हारी कुर्सी पर बैठा हुआ था। बिल्कुल सेकंड ईयर में ही था, ठीक तीस साल पहले। तो मैं जानता हूँ कि कैंपस में क्या माहौल होता है, और हॉस्टल में रात में क्या ज़बरदस्त शास्त्रार्थ होते हैं, और उसमें कैसे-कैसे लोग बिल्कुल ज्ञानी बन के उभरते हैं। ऐसों से ही बचकर रहना है। तुम्हारे लिए गनीमत है कि तुमको पता तो चल रहा है कि जो आसपास के दोस्त हैं, “सर, वह आप जैसी बात नहीं कर पाते।” यहाँ बहुतों के पास तो ऐसे दोस्त होंगे जो बिल्कुल मेरी ही जैसी बात कर लेते होंगे, उनकी सोचो। और ख़ासकर अगर दोस्त नहीं, दोस्तानी हो, तब तो कभी कह ही नहीं पाओगे कि, “तू बेवकूफ़ी की बात कर रही है।”
जेंडर-स्पेसिफिक ताली मत बजाओ, ये दोनों लिंगों पर बात लागू होती है। क्योंकि दो जने बैठे तो रोमांटिक बातें करते-करते भी ऊब जाते हैं। तो फिर ज्ञान देने लग जाते हैं एक-दूसरे को। कुछ नहीं था करने को, तो एक-दूसरे को गुरु-दीक्षा दे दी। और अब कितनी देर तक रोमांस करते हैं? तो एक ने दूसरे को उपनिषद् पढ़ा दिए, और दूसरे ने उसको क्रिटिकल थ्योरी पढ़ा दी। दोनों ने एक-दूसरे को पीएचडी भी घोषित कर दिया। “जो तुमको पसंद, वही बात कहेंगे। तुम दिन को कहो रात, तो रात कहेंगे।” बचा करो।
और दोस्तों से बचना तो फिर भी एक बार को आसान हो जाए, जो ज्ञानी बने हैं। जो घर में ज्ञानी हैं, उनसे कैसे बचोगे? वो तो कहते हैं, “हमारे पास तो उम्र भी है, अनुभव भी है, और बाप हैं तुम्हारे। हम बताते हैं तुमको असली ज्ञान क्या होता है।” वहाँ बैठ भी जाओगे और बात लगेगी भी इम्प्रेसिव, प्रभावित हो जाओगे। बाप माने आवश्यक नहीं पिता ही, कोई हो सकता है चाचा, ताऊ, इधर-उधर के पड़ोस के शर्मा-वर्मा अंकल, कोई भी। हिंदुस्तान में ज्ञानियों की कमी है? विशेषकर पूर्वी भारत में।
कलकत्ता, पटना, राँची, लखनऊ इन दिनों घूमा हूँ, कितना ज्ञान लिया मैंने! मेरा सिक्योरिटी गार्ड, मेरी कैब का ड्राइवर, सबके आगे मैं नमित होकर के बैठा और उन्होंने मुझे भरपूर ज्ञान दिया। कोई यहाँ नहीं है जो ज्ञान देने से चूकता हो। होटल में रुका हूँ कमरे में वेटर आ रहा है, वो भी कह रहा है, “सर, आपसे एक बात कहनी थी।” मैंने कहा, “हाँ, बोलो।” बोले, “वो आज के सत्र में आप थोड़ा चूक गए।” मैंने कहा, “हाँ, महंत, बताएँ।” वो भी किसी का पिता होगा, किसी का भाई होगा। वो भी गुरु बना बैठा है। मुझ पर उसका बस नहीं चला लेकिन जो लोग उस पर आश्रित हैं, उनका तो वो पक्का गुरु हो गया। मैं तो उसको कह सकता हूँ कि वापस मुड़ जा और दरवाज़े पर लगा दे “डू नॉट डिस्टर्ब”। उसकी पत्नी ये कैसे बोलेगी उसको? पत्नी को तो बैठा के दो घंटा ज्ञान पेलेगा, वो थोड़ी मना कर पाएगी कि, “मूर्ख जैसी बातें कर रहे हो।”
बहुत बड़ी लाइब्रेरी होगी, वहाँ जाओ और जिन्होंने सचमुच ज़िंदगी में कुछ जाना है, उनसे समझो न। ये क्या करोगे, ये दोस्त-यार? यह सब तुम्हारे ही प्रतिबिंब हैं। अपनी छाया से कोई कुछ सीख सकता है क्या? तुम्हारी छाया तुम्हें क्या सिखा पाएगी? हाँ, कभी तुम्हें लगेगा कुछ तुमसे लंबी है, कभी तुमसे छोटी है; पर तुमसे बहुत भिन्न नहीं हो सकती। ऐसे ही सब कैंपस के दोस्त तैयार होते हैं।
