
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन था कि आजकल रील्स ऐसी बहुत ज़्यादा आ रही हैं, जिनमें आध्यात्मिक बातें करते हैं और सेल्फ-हेल्प का उसके माध्यम से दावा करते हैं। और ऐसी बहुत घातक होती हैं क्योंकि वो आधारहीन होती हैं ज़्यादातर। और चूँकि मैं आपको काफ़ी समय से सुन रहा हूँ, तो इनका प्रभाव मुझ पर बहुत कम पड़ता है। पर फिर भी कुछ ऐसी चीज़ें रहती हैं जो घर कर जाती हैं, मन में रह जाती हैं या कभी-कभार सच लग जाती हैं। जैसे एक दीदी को बोलते हुए सुना था मैंने कि समाज को तभी महत्त्व देना चाहिए, जब तक समाज से हमारी जेब भर रही है या वो बिल्स भर रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: अच्छा, घर के बिल्स।
प्रश्नकर्ता: जी। तो मतलब हम कैसे समझें या क्या तरीका है ऐसा कि...?
आचार्य प्रशांत: ये बहुत अच्छा उदाहरण है खोखले विद्रोह का। ये बहुत-बहुत अच्छा उदाहरण है खोखले विद्रोह का। कोई आकर के ज्ञान दे रहा है, कि “हम समाज की क्यों सुनें? क्या समाज मुझे पैसा दे रहा है? क्या समाज मेरा घर चला रहा है? क्या समाज मेरे घर के ख़र्चे उठा रहा है? हम समाज की क्यों सुनें?” और ये बात सुनने में कैसी लग रही है? कि बात तो सही है। समाज में इतने लोग हैं, कुछ भी बोलते रहते हैं पर अपने घर के ख़र्चे तो मैं ही उठाता हूँ। अपनी जितनी समस्याएँ हैं, ज़िम्मेदारियाँ हैं, वह तो सब मैं ही देखता हूँ। है न? तो हम समाज की क्यों सुनें?
यह बहुत अच्छा उदाहरण है उस प्रकार के दर्शन का, जो आपको बड़ी आसानी से मौका दे देता है ख़ुद को विद्रोही कहने का, सस्ता विद्रोह। और अहंकार चाहता है कि विद्रोही कहलाए, क्योंकि वह भी उसके लिए एक पदक जैसा होता है। मैं क्या था? “मैं अमीर था, मैं ज्ञानी था, मैं सुंदर था, मैं मज़बूत था। और अब मैं क्या हूँ? मैं विद्रोही भी हूँ। देखो, एक चीज़ और जुड़ गई मेरे तमगों में, मैं विद्रोही भी हूँ। "आइ ऐम द रेबल। आइ ऐम द रेबल।”
ये सस्ता विद्रोह है। बताओ क्यों? यह कह रहे हैं कि मैं उन लोगों की क्यों सुनूँगा? कोई मेरे घर के ख़र्चे चला रहे हैं? मेरे घर की ज़िम्मेदारियाँ क्या वह उठा रहे हैं? मैं इन लोगों की नहीं सुनूँगा। पर तू यह बता, तुझे यह किसने बताया कि घर की ज़िम्मेदारियाँ क्या होती हैं? तुझे यह किसने बताया? तुझे कैसे पता कि घर नाम का कोई कॉन्सेप्ट होता भी है? जब तू पैदा हुआ था, तो क्या तू यह ज्ञान लेकर पैदा हुआ था कि एक घर होता है और घर का मतलब ही होता है कि यहाँ स्त्री-पुरुष और दो बच्चे रहेंगे, और यही इकाई है, और इसी का सबसे पहले, सर्वप्रथम ख़याल रखना है, और यही तुम्हारा सर्वोच्च कर्तव्य है? ये सब तुझे किसने बताया? ये तुझे समाज ने ही बताया।
