जलवायु संकट कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। इसके बावजूद लोग, मीडिया और राजनीति उन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं जो अहंकार, मनोरंजन, पहचान और तात्कालिक भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। पर्यावरण विनाश का मूल कारण बाहरी व्यवस्था से अधिक मानवीय लालच, उपभोग और सामूहिक बेहोशी है। प्रकृति का शोषण विकास नहीं, आत्मविनाश है; और जब तक व्यक्ति स्वयं नहीं बदलेगा, तब तक न राजनीति बदलेगी, न समाज, न पृथ्वी का भविष्य।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा नाम तुषार है। आचार्य जी, हाल ही में अभी एनवायरमेंटल रिपोर्ट आई है, 2026 की। उसमें कुछ मुख्य बिंदु हैं, कुछ फ़ैक्ट्स हैं, जो मैं प्रस्तुत करना चाहता हूँ। तो कर सकता हूँ?
पहला है, आचार्य जी, एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स। लगभग 365 में से 360 दिन ऐसे थे भारत में, जिसमें एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स देखे गए। कहीं-न-कहीं, कहीं बाढ़ आई, कहीं एक्सट्रीम गर्मी हो गई, कहीं भूकंप और भी बहुत चीज़ें।
दूसरा है, आचार्य जी, ह्यूमन एंड एग्रीकल्चर लॉसेस। लगभग 4119 ऑफ़िशियल लोगों की मौत हो गई है, 2025 में ही एक्सट्रीम क्लाइमेट इवेंट्स के कारण। और आचार्य जी, लगभग 1 करोड़ 74 लाख हेक्टेयर की जो फ़सलें हैं, वो बर्बाद हो गईं। किसानों को भारी नुकसान हुआ इसकी वजह से।
तीसरा, आचार्य जी, इसमें जो राइजिंग फ़्लड रिस्क है, वह लगभग डेढ़ से दो गुना बढ़ गया है। बहुत तेज़ी से और बढ़ रहा है। और बहुत से इलाक़ों में, ख़ासकर




