बच्चों का बचपन साइलेंट मोड पर

Acharya Prashant

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बच्चों का बचपन साइलेंट मोड पर
आज के समय में बच्चों में मोबाइल और गेम का एडिक्शन बढ़ता जा रहा है, जिसका मुख्य कारण खुद माता-पिता की लापरवाही और सुविधा-प्रियता है। समस्या को समझाने से नहीं, बल्कि सीधे नियंत्रित करने से हल किया जा सकता है। इसी तरह सोशल मीडिया तुलना और हीन भावना को बढ़ा रहा है। हर मानसिक समस्या का मूल समाधान आत्म-जागरूकता और सही दिशा में प्रयास है, जिसके लिए व्यक्तिगत पहल जरूरी है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, मेरा नाम आयुष है। अभी हाल ही में गाजियाबाद में मैंने एक न्यूज़ देखा कि तीन माइनर लड़की कोरियन गेम के एडिक्शन में आकर, मतलब, वे उससे इतनी एडिक्ट हो गई थीं कि वो गेम उन्हें कंट्रोल कर था। और लास्ट में वो इस हद तक एडिक्शन में चली गईं कि लास्ट में उन्होंने सुसाइड कर लिया। तो ये बात है कि एडिक्शन आज मैं अपने घर में भी देखता हूँ। मेरे छोटे भाई-बहन हैं, वो भी अभी एडिक्शन के पहले स्टेज में हैं। उनसे अगर फोन छीन लिया जाए तो वे अलग तरीके का व्यवहार करते हैं।

तो मैं ये जानना चाहता हूँ कि ये जो एडिक्शन है, कारण तो हमें समझ में आ रहा है। मैं इसके सॉल्यूशंस पर बात करना चाहूँगा कि मैं उन छोटे बच्चों को कैसे बताऊँ कि हाँ, अब ये गलत है। तो आप इस पर मार्गदर्शन करिए। थैंक यू।

आचार्य प्रशांत: क्यों बताना है? फोन छीन लो न। अब तुम अपना सॉल्यूशन बताओ कि क्या है जो तुम्हें फोन छीनने से रोकता है? तीन जिन बच्चियों की बात कर रहे हो, उन्होंने दो साल से स्कूल जाना बंद कर रखा था। प्रश्न ये भी उठना चाहिए न कि क्या मजबूरी थी कि उनको स्कूल नहीं भेजा गया। क्या मजबूरी थी? तीन बच्चियाँ घर में और तीनों स्कूल नहीं जा रहीं, दो साल से नहीं जा रहीं।

प्रश्नकर्ता: सर, मेरे छोटे भाई-बहन से अगर हम फोन छीन भी लेंगे तो उनकी मम्मी ही बोलेगी कि, “नहीं बेटा, दे दो, थोड़े समय के लिए।”

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो फिर समस्या मम्मी में है न। समस्या मम्मी में है न।

प्रश्नकर्ता: तो सर, अगर एडिक्शन हो ही गया है।

आचार्य प्रशांत: हो ही गया है नहीं, एडिक्शन की आग में लगातार ईंधन डाल रहे हैं माँ-बाप ख़ुद। और माँ-बाप इसलिए ईंधन डाल रहे हैं क्योंकि माँ-बाप बच्चों को सही प्रक्रिया में ले जाने में जो निवेश और ऊर्जा लगती है, वो करना नहीं चाहते। आसान लगता है, कि चलो, बच्चा अपने मोबाइल में मुँह डालकर पड़ा हुआ है, पड़ा रहने दो। नहीं तो बच्चे से मोबाइल छुड़ा लेना कौन-सी मुश्किल बात है।

आप बोलोगे, नहीं पर बल प्रयोग नहीं करना चाहिए। अच्छा, तो ज़हर खा रहा होगा तो बल प्रयोग नहीं करोगे? उसके हाथ में मोबाइल है, तुमने ही दिया है न। जैसे दिया था, वैसे वापस ले लो। बात ख़त्म हो गई। तुम कह रहे हो, नहीं, मोबाइल तो हम उसको देंगे। आप बताइए कि ज्ञान-मार्ग पर कैसे ले जाएँ, कि मोबाइल लिए लिए भी उसे एडिक्शन न हो। तुम कहानी इतनी बढ़ा क्यों रहे हो? जस्ट कट द गॉर्डियन नॉट।

एक जगह हुआ करती थी यूनान में। वहाँ पर किसी पुराने फ़कीर ने जाकर एक गाँठ बाँध दी थी। ठीक है? कहते हैं कि एक भैंसागाड़ी थी, ऑक्स-कार्ट था तो उसमें जाकर, उसे किसी पेड़ से बाँध दिया गया होगा। कहीं पर किसी सार्वजनिक स्थल पर जाकर एक गाँठ बाँध दी थी। और उसके बाद ओरेकल ने कहा था; ओरेकल माने, समझो, भविष्यवक्ता, उसने कहा था कि जो इसको खोल देगा, वो एशिया पर राज करेगा। सिकंदर को ये बात बताई गई, सिकंदर वहाँ गया। देखा, वो गाँठ है, और पता नहीं कितने आए, कितने गए किसी से खुलती नहीं। उसने तलवार निकाली, काट दिया, बोला, ख़त्म।