अब तू कह रहा है, मैं समाज के ख़िलाफ़ विद्रोह करके अपने घर की ज़िम्मेदारियों का पालन करूँगा। तो तू किसका पालन कर रहा है? तू चल समाज की ही सीख पर रहा है, तू पालन अभी भी समाज के आदेशों का कर रहा है। तू अभी भी उतना ही बड़ा ग़ुलाम है, लेकिन अब तूने बेईमानी करके अपने आप को रिबेल, विद्रोही होने का तमगा भी पहना दिया।
"साहब, मैं किसी की नहीं सुनता। मैं तो अपनी सुनता हूँ।" और यह जब तू अपनी सुनता है, जिसको तू अपनी अंतरात्मा वग़ैरह बोलता है, ये सब कुछ भी कहाँ से आ रहा है? समाज से ही आ रहा है। तो है तू अभी भी उतना ही बड़ा टट्टू। है तू अभी भी उतना ही बड़ा आज्ञापालक। बिल्कुल आज्ञाकारी गदहवा है। लेकिन अब तूने अपने आप को यह जता लिया है कि मैं तो विद्रोही हूँ और स्वाधीन हूँ।
आप अपनी निजी ज़िंदगी में जिसे अपनी स्वेच्छा बोलते हैं, वो क्या आपकी इच्छा है? स्वेच्छा माने सामाजिक इच्छा। स्वेच्छा माने स्व की इच्छा नहीं होता। आपकी सारी स्वेच्छाएँ सामाजिक हैं, बस आपको भ्रम हो जाता है कि वो आपकी इच्छा है। आपकी सारी इच्छाएँ सामाजिक हैं, आपकी कोई इच्छा आपकी नहीं है। बिरला होता है वो आदमी जिसकी इच्छा मुक्त होती है, उसे बोलते हैं मुक्त इच्छा। मुक्त इच्छा तो उसको ही होगी जिसका अहंकार घट करके न के बराबर हो गया है। हमारी स्वेच्छाएँ सब नकली होती हैं, हमारी सारी इच्छाएँ समाज से ही आ रही हैं। और फिर हम कहते हैं, "मैं समाज की नहीं सुनूँगा, अपनी इच्छाओं की सुनूँगा।" पर तुम्हारी इच्छाएँ तो समाज से ही आई हैं। ये क्या हो गया? ये क्या हो गया?
अपनी कोई इच्छा बता दीजिए जो रहती, अगर आपका जीवन वैसे नहीं बीता होता जैसे बीता है। अगर आपका परिवार वैसा नहीं होता जैसा है। अगर स्कूल-कॉलेज में आपको वो माहौल और वो पढ़ाई न मिली होती जो मिली, कोई इच्छा बता दीजिए जो बची रहती। अपने जीवन का कोई निर्णय बता दीजिए जो वैसा ही रहता जैसा है, अगर आपके ऊपर समाज के प्रभाव न पड़े होते। कुछ भी है ऐसा जो सचमुच मुक्त रहा है आपके जीवन में? सब कुछ तो सामाजिक रहा है। कपड़े कैसे पहनते हो? यह आपने ख़ुद अपने लिए डिज़ाइन बनाया है क्या? जो समाज में चल रहा है, वही पहन लिया।
क्या बोलते हो? क्या पसंद है? क्या पसंद है? क्या पसंद है? खाने में क्या पसंद है? इंदौरी सेव, गुजिया और नमकीन। क्यों? क्योंकि इंदौरी हैं। इंदौरी न होते, हैदराबादी होते, तो बिरयानी पसंद होती; इटालियन होते, तो पास्ता पसंद होता। जापानी होते, तो सुशी पसंद होती। तुम्हारी पसंद में तुम्हारा क्या है? ओ! तो ग़लत हो गया। डेनमार्क में पैदा हुए होते, तो थोड़ी बोलते, "सिक्सर! सिक्सर! सिक्सर!" वहाँ कौन क्रिकेट देख रहा है? वहाँ कोई नहीं देख रहा होता, तो तुम भी नहीं देखते। तुम कहते हो, "क्रिकेट मुझे बहुत पसंद है।" तुम्हें थोड़ी पसंद है, तुम्हारा अपना तो कुछ भी नहीं है। तुम्हारा दिल भी तुम्हारा नहीं है। वह भी समाज ने दिया है।
