
प्रश्नकर्ता: गुड इवनिंग, सर। सर, मेरा क्वेश्चन यह है कि जैसे पॉप कल्चर में बहुत सारे कपल्स रहे हैं, लैला-मजनूँ, रोमियो-जूलियट। इसको रोमांटिसाइज़ तो बहुत लोग करते हैं, सब लोग करते हैं। लेकिन जब ख़ुद के ऊपर अमल करने की बात आती है, तो फैमिली में अगर कोई यह बात लेकर जाता है, जैसे पेरेंट्स से कि, “पापा, मुझे लव मैरिज करनी है,” या फिर, “मम्मी, मुझे लव मैरिज करनी है,” वहाँ पर उनका होता है कि जाति अलग है, धर्म अलग है। तो इस डुअलिटी के ऊपर आपके क्या थॉट्स हैं?
आचार्य प्रशांत: मेरे थॉट्स से क्या फ़र्क़ पड़ता है? सारी समस्या यही है कि तुम दूसरों के थॉट्स पूछते रहते हो। ज़िंदगी तुम्हारी, इश्क़ तुम्हारा, किसी और के थॉट्स पूछ ही क्यों रहे हो? पहली गलती तुमने यहीं पर कर दी। घर में चले जाते हो किसी की परमिशन लेने। यहाँ मैं आया हूँ, तो मेरे थॉट्स पूछ रहे हो। कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं, जिनमें ईश्वर आ जाए, तो उसकी भी सलाह नहीं ली जाती। बशर्ते वहाँ तुमने चुनाव वृत्ति से नहीं, विवेक से किया है। हाँ, तुम्हारा प्यार अंधा है, हार्मोनल है, वासनागत है, तो फिर वह दो कौड़ी का है। लेकिन अगर तुम्हारे चयन में, तुम्हारे प्रेम में शुद्धता है, तो इस दुनिया की बड़ी-से-बड़ी हस्ती तुम्हारे सामने खड़ी हो जाए, उसका आदेश क्या, सलाह भी मत सुनना। प्रेम से ऊपर कुछ नहीं होता।
पेरेंट्स ऐसा क्यों करते हैं वह जाने न, उन्हें अपनी ज़िंदगी देखने दो। और पॉप कल्चर में उनको रोमांटिसाइज़ किया गया है। पॉप कल्चर में वह जिस तरीके से तुम्हारे सामने आते हैं, उसमें बहुत कुछ है भी नहीं। वहाँ वह तुम्हारे सामने स्त्री-पुरुष, आदमी-औरत ही बनकर आ जाते हैं। अध्यात्म में उनका अर्थ बहुत अलग और बहुत गहरा होता है। वहाँ पर जो प्रेमी है, वह अहंकार है; और जो बिलवेड है, जिससे प्रेम करा जा रहा है, जो प्रियवर है, वह मुक्ति है, सत्य है, आत्मा है। वहाँ बात पाने की नहीं होती, वहाँ मिट जाने की बात होती है।
“राँझा-राँझा करते-करते आपे राँझा होई।”
यह नहीं है कि हीर ने राँझा को पा लिया, बात यह है कि हीर राँझा बन गई। तुम उसको ऐसे देखते हो कि हीर और राँझा माने कपल जा रहा है। वह कपलबाज़ी की बात नहीं हो रही है, वहाँ जो बात हो रही है, वह सांकेतिक तौर पर बहुत-बहुत गहरी है। और सांकेतिक तौर पर वहाँ पर जब बात राम-सीता की भी होती है, तो वहाँ पर दो व्यक्तियों की बात नहीं हो रही है। मानस में कहते हैं, “सियाराममय सब जग जानी।” वहाँ पर राम और सीता दो व्यक्ति नहीं हैं, दो सिद्धांत हैं। दो ऐसे सिद्धांत हैं, जो एक-दूसरे से विलग हो ही नहीं सकते, जैसे शिव और शक्ति।
