
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा नाम तुषार है। आचार्य जी, हाल ही में अभी एनवायरमेंटल रिपोर्ट आई है, 2026 की। उसमें कुछ मुख्य बिंदु हैं, कुछ फ़ैक्ट्स हैं, जो मैं प्रस्तुत करना चाहता हूँ। तो कर सकता हूँ?
पहला है, आचार्य जी, एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स। लगभग 365 में से 360 दिन ऐसे थे भारत में, जिसमें एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स देखे गए। कहीं-न-कहीं, कहीं बाढ़ आई, कहीं एक्सट्रीम गर्मी हो गई, कहीं भूकंप और भी बहुत चीज़ें।
दूसरा है, आचार्य जी, ह्यूमन एंड एग्रीकल्चर लॉसेस। लगभग 4119 ऑफ़िशियल लोगों की मौत हो गई है, 2025 में ही एक्सट्रीम क्लाइमेट इवेंट्स के कारण। और आचार्य जी, लगभग 1 करोड़ 74 लाख हेक्टेयर की जो फ़सलें हैं, वो बर्बाद हो गईं। किसानों को भारी नुकसान हुआ इसकी वजह से।
तीसरा, आचार्य जी, इसमें जो राइजिंग फ़्लड रिस्क है, वह लगभग डेढ़ से दो गुना बढ़ गया है। बहुत तेज़ी से और बढ़ रहा है। और बहुत से इलाक़ों में, ख़ासकर नॉर्दर्न रीजन्स में, बाढ़ तेज़ी से आ रहे हैं। और इसके बाद है, आचार्य जी, जो ह्यूमन एंड एनिमल कॉन्फ्लिक्ट है, वो दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहा है।
आचार्य प्रशांत: ठीक है, ठीक है। हाँ, चलिए। सवाल क्या है?
प्रश्नकर्ता: सर, तो मेरा सवाल ये है कि इतना कुछ होने के बावजूद भी, जो मेनस्ट्रीम मीडिया है, सोशल मीडिया है, इवन जो मैक्ज़िमम लोग हैं, उनका इस पर ध्यान क्यों नहीं जा रहा है? लोग इस पर इतना नज़रंदाज़ क्यों कर रहे?
आचार्य प्रशांत: अरे यार, सोशल मीडिया पर कोई जाता है, तो इसलिए जाता है कि उसको व्यूज़ मिलेंगे, लाइक्स मिलेंगे। इसलिए थोड़ी जाता है कि वो वहाँ अपना अकाउंट ठप कराएगा। हॉल में कोई मूवी इसलिए दिखाई जाती है कि लोग देखने आएँगे, तो पैसा देंगे। हॉल में मूवी इसलिए थोड़ी लगाई जाती है कि सामने खाली कुर्सियाँ रहेंगी।
“सोशल मीडिया पर इसकी बात क्यों नहीं हो रही है? टीवी पर क्यों नहीं आ रहा है? इस पर फ़िल्में क्यों नहीं बन रही हैं? अख़बारों में क्यों नहीं छप रहा है?” क्योंकि तुम्हें पढ़ना नहीं है, क्योंकि तुम्हें देखना नहीं है। अभी हाल में यह रिपोर्ट आई है, अभी हाल में एक फ़िल्म भी आई है। तुम कोशिश कर लो कि अगले दो दिनों में तुम्हें उसका टिकट मिल जाए। नहीं मिलेगा, क्योंकि लोगों को देखनी है। और जब वो फ़िल्म चल गई, तो अब उस तरह की दस और बनेंगी, क्योंकि लोगों को देखनी हैं।
अब तुम कहो, यह हॉल वालों की गलती है, पीवीआर वालों की, या जो और चेन्स हैं थिएटर्स की, उनकी गलती है कि वो क्लाइमेट पर आधारित मूवी क्यों नहीं चला रहे? उनको अपना धंधा ख़राब करना है क्या। उनको भी अपना घर चलाना है। भाई, वो कहते हैं, जनता जो देखना चाहती है, वही तो दिखाएँगे। जनता जो देखना चाहती है, वह दिखा देते हैं।
