रेस्टोरेंट में जाकर बैठो, वहाँ मेन्यू आता है; उसमें लाल निशान वाले इतने सारे होते हैं; क्या बुरा नहीं लगता? सड़क पर गाड़ी लेकर निकलता हूँ, तो वहाँ पर झटका मीट, हलाल मीट। छोटे शहरों की ओर चले जाओ, तो वहाँ तो पूरे के पूरे बकरे लटक रहे हैं। जिस इंसान में थोड़ी भी जागृति है, वह जैसे-जैसे इस दुनिया को देखेगा, वैसे-वैसे बिल्कुल पगलाता जाएगा। कहेगा, "ये दुनिया है? ये जीने की जगह है? यहाँ क्यों जिए?" पर जीना है। दुनिया में आग लगी हुई है, तो आग बुझाने के लिए जीना है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: सबसे पहले तो आचार्य जी, आपके चरणों में मेरा नमन है। और मेरा सवाल है कि ज़िंदगी में इंसान खुश कैसे रहे? ये सब जानने के बावजूद कि हर साल 8000 करोड़ पशुओं को मारा जाता है, इंसान की स्वार्थ की माँगें पूरी करने के लिए। और पशु; दूध, अंडा, माँस, मछली, शहद, इन सबको बनाने के लिए, मतलब पशुओं से ये सब सामान लेने के लिए कितनी करोड़ों लीटर पानी की बर्बादी की जाती है। जंगल काटे जाते हैं जिससे इनका धंधा चल सके।
और दूसरा, न साफ़ पानी है। मीथेन गैस निकलती है पशु खेती से, जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ती है। गर्मी बढ़ती जा रही है। आँकड़ों के मुताबिक 2014 से लेकर 2023, ये दस साल इतिहास के सबसे गर्म साल रहे हैं। और अभी इन सब चीज़ों को तीन गुना बढ़ाने के लिए एनिमल हस्बेंडरी इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड में भारत सरकार ने 30 हज़ार करोड़ रुपए डाल दिए हैं, जिसमें पशुओं का धंधा तीन गुना और बढ़ाया जाएगा।
तो ये सब जानने के बावजूद इंसान स्वस्थ कैसे रह सकता है? खुश कैसे रह सकता है? जब उसके पास खाने के लिए, मतलब पानी नहीं होगा। जैसे बेंगलुरु में पानी की समस्या देखने को मिल ही गई है, लोगों के पास पीने का पानी भी नहीं है। लोग तीन-तीन दिन में एक बार नहा रहे हैं। लोग नहाने के बाद जो पानी निकलता है उसको भी बचा रहे हैं, कि उसको भी इस्तेमाल कर लेंगे।