हीर कहती है कि मुझे अब हीर बोलो ही मत। मेरी कोई अलग सत्ता, कोई पहचान, कोई इंडिविजुअलिटी, कोई वैयक्तिकता रह ही नहीं गई है, मुझे हीर न आखो कोई। मुझे अगर बोलना भी है, तो अब मेरा नाम क्या बोलो? मतलब समझो, यह बात किसी इंसान की नहीं है। यह बात इंसान के भीतर की है।
तुम्हारे ही भीतर कोई बैठा है, जो प्रेम का प्यासा है, किसी बाहर वाले के नहीं अपनी ही मुक्ति का प्रेम चाहिए उसको।
वहाँ तक पहुँचने के लिए तुम्हारे सामने इन जोड़ियों के आदर्श लाए गए। तुमने उनको इंसानी देह में तब्दील कर दिया, चलो, ठीक है, कोई बात नहीं; पर उनका अर्थ तो समझ लो। तो गहरे अर्थ में, चाहे सोहनी-महिवाल हो, लैला-मजनूँ हो, हीर-राँझा हो, यह सब एक ही दिशा में संकेत देते हैं कि मीरा भी तुम ही हो, और श्रीकृष्ण भी तुम्हारी ही उच्चतम संभावना का नाम है। तुम्हारे भीतर मीरा है और तुम्हारे ही भीतर श्रीकृष्ण है, तुम्हें बाहर निकलकर किसी इंसान को नहीं खोजना है, तुम्हें सबसे पहले ख़ुद को खोजना है।
और जो इंसान अपने भीतर की उस यात्रा पर निकलता है, वह फिर यह सब शिकायतें नहीं करता कि पप्पा नहीं मान रहे, कि समाज परमिशन नहीं दे रहा। यह सब तो बालकों के सवाल हैं। बच्चे छोटे, जैसे दूधमुँहे, उनसे तो प्रेम वैसे भी नहीं होगा। प्यार तो जवानी की बात होती है और जो दूसरे का मुँह देखकर कहे, “परमिशन मिलेगी क्या?”, उसको जवानी कहते नहीं। तो इस तरह के तुम सवाल लेकर आते हो न, कि मेरी ज़िंदगी में लैला आ गई है, पर फूफी नहीं मान रही, अब क्या करूँ? या कि मेरी रिलेशनशिप है, पर पापा बोल रहे हैं, “वह कास्ट का मिसमैच है, हम ऊँची जात के हैं, मैं कैसे मान लूँ?” तो इसका मतलब यह नहीं है कि फूफी ख़राब है, कि पापा में कोई दोष है। इसका मतलब यह है कि तुम्हारी ज़िंदगी में प्यार अभी आया ही नहीं है।
प्रेम क्या होता है? यह अगर समझना हो, तो कबीर साहब के पास चले जाना और वहाँ प्रेम की साखियाँ पढ़ना। तो जानोगे प्रेम किसको कहते हैं। जहाँ सम्मान तो छोड़ दो, सिर की भी परवाह नहीं करी जाती, उसको प्यार कहते हैं। "सिर काँटे भुईँ धरे, तब बैठे घर माहीँ। यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नहीं।” यह तुम्हारे ख़ून के रिश्तों का घर नहीं है, खाला माने ख़ून का रिश्ता, मौसी। यह तुम्हारे ख़ून के रिश्तों की बात नहीं है, यह बहुत ऊँची बात है। यहाँ पर इज़्ज़त तो छोड़ दो, इल्म तो छोड़ दो, सिर को भी दाँव पर लगा दिया जाता है। परमिशन नहीं माँगी जाती। पर तब न, जब प्यार असली हो।
हमारा प्यार असली नहीं होता। हमारा प्यार तो कुंडली वाला होता है। गुण नहीं मिल रहे, जात नहीं मिल रही, गोत्र का लफड़ा है, इकोनॉमिक स्टेटस मैच नहीं कर रहा। और बेटा जी और बेटी जी मुंडी हिला रहे हैं, "हाँ, हाँ, हाँ, यह बात तो सही है।" इधर-उधर घूम रहे हैं। कैंपस में भी पहले किसी को देखा, तो उससे हॉरोस्कोप मैच किया। जब सब ठीक है, तब कहा, "अब हमें प्यार होगा", क्योंकि बाक़ी सब मैचिंग-मैचिंग हो चुका है।