आप ऐसे क्यों हो कि आपको कहीं उत्तेजना दिखाई दे जाए, तो आप कूद पड़ते हो, “जल्दी से टिकट ले लूँ, देख आऊँ।” आपको कहीं विचारधारा दिखाई दे जाए, वहाँ पर आप कूद पड़ते हो। पर जहाँ आपको सच दिखाया जा रहा हो, विभाजित सच नहीं, तात्कालिक सच नहीं, पूरी पृथ्वी का सच, आने वाली सब पीढ़ियों को खा जाने वाला सच, वहाँ आप नहीं देखना चाहते। तो कोई क्या करे इसमें? और फिर, जब आप नहीं देखना चाहते, तो फिर पूरी दुनिया भर के जो नेता हैं, वो भी इस मुद्दे पर कुछ काम नहीं करना चाहते। पेरिस एग्रीमेंट हो चुका, एक के बाद एक सीओपी होते रहते हैं, कोई क़दम नहीं लिया जा रहा। पृथ्वी बर्बाद हो रही है, क्योंकि पृथ्वी सिर्फ़ उन नेताओं की नहीं है। पृथ्वी आपकी है। आपको जाकर के धुरंधर देखनी है, तो ठीक है पृथ्वी बर्बाद होती रहे।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न इसमें मेन ये है कि ये तो सीधा-सीधा लोगों के ज़िंदगी और मौत का फ़ैसला है न? मतलब ये ऐसा नहीं है ये होगा, ये हो रहा है।
आचार्य प्रशांत: अहंकार ख़ुद को बचाने के लिए किसी की भी बर्बादी बर्दाश्त कर सकता है; बर्दाश्त ही नहीं कर सकता, वो किसी को भी बर्बाद कर सकता है। यहाँ तक कि वह स्वयं को, माने अपने शरीर को भी बर्बाद कर सकता है अपने आप को बचाने के लिए।
क्लाइमेट चेंज होगा तो असर तुम्हारे शरीर पर पड़ेगा, तुम्हारी जेब पर पड़ेगा, तुम्हारी मानसिक स्थिति पर पड़ेगा, तुम्हारे समाज पर पड़ेगा। ये सब बर्बाद किए जा सकते हैं। और इनको बर्बाद करने से अहंकार बचता है तो। एक आतंकवादी अपने अहंकार को बचाने के लिए क्या करता है, वो जाकर सुसाइड बॉम्बिंग कर लेता है। देखो, क्या किया उसने। अहंकार ने अपने आप को बड़ा करने के लिए शरीर को ही बम से उड़ा दिया। किसके शरीर को? अपने ही शरीर को।
अहंकार ऐसी चीज़ है, जो अपने शरीर का भी सगा नहीं है। वो अपने शरीर का भी शिकार करता है।
तो क्लाइमेट चेंज से फ़र्क़ शरीर पर पड़ेगा, ग़रीबों पर पड़ेगा, फ़सलों पर पड़ेगा, नदियों पर पड़ेगा, जनसंख्याओं पर पड़ेगा। अहंकार कहता है, “इन सब से मुझे क्या लेना-देना, मुझे तो इस बात से मतलब है कि मैं महान हूँ। अगर सब बर्बाद करके मैं यह दावा ठोक सकूँ कि मैं महान हूँ, तो सब बर्बाद हो जाए, मैं महान हूँ। मैं महान हूँ, बस।”
क्लाइमेट चेंज कोई भविष्य की बात नहीं है, भाई। वह हो रहा है, वह आज की बात है अब। जब मैं तुम्हारी उम्र का था उस समय क्लाइमेट चेंज लगता था भविष्य की बात है। आज से दस बीस साल पहले, पचीस साल पहले कह सकते थे कि क्लाइमेट चेंज भविष्य की बात है। बीस साल से क्लाइमेट चेंज के बारे में बोले जा रहा हूँ, बोले जा रहा हूँ, क्या अभी भी भविष्य की बात है? दो दशक तो बीत गए, कौन-सा भविष्य।
आपको नहीं पता, पृथ्वी का तापमान पहले ही कितना बढ़ चुका है। भविष्य में नहीं, अभी बढ़ चुका है, और पलटा नहीं जा सकता, इररिवर्सिबल है। आपको नहीं पता, ग्लेशियर कितने पिघल चुके हैं वो पलटे नहीं जा सकते, उन पहाड़ों पर बर्फ़ कभी वापस नहीं आएगी। आपको नहीं पता कि कार्बन डाइऑक्साइड कितने पार्ट्स पर मिलियन हो चुकी है और अब वहाँ से वो और ऊपर ही जाएगी। वापस सोखी नहीं जा सकती। वो आज की बात है। पर अहंकार उसको नहीं देखना चाहेगा, वो कहेगा, “मुझे दूसरी चीज़ों से ज़्यादा मतलब है।”