बोल रहा है, कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जिनका समाधान समस्या ही द्वारा तय की गई शर्तों पर नहीं किया जा सकता। इस समस्या ने ये शर्त लगाई थी, कि मुझे सुलझाओ। मैं तुझे सुलझाऊँगा नहीं, मैं तुझे ख़त्म कर दूँगा। मुझे अगर समस्या पसंद नहीं है, तो समस्या ने ही जो शर्त रखी है, मैं उसको मानूँ क्यों? समस्या कह रही है कि गाँठ को खोलो। मैं खोलूँ क्यों? खोलने की शर्त किसने रखी है? ख़ुद समस्या ने। मैं क्यों खोलूँ? मैं काट दूँगा।

क्यों तुम्हें उनके मोबाइल में तरह-तरह के फ़िल्टर लगाने हैं? छीन लो न। कट द गॉर्डियन नॉट।

समस्या से उसी के तल पर जाकर नहीं जीता जा सकता। समस्या की शर्तों को मानकर तुम समस्या को कभी नहीं हरा पाओगे।

और वो गाँठ बाँधी ही इस तरह से गई थी कि कभी खुल ही नहीं सकती। सिकंदर ने कहा, खोलने-वग़ैरह का हमारा कुछ नहीं है। तलवार निकाली, काट दिया, और सचमुच उसने एशिया पर राज करा।

आप लोग भी ये खूब करते हो, जैसे आपने भी जो प्रश्न पूछा था, उसमें यही बात निहित थी कि “वो मैं समझा रही हूँ कि आचार्य जी की बातें सुनो, किताब पढ़ो, गीता देखो। वो समझते नहीं हैं।” उन्हें समझाना नहीं है। उनका रास्ता समझ का नहीं है, उनका रास्ता ये है, बल। वो गाँठ कभी खुलने वाली नहीं थी, उस पर वैचारिक काम सफल नहीं हो सकता था। आप सज्जन बनकर लगे ही रह जाते कि गाँठ को धीरे-धीरे खोलूँगा सज्जनता, शालीनता के साथ। वो गाँठ हज़ार साल में भी नहीं खुलनी थी, उसका एक ही तरीका था, तलवार, बल।

और आप जितना ध्यान दोगे, उतना आपको मेरी बात स्पष्ट होगी कि हाँ, ये बात तो सही है। बच्चे के हाथ में मोबाइल हो ही क्यों? क्या कर रहा है? क्या सीख रहा है ऐसा? क्या सीख रहा है ऐसा कि उसके हाथ में मोबाइल देना ज़रूरी है? और अगर कोई ऐसी बात है ही यूट्यूब वग़ैरह पर, जो उसको दिखानी है, तो माँ-बाप खुद उसे टीवी पर प्रोजेक्ट करके दिखा दें। अपने मोबाइल से कनेक्ट कर दें। टीवी पर दिखा दें कि “बच्चे, आ बैठ। आधे घंटे के लिए तुझे ये दिखाना चाहता हूँ।” देख लिया। मोबाइल क्यों उसको मिल रहा है छूने के लिए?

माँ-बाप स्वार्थी हैं और माँ-बाप आलसी हैं। बच्चा जब मोबाइल में लगा होता है न, बाप को और बाप से ज़्यादा माँ को बड़ा आराम हो जाता है। मोबाइल में मुँह डालकर बैठा है, अब परेशान नहीं करता। बस ये बात है। नहीं तो क्या करेगा? शोर ही तो मचाएगा, मचा ले। और शोर भी बहुत नहीं मचता है। शोर भी तभी तक मचता है जब ये आशा होती है बच्चे को कि शोर मचाकर कुछ मिल जाएगा। जब समझ जाता है कि शोर मचाते रहो कुछ मिलना नहीं है, तो शोर मचाना बंद कर देता है।

मैं आठवीं तक था। हमारे घर में टीवी रखा हुआ था, वो कलर वाला था उसमें कनेक्शन ही नहीं था। एक छोटा-सा पोर्टेबल ब्लैक एंड व्हाइट था, और उसमें भी बस दूरदर्शन आता था, वो भी यदा कदा लगता था। मुझे तो नहीं लगता कि मैंने, या घर में और किसी ने, ज़िद करी कि नहीं, नहीं, नहीं, चाहिए ही चाहिए। वरना आप कह सकते हो कि जैसे आज मोबाइल है, वैसे तब टीवी था।