यह जो तुम लड़का-लड़की का यह सब करते हो, इसमें प्यार कहाँ है? प्यार कोई इतनी सस्ती चीज़ नहीं होती कि एक उम्र हो गई और हार्मोनल सीक्रेशन शुरू हो गए, तो तुम्हें इश्क़ हो जाएगा। बहुत गहरी ज़िंदगी चाहिए और बहुत साफ़ और सच्चा इंसान चाहिए प्यार के लिए। हम वैसे होते नहीं, ज़्यादातर लोग इसीलिए मर जाते हैं, पर उन्हें प्यार कभी पता नहीं चलता, क्योंकि प्यार ऐसा नहीं है कि उम्र के साथ आ जाएगा, कि शादी के साथ आ जाएगा। "शादी कर दो, शादी कर दो, फिर प्यार तो अपने आप हो जाएगा।"
ऐसे नहीं हो जाता, उम्र भर नहीं होगा, एक पल नहीं मिलेगा प्रेम का।
प्रेम अर्जित किया जाता है। अपने गीता सत्रों में हम कहते हैं, प्रेम सीखना पड़ता है। उम्र और अनुभव के साथ प्रेम नहीं आ जाता।
हार्मोन्स के साथ प्रेम नहीं आ जाता। हार्मोन्स के साथ हार्मोनल अट्रैक्शन आ जाएगा, सेक्सुअल एक्टिविटी आ जाएगी, प्रेम नहीं आ जाएगा।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम शिवांश अरोरा है। और सर, रिसेंटली आई केम टू नो अबाउट फोर बर्नर थ्योरी। हर इंसान का जीवन चार स्तंभों के ऊपर खड़ा रहता है, फैमिली, फ्रेंड्स, हेल्थ और वर्क। और जितने भी सक्सेसफुल लोग हैं, उन सभी में से हर किसी ने एक-न-एक स्तंभ को अपने जीवन से निकाला है। जैसे कई लोगों ने अपनी फैमिली को हटाया है, कई लोगों ने दोस्त नहीं बनाए, कई लोगों ने अपनी हेल्थ पर ध्यान नहीं दिया। जैसे आचार्य जी, आप हैं, आपने भी शादी नहीं की। तो आप आज इतने सक्सेसफुल हैं कि आपको सुनने के लिए सैकड़ों लोग बैठे हैं।
तो मेरा प्रश्न यह है कि क्या मैं भी ऐसे ही किसी एक स्तंभ को अपने जीवन से निकालूँ? मतलब कि अगर मैं शादी न करूँ तो…
आचार्य प्रशांत: कहाँ से यह थ्योरी आई है? किसकी है?
प्रश्नकर्ता: यह मैं गूगल में एक आर्टिकल पढ़ रहा था। उसमें लिखा हुआ था। देखा जाए, तो जितने भी बड़े लोग हैं, उनकी भी वाइफ़ नहीं है। उन्होंने भी शादी नहीं की है।
आचार्य प्रशांत: तुम कुछ भी पढ़ लेते हो? मैं पूछूँ, तुमने प्लेटो को पढ़ा? तुम कहोगे, "नहीं पढ़ा।" मैं कहूँ, मार्कस ऑरेलियस को पढ़ा? तुम कहोगे, "नहीं पढ़ा।" मैं आगे बढ़ूँ। मैं कहूँ, स्पिनोज़ा को पढ़ा? तुम कहोगे, "नहीं पढ़ा।" वोल्टेयर को पढ़ा? "नहीं पढ़ा।" सार्त्र को पढ़ा? "नहीं पढ़ा।" हाइडेगर को पढ़ा? "नहीं पढ़ा।" भारत में आऊँ, उपनिषदों को पढ़ा? "नहीं पढ़ा।" गीता को पढ़ा? "नहीं पढ़ा।" सांख्य सूत्र पढ़े? "नहीं पढ़े।" क्या पढ़ा? चार खंभों की थ्योरी!