अब? फ़ेक रिबेलियन, फ़ेक रिबेलियन; पकड़ा गया, पकड़ा गया; झूठा, झूठा। जो तुम्हें बताए कि समाज का पालन करो, वो तो तुम्हारा दोषी है ही। लेकिन यह सब जो सेल्फ-हेल्प और यह जो मॉडर्न गुरु चल रहे हैं, जो तुमको रिबेलियस बनाते हैं, यह ज़्यादा बड़े दोषी हैं। क्योंकि ये तुम्हारा अहंकार क़ायम रखते हुए, यथावत रखते हुए, तुम्हें विद्रोही हो जाने की, कहलाने जाने की सहूलियत दे देते हैं। हो तुम वही जो तुम हो। बस अब एक सुविधा मिल गई है कि मैं अपने आप को क्या बोलूँगा? "मैं रिबेल हूँ।" मुझे भाव दो, मुझसे दब के चलो।
हमारी सारी मान्यताएँ, हमारी सारी धारणाएँ, हमारे सारे विश्वास, बता दो कुछ भी होता क्या, अगर तुम्हें समाज ने न दिया होता?
जल्दी बोलो।
आप पैदा हुए होते, और जैसा कि होता था, शायद अभी भी होता होगा, बच्चा बदल जाता वहाँ मैटरनिटी वार्ड में। आप कहीं और चले गए और जिन दीदी के पास चले गए, वो आपको लेकर के गोवा निकल गईं, कि तमिलनाडु निकल गईं, कि उत्तर-पूर्व निकल गईं, कि केरल निकल गईं, तो अब नमकीन और फाफड़े का क्या होता? अभी भी कहते, "जान दे दूँगा फाफड़े के लिए"? अभी भी बोलते क्या? बोलते? और जो बातें आप कहते हो, "छी-छी-छी, ऐसा तो मैं कर ही नहीं सकता, ऐसा तो मैं सोच ही नहीं सकता।" नॉर्थ-ईस्ट में होते, तो वो सोच भी रहे होते, कर भी रहे होते। तो आप हो क्या?
और कईयों को बहुत रहता है, "मैं नारी-शक्ति हूँ।" कईयों को रहता है, "मैं ज़बरदस्त मर्द हूँ, पुरुष हूँ।" एक क्रोमोसोम थोड़ा इधर से उधर हो गया होता, उसका मूड बदल जाता। तो नारी-शक्ति फ़ौलादी हो जाती, और मर्द कोमलांगनी बन जाता? और आज तो वही आइडेंटिटी है आपकी। रॉ मैस्कुलिनिटी। टेस्टोस्टेरोन ऑन बॉयल।
(बच्चे की रोने की आवाज़।)
वो देखो, “छोटा-मोटा नहीं हूँ। अल्फ़ा हूँ।" और करना कुछ नहीं था। वो जो एक्स था, उसको अपनी टाँग एक बस ऐसे मोड़ लेनी थी। सारा जेंडर प्राइड ग़ायब हो जाता, दोनों तरफ़ का। आपका अपना क्या है? ओ! अब क्या करें?
साठ के दशक में भारत ने सैन्य कार्रवाई करके पुर्तग़ालियों से गोवा को छुड़ा लिया, तो हम गोवा को स्वदेश बोलने लगे, उससे पहले हम गोवा को विदेश बोलते थे। आज़ादी के दस बारह साल बीत जाने के बाद भी गोवा पुर्तग़ाल का हिस्सा था। तो हम गोवा को क्या बोलते थे? 47 के 12-14 साल बाद तक भी गोवा विदेश था, और 47 के कुछ साल पहले तक कराची स्वदेश था। और सिक्किम बेचारे का तो नंबर और बाद में लगा है। आप 35 में पैदा हुए होते तो? बड़ी समस्या हो जाती, स्वदेश बोलें कि विदेश बोलें? सब आती-जाती हवाओं पर निर्भर है हमारा, हमारा प्यार भी।
कुछ आ रही है बात समझ में?