अच्छा दोस्त वो है जो बोले कि, “मैं तुम्हें वहाँ ले जाऊँगा जहाँ तुम कुछ सीख सको।” जो यह न बोले कि, “मेरे पास आओ, मैं ही गुरु हूँ। मैं ही सिखा दूँगा।”
कोई मुद्दा उठेगा, जिस पर विचार की, विमर्श की, फ़ैसले की ज़रूरत होगी, तो अच्छा दोस्त ये नहीं कहेगा कि, “आ जा, मैं बताता हूँ, मैं बताऊँगा न।” वो कहेगा, “आओ, मेरे साथ आओ, लाइब्रेरी चलते हैं। आओ, पढ़ते हैं। आओ, देखते हैं औरों ने क्या कहा। या चलो, ह्यूमैनिटीज़ डिपार्टमेंट में कोई प्रोफ़ेसर है, उनसे अपॉइंटमेंट लेते हैं, उनसे कुछ बात करके आते हैं।” वो यह कहेगा न? या वो वही जैसे वो श्रीमान राजपाल यादव, “मैं मुझे सब पता है, आओ।”
दुनिया में कम हुए हैं जानने वाले, पर मानव इतिहास इतना लंबा है कि कम होने के बावजूद उनकी संख्या सैकड़ों में है। और सैकड़ों में सिर्फ़ उनकी संख्या है जिनकी बातें संरक्षित हैं, पुस्तकबद्ध हैं, कैटलॉग्ड हैं। कैंपस के ये जो भी तुम्हारे चार साल या छह साल हैं, यह मौक़ा है पढ़ने का। यह गॉसिप का मौक़ा नहीं होते। अभी तुम्हें बहुत अच्छा लग रहा है बोलना कि, “माय लाइफ़ हैज़ बीन एनरिच्ड बाय माय फ्रेंड्स।” यह बात कितनी खोखली है, कैंपस से निकलने के दो-चार साल के अंदर जान जाओगे। कुछ रहेगा अगर तुम्हारे साथ, तो ज्ञान और कौशल।
जिम जा रहे हो?
प्रश्नकर्ता: यस सर।
आचार्य प्रशांत: लग नहीं रहा। अभी शुरू किया है, जल्दी? हाल में?
प्रश्नकर्ता: नहीं सर। पहले एकदम ख़त्म था, अभी तो...
आचार्य प्रशांत: लेग्स की नहीं करते? फुल बॉडी किया करो।
प्रश्नकर्ता: यस सर।
आचार्य प्रशांत: टेनिस कोर्ट होगा, बैडमिंटन कोर्ट होगा, स्क्वैश कोर्ट होगा, स्विमिंग पूल होगा। कर रहे हो इस्तेमाल, या अपने ये सब चौकड़ी जमा करके ज्ञानबाजी करोगे? यह गॉसिप है, इसमें कोई ज्ञान नहीं होता। और गॉसिप से ज़्यादा बड़ी बर्बादी नहीं होती समय की। हाँ, चूँकि वह गॉसिप करने वाले तुम्हारे ही तल के हैं, तो तुम ऊपर से नहीं देख पाते। तुम्हें पता ही नहीं चलता कि यह बातें बिल्कुल दो कौड़ी की हैं, इनमें कुछ नहीं रखा, कोई दम नहीं है। इम्प्रेस हो जाते हो, प्रभावित हो जाते हो। लगता है, कुछ बड़ी बात कह दी किसी ने। वही जैसे फ़िल्मी डायलॉग्स कई बार इम्प्रेस कर जाते हैं न।
यहाँ से बाहर निकलोगे, तो इतना भी अच्छा नहीं है एम्प्लॉयमेंट सीन कि तुरंत ही तुमको किसी बड़े क्लब की मेंबरशिप मिल जाएगी। जो सुविधाएँ तुमको कैंपस में उपलब्ध हैं, बाहर आसानी से नहीं मिलने वालीं। बिल्कुल ऐसा हो सकता है कि कैंपस से निकलने के 8-10 साल बाद भी तुमको किसी ऐसे क्लब की मेंबरशिप महँगी लगे, जहाँ वो सब फ़ैसिलिटीज़ हैं जो आज कैंपस में मुफ़्त हैं।
