
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। तो एक चीज़ ये थी कि मेरी फैमिली में है। दरअसल क्या, मेरी फैमिली मतलब पापा-मम्मी पीछे गाँव से ही बिलॉन्ग करते हैं। रहते हम यहीं पर हैं दिल्ली में, काफ़ी टाइम से। बट अब जो उनके रिश्तेदारी वग़ैरह, वो सब गाँव से ही ज़्यादातर है। तो उनकी सारी भावनाएँ, विचार हैं, सब वहीं के ही हैं।
तो अभी मैं शादीशुदा हूँ। मेरी वाइफ़ कुछ दिन के लिए गई थी अपने घर पर। तो मम्मी खाना नहीं बना पाती ज़्यादा, तो मैं बना रहा था। मैं पापा के लिए रोटियाँ बना रहा था, मम्मी के लिए भी। तो पापा ने सीधा आके बोला, कि “बहू कहाँ है? वो क्यों नहीं आ रही है?” मैंने कहा उसकी तबीयत ख़राब है, आ जाएगी एक-दो दिन में। तो कह रहे, “तो फिर उसका फ़ायदा क्या है शादी करने का तुम्हारा?”
तो मैंने कहा, तो वो खाना-वाना बनाने के लिए है क्या यहाँ पर? फ़ायदा पूछ रहे हो। मैंने कहा अगर ऐसे आप उसका फ़ायदा पूछ रहे हो तो फिर तो मेरा भी कोई फ़ायदा होगा। मेरे से क्या फ़ायदा आपको? कह रहे, “ये कैसी बातें कर रहे हो?” मैंने कहा, फिर भाई से क्या फ़ायदा है आपको? मम्मी से क्या फ़ायदा है? मैंने कहा, तो फिर पापा आप कहते हो प्रेम के रिश्ते होने चाहिए, ये तो लालच के रिश्ते हुए फिर। वहाँ उनका जवाब देना ही नहीं बना फिर।
आचार्य प्रशांत: ये बातें बहुत गहरी हैं क्या? बहुत ज़ाहिर बातें होती हैं न, पर तब भी हमें दिखाई नहीं देती। हम न जाने किस ढकोसले में बैठे रहते हैं कि निस्वार्थ रिश्ते हैं, प्रेम के रिश्ते हैं, दैवीय रिश्ते हैं, पवित्र रिश्ते हैं।
क्या पवित्रता है रिश्तों में? पत्नी, बहू घर आई है तो खाना बनाएगी, बर्तन धोएगी, कपड़े साफ़ करेगी, बच्चे पैदा करेगी। इसमें पवित्रता क्या है? तो क्या बताते हो कि शादी का पवित्र बंधन, अगर यही सब है तो पवित्र क्या है इसमें फिर?
पवित्रता चीज़ क्या होती है? ये जानना है तो ऋषियों के पास जाओ, उपनिषदों के पास जाओ, वो बताएँगे कि पवित्र माने क्या।
अभी हमने क्या बोला था? “पवित्रमिह विद्यते,” ज्ञान ही है जो पवित्र करता है। ज्ञान जैसा, “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” ये जाकर के पूछो न। ज्ञान है पवित्र। ये थोड़ी है कि बर्तन माँजना पवित्र हो गया।
मेरे ख़िलाफ़ आते हैं, एकदम तन के, “ये शादी के पवित्र रिश्ते के ख़िलाफ़ बोलता है।” नहीं, मैं पवित्रता से प्रेम करता हूँ, इसीलिए अपवित्रता के ख़िलाफ़ बोलता हूँ। तुम संबंध सचमुच पवित्र बना लो, मुझसे बड़ा समर्थक नहीं मिलेगा दूसरा। तुम संबंध सचमुच पवित्र बनाओ तो सही। पर मैं एक साथ पवित्रता और अपवित्रता दोनों को सम्मान कैसे दे दूँ? जब मैं देख पा रहा हूँ कि तुम्हारे रिश्ते में पवित्रता है ही नहीं, तो कैसे सम्मान दे दूँ? गीता और पपीता को एक बराबर बना लूँ?