क्यों नहीं देखना चाहेगा कारण और बताऊँ साफ़? क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड ख़ुद अहंकार का ही निर्माण है। CO₂ कम करनी है तो अहंकार कम करना पड़ेगा। ईगो जितनी ज़्यादा होती है, एमिशन उतना ज़्यादा होता है। ई, वो जो CO₂e लिखा जाता है न, CO₂ इक्विवेलेंट तो चलो ठीक, वो CO₂ ईगो है। अहंकार जितना ज़्यादा होगा एमिशन उतना ज़्यादा होगा।
अभी ये जो लड़ाई चल रही है, अमेरिका, इज़राइल, ईरान वाली इसकी क्लाइमेट कॉस्ट पता है न? इसमें कितने एमिशन हो रहे हैं, पता है न? ये क्यों हो रहा है? राष्ट्रीय अहंकार है और धार्मिक अहंकार है, और आर्थिक भूख है, और यह सारी चीज़ें अहंकार की हैं। ईसाई है, यहूदी है, इधर मुसलमान है, शिया मुसलमान, यह हुआ धार्मिक अहंकार। “हम उन्नत राष्ट्र हैं, हम लिबरल राष्ट्र हैं, हम *डेमोक्रेसीज़*हैं, और यहाँ थियोक्रेसी है।” यह हुआ धार्मिक। “और मैं अहंकार हूँ, मैं अधूरा हूँ, मुझे और खाना है खाने के लिए तेल चाहिए।” यह हुआ अहंकार का आर्थिक पक्ष।
जहाँ ईगो है वहाँ एमिशंस होंगे। एक-एक बम जो गिर रहा है वो क्लाइमेट के साथ बलात्कार है। आप सोचिए, पहले कि एक बम गिरता होगा तो कितनी कार्बन डाइऑक्साइड उसमें से...। आप एक साधारण-सी गाड़ी चलाते हो और फिर कहते हो, “गाड़ी चला रहा हूँ, तो उसकी जगह ईवी ले लेता हूँ।” तो यह बताओ, ये जो फाइटर जेट उड़ रहा है ये कितना एमिशन करता होगा। गाड़ी का तो ईवी बना दोगे। टैंक का और फाइटर जेट का क्या बनाओगे, और वह कितना कार्बन फेंक रहे होंगे। और जो दिन-रात सैकड़ों की तादाद में मिसाइलें इधर से उधर चल रही हैं, इनका क्या हो रहा होगा? और ये जो ड्रोंस जा रहे हैं, इनका कार्बन डाइऑक्साइड से क्या लेना-देना? पर जहाँ ईगो है, वहाँ एमिशन है।
ये तीन “ई” बिल्कुल साथ चलते हैं, ईगो, इमोशन, एमिशन। जहाँ ईगो है वहाँ एमिशन होगा, और जहाँ इमोशन है वहाँ एमिशन होगा। इमोशन के क्षण में आप संयमित और विवेकी नहीं रह सकते। जहाँ इमोशन आया तहाँ आप एमिशन शुरू कर देते हो। आप जब बहुत ख़ुश होते हो, तो आप कहते हो, “ओ, गाजा-बाजा लगाओ, और जनरेटर लगाओ, और पार्टीयाँ करो, और चलो सब गाड़ियाँ लेकर चलो।” एमिशन शुरू, उपद्रव शुरू। जब आप दुखी होते हो, तब भी आप यही कहते हो, “चलो, कुछ करते हैं, कुछ करके आते हैं, खाते हैं, पीते हैं, उड़ाते हैं।” फिर एमिशन शुरू।
आपको किसी पर क्रोध आता है आप उस पर जाकर के चढ़ बैठते हो, एमिशन शुरू। तो अहंकार क्यों करेगा क्लाइमेट चेंज की बात, अहंकार ख़ुद क्लाइमेट चेंज है। ईगो इज़ एमिशन। वो नहीं करने वाला बात। और आपने बड़ी मासूमियत से, बल्कि नादानी से सवाल पूछ दिया, “पर क्लाइमेट चेंज की बात मीडिया क्यों नहीं कर रहा है?” मीडिया वाले देवपुरुष हैं? उन्हें अपना चैनल बंद कराना है? क्यों करें कोई बात? क्यों करें, सब मेरी तरह पागल हैं, कि जो चीज़ कोई सुनना नहीं चाहता वो भी लोगों के पीछे पड़-पड़ के सुनाएँ? नहीं करेगा कोई बात।