आज वो मुफ़्त हैं, तो तुमको लगता है कि इनका क्या करना है, कुछ नहीं। और बिल्कुल मान लो यह कि एकदम हो सकता है कि कोई क्लब हो, जो यही फ़ैसिलिटीज़ देता हो; तुम 10 साल बाद भी उसको अफ़ोर्ड नहीं कर पाओ। पर आज तुम उसका इस्तेमाल नहीं कर रहे। क्यों? क्योंकि जब शाम का समय हो सकता है स्विमिंग सीखने का, तो शाम को तुम निकल जाते हो दोस्तों के साथ कि, “आओ, आओ, बन-मस्का खाएँगे, चाय पिएँगे और बकैती करेंगे।” यही होता है न? झुंड घूम रहे होते हैं अपना इधर-उधर। क्या कर रहे हैं? कुछ नहीं कर रहे हैं। क्या कर रहे हैं? कुछ नहीं कर रहे।
कैंपस में ज़्यादातर लोग तो एवरेज ही होते हैं। और क्या? कुछ नहीं कर रहे होते, चार साल गँवा कर बाहर निकलते हैं। कुछ अपनी *एवरेज, सीजीपीए *चलती है यहाँ पर? क्या चलता है? परसेंटेज? क्या चलता है? सीजीपीए। कुछ एवरेज सा सीजीपीए ले आ लो। छह, सात, आठ इसके बीच में सभी की रहती है आमतौर पर, इससे कम भी नहीं होने देते। इतनी सीजीपीए ले आ लो, निकल जाओ। कोई एवरेज-सी जॉब लग जाएगी, हो गया। तुम एवरेज ही रहने के लिए यहाँ पर आए हो क्या? एवरेज ही रहने के लिए आए हो?
अच्छा दोस्त तुम्हें अपनी ओर नहीं खींचता है। वो कहता है, “साथ, दोनों मिलकर के ऊँचाई की ओर दौड़ लगाएँगे। दोनों मिलकर के वो ऊपर शिखर है, वहाँ दौड़ लगाएँगे। ऊपर रोशनी है।” और ऊपर दौड़ कर जाने में जान लगेगी। तन और मन, दोनों विकसित होंगे। और ऊपर पहुँचेंगे, तो रोशनी मिलेगी। संकेतात्मक बात बोल रहा हूँ। सिम्बॉलिज़्म समझ रहे हो न? अच्छा दोस्त वो नहीं होता, जो कहता है, “आ जा, आ जा, मेरे कमरे में आ जा।” और क्या कर रहे हैं दोनों कमरे में बैठकर के? मिले इसलिए थे कि असाइनमेंट साथ करेंगे, और असाइनमेंट के नाम पर कुछ नहीं, कुछ स्क्रीन खोल ली है, कुछ कर रहे हैं, कुछ कर रहे हैं। जितने तरह के काम होते हैं, जानते ही हो। वो सब चल रहे हैं।
यह कौन-सी दोस्ती है?
क्योंकि तीस साल हो गए हैं एक आईआईटी से ही निकले हुए, इसलिए बता देता हूँ, बहुत हद तक तुम ज़िंदगी में क्या करोगे वह तुम्हारे इन चार सालों से तय हो जाता है। क्योंकि इंसान आसानी से बदलने वाली शय नहीं होती। तुमने अपना व्यक्तित्व, पर्सनैलिटी यहाँ जिस साँचे में ढाल ली, वह साँचा लगभग पूरी उम्र वैसा ही रहता है। जो यहाँ से दबा-दबा-सा, डल, बोर्ड, मीडियॉकर निकल गया, वो पूरी ज़िंदगी वैसा ही रह जाता है।
जब तुम्हें यहाँ पर इतनी सुरक्षा थी, ये जो कैंपस की दीवारें हैं न, ये बड़ी महत्त्वपूर्ण चीज़ हैं, यहाँ से निकल जाओगे तो कोई तुम्हें इतनी सुरक्षा नहीं देने वाला। अभी तुम एक अलग यूनिवर्स में रह रहे हो। यह यूनिवर्स यहाँ से निकलने के बाद नहीं मिलने वाला। जब तुम्हें इतनी सुरक्षा और इतनी सुविधाएँ थीं, अगर तुमने तब भी नहीं सीखा, तो तुम बाहर निकलकर क्या सीखोगे? यह वह जगह है जहाँ तुम्हें ख़ुद को चुनौती देनी है, ख़ुद को तोड़ना है। जानो, सीखो, जितना ज़्यादा पढ़ सकते हो, पढ़ो। और पढ़ना माने मैं टेक्स्टबुक्स की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं ग्लोबल लिटरेचर की बात कर रहा हूँ। और मैं कह रहा हूँ, को-करिकुलर्स में हिस्सा लो। क्लब्स होंगे बहुत सारे कैंपस में। इलोक्यूशन क्लब होगा, ड्रामेटिक्स होगा, डांस होगा, फ़ोटोग्राफ़ी होगा। ये सब है कि नहीं है? पूछ रहा हूँ, मुझे नहीं मालूम। आप बताओ।