कहाँ से ले आए यह? क्यों ले आए? क्यों पढ़ रहे हो? जीवन बहुत छोटा-सा है, अभी बीत जाएगा, समय सीमित है। यह क्या पढ़-पढ़ के ज़िंदगी बिता रहे हो? इंस्टा ज़्यादा देखते हो, रील्स तुम्हारे शिक्षक हो गए।
और बात यह नहीं है कि यह थ्योरी प्रसिद्ध नहीं है, मैं इसलिए इससे इंकार कर रहा हूँ। तुम्हारी थ्योरी सुन ली मैंने, मूर्खता की थ्योरी है, इसलिए इससे इंकार कर रहा हूँ। और इस थ्योरी के हिसाब से तुम किसी को भी बड़ा आदमी बोल दोगे कि जीवन से चार चीज़ें निकालनी पड़ती हैं। क्या खंभा? पहला खंभा क्या निकालना पड़ता है?
फैमिली, फ्रेंड्स। और? आप बताओ न, आप ही तो कुछ बोल रहे थे। क्या था?
प्रश्नकर्ता: फैमिली, फ्रेंड्स, हेल्थ या फिर अपना वर्क।
आचार्य प्रशांत: फैमिली, फ्रेंड्स, हेल्थ, वर्क। सही जीवन में चार नहीं निकालने पड़ते, एक निकालना पड़ता है उसका नाम होता है अहंकार। और वह एक निकाल दिया, तो जीवन सार्थक हो जाता है। उस एक को नहीं निकाला, तो तुम चार को नहीं, चार सौ को निकाल दो, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
इतनी आसानी से कोई किताब मत उठा लिया करो। 99.9% किताबें पढ़ने लायक नहीं होतीं। तुम्हारे समय की बर्बादी हैं। बर्बादी ही नहीं हैं, वे तुम्हारे मन को विषाक्त कर जाएँगी। ठीक वैसे जैसे, ये खाने लग जाऊँ, क्या मैं ये (ग्लास को उठाते हैं)? यह सब कुछ जो दिख रहा है खाने के लिए है? चार खंभे हैं! खाओ! ये, एक, दो, तीन, चार। जैसे सब कुछ मुँह के भीतर नहीं डाला जा सकता, वैसे ही सब कुछ मन के भीतर भी नहीं डाला जा सकता, भाई। भले ही वो किसी किताब की शक्ल में क्यों न हो, भले ही वो किताब किसी लाइब्रेरी में क्यों न रखी हो, या टॉप बुक स्टोर में क्यों न रखी हो, या जो बेस्ट सेलर शेल्व्स होती हैं, उनमें क्यों न रखी हो। 99% बेस्ट सेलर्स नॉनसेंस होती हैं। पढ़कर के अपना दिमाग ख़राब मत कर लेना।
“जीवन से फ्रेंड्स निकालने हैं।” गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन के क्या हैं? बार-बार कहते हैं, अर्जुन, “सखा।" और तुम्हारी ये थ्योरी कहीं अर्जुन ने पढ़ ली होती, तो गीता ही न मिलती हमें। अर्जुन सबसे पहले बोलते, "जीवन से फ्रेंड को निकालो।" अर्जुन के तो परम सखा श्रीकृष्ण ही थे। श्रीकृष्ण अर्जुन के गुरु बाद में थे, सखा पहले थे। वो तो निकाल देते, बोलते, "दोस्त तो होने ही नहीं चाहिए जीवन में, निकाल दो।"
बात दोस्तों को जीवन से निकालने की नहीं है, बात जीवन में सही दोस्तों को रखने की है। और गलत दोस्त जो जीवन में लाता है, उसको बोलते हैं अहंकार। जब वो नहीं होता, तो अपने आप सत्संगति हो जाती है। अपने आप राइट कंपनी हो जाती है। अपने आप फिर तुम्हारे आसपास वही लोग होते हैं, जो इस लायक होते हैं, जिनमें वो श्रेष्ठता होती है, योग्यता होती है।
दूसरी क्या बोली? किसको निकालना पड़ता है? क्या? फैमिली निकालनी पड़ती है?