अभी कोई पॉलिटिकल पार्टी आ जाए आपके यहाँ चुनाव होने वाले हों, वह आपसे बोले, “ऐ जात” की बात। उसको आप वोट दे आओगे तुरंत। कोई आकर बोले, “ऐ फ़्री में फलानी चीज़ दे देंगे”, उसको भी वोट दे आओगे। “ऐ आ जाओ, धर्म की बात है”, उसको भी आप वोट दे आओगे। फिर कोई पार्टी आए वो बोले, क्लाइमेट। उसको वोट दोगे? नहीं दोगे। तो कोई पॉलिटिकल पार्टी क्यों करे क्लाइमेट की बात? क्यों करे? घटिया-से-घटिया मुद्दे पर आपसे वोट लिया जा सकता है, और घटिया मुद्दे पर ही आप वोट दे देते हो। पर कोई आपसे ढंग की बात कर दे, तो आप वोट दोगे उसको? तो क्यों करे कोई आपसे ढंग की बात। अब पृथ्वी बर्बाद होती है, हो तो हो जाए।
किसी और पर दोष मत लगाया करो। कभी कोई आकर बोलेगा, “ये सब नेता चोर होते हैं।” कभी कोई बोलेगा, “ये सब बाबा लोग चोर होते हैं।” कभी, “चैनल वाले चोर हैं।” कभी, “सोशल मीडिया पर सब लफ़ंगे बैठे हुए हैं।”
दूसरे पर इल्ज़ाम लगाने से पहले आम आदमी की ओर देखो। सबसे बड़ा चोर आम आदमी है। सबसे बड़ा पाखंडी आम आदमी है। वो ढंग का होता, तो ऐसे नेता चुनता? वो ढंग का होता, तो ऐसे चैनल देखता? वो ढंग का होता, तो ऐसी मूवी हिट होती? वो ढंग का होता, तो दुनिया जैसी है, क्या ऐसी होती? बोलो।
तो किसी दूसरे को बुरा या गिरा बताने से पहले आम आदमी की ओर देख लिया करो। सबसे गिरा हुआ वही है।
और जब तक यह आम आदमी, माने तुम और मैं, हम नहीं बदलेंगे, हम नहीं सुधरेंगे, तब तक हमें किसी दूसरे का दोष निकालने का कोई हक़ नहीं है। उन्हें हमने ही चुना है, उन्हें हमने ही वहाँ सरताज बनाया है। चैनल को टीआरपी से मतलब है, टीआरपी देने वाले तुम हो।
प्रश्नकर्ता: तो मतलब यही कारण है कि हम देखते हैं कि आम आदमी विद्रोह तो छोड़ो, उल्टा उनको सपोर्ट करता है जो उनका शोषण करते हैं?
आचार्य प्रशांत: अरे भाई, वो आम आदमी के ही चढ़ाए हुए चढ़े हैं। चैनल एडवर्टाइज़मेंट पर चलता है, विज्ञापनदाता यही देखकर आता है कि इस चैनल को कितने लोग देख रहे हैं। तुम देख रहे हो, इसीलिए उसको विज्ञापन मिलते हैं, उसी से उसकी कमाई है इसीलिए वो चैनल चल रहा है। तुम घटिया चीज़ें देखनी बंद कर दो, तो दुनिया में घटिया चीज़ें कम हो जाएँगी। पर जो चीज़ जितनी गिरी हुई है, वह उतनी तेज़ी से फैलती है। फैलाने वाले हम हैं।
सच्चाई तो आप तक लाने के लिए दिन-रात मशक्कत करनी पड़ती है, आपका पीछा करना पड़ता है। गीता सत्रों में अभी न जाने कितनों ने अगले महीने के लिए रजिस्टर नहीं करा है। और वो तब है, जब हम कह रहे हैं, “आ जाओ, जैसी तुम्हारी आर्थिक स्थिति है जो भी कर सकते हो। अरे, 25-50, तुम बहुत ग़रीब हो हम उस बात का भी स्वागत करते हैं। आ जाओ, सबका सम्मान है।” तो भी नहीं। यहाँ से फ़ोन भी करते रहे, “आ जाओ, आ जाओ। गीता की बात हो रही है, ज्ञान की बात हो रही है, संतवाणी है, आ जाओ।” नहीं आते।
और ये जो तुम मूवी हिट कराते हो, क्या उन्होंने तुम्हें फ़ोन किया था, तब गए थे देखने? मूवी तो ख़ुद ही कूद करके देख आए। और टिकट भी मैं देख रहा हूँ कि साधारण जो दाम होते हैं उससे दोगुने भी हैं तो भी देखने जा रहे हो। जो सबसे महँगी रिक्लाइनर सीट होती है वो भी नहीं मिल रही, दो दो हज़ार वाली, वो भी सीट नहीं मिल रही है। उन्होंने फ़ोन किया था? वो दिन-रात तुमको मैसेजेस भेजते थे कि “जल्दी से कृपया री-एनरोलमेंट कर लीजिए”, तब गए हो?