इतना अड़ मत जाया करो कि "यह सब बाहरी है और यह सब भीतरी है।"
बाहरी तो बाहरी है ही। जिसको तुम भीतरी बोलते हो, वो भी बाहरी है। अध्यात्म का अर्थ ही है, जिसको तुम भीतरी माने बैठे हो, उसको बाहरी जान लेना। यही मुक्ति है।
बात आ रही है समझ में? दुनिया में बाहरी आज़ादी आज जितनी है इंसान को, उतनी कभी नहीं थी। हम गणराज्य हैं, हम लोकतंत्र हैं। कितने तरीके की आज़ादियाँ, फ़्रीडम्स हमें मिली हुई हैं। और दुनिया में ज़्यादातर देशों में किसी-न-किसी हद तक डेमोक्रेसी और फ़्रीडम मौजूद हैं। तो बाहरी आज़ादी के लिए आप क्या संघर्ष करोगे अब? बाहरी आज़ादी तो मिल गई। आज के इंसान की समस्या बाहर की ग़ुलामी नहीं है, बाहरी आज़ादी मिल गई। आज के इंसान की समस्या भीतरी ग़ुलामी है। तुम अपने ग़ुलाम हो, तुम अहंकार के ग़ुलाम हो, अहंकार स्वयं अपना ग़ुलाम है।
तो आज बाहर क्रांति करने से कुछ नहीं मिलेगा कि जाकर के नारे लगा रहे हैं, और यह कर रहे हैं, और वो कर रहे हैं। तुम्हारा दुश्मन आज बाहर नहीं है, भीतर बैठा है। बाहर भी है, पर पहले बाहर ही था। पहले बाहर ज़्यादा बड़ा था दुश्मन, आज बाहर वाला जो दुश्मन है उसने अपना आकार बाहर घटा लिया है और भीतर बढ़ा लिया है, क्योंकि वो भी जानता है कि अगर बाहर से किसी को क़ाबू में करोगे, तो वो विरोध करेगा। इससे अच्छा यह है कि उसके भीतर ही घुस जाओ और उसको भीतर से नियंत्रित करो।
आपका दुश्मन आज आपके भीतर बैठा है आपकी मान्यताएँ बनकर, आपके विश्वास बनकर, आपकी धारणा बनकर। जो कुछ भी आप पसंद-नापसंद करते हो, जो कुछ भी आप सही-गलत, शुभ-अशुभ मानते हो, वो सब बनकर आपका दुश्मन आज आपके भीतर बैठा हुआ है। और मज़ेदार बात यह कि उस दुश्मन को आप ख़ुद ही सुरक्षा दे रहे हो, यह बोलकर कि, "वो तो मैं हूँ। वो मेरा दुश्मन नहीं है। वो तो मैं हूँ।"
ऐसा दुश्मन कभी हारेगा क्या, जिसे ख़ुद आपने सुरक्षा दे रखी हो? कुछ आ रही है बात समझ में?