यहाँ पर हमारे संत लोग गाए हैं, "हम सम बड़ा कौन परिवारी।" उन्होंने कहा है कि पूरी दुनिया हमारा परिवार है। गृहस्थ लोग तो छोटा-मोटा परिवार चलाते हैं, पाँच-सात लोगों का, दो लोगों का चला लिया परिवार। ज्ञानियों ने गाया है, "हमसे बड़ा कौन परिवारी है?" हमारे परिवार में तो सब आते हैं। और तुम कह रहे हो फैमिली निकालनी है! फैमिली नहीं निकालनी है। यह जो फैमिली की व्यर्थ की परिभाषा है, वो हटानी है। फैमिली नहीं हटानी है, फैमिली की संकीर्ण, संकुचित परिभाषा हटानी है। क्यों तुम कह रहे हो कि जिससे तुम्हारा देह का और ख़ून का रिश्ता है, मात्र वही तुम्हारी फैमिली है? क्यों कह रहे हो?
अगर देह और ख़ून के रिश्ते की बात करनी है, तो गीता का ही जो उदाहरण चल रहा है, इसको और आगे बढ़ा लो। रिश्ते में तो श्रीकृष्ण अर्जुन के बहुत निकट संबंधी नहीं थे। आ रही है बात समझ में? और जो सामने खड़े थे, वो अर्जुन के कोई बहुत दूर के संबंधी नहीं थे। कर्ण तो सीधे-सीधे अर्जुन के बड़े भाई थे, और दुर्योधन भी भाई ही लगते थे रिश्ते में। गीता सिखा रही है, फैमिली की यह परिभाषा गलत है, जहाँ तुम कहते हो कि किसी से ख़ून का रिश्ता है, तो वो भाई हो गया। ख़ून के रिश्ते से भाई नहीं हो जाते। चेतना के रिश्ते से भाई होते हैं। नॉट ब्रदर्स इन ब्लड, बट यस, ब्रदर्स इन स्पिरिट।
ख़ून के तो जितने रिश्ते थे, उन सबका तो अर्जुन को ख़ून बहाना पड़ा। भीष्म भी ख़ून के रिश्ते के थे, और वहाँ जो सौ खड़े हुए थे आगे, भाई, वह सब ख़ून के रिश्ते के थे इनके। सबका तो ख़ून बहाना पड़ा। और फैमिली बनकर बहुत सारे जो खड़े हुए हैं सचमुच अर्जुन के साथ, उनका अर्जुन से कोई ख़ून का रिश्ता नहीं था। इतने सैनिकों ने अर्जुन के लिए जान दी है, क्या अर्जुन का उनसे रक्त संबंध था? था क्या?
वो घटोत्कच, उसने आकर जान दे दी। उससे दूर का रिश्ता है। वह फिर भीम है, फिर वह दूसरे कुल की और दूसरी रेस की हिडिंबा है, फिर उसका बेटा है। वो आकर के जान दिए दे रहा है अर्जुन के लिए। फैमिली नहीं हटानी है। फैमिली का फ्लॉड कॉन्सेप्ट हटाना है, जहाँ आदमी कहता है, "यह कितनी भी अच्छी हो, यह पड़ोस की है न, तो नाइंसाफ़ी भले होती हो, मैं इसका साथ नहीं दे सकता। और यह कितना भी बुरा हो, यह भतीजा है मेरा, तो मैं इसका साथ दूँगा।" यह फ्लॉड कॉन्सेप्ट है इसको हटाना है।
न्याय देखो, ज्ञान देखो, विवेक देखो, प्रेम देखो। ये पहले आते हैं। ये ख़ून का रिश्ता और इस तरह की फ़िल्मी बातें, यह बहुत बाद में आती हैं। जिधर सच्चाई खड़ी हो, उधर खड़े होना। जिधर ख़ून खड़ा हो, उधर नहीं खड़े हुआ जाता। यह नहीं कि "भाई है। अब भाई अगर नाइंसाफ़ी भी कर रहा है, तो भाई का साथ तो देंगे न।" "मेरा बेटा है, बलात्कारी भी है, तो मैं तो उसका साथ दूँगी न।" ये, इसको हटाना है। और क्या बोली थी? दो बातें? फैमिली, फ्रेंड्स, और क्या था? अरे, जो भी था, हटा दो। जो भी खंभा है, गिरा दो। और इन खंभों पर तुम किसी को भी खड़ा करके महापुरुष बना दोगे। वो खंभों पर ही खड़ा हुआ है, कभी भी गिर जाएगा। कोई भी ऐसे अपनी फ्रेंड्स छोड़ देगा, तुम कहोगे, "महापुरुष है।" यह भी तो हो सकता है कि वो इतना गिरा हुआ आदमी था कि फ्रेंड्स ने लतिया दिया। बात आ रही है समझ में?