“हाँ, हाँ, हाँ, बहुत बार वो बुला रहा है हमें देखने के लिए, तो अब जाकर उसकी पिक्चर देख ही लेते हैं!”
अब शिकायत करने मत आना कि क्यों धर्म की हानि हो रही है। क्योंकि जहाँ धर्म है, वहाँ आम आदमी नहीं है। आम आदमी की वरीयताएँ दूसरी हैं, उसको उन्माद में जीना है, उसको बेहोशी में जीना है। और यह बात मैं सिर्फ़ शिकायत के तौर पर नहीं कह रहा हूँ, यह बात अगर बुरी लगती है तो फिर जूझो, आओ, मेरा साथ दो। अगर मैं कह रहा हूँ कि आम आदमी ख़ुद पाखंडी है, तो फिर उस पाखंड को हटाने के लिए दिन-रात मेहनत भी कर रहा हूँ। चूँकि मेहनत कर रहा हूँ, इसीलिए इस मंच से कहने का अधिकार रखता हूँ कि आम आदमी पाखंडी है। वो होगा पाखंडी, मैं उससे प्रेम करता हूँ। वो करता होगा मेरी उपेक्षा, मैं बार-बार उसके पीछे जाता हूँ। वो देता होगा मुझे गाली, मैं फिर भी उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता हूँ, “चल, मेरे साथ।”
तो यह कहकर भी कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती कि दोष चैनल का नहीं है, और दोष सोशल मीडिया का नहीं है, और दोष पॉलिटिशियन का नहीं है। दोष आम आदमी का है। आम आदमी का अगर दोष है, तो जाओ, आम आदमी के साथ खड़े हो। उसकी नादानी हटाओ, उसका अज्ञान मिटाओ, उसका अँधेरा मिटाओ। उसके लिए प्रेम चाहिए, प्रेम पैदा करो।
प्रश्नकर्ता: जी आचार्य जी। धन्यवाद, आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मैं डॉक्टर लोकेश हूँ। मैं यहाँ एम्स ऋषिकेश में हूँ। आचार्य जी, मैं यहाँ आठ सालों से हूँ और देख रहा हूँ कि एक ट्रेंड है कि लोग यहाँ पर आते हैं घूमने के लिए, पहाड़ों पर, क्योंकि यहाँ पर एक अच्छी चीज़ है, नेचुरल सीनरी। अपने यहाँ पर हैं सीनरीज़ हैं। तो वो लोग तो आ जाते हैं, उनको लगता है कि कुछ ब्रेक मिल जाएगा उन लोगों को। लेकिन यहाँ पर आने के बाद जो ट्रैफ़िक जैम होगा, जो प्लास्टिक कचरा फैलेगा, जो अब उनके लिए प्लॉट्स कटने लगे हैं हाइट्स पर, तो वहाँ से जो आप कह सकते हैं कि डिफ़ॉरेस्टेशन हो रहा है, तो उसका नुकसान बहुत हो रहा है।
मेरे कुछ फ्रेंड्स हैं। उनको मैंने जब इस बारे में पूछा, तो ऐसा कहते हैं कि हमें ब्रेक भी तो चाहिए। हम परेशान होते हैं। जहाँ पर वो रहते हैं दिल्ली हरियाणा में, वहाँ ये सब चीज़ें नहीं हैं। तो अपनी जगह ऐसा है कि उनके पास कोई ऑप्शन नहीं है आने के अलावा। यहाँ के लिए ऐसा है कि यहाँ नुकसान बहुत हो रहा है। हालाँकि पैसा मिलता है, टूरिज़्म इंक्रीज़ हो रहा है लेकिन उस चीज़ को बैलेंस नहीं कर पा रहे हैं दोनों ही लोग।
आचार्य प्रशांत: नहीं, बैलेंस हो भी नहीं सकती। कोई तरीका नहीं है, कोई बैलेंस नहीं है कि इतने लोग, और जैसे लोग हैं उस तरीके के लोग यहाँ आएँगे और पर्वत बचे रह जाएँगे। बचे क्या रह जाएँगे, आप कह रहे हो, आप आठ साल से देख रहे हो। मैं बीस साल से देख रहा हूँ, मैंने बीस साल में ही भारी-भारी तबाही देखी है यहाँ पर्वतों की।
ऋषिकेश वो है ही नहीं जो बीस क्या, दस साल पहले भी होता था। जो आप बैलेंस माँग रहे हो वही गलती है, बैलेंस संभव नहीं है। इतने सारे लोग और इस तरह के लोग, बहुत बुरी क्वालिटी और बहुत ज़्यादा क्वांटिटी कोई तरीका नहीं है कि ये यहाँ आएँ और पर्वत तबाह न हों। होंगे। अब बताओ, क्या करना है?