प्रश्नकर्ता: हैं।
आचार्य प्रशांत: हैं। तो इनमें हिस्सा लो। और यहाँ नहीं सीखा तो फिर कह रहा हूँ, जब जॉब में जाओगे, तो वहाँ तो जो मालिक लोग हैं उनका एक ही उद्देश्य है कि तुमको निचोड़ कर तुमसे पैसा वसूलें। वो थोड़ी तुमसे कहेंगे कि, “हाँ, हाँ बेटा, 5:00 बजे अब आप घर जाइए अपना टेनिस खेलिए।” और टेनिस का हम नाम ले रहे हैं, तो वो ऐसी चीज़ नहीं होती, जो चार महीने में सीख जाओगे। एक प्लेयर कहला सको, इसके लिए डेढ़-दो साल लगते हैं, कम-से-कम। और डेढ़-दो साल डेडिकेट करने के लिए, समर्पित करने के लिए, बाहर शायद तुम्हें वक़्त न मिले, कभी भी न मिले। यहाँ सीख लिया, तो सीख लिया।
जिन्होंने स्टेज पर कभी नहीं बोला, स्कूल वग़ैरह में, ये वो जगह है जहाँ आओ, स्टेज पर उतरो। चाहे बोलना, चाहे पोएट्री रेसिटेशन, चाहे ड्रामेटिक्स, चाहे डांस। कैंपस बनाया गया है तुम्हारी बेहतरी के लिए। कॉर्पोरेट तुम्हारी बेहतरी के लिए नहीं बनाया गया है, कॉर्पोरेट किसी सेठ के मुनाफ़े के लिए बनाया गया है। दोनों के केंद्र में ही अंतर है। और फिर दोहरा रहा हूँ कैंपस में अपने समय को बर्बाद करने का सबसे अच्छा तरीका होता है यह यारीबाज़ी।
यह भी नोटिस किया है कि एक ही तरह के लोग अपना एक झुंड बना लेते हैं। ऐसा कम होगा कि 9.5 सीजीपीए वाला चार और पाँच सीजीपीए वालों के झुंड में घूम रहा होगा। नहीं मिलेगा, मुश्किल है। जिस तरह के लोग होते हैं न, वो हॉस्टल के अंदर या कि डिपार्टमेंट के अंदर अपना-अपना झुंड बना लेते हैं। वो इको चेम्बर बन जाता है। इको चेम्बर समझते हो? जहाँ जैसे तुम हो, वैसा ही दूसरा; और सब एक-दूसरे की आवाज़ को सुन रहे हैं और वैलिडेट कर रहे हैं। उसमें कहीं भी प्रगति, इम्प्रूवमेंट नहीं है, कुछ नहीं सीखने वाले। और चार साल पलक झपकते बीत जाएँगे।
इंटरनेशनल एक्सचेंज प्रोग्राम है कैंपस में? अगर है, तो कोशिश करो कि बाहर जा पाओ, कुछ सीख के आओगे। यह मत कह देना कि, “अरे, यारी है ईमान मेरा यार, मेरी ज़िंदगी। यार मेरा हॉस्टल में पड़ा हुआ है, क्योंकि चार सब्जेक्ट्स में एफ लगा हुआ है, तो मैं भी फ़्रांस थोड़ी जाऊँगा। मैं भी उसके लिए वफ़ा निभाऊँगा।”
दोस्ती भी दो सशक्त लोगों के बीच हो सकती है। दो कमज़ोर, अज्ञानी लोग क्या दोस्ती करेंगे एक-दूसरे से? वो बस एक-दूसरे का शोषण कर सकते हैं। वो एक-दूसरे पर निर्भर हो सकते हैं, मित्र थोड़ी हो सकते हैं।