और दूसरे छात्र क्लास में आकर बताते थे, तब केवल नया नया आया थे कि मैंने केबल टीवी पर ये देखा, केबल टीवी पर वो देखा। केबल टीवी छोड़ दो, हमारा यहाँ दूरदर्शन भी नहीं चल रहा है। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा, इच्छा भी नहीं होती थी। एक अच्छी मूवी मम्मी ख़ुद चुनकर के, लगभग हर हफ़्ते, उसका वीडियो कैसेट मँगाकर दिखा देती थीं। हो गया।

ये बच्चों का बिगड़ना, ये चीज़ मुझे समझ में ही नहीं आती। ये जो कहते हैं, “बच्चे बिगड़ गए, ये कर गए, वो कर गए।” कैसे बिगड़ जाते हैं? माँ-बाप बच्चों के बिगड़ने में शामिल न हों, तो बच्चा बिगड़ ही नहीं सकता।

मैंने देखा हुआ है सार्वजनिक जगहों पर, एक देखा, इतना-सा था वो, पता नहीं लड़का था या लड़की जो भी। पहले तो उसने अपनी माँ के जितने हो सकते थे, बाल खींचे। पहले तो वो रोया खूब, माँ के खूब बाल खींचे। उसके बाद उसने उँगली डालकर यहाँ पर माँ के कान में (कान की बाली खींचने का ईशारा करते हुए)। समझ रहे हैं क्या? और खून, माँ का खून बह रहा है।

ये मेरी समझ से बाहर की बात है। ये बच्चा ख़राब किया गया है, इसे सिर चढ़ाया गया है, और ये बात प्रेम की नहीं है।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आचार्य जी।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम डॉक्टर अनीश कुमार है। मैं यहाँ रांची कॉलेज में पढ़ाता हूँ। मेरे एक चेतना आया है दिमाग में, कि आजकल सोशल मीडिया इन्फीरियर कॉम्प्लेक्सिटी बहुत ज़्यादा हो रही है। जो स्टेट यूनिवर्सिटी में बच्चे पढ़ रहे हैं, वे कंपेयर कर रहे हैं कि वे आईआईटी के बच्चे नहीं बन पाए, एनआईटी नहीं जा पाए।

जो गाँव के बच्चे हैं, अगर गाँव में कोई कंटेंट क्रिएटर बन रहा है, सारे लोग सोशल मीडिया में एक्टिव हैं। वो देख रहे हैं कि वो सोशल मीडिया पर इतना एक्टिव है, उसको इतना सम्मान मिल रहा है। तो बच्चे के पास उतना आत्मज्ञान नहीं है, सब कोई उससे प्रभावित हो रहे हैं। सो अपने अंदर एक तुलनात्मक आत्मग्लानि सबके अंदर जागृत हो रही है। हमारे एजुकेशन सिस्टम में गीता तो है नहीं, जहाँ पर मेबी इसका सॉल्यूशन मिल सकता है। तो इसका सॉल्यूशन क्या है? लाइक, प्रभावित बहुत ज़्यादा लोग हो रहे हैं इसके चलते।

आचार्य प्रशांत: यही बात कर रहे हैं। अलग-अलग बीमारियाँ हम गिनते रहेंगे तो अनंत हैं, समाधान तो सबका एक ही है रामबाण, जो काम आपकी संस्था कर रही है। बाक़ी इसमें आप अलग-अलग तरीके की बातें बताइए। आप ये कह सकते हैं कि लोग अपना समय इसमें ख़राब कर रहे हैं। कोई इसमें कुछ कर रहा है। कोई समस्या आप युवाओं की बता सकते हैं, कोई बच्चों की बता सकते हैं, कोई वृद्धों की बता सकते हैं। पर किसी भी दिशा की, कोई भी मानसिक समस्या हो, उसका समाधान तो वही है न, जो आप तक ला रहे हैं।

प्रश्नकर्ता: तो इतना ज़्यादा, सबके पास लाइबिलिटीज़ हैं, सब परेशान हैं कुछ-न-कुछ चीज़ों से, तो उसका सोल्यूशन तक पहुँच ही नहीं पा रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: तो पहुँचाइए।

प्रश्नकर्ता: एजुकेशन सिस्टम में है नहीं वो।

आचार्य प्रशांत: सिस्टम बनाना पड़ता है। मैंने भी एक सिस्टम बनाया, तो आप तक पहुँचा हूँ। आप भी आगे बढ़िए। उम्मीद करने से, या शिकायत करने से कि कोई सिस्टम हो जाए या कोई सिस्टम बना दे, नहीं हो जाएगा। नहीं है ऐसा सिस्टम, तो आप खड़े हो जाइए। आप बनाइए। छोटी शुरुआत करिए, आगे बढ़ते जाइए।

प्रश्नकर्ता: सर, ऐसा मेरा भी इसमें सहमति है। और मैं कुछ-कुछ करते रहता हूँ।

आचार्य प्रशांत: बस, ठीक है। आगे बढ़िए।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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