अरे, ये कैसे लोग हैं जो यहाँ आ रहे हैं, कौन-से लोग हैं जो गंदी नौकरियाँ कर रहे हैं, जिन्हें पता ही नहीं था वो कर क्या रहे हैं। किसी भी तरीके से उन्होंने कुछ पढ़ाई पूरी कर ली क्योंकि सब करते थे। फिर जाकर के कोई मीडियोकर डिग्री के साथ कोई मीडियोकर जॉब ले ली है। अब वो जो नौकरी है, उसमें उनका ख़ून चूसा जाता है। साथ-ही-साथ वो शादी-ब्याह करके दो-चार बच्चे पैदा करके बैठ गए हैं, तो ज़िंदगी झेली नहीं जाती।
पर दस बीस साल बीत गए नौकरी करते-करते, तो किसी तरह से एक छोटी कार खरीद ली है। तो उसको जल्दी से वो वीकेंड पर भुर्र भगाकर यहाँ ऋषिकेश में आ जाते हैं, क्योंकि कहीं और जा नहीं सकते। यह आदमी जिसकी ज़िंदगी तबाह है यह जब पर्वतों पर आएगा तो क्या पर्वतों को तबाह नहीं करेगा? आप क्या उम्मीद कर रहे हो?
तो दो-तीन बातें हैं; या तो चलाओ वैश्विक आंदोलन, साथ दो हमारा, बढ़ाओ गीता कार्यक्रम को, कि जनसंख्या की चेतना का स्तर ही थोड़ा बढ़े, लोग बेहतर हो पाएँ। पर वो थोड़ा लंबा कार्यक्रम है, रातोंरात आप लोगों के दिल नहीं बदल सकते। तो तब तक अगर उत्तरांचलवासियों में अपने पर्वतों और नदियों के लिए प्यार हो, तो एंट्री टैरिफ़ लगा दो। मत घुसने दो इतने लोगों को, भले ही वो बात नाइंसाफ़ी की लगे। भले ही फिर इल्ज़ाम लगाए जाएँ कि, “अरे, क्या ग़रीबों के लिए इस दुनिया में कोई जगह नहीं, क्या ग़रीबों को पर्वतों पर जाने का हक़ नहीं?”
कोई और तरीका है नहीं। कोई और तरीका नहीं है, जितना लगाया गया बहुत कम है। इतना ज़्यादा लगा दो कि नहीं प्रवेश कर पाए आम आदमी। और बिल्कुल आम आदमी इस बात पर तिलमिला जाएगा। वो कहेगा, “तो क्या करें हम? क्या हमें पहाड़ों की चोटियों और ठंडक का अधिकार नहीं है? अभी क्लाइमेट चेंज हो गया, इतनी गर्मी होगी दिल्ली में। क्या हमें हक़ नहीं है कि हम भी जाएँ ऋषिकेश, नैनीताल, मसूरी घूमने?”
बात तुम्हारी नहीं है। तुम छोटी चीज़ हो, तुम आए हो चले जाओगे। बात इस ग्रह की है, पृथ्वी की है, और इसकी करोड़ों प्रजातियों की है, इसके वनों के विनाश की है। और अगर तुम्हें दिखाई दे रहा है कि तुम्हें अब दर्द हो रहा है, तो कम-से-कम इतना करो कि जनसंख्या और मत बढ़ाओ। तुम अपने दर्द को ही कोई सही काम करने का कारण बनाओ।
और अगर तुम्हें सचमुच प्यार ही है वनों से, नदियों से और पर्वतों से, तो फिर जितना एंट्री टैक्स लग रहा है उतना दे दो और आ जाओ। और उतना एंट्री टैक्स देने के लिए अगर तुम्हें अपनी तनख़्वाह का 25% भी देना पड़ता है, तो दो न, क्योंकि तुम्हें तो प्यार है। प्यार में तो दिया जा सकता है। पर आसानी से यहाँ आकर के विध्वंस मचाना, इसकी अनुमति नहीं होनी चाहिए।
और जो मैं बोल रहा हूँ, बात नाइंसाफ़ी की नहीं है, समझिएगा। मैं बस यह कह रहा हूँ कि आम आदमी, जो यहाँ पर आता है, वो बड़े सब्सिडाइज़्ड तरीके से पर्वतों का विनाश कर रहा है। क्योंकि जब वो यहाँ आ रहा है न, तो उसके यहाँ आने की इकोलॉजिकल कॉस्ट आप कैलकुलेट नहीं कर रहे, फ़ैक्टर-इन नहीं कर रहे। आप उससे ये छोटा-मोटा जो टोल टैक्स वग़ैरह ले लेते हो, उससे कुछ नहीं होता। आप गिन ही नहीं रहे कि अगर वह यहाँ आया है, तो उससे कुल वो नुकसान यहाँ कितना करके जाएगा। और जितना वह नुकसान करके जाएगा, उतना उससे पहले ही ले लो।
ये कोई नाइंसाफ़ी की बात तो नहीं हुई न?