फैमिली को छोड़ने से ऐसा कुछ नहीं मिल जाता। मैं जहाँ हूँ, इसलिए नहीं हूँ कि मैंने शादी नहीं करी। कर भी लेता, तो भी क्या हो जाता? कोई मेरा संदेश यह है कि मैं तुम्हारे सामने आया हूँ कुंवारेपन का आदर्श बनकर? भाई, मैं तुम्हारे सामने कुंवारापन सिखाने नहीं आया हूँ। ज़िंदगी में और बहुत बड़ी-बड़ी, ऊँची चीज़ें हैं, मैं उनकी बात करने आया हूँ। शादी न करना कब से बहुत बड़ा आदर्श हो गया? मूर्ख आदमी शादी कर ले, तो भी मूर्ख ही रहेगा; न करे, तो भी मूर्ख ही रहेगा। शादी न करने से तुम कोई महान नहीं हो जाते। और न दोस्तों को छोड़ देने से। और दो खंभे तो बताओ। खंभे कौन-से छूट गए?
श्रोता: हेल्थ।
आचार्य प्रशांत: हेल्थ, यह तो अद्भुत खंभा बताया कि हेल्थ छोड़ दो, तो तुम महान हो जाओगे। हेल्थ छोड़ने से महान कैसे हो जाओगे? कैसे? अब सोचो, अर्जुन टिटहरी की तरह वहाँ ऐसे-ऐसे, और श्रीकृष्ण कह रहे हैं, "गाण्डीव उठा, युद्धस्व।" वो कह रहे हैं, "उठ ही नहीं रहा।" साथी हाथ बढ़ाना। पाँच मिलकर के अर्जुन का धनुष उठा रहे हैं। और तुम्हारी जो भी थ्योरी है, वो आकर बोल रही है, "इन्होंने हेल्थ छोड़ी है, इसीलिए महान हैं। अभी ये स्थितप्रज्ञ हो गए ख़ुद ही।" और जितनी देर में उनको स्थितप्रज्ञ बोला, उतनी देर में वो ऐसे झूम के गिर भी गए।
हेल्थ छोड़ना कहाँ से महानता की निशानी हो गई, भाई? न हेल्थ बनाने से तुम महान हो जाते कि तुम जिम जा रहे हो, तो महान हो जाओगे; न हेल्थ गिराने से तुम महान हो जाते। महानता क्या होती है? यह जानने के लिए समझो पहले कि नीचता क्या होती है। हमारे भीतर कुछ बैठा है, जो गिरे रहने में ही स्वार्थ मानता है; जिसकी वृत्ति यह है कि वह हर घटिया दिशा की ओर आकर्षित होता है। उसी को पहचानना है। उसी ने "मैं" का नाम पकड़ रखा है। इसीलिए उसको अहंकार बोलते हैं। वो "अहम्" बनकर बैठा है, "आई, सेल्फ, आई, सेल्फ।" वह मैं ही है। उसी को ग़ौर से देखना और कहना है, "यार, अगर तू मैं है, तो मुझे मैं जैसा होना ही नहीं।"
इससे नीचता हटती है। उसके हटने के बाद जो बचता है, उसको तुम चाहो तो महानता बोल लो, इतनी-सी बात है। यह खंभे-वंभे गिरा दो।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम अथर्व राठौर है। मैं यूट्यूब के माध्यम से आपको कुछ वर्षों से सुनते आ रहा हूँ और गीता सत्रों में भी कुछ महीनों से मैं हूँ। मैं वीगनिज़्म को भी फॉलो करना चालू कर दिया हूँ।
