फ़ॉरगिवनेस कुछ होता ही नहीं है, फ़ॉरगेटफ़ुलनेस होता है। ये अपना अपमान है कि एक तो दूसरा घाव दे गया और पीछे से हम उसको लगातार याद रख रहे हैं। ज़िंदगी का नियम है कि जो चीज़ याद रखते हो, वही चीज़ कोई और रूप लेकर दोबारा आ जाती है। भूलना सीखो, आगे बढ़ते चलो, और जगह बनाओ ताकि ढंग के लोग ज़िंदगी में आ पाएँ।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम सीमा है। मैं सिविल हॉस्पिटल में डॉक्टर काम कर रही हूँ। मेरा प्रश्न चैप्टर 85 से है, “बियोंड फ़ॉरगिवनेस।” काफ़ी बार हमारे साथ होता है कि कुछ बातें होती हैं जो हम पकड़ के बैठ जाते हैं। दूसरों को माफ़ नहीं कर पाते, और काफ़ी बार हम ख़ुद को भी कुछ चीज़ों के लिए माफ़ नहीं कर पाते, तो उन्हें पकड़ के बैठ जाते हैं। तो सर, हम कैसे बियोंड फ़ॉरगिवनेस पहुँच पाएँगे?
आचार्य प्रशांत: वही है, दूसरे को भगवान बनाना बंद करो। वो इतना बड़ा कैसे हो गया कि उसने इतना बड़ा घाव दे दिया। अगर आपको इतना बड़ा घाव लगा है कि आप भूल ही नहीं पा रहे, तो इतना बड़ा घाव देने वाला भी उतना ही बड़ा होगा। तो बहुत बड़ा घाव खाकर तो आपने किसी को भगवान बना लिया। और वो भी किसको बना दिया, जिसने घाव दिया है।
कोई आपको प्यार दे, आप उसे भगवान बना लो। थोड़ा सा समझ में आता है फिर भी। कोई आपको ज़िंदगी ही दे, आप उसको कहो भगवान हो, समझ में आता है। कोई आपको घाव दे रहा है और आपने उसको भगवान बना लिया, ये कैसी बात है?
आप कहते हो न कि पल-पल सुमिरन करेंगे। सोचो, जो आपको बहुत चोट देकर गया है, आप उसका पल-पल सुमिरन ही तो करते हो। वो तो भगवान का किया जाता है। जिसको आप लगातार याद रखो, वो तो क्या हो गया आपका? वो तो पूज्य हो गया। उसी की आराधना कर रहे हो, उसी की साधना कर रहे हो, याद कर रहे हो, “ऐसा ज़ख़्म दिया है जो न फिर भरेगा।” ये अपना अपमान है कि एक तो वो चोट मार गया और पीछे से हम उसकी पूजा कर रहे हैं। एक तो वो घाव दे गया और पीछे से हम उसको लगातार याद रख रहे हैं।