मैं कॉलेजों में पहले दस साल वहीं ज़्यादा जाकर बोलता था। पहला हमारा शिविर औपचारिक रूप से 2011 में हुआ था। तो उससे पहले और उसके बाद भी कुछ साल तक कॉलेजों में खूब जाता था, और उनमें से बहुत सारे कॉलेज उत्तर प्रदेश के होते थे; और जगहों के भी, एमपी के भी होते थे। उनमें भी जो एकदम बड़े शहर हैं, इनकी बात अलग है। मान लीजिए, यूपी तो लखनऊ-कानपुर की बात अलग है, और अगर अंदर के शहरों में चले जाओ, अमेठी, झाँसी, बांगा।
लड़कियाँ बैठी होती थीं। अब ये कॉलेज की लड़कियाँ हैं। मैं बोल रहा हूँ, वहाँ बैठी हुई लड़कियाँ सुनने के लिए। कॉलेज की लड़कियाँ हैं। और मैं कहूँ, ये पाँचवीं में पढ़ती है क्या? वो इतनी छोटी सी। उसको खाने को नहीं दिया है ठीक से। उसका क़द नहीं बढ़ा है, उसके कंधे कुल इतने (संकरे) हैं। यहाँ बीच में खोपड़ी है और कुल इतने कंधे हैं।
और फिर तुम बोल रहे हो कि पवित्र परिवार, ये पवित्रता है तुम्हारी। और ऐसा नहीं कि घर में खाने की इतनी क़िल्लत है, भाइयों को मिलता है खाने को। भारत में कितनी महिलाएँ एनीमिया से ग्रस्त हैं, खोजिएगा एक बार; क्योंकि खाने को ही नहीं मिलता। और ये नहीं कि बाहर वाला आकर खाना चुरा ले जाता है, घर वाले खाने को नहीं देते, और तुम पवित्र-पवित्र का राग अलाप रहे हो।
एक दफ़े तो था; वहाँ पर ब्रेक होता था लंच का, तो वो होता था उनका 12:00 बजे से लेकर के 2:00 बजे तक होता था। जब उनकी वो मेस खुली होती थी या कैंटीन जो भी था खाने का, वो 12:00 से 2 का था। तो जो उनके साथ मेरी बात थी, वो 11:00 से 1 तक थी। ये था कि 1:00 बजे भी ये लोग छूटेंगे तो 1 से 2, इनको मिलेगा जाकर खा लेंगे।
अब मैं उनको देख रहा हूँ, मैंने उनको 12:00 बजे ही छोड़ दिया। मैंने कहा, तुम पहले खा लो कुछ। ऐसे पिचके हुए मुँह, मैंने कहा, इस पूरे हॉल का जो वजन है उससे ज़्यादा तो मेरा ही होगा। कोई ढाई किलो की और पंखा ज़्यादा तेज कर दो तो दो-चार उड़ जाएँ। 11:00 बजे बोलना शुरू किया, 12:00 बजे मैंने बोला, जाओ तुम कुछ पहले खाओ। मैं तुम्हें ज्ञान देकर क्या करूँगा? तुम्हारा पेट खाली है।
न हाँ, न ना, बिल्कुल ऐसे मूर्ति की तरह मृत या फिर मन इतना संकुचित, इतना छोटा कि दो अगल-बगल बैठ गई हैं और ‘खी खी खी खी खी’ करे जा रही हैं। कई तो उन कॉलेजों में लड़कियाँ होती थीं, वो शादीशुदा होती थी। कईयों के बच्चे होते थे। ये मौत उत्तर प्रदेश है। वो 18-19 साल या 20 साल की कॉलेज की लड़की है और उसके बच्चा हैं। और कोई भरोसा नहीं है कि वो डिग्री पूरी करेगी कि नहीं, वो छोड़ ही देगी। शादीशुदा तो बहुत सारी होती थीं।
अब वो दो अगल-बगल बैठी हैं। एक की शादी हो गई है, वो बगल वाली को अपनी शादी के किस्से सुना रही है और दोनों ‘खी खी खी खी खी’ कर रही हैं। क्योंकि तन ही नहीं, उनका मन भी छोटा कर दिया गया है। उनका संसार भी छोटा कर दिया गया है, उनके लिए बस यही बहुत बड़ी बात है कि बेलन, चिमटा, हींग, लहसुन, पति ने ऐसा करा।
उनसे क्या बात करें? उसकी दुनिया इतनी (छोटी) सी होकर रह गई है, मैं उससे कौन सी गीता की बात करूँ? उसकी कुल दुनिया अब बेलन में समा जाती है।
और मालूम है क्या करती थी? जैसे एक बड़ी लंबी सी बेंच है। पूरा हॉल खाली है और बेंच इतनी है, मान लीजिए यहाँ से यहाँ; पूरा हॉल खाली है, उस बेंच में, वो दस लोगों की बेंच है उसमें दस बैठ सकते हैं। उसमें चार बैठती थी और चिपक के बैठ जाती थी, लोनलीनेस। होना तो ये चाहिए, स्वास्थ्य की तो ये निशानी है कि अगर जगह है तो अपना दूर-दूर होकर बैठेंगे। वो चार आएँगी और एकदम चार इकट्ठे चिपक कर बैठ जाएँगी। जबकि बहुत जगह उपलब्ध है, वो चार चिपक के बैठ जा रही हैं, डरी हुई हैं।
और उन्हें स्पेस मिला ही बहुत कम है। आउटर स्पेस, इनर स्पेस बहुत कम मिला है। तो उनकी आदत ही हो गई है अपने आप को ऐसे सिमटा लेने की। श्रिंकिंग हो गई हैं, सिकुड़ गई हैं। वो चारों वहाँ चिपक के बैठ गई हैं, मैं, “चिपक के क्यों बैठी हो? दूर हो।” वो डर लग जाता था कि दूर होते ही असुरक्षित हो जाएँगे। दूर होने का मतलब होता है, आप इंडिविजुअल हो गए न। इंडिविजुअलिटी तो सिखाई नहीं जाती।