तो मेरा सवाल यह था कि जैसे मैं भी GATE की तैयारी कर रहा हूँ और मैं जिम भी जाता हूँ। तो उन दोनों ही चीज़ों में कंसिस्टेंसी और डिसिप्लिन की बहुत आवश्यकता है। बट मैं यह पाता हूँ कि डिसिप्लिन हमेशा फॉलो नहीं हो पाती मुझसे। कभी-कभी कुछ हफ्तों में, कुछ महीनों में ऐसा पॉइंट आता है, जो ब्रेक पॉइंट होता है। उसमें जैसे अगर मुझे शुगर नहीं खाना, बट फिर भी मैं मीठा खा लेता हूँ। तीन-चार घंटे पढ़ना है, बट वो नहीं पढ़ पाता। इससे निराशा पैदा होती है और फिर इससे ख़ुद को समझाना पड़ता है मुझे, और फिर से रिस्टार्ट करना पड़ता है। और यह लूप में चलता जाता है।
तो जैसे कि मैंने यूट्यूब के वीडियो से समझा था यह चीज़ कि अगर जीवन का जो लक्ष्य है, जो भी गोल है, वो अगर बहुत ऊँचा होगा, तो जो डिस्ट्रैक्शंस हैं, वो इतनी छोटी लगेंगी कि नज़र ही नहीं आएँगी, और डिसिप्लिन अंदर से आ जाएगा। और गीता में भी सुना था मैंने, समझा था, कि जो कर्ता है, वह जब कर्म करता है, तो उसका कर्मफल उसको उसी क्षण मिल जाता है। और अगर मैं बड़ा कर्म करूँगा, तो बड़ा कर्मफल मेरे को तुरंत मिल जाएगा।
तो मेरा बेसिकली प्रश्न यह है कि मैं बड़ा सही कर्म को पहचानूँगा कैसे? और मैं अपने नज़रिए में उस किसी भी कर्म को या गोल को इतनी ऊँचाई तक ले जाऊँ कैसे कि फिर कोई डिस्ट्रैक्शंस न रहें?
आचार्य प्रशांत: सही कर्म वही है, जिसको पहचानने के लिए तुम होते नहीं हो। "मैं सही कर्म को पहचानूँगा कैसे?" "मैं" है, तो सही कर्म हो ही नहीं सकता। तुम्हारा काम सही कर्म को पहचानना नहीं है, तुम्हारा काम गलत कर्म को पहचानना है। वो ज़्यादा आसान है, क्योंकि सब गलत ही गलत तो कर्म होते हैं। गलत कर्म कैसे पहचाना जाता है? यह देख के कि यह कर्म किन्हीं प्रभावों से आ रहा है।
"मेरा नहीं है।" कोई चीज़ है, जो मेरे ऊपर चढ़ बैठी है। वहाँ से यह कर्म आ रहा है, मेरा नहीं है। गलत केंद्र को हटाया जाता है। गलत केंद्र हटा दिया, उसके बाद सही कर्म स्वतःस्फूर्त होता है। सही कर्म आप नहीं करते, वह अपने आप हो जाता है। आप उसके निर्धाता नहीं होते, आप उसे आयोजित नहीं करते, आप कर्ता नहीं होते। कर्ता की अनुपस्थिति में जो कर्म होता है, वही सही कर्म है। बात आ रही है समझ में?
यह मत पूछो, सही कर्म क्या है? सही कर्म का कोई ब्लूप्रिंट नहीं होता। सही कर्म का कोई प्रोटोटाइप नहीं होता। सही कर्म की कोई पूर्वनिर्धारित छवि नहीं होती। तो सही कर्म के मुद्दे में तुम पड़ो ही मत, उलझो ही मत इस बात से। आप बस यह देखो कि मैं अभी जो कर रहा हूँ, कहीं वह तो नकली काम नहीं है। उदाहरण दूँ?