प्रश्नकर्ता: सर, फ़ॉलो-अप क्वेश्चन है कि मैं रील्स की बात कर रहा था। तो ऐसे मैं काफ़ी लोगों को जानता हूँ, जो मतलब अपने आपको इंटेलेक्चुअल साउंड करने के लिए और फ़िलॉसॉफ़िकल साउंड करने के लिए आपकी और अन्य बहुत सारी रील्स देखेंगे, शेयर करेंगे, और सामाजिक मुद्दों की भी रील्स शेयर करेंगे। बट उनके जीवन से कुछ ऐसा दिखता नहीं है कि ऑन ग्राउंड उनकी लाइफ़ वही है जो बाक़ी सबकी लाइफ़ है। वह वही ढर्रा फ़ॉलो कर रहे हैं जो सभी कर रहे हैं। बट अपने आपको बस एक ऑनलाइन प्रेज़ेन्स थोड़ी उन्होंने चेंज कर रखी है।
आचार्य प्रशांत: देखो, मुझे किसी के भी साथ रहने या रखने का कोई तुक बनता नहीं है, क्योंकि मैं अहंकार को किसी भी तरह का सुख नहीं लेने देता। आप बाक़ी गुरुओं के साथ रहोगे, वह आपको यह सुख तो बिल्कुल दे ही देंगे, यू आर द रोमैन्टिसाइज़्ड रेबल। यू कैन लीड अ लाइफ़ फ्री ऑफ कंडीशनिंग। मैं अहंकार से बोलता हूँ कि तू गंदा है, तू बुरा है, और जब तक शरीर रहेगा तू भी रहेगा। तो मेरी तस्वीर दिखा करके कोई कहे कि, "यह देखो, मैं नारे लगाऊँगा," बढ़िया चीज़ मिल गई। या मुझे किन्हीं और लोगों की तस्वीरों के साथ आप बैठा रहे हो, तो आप भूल कर रहे हो। मैं वो बात बिल्कुल नहीं कह रहा हूँ जो औरों ने कही है।
जो औरों ने बात कही है, वो अहंकार का आहार बन सकती है। मुझे देखा कि मैं कभी आपसे ब्लिस की, या अवेयरनेस की, या कॉन्शसनेस की, प्योर कॉन्शसनेस वग़ैरह की बात कर रहा हूँ? जो कुछ भी अहंकार को अच्छा लग सकता है, वो मुझसे कभी मिला क्या? मुझे तो ताज्जुब है, आप इतने लोग आ क्यों गए? मैंने आज तक किसी को कुछ ऐसा नहीं दिया जो उसे अच्छा लगता हो। ज़्यादा संभावना यही है कि आप मेरी बात को कुछ उल्टा-पुल्टा समझ के आ गए हो। जो मेरी बात समझने लग जाते हैं बहुत ज़ोर से दूर भागते हैं, जैसे मौत से भागा जाता है।
तो मैं कोई ऐसी बात नहीं बोल रहा हूँ जिसको आप रील्स में डालकर, उसके पीछे बीट्स डालकर, और दिखा दोगे कि धिंचक-धिंचक, धिंचक-धिंचक, "देखो, अब हम रिबेलियन कर रहे हैं। यह कर रहे हैं, वो कर रहे हैं।" उन सब में तो अहंकार को बड़ा सुख मिलता है न। आइ ऐम द स्ट्रीट फाइटर। आइ ऐम द आइकॉनोक्लास्ट। आइ ऐम एंटी-रिचुअल, एंटी-ट्रेडिशन।
मेरे पास एंटी-रिचुअल वाले आते हैं, तो मैं कहता हूँ कि रिचुअल तुम्हारे भीतर बैठी है। तुम काहे के एंटी-रिचुअल? भागो यहाँ से।
सेकुलर लोग आते हैं, तो बोलता हूँ, "तुम्हारा सेकुलरिज़्म ही तुम्हारा डॉग्मा है। तुम्हारा रिलीजन है। भागो यहाँ से।"
रिलिजियस लोग आते हैं। मैं कहता हूँ, "तुम्हें रिलीजन का मतलब ही नहीं पता। भागो यहाँ से।"