डेवलप अ टेस्ट फ़ॉर ग्रेटनेस। ज़रूरी नहीं है कि हर कोर्स में टॉप करो। पर हर सेमेस्टर में एक या दो कोर्सेज ऐसे चुनो कि इन पर दिल आ गया है, और इसमें तो नंबर मेरे आने ही चाहिए। जिसमें ऊँचाई के लिए, एक्सीलेंस के लिए, ग्रेटनेस के लिए ज़रा भी जज़्बा नहीं है, वो इंसान ज़िंदगी में भी बहुत औसत क़िस्म का रहेगा। और उसमें कुछ रखा नहीं है। कोई स्पाइक दिखनी चाहिए तुम्हारी ज़िंदगी में कि एवरेज, एवरेज, एवरेज; पर हाँ, कम-से-कम एक, दो, तीन ये क्षेत्र हैं, जिनमें स्पाइक्स हैं।
“अच्छा, टेबल टेनिस इसमें स्पाइक दिखाई दे रही है। ओके, ठीक है। अच्छा लिखता बहुत अच्छा है, पोएट्री लिखता है, स्पाइक दिखाई दे रही है। ठीक है, ठीक है। अच्छा, डिपार्टमेंटल कोर्सेज़ में अच्छा नहीं करा है, लेकिन बेसिक साइंसेज़ में बहुत अच्छा परफ़ॉर्म करा है, स्पाइक दिखाई दे रही है। कहीं तो दिखाई दे कि जज़्बा है, जान है, नहीं तो वही करते रहोगे, “आ जा, बाहर कैंपस के चाय पी के आते हैं।”
यहाँ पर चलता है वो सब कि दस जने जा रहे हैं इकट्ठे रात में चाय पीने। कभी सोचा है, एंड-टू-एंड उसमें कितना समय ख़राब होता है? पहले तो दस जने निकले हैं, इस प्रक्रिया में ही आधा घंटा लगेगा; क्योंकि छह सो रहे होंगे, दो गाली दे रहे होंगे, एक को ज़बरदस्ती खींचा जाएगा, दो का इंतज़ार किया जाएगा कि, “चलो, उनको भी साथ ले लेते हैं।” फिर धीरे-धीरे, ऐसे टहलते-टहलते, दस जने जाएँगे कहीं पर अब चाय पीने गए हैं। फिर वो वहाँ पर खड़े होकर धीरे-धीरे सुड़केंगे। फिर वापस आएँगे, और फिर सुबह की तीन क्लासेस मिस करेंगे।
और ये सब बड़ा अच्छा लगता है, ऐसा लगता है, “यही तो कैंपस लाइफ़ की वॉर्म्थ है।” थोड़ी रोमांटिक-सी फ़ीलिंग आती है। और रोमांटिक हो जाता है, अगर इस झुंड में एक-आध, दो लड़कियाँ हों, तो। उनको भी तो अपना समय बर्बाद करना है। वो भी कह रही हैं, “हम भी मनुष्य हैं, बर्बाद होने पर बराबर का हक़ है।”
कोर्सेज़ इस तरह मत चुनना। सेकंड ईयर में बोला न?
प्रश्नकर्ता: सेकंड ईयर।
आचार्य प्रशांत: अब इलेक्टिव शुरू होंगे तुम्हारे, या हो चुके हैं?
प्रश्नकर्ता: होंगे।
आचार्य प्रशांत: अब इलेक्टिव शुरू होंगे, इलेक्टिव ये देख के मत चुनना कि आसान कौन-सा है, या मेरे दोस्त कौन-सा ले रहे हैं। ग्रेड किसमें अच्छा लग जाएगा। ऐसे नहीं चुने जाते इलेक्टिव्स। बहुत लोग तो इलेक्टिव्स इस हिसाब से चुनते हैं कि, “अच्छा, कंप्यूटर वाले जो न ले रहे हों, वो ले लो; क्योंकि रिलेटिव ग्रेडिंग है न। कंप्यूटर साइंस वाले जहाँ घुसे हुए होंगे, वहाँ मेरी ग्रेड अच्छी नहीं लगेगी। एवरेज उठा देते हैं सब मिलके। तो जहाँ सब मेरे ही जैसे हों, या मुझसे भी बदतर हों, वो ऑप्शनल ले लो, ग्रेड अच्छी लग जाएगी।”
ऐसे नहीं चुना जाता।
दिल, जज़्बा, स्पष्टता, ईमानदारी, मैं नहीं कह रहा कि हर कोर्स में जान लगा दो। कुछ बेकार कोर्सेज़ होते हैं, पता है, ऐसे ही। ठीक है, उसको निकल जाता है धीरे-धीरे। पर कहीं तो दिखना चाहिए न कि बंदा जवान है। भीतर कुछ आग है।
कुछ जम रही है बात या इररेलेवेंट है ज़्यादातर?
प्रश्नकर्ता: जम रही है, सर।
आचार्य प्रशांत: फिर ठीक है।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।