प्रेम कोई सामाजिक स्वीकृति, विवाह या रोमांटिक आकर्षण नहीं, बल्कि अहंकार के मिटने की प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम अनुमति नहीं मांगता और न ही हार्मोन या परंपरा से पैदा होता है; वह सत्य और मुक्ति की ओर भीतर की यात्रा है। इसी तरह अहंकार सफलता पाने के लिए खुद को नहीं मिटा सकता — क्योंकि जब तक "मैं" बना हुआ है, तब तक हर त्याग, चाहे परिवार का हो, मित्रों का हो या स्वास्थ्य का, अहंकार का ही एक रूप रहता है। सही कर्म योजना बनाकर नहीं, बल्कि झूठे प्रभावों और बंधनों से मुक्त होकर स्वतः प्रकट होता है।
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प्रश्नकर्ता: गुड इवनिंग, सर। सर, मेरा क्वेश्चन यह है कि जैसे पॉप कल्चर में बहुत सारे कपल्स रहे हैं, लैला-मजनूँ, रोमियो-जूलियट। इसको रोमांटिसाइज़ तो बहुत लोग करते हैं, सब लोग करते हैं। लेकिन जब ख़ुद के ऊपर अमल करने की बात आती है, तो फैमिली में अगर कोई यह बात लेकर जाता है, जैसे पेरेंट्स से कि, “पापा, मुझे लव मैरिज करनी है,” या फिर, “मम्मी, मुझे लव मैरिज करनी है,” वहाँ पर उनका होता है कि जाति अलग है, धर्म अलग है। तो इस डुअलिटी के ऊपर आपके क्या थॉट्स हैं?
आचार्य प्रशांत: मेरे थॉट्स से क्या फ़र्क़ पड़ता है? सारी समस्या यही है कि तुम दूसरों के थॉट्स पूछते रहते हो। ज़िंदगी तुम्हारी, इश्क़ तुम्हारा, किसी और के थॉट्स पूछ ही क्यों रहे हो? पहली गलती तुमने यहीं पर कर दी। घर में चले जाते हो किसी की परमिशन लेने। यहाँ मैं आया हूँ, तो मेरे थॉट्स पूछ रहे हो। कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं, जिनमें ईश्वर आ जाए, तो उसकी भी सलाह नहीं ली जाती। बशर्ते वहाँ तुमने चुनाव वृत्ति से नहीं, विवेक से किया है। हाँ, तुम्हारा प्यार अंधा है,