लेफ़्ट वाले आते हैं। बोलता हूँ, "तुम किसी की नहीं सुनते, बस अपने अहंकार को पूजते हो। भागो यहाँ से।"
राइट वाले आते हैं। मैं कहता हूँ कि, "जो ग्रंथ अहंकार को तोड़ सकते थे, तुमने उन ग्रंथों को ही तोड़ दिया। भागो यहाँ से।" मैं तो किसी को भी सुख नहीं देता।
ट्रेडिशनल पैट्रिआर्की वाले आते हैं। मैं कहता हूँ, "तुमने अपने अहंकार को पोषण देने के लिए महिलाओं की दुर्गति कर रखी है। भागो यहाँ से।"
मॉडर्न फ़ेमिनिस्ट आ जाती हैं। मैं कहता हूँ, "तुम्हें तुम्हारी दुर्गति कराने के लिए पुरुषों की ज़रूरत ही नहीं। तुम ख़ुद अपनी दुर्गति करती हो। भागो यहाँ से।"
मैं किसको सुख दे रहा हूँ? तुम मेरी तस्वीर किसके साथ लगा रहे हो? उन बेचारों को ही बुरा लगेगा, मैं उनकी श्रेणी का हूँ ही नहीं।
कौन-से गुरु ने तुमसे साफ़-साफ़ कहा कि दूध का रंग लाल है? तुम जिनके साथ मेरी तस्वीरें लगा रहे हो, वो तो अंडे-मांस की बुराई तक न कर पाएँ। बल्कि अनुमति दे रखी थी, "हाँ, आ जाओ, हमारे आश्रम में भी अंडा-वंडा चल रहा है। चल रहा है।" तुम कहाँ मेरी तस्वीर लगा रहे हो? वह ऊँचे लोग हैं। उनके साथ मुझे लगाकर के तुम उनको असुविधा दे रहे हो। मैं बहुत नालायक हूँ और बदतमीज़ भी। शालीन, भद्र लोगों की संगति में मुझे मत बैठा दिया करो, उनके साथ बुरा हो जाता है।
मैं किसी का अच्छा कर सकता हूँ कभी? कोई खुशी-खुशी आए मेरे पास, वो बेचारा मुँह उतार के वापस जाएगा। ऐसा ही तो है। आनंद आता है कि नहीं आता गुरुओं की वाणी सुन के? कि जैसे ब्लिस की लहरें हैं, उस पर बहे जा रहे हैं। आता है कि नहीं? ऐसा लगता है कि कविता ही सुना दी। और ये होता है, और फिर कहानियाँ हैं, और चुटकुले भी चल रहे हैं।
मैं कहाँ किसी को आनंद दे रहा हूँ? यहाँ तो कोई बेचारा मासूम शांति से सो रहा हो, मेरी आवाज़ सुन के बिस्तर से गिर पड़े। सबकी ज़िंदगी ख़राब करना ही मेरा मक़सद है। तुम कहाँ मुझे सोच रहे हो कि और जितने परंपरागत गुरु हुए हैं या आधुनिक गुरु हुए हैं, उनके साथ मेरी तस्वीर लगा दोगे और उन्हीं की कोटी में मुझको रख दोगे? मैं उन्हीं की तो भुगत रहा हूँ। उन्होंने कोई ढंग का काम करा होता तो आज दुनिया ऐसी होती? यह जो मुझे कचरा साफ़ करना पड़ रहा है यह तुम्हारे पुराने गुरुओं का ही फैलाया हुआ है।
और अहंकार और ज़्यादा गठीला और प्रबल हो जाता है, जब उसे अध्यात्म का आश्रय मिल जाता है। साधारण व्यक्ति को गीता समझाना आसान है फिर भी, लेकिन जिसने कहीं और जाकर किसी गुरुदेव की गीता पढ़ ली है, उसको समझाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। जिसके दिमाग़ में वो ब्लिस और पीस और लव वाली बात आ गई कि जो आध्यात्मिक गुरु होता है, वो तो ऐसा होता है (शांति से चलने का अभिनय करते हैं और नमस्कार करते हैं)। चौपट, सब चौपट। अब कुछ नहीं हो सकता, अब कुछ नहीं हो सकता।