भाई, तू यहाँ आया है, तू यहाँ एक ज़बरदस्त तरीके से नुकसान करके जाएगा। पहले हम उस नुकसान का हिसाब नहीं रखते थे, पर अब हम उस नुकसान का हिसाब रखना चाहते हैं और आने से पहले इतना पैसा दे दे क्योंकि तू इतने पैसे का नुकसान करने जा रहा है। ये हम नाइंसाफ़ी नहीं कर रहे। तू आया है तो तू इतना नुकसान करेगा, वो उतना पैसा तू हमें पहले ही दे दे, और नहीं दे सकता तो कृपा करके मत आ।
देखो, यह होना ही है। मैं जैसे बोल रहा हूँ, बात अन्याय की और क्रूरता की लगेगी पर यह हो ही रहा है। जितनी भी ऐसी जगहें हैं जहाँ अभी भी ताज़ी हवा है और थोड़ा-सा सुंदर मनोरम दृश्य है, साफ़ पानी है, वो जगहें सब अमीरों द्वारा हड़प ही ली जा रही हैं। ये जिन्होंने अपनी तादाद बढ़ा दी है बिल्कुल कीड़े-मकोड़ों की तरह, इनका तो भविष्य वैसे भी बर्बाद है। ये कितने दिनों तक पर्वतों का भी शोषण कर लेंगे? क्लाइमेट चेंज होगा और बढ़ गया तापमान 4-5 डिग्री, तो ज़मीन यहाँ सोने के भाव बिकेगी क्योंकि यहाँ ठंड होगी। तो क्या आम आदमी खरीदेगा वो ज़मीन?
आम आदमी के लिए तो वैसे भी कोई भविष्य नहीं है। आम आदमी तो बस फँसा हुआ है अपनी बेहोशी में, नशे में, अपने सपनों में, बिना यह जाने कि वह कैसी दुनिया में जी रहा है और दुनिया को क्या बना रहा है। बिना यह जाने कि ये जो अमीर हैं वो ग़रीबों के ही शोषण पर और ख़ून पर अमीर बने हैं; और उन्हीं अमीरों को अपना आदर्श मानता है। तो जब वो इतनी बड़ी-बड़ी गलतियाँ कर रहा है, तो फिर ज़िंदगी ही उसको सज़ा देगी न।
उसको अगर सज़ा मिल रही है, तो ये बात आपको नाइंसाफ़ी की क्यों लग रही है? जैसे अपनी ज़िंदगी गंदी, जैसे अपने रिश्ते गंदे, जैसे अपनी कमाई गंदी, जैसे अपनी पढ़ाई गंदी, वैसे ही आकर के यहाँ पर पानी की बोतलें, चिप्स के पैकेट, जितनी तरह की गंदगियाँ हो सकती हैं, करते हैं।
शिवपुरी वग़ैरह में चले जाओ, पता नहीं क्या हाल है। नंगे पाँव चलो तो बियर की बोतल के काँच धँस जाएँ। यह कोई यहाँ पर शांति और मुक्ति के लिए आ रहा है? यह यहाँ जो करने आ रहा है, बस उस नाश की क़ीमत उससे पहले ही वसूल कर लो। क्योंकि तू यहाँ पर कोई पर्वतों का सम्मान करने नहीं आ रहा है, तू आ रहा है राफ़्टिंग करने। और कितने भद्दे तरीके से वह करता है, और क्या गा रहा होता है! और गंगा के तट पर कोई बैठा है शांति के लिए, सामने से चार राफ़्ट निकलेंगे और बदतमीज़ी और अश्लीलता की इंतहा हो जाएगी।
तू यह सब करने आ रहा है, तो इसकी पूरी क़ीमत चुका के आ। और उससे जो फिर पैसा इकट्ठा हो उसका इस्तेमाल होना चाहिए प्रकृति के संरक्षण में। पर वो तभी हो पाएगा, जब पहले प्रदेशवासियों के भीतर कोई प्रेम और सम्मान आएगा अपनी ही प्राकृतिक धरोहर के लिए। अगर प्रदेशवासी ख़ुद ही तैयार बैठे हैं जंगल को, ज़मीन को और पानी को बेच खाने के लिए, तो फिर कुछ नहीं हो सकता। अगर जो पहाड़ का निवासी है वो ख़ुद ही तैयार बैठा है कि “सब बेच दो, मेरे पास भी तो पैसे की हवस है,” तो फिर कुछ नहीं हो सकता।
प्रश्नकर्ता: मैंने देखा है, सर, कि जिनको कुछ मिल रहा है पैसा, उनको अच्छा लग रहा होता है और लोग दुखी हो रहे होते हैं। “क्यों आ गए हैं? क्यों आ गए हैं?”
