पत्नी, बहू घर आई है तो खाना बनाएगी, बर्तन धोएगी, कपड़े साफ़ करेगी, बच्चे पैदा करेगी। इसमें पवित्रता क्या है? क्या बताते हो कि शादी का पवित्र बंधन, अगर यही सब है, तो पवित्र क्या है इसमें फिर? पवित्रता चीज़ क्या होती है; ये जानना है तो ऋषियों के पास जाओ, उपनिषदों के पास जाओ। वो बताएँगे कि पवित्र माने क्या। “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” ज्ञान ही है जो पवित्र करता है। ज्ञान है पवित्र। ये थोड़ी है कि बर्तन माँजना पवित्र हो गया।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। तो एक चीज़ ये थी कि मेरी फैमिली में है। दरअसल क्या, मेरी फैमिली मतलब पापा-मम्मी पीछे गाँव से ही बिलॉन्ग करते हैं। रहते हम यहीं पर हैं दिल्ली में, काफ़ी टाइम से। बट अब जो उनके रिश्तेदारी वग़ैरह, वो सब गाँव से ही ज़्यादातर है। तो उनकी सारी भावनाएँ, विचार हैं, सब वहीं के ही हैं।
तो अभी मैं शादीशुदा हूँ। मेरी वाइफ़ कुछ दिन के लिए गई थी अपने घर पर। तो मम्मी खाना नहीं बना पाती ज़्यादा, तो मैं बना रहा था। मैं पापा के लिए रोटियाँ बना रहा था, मम्मी के लिए भी। तो पापा ने सीधा आके बोला, कि “बहू कहाँ है? वो क्यों नहीं आ रही है?” मैंने कहा उसकी तबीयत ख़राब है, आ जाएगी एक-दो दिन में। तो कह रहे, “तो फिर उसका फ़ायदा क्या है शादी करने का तुम्हारा?”
तो मैंने कहा, तो वो खाना-वाना बनाने के लिए है क्या यहाँ पर? फ़ायदा पूछ रहे हो। मैंने कहा अगर ऐसे आप उसका फ़ायदा पूछ रहे हो तो फिर तो मेरा भी कोई फ़ायदा होगा। मेरे से क्या फ़ायदा आपको? कह रहे, “ये कैसी बातें कर रहे हो?” मैंने कहा, फिर भाई से क्या फ़ायदा है आपको? मम्मी से क्या फ़ायदा है? मैंने कहा, तो फिर पापा आप कहते हो प्रेम के रिश्ते होने चाहिए, ये तो लालच के रिश्ते हुए फिर। वहाँ उनका जवाब देना ही नहीं बना फिर।