कि “अध्यात्म माने तो ब्लिस, लव एंड पीस। लेट्स लव ईच अदर अनकंडीशनली।” क्या? “और दुखी मत रहो बेटा, तुम तो नाचो।”
बड़ी समस्या हुई, शुरू-शुरू में लोग आते थे जब उन्हें पता ही नहीं था कि मैं कितनी घटिया चीज़ हूँ। आ जाएँ, बैठ जाएँ, और 15-20 मिनट, आधे घंटे के बाद ऐसे खुजलाना शुरू कर दें। इधर-उधर देखना शुरू कर दें बेचैनी में। और फिर कोई वॉलंटियर हो, उसको बुलाकर पूछें, "पर नाच कब शुरू होगा?" बोले, "ये बोलते ही रहेंगे क्या? अध्यात्म माने तो नाचना होता है न। वो कब शुरू होगा?" और सुनने की उनकी कोई तबीयत ही नहीं, उठे तो कहें, "हमें चेयर-सोर पड़ गए हैं।" जैसे बीमारों को बेड-सोर पड़ जाते हैं न बैठने के कारण, छाले-फफोले। बोले, "तीन-तीन, चार-चार घंटा बैठाकर बात करा, ये देखो खोल के दिखा रहे हैं। इतना बड़ा फफोला निकला है।"
तो हम कहें कि फफोला बैठने से नहीं निकला, घिसने से निकला है। घिस काहे को रहे थे? इतना ही बुरा लग रहा था, उठ के भाग जाते। वहाँ कुर्सी घिस दी तुमने हमारी, कुर्सी फाड़ दी, ग़रीब मेरी संस्था।
न तो मैं तुम्हें नाचने का सुख दूँगा, न लव, पीस और ब्लिस का दूँगा। तुम कहाँ मुझे औरों की श्रेणी में लाकर के कह रहे हो कि आचार्य जी भी वही बात कहते हैं जो औरों ने कही है? मेरे साथ होना तो बड़े ख़तरे की बात है, बहुत ख़तरे की बात है। किसी दिन ऐसा होगा कि मैं आऊँगा बोलने के लिए और एक-एक कुर्सी खाली पड़ी होगी। और सच बोल रहा हूँ, मुझे कोई ताज्जुब नहीं होगा। उसका मतलब यह हुआ कि मेरी बात लोगों ने समझ ली। सब समझ गए कि क्या बोल रहा हूँ, इसीलिए भाग गए। अभी तो आप नासमझी में आ गए हो। आप कुछ का कुछ समझ रहे हो। इतनी हिम्मत आप में नहीं, और इतनी अच्छी दुनिया नहीं, कि आप जो मैं कह रहा हूँ उसके साथ चल सको।
नाचने-गाने वाली धार्मिकता बढ़िया है, उसके साथ आप चल लोगे। या ऐसी वाली, जो आपको रिबेल बना दे कि सुनो और बोलो, "हाँ, हाँ, हाँ, किसी की नहीं सुननी, अपनी करनी है बस।" वो भी बढ़िया है, आप उसके साथ भी चल लोगे। जहाँ बात सीधे-सीधे यहाँ (हृदय की ओर इंगित करते हुए) चोट खाने वाली हो ना, उसके लिए प्यार चाहिए। इतना प्यार हमारी पृथ्वी पर है नहीं।
आपने सवाल पूछा कि, "अरे आचार्य जी, हम कुछ करना चाहते हैं, पर कोई साथ नहीं देता।" मुझे देख लो न, मुझे तो यह भी पता है कि जो साथ दे रहे हैं, वो भी नहीं दे सकते। आपको तो किसी का साथ मिल गया, तो आप शायद खुश हो जाएँ। मुझे तो जिनका मिला भी हुआ है, और बहुतों का मिला हुआ है, कहने को आँकड़े तो बहुत बड़े-बड़े हैं, मुझे तो यह भी पता है कि जिनका मिला हुआ है, उनका भी नहीं मिला हुआ है। मैं तब भी अपना काम करे जा रहा हूँ, ऐसे ही आप भी अपना काम करे जाओ।