आचार्य प्रशांत: मैं तभी बोल रहा हूँ न, आप जो बैलेंस माँग रहे हो, नहीं मिल सकता, विनाश सुनिश्चित है। और यंग फ़ोल्ड माउंटेंस हैं ये। ये जो हैं न, ठोस नहीं हैं अरावली की तरह। ये भुरभुरे पहाड़ हैं, ये अभी भी बन रहे हैं। इनका क़द अभी भी बढ़ रहा है। जिस क़दर ये गिर रहे हैं और गिरेंगे, प्रदेश से झेला नहीं जाएगा। मैंने अपनी आँखों से इनका विनाश देखा है, पिछले दो दशकों में ही। पहाड़ काट रहे हैं और जो मलबा निकल रहा है नीचे गंगा में फेंक रहे हैं। और यह काम आयोजित स्तर पर कराया जा रहा है, शायद स्वयं सरकार के द्वारा करा जा रहा है।
तुम्हें क्या लग रहा है, ये पर्वत तुम्हें माफ़ कर देंगे? आप अगर प्रदेश के वासी हो और अपने ही पर्वतों के साथ यह व्यवहार कर रहे हो, तो जो दिल्ली, गुड़गाँव, चंडीगढ़ से आए हैं ये तो अपनी-अपनी गाड़ियाँ ले भाग जाएँगे वापस, झेलना आपको है।
ये पर्वत आपके हैं, इनको प्यार और संरक्षण आपको देना है। इन्हें बेचिए मत। और यह सिर्फ़ उत्तराखंड के नहीं हैं। यह पूरे भारत का जीवन हैं।
हिमालय नहीं, तो उत्तर भारत में वर्षा नहीं होने वाली। काट लो वनों को। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, पंजाब, हरियाणा, सब तरसेंगे पानी के लिए। पिघलने दो ग्लेशियरों को। हम देखेंगे नदियों में फिर जल कैसे बचता है। तो आप अगर अपनी प्राकृतिक धरोहर को बचा रहे हैं तो आप पूरे राष्ट्र पर एहसान कर रहे हैं, बचाइए इसको। विकास के नाम पर प्रकृति का शोषण इससे बड़ी मूर्खता नहीं हो सकती। यह विकास नहीं है, यह पागलपन है और यह इरिवर्सिबल पागलपन होगा।
जब तक आपको बिल्कुल प्रत्यक्ष प्रमाण ही मिलेगा कि “यह हमने क्या कर दिया,” तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। और वो प्रमाण हो सकता है दस बीस साल बाद नहीं, दो-चार साल में आपके सामने आ जाए।
**माखी गुड़ में गड़ी रहे, पंख रहे लिपटाए। हाथ मले और सिर धुनें, लालच बुरी बलाय।।
अब कुछ नहीं हो सकता, अब मरेगी वो। मक्खी मत बनिए।
जोशीमठ धँस रहा था, उस पर मैंने कुछ बात करी थी। कल गीता छात्रा मिली कोई बोली, “मैं जोशीमठ से हूँ।” मैंने कहा, “अभी क्या हाल है?” बोली, “बस अब मीडिया में नहीं आता, धँस तो अभी भी रहा है।” आज किसी ने मुझसे कहा कि “ऋषिकेश को तो आपने भुला ही दिया।” किसने कहा था? आपने कहा था।
बुरा लगता है। एक समय था जब मैं ऋषिकेश को होमटाउन बोला करता था, मैं कहता था, “यही मेरा शहर है।” मैं सचमुच यहाँ बसना चाह रहा था। पर जो हाल किया है न ऋषिकेश का, बुरा लगता है। चोट लगती है, देखने से बचता हूँ। इसलिए कम आता हूँ ऋषिकेश की तरफ़। बहुत प्यार किया है मैंने उस शहर को, इसलिए उसे अब देखना नहीं चाहता। जो दुर्दशा कर दी उसकी। आऊँगा यद्यपि इसी महीने में आऊँगा।