यह चार लोग न हों यहाँ मंच पर। आप अकेले बैठे हो। आप हो, मैं हूँ। और यहाँ आगे ये सब श्रोता लोग न हों। तो क्या तब भी वही सवाल पूछोगे, जो अभी पूछा? और ये कैमरे न लगे हों, रिकॉर्डिंग का कोई ख़तरा न हो। तो क्या तब भी वही बात करोगे, जो अभी करी? और जैसे अभी करी, वैसे ही करोगे? और अगर पाओ कि इन लोगों की उपस्थिति से, या दर्शकों की उपस्थिति से, या कैमरों के होने से तुम्हारा शब्द, सवाल, तुम्हारा वचन, माने तुम्हारा कर्म बदल गया है, तो मतलब तुम्हारा सवाल फ़र्ज़ी था।
ऐसे देखा जाता है, कि मैं जो कर रहा हूँ, क्या वह सचमुच मेरा है, या उसको किसी ने बाहर से इन्फ्लुएंस कर रखा है? और हमारा तो सब कुछ इन्फ्लुएंस्ड ही होता है। मान लो, अभी यहाँ भीड़ में कोई है और उसको नींद आ रही है। वह गिरने को हो रहा है। या कोई है, जो बगल वाले को कोहनी मार रहा है, खुजली कर रहा है, उससे बात करना चाहता है; जबकि बगल वाला ध्यान से सुनना चाहता है। क्या यह व्यक्ति इसी तरह से सो रहा होता, या कोहनी मार रहा होता, यदि यहाँ बाक़ी लोग न होते, सिर्फ़ मैं होता और वह होता?
एक क्षण के लिए कल्पना करो कि यह पूरा पंडाल खाली हो गया है। मैं बैठा हूँ और ये खुजलीबाज़ है। और वह वहाँ आगे बैठ गया है। क्या ये अभी भी सोकर लुढ़कता? नहीं। तुम्हारी नींद भी कंडीशंड है। तुम सो भी इसीलिए रहे हो, क्योंकि तुम्हें भीड़ का संरक्षण प्राप्त है। कुछ भी तुम्हारा अपना नहीं। ऐसे पहचाना जाता है फ़र्ज़ी कर्म को।
मेरा प्यार भी नकली, मेरी नींद भी नकली, मेरा यार भी नकली, मेरा व्यवहार भी नकली, मेरे सवाल भी नकली, मेरे जवाब भी नकली। क्योंकि इनमें से कुछ भी मेरा अपना नहीं है। सब किसी सहयोग का है, किसी भीड़ का है। जिस हद तक तुम भीड़ से, समाज से, शरीर से, अपनी ही वृत्तियों से आज़ाद होते जाते हो, तब जो बचता है, वह सही कर्म होता है। पहले से उसके बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
तुम्हारा काम आज़ादी की छवि बनाना नहीं है। तुम्हारा काम है ईमानदारी से अपनी बेड़ियों को पहचानना और जान लगाकर उन्हें काट डालना। बिना अपनी बेड़ियों को पहचाने, बिना झूठे कर्म को पहचाने, सही कर्म के बारे में सवाल करना ऐसा ही है, जैसे कि कोई ख़ुद को ही एक कोठरी में बंद करे हो, एक जेल बनाकर। ताला बाहर से नहीं, भीतर से लगा हुआ है। ताला बाहर से नहीं, भीतर से लगा रखा है। और भीतर बैठकर वह अपनी ही कोठरी की दीवारों पर खुले आकाश के आज़ाद परिंदे के चित्र बनाए और वहाँ लिख दे, “आज़ादी”।
तूने ख़ुद तो गुलामी पाल रखी है, पर तू बेईमान इतना कि अपनी गुलामी की बात नहीं करना चाहता। तू आज़ादी के बारे में कल्पनाएँ फैलाना चाहता है। तू आज़ादी के गीत गाना चाहता है, बिना अपनी गुलामी से रूबरू हुए। यह गलत है न? बेईमानी है न? तो इसीलिए, आज़ादी कैसी होती है? सत्य कैसा होता है? मुक्ति कैसी होती है? सार्थक निष्काम कर्म कैसा होता है? इन सवालों में कुछ नहीं रखा। तुम पूछो, स्वार्थ-भरा कर्म कैसा होता है? तुम पूछो, बंधन कैसे होते हैं? तुम पूछो, झूठ और फ़रेब कैसे होते हैं? और देखो कि वह सब भीतर मौजूद है।
जब वो भीतर दिखाई देते हैं, तो घिन-सी आती है। जिस चीज़ से घिनाने लगोगे, वह चीज़ जीवन से जाने लगेगी। जब बंधन जीवन से जाने लगेंगे, तो पाओगे कि मुक्ति आ रही है। जब व्यर्थ कर्म जीवन से जाने लगेगा, तो पाओगे सही कर्म अपने आप उठने लगा है। बस यही तरीका है।