आपसे जो बात मैं कह रहा हूँ, किसी की कोटि की नहीं है। इस मूर्खता से बाहर आ जाइए कि "हाँ, हाँ, सबने एक ही बात तो कही है।" नहीं, सबने एक ही बात नहीं कही। बात और बात में अंतर होता है। एक बात होती है, जो अहंकार पचा जाता है, क्योंकि वो बात अहंकार के अलावा किसी विषय की होती है। अहंकार के अलावा जिस भी विषय की बात होगी, समाज, इतिहास, कॉन्शियसनेस, अवेयरनेस, दिस, दैट अहंकार खा जाएगा। मैं और कोई बात करता ही नहीं। आपने देखा है। कोई भी बात हो, सीधे कहाँ ले जाता हूँ? सीधे उसी के ऊपर।
मैं वही बात नहीं कह रहा जो सबने कही है, मेरी बात अहंकार के पचाए पचेगी नहीं। हाँ, इतना है कि उसने समझी ही नहीं, तो थोड़ा खुश रह लेगा कि चलो, चलो, सुरक्षित बात है, लेकिन जिस दिन अहंकार साफ़-साफ़ जानने लग गया कि मैं क्या कह रहा हूँ, वो या तो मिटेगा या फिर भागेगा। श्रीकृष्ण अर्जुन को नाचने के लिए नहीं बोल रहे हैं कुरुक्षेत्र में, मैं कह रहे हैं, "युध्यस्व।" बात आ रही है समझ में? वहाँ नाचोगे नहीं। सामने ये कौरव पक्ष खड़ा है और तब तो दाँव पर सिर्फ़ भारत लगा था। आज पूरी धरा लगी है। क्या बोलूँ? नाचो? या बोलूँ कि लड़ो?
हाँ, लड़ो। और अंजाम की परवाह किए बिना लड़ो। अपने घाव गिने बिना लड़ो। ज़्यादा संभावना यही है कि हारोगे, पर हार-जीत की फ़िक्र किए बिना लड़ो। क्योंकि लड़ना ही धर्म है, उसी में प्रेम है, उसी में जीवन है।
और उनसे लड़ सको, इसलिए सबसे पहले ख़ुद से लड़ो। दुर्योधन से नहीं लड़ पाते अर्जुन, अगर गीता ने पहले अर्जुन को ख़ुद से न लड़वा दिया होता। दुर्योधन से बाद में लड़े, पहले खुद से लड़े। तो पहले ख़ुद से लड़ो और ख़ुद से लड़ पाए हो, इसका प्रमाण यह होगा कि अब समाज में दहाड़ोगे। चुप नहीं बैठोगे, कायरों की तरह। जैसे अर्जुन के तीर बरसे थे चारों तरफ़, तुम्हारे वचन बरसेंगे। आ रही है बात समझ में कि गीता सुन के अर्जुन ने ये करा था कि कोने में कहीं ध्यान लगाकर बैठ गया? "अति उत्तम, मधुसूदन! क्या आपने बात बताई है। अब मैं एक कोने में जा रहा हूँ। ज़रा मुझको मैट और माला दे दीजिए। मैं माला फेरूँगा, मैं जपूँगा।”
जिसके जीवन में गीता उतरती है, वो कोने में मैट और माला लेकर नहीं जपने लग जाता। वो युद्ध में उतरता है, उसके घाव फिर उसकी सच्चाई का सबूत होते हैं। अब बताओ, मुझे किसके साथ रखोगे? न ब्लिस पाने वाले हो, न पीस पाने वाले हो, न प्योर कॉन्शसनेस पाने वाले हो, न टोटल फ़्रीडम फ्रॉम कंडीशनिंग पाने वाले हो, मेरे साथ तो घाव पाने वाले हो। मंज़ूर है? कुछ मत बोलो, छोड़ो। काहे को तुमसे झूठ बुलवाऊँ।