हम आमतौर पर बस ऐसे ही छवि बना लेते हैं कि संघर्ष या दबाव सिर्फ़ व्यवसाय में या सांसारिक मसलों में ही है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। दबाव और संघर्ष अध्यात्म में भी उतने ही करने पड़ते हैं, जितने कि संसार में, बस उसकी श्रेणी, उसकी गुणवत्ता अलग है। बाहर तुम दबाव झेलते हो कुछ और अतिरिक्त हासिल कर लेने के लिए, और अध्यात्म में, जिसको तुमने नाहक पा लिया है, वह दबाव बनाता है कि मुझे मत छोड़ो। भीतर वाली लड़ाई जीत लो, बाहर की सब लड़ाइयाँ तुम पाओगे कि तुम्हारे लिए बहुत आसान हो गई हैं।
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प्रश्नकर्ता: मेरा कॉलेज में जो अनुभव होता है वो कॉम्पीटिशन (प्रतिस्पर्धा) से, फ़ियर (डर) से और बहुत ज़्यादा प्रेशर (दबाव) से भरा हुआ होता है। इसके विपरीत जो अनुभव आपके वीडियो सुनने का होता है वो बहुत ही ज़्यादा शान्तिपूर्ण होता है। अक्सर मुझे ये विचार आते हैं कि कॉलेज इत्यादि में जो डर है और जो दबाव है उसको छोड़कर मैं पूरी तरह वीडियोज़ को सुनने में या संस्था के कार्य में ही समर्पित हो जाऊँ। क्या ये एस्केप (पलायन) है?
आचार्य प्रशांत: नहीं। ऐसा नहीं है कि संघर्ष या दबाव या भय या प्रतिस्पर्धा सिर्फ़ कॉलेज में या व्यवसाय में या सांसारिक मसलों में ही है। हम आमतौर पर बस ऐसे ही छवि भर बना लेते हैं। हमें लगता है कि एक तो सांसारिक तल है, इसमें बड़ा घर्षण है, बड़ी रस्साकशी है, बड़े संघर्ष हैं, भय का सामना करना पड़ता है, ज़ोर लगाना पड़ता है, मेहनत करनी पड़ती है।
इन सब बातों को हम जोड़ देते हैं बाहर की दुनिया से; चाहे वो कॉलेज की दुनिया हो, चाहे वो नौकरी की दुनिया हो, व्यापार की दुनिया हो। और इसके विपरीत हम छवि बना लेते हैं अध्यात्म की दुनिया की।




