जिसकी चेतना पूरे तरीके से उसकी देह से आबद्ध है, वह पशु है। पशुबलि का मतलब जानवर मारना नहीं है, पशुबलि का मतलब अपने भीतर के जानवर को मारना है। बकरे को नहीं मारना है, ये जो भीतर ‘मैं-मैं’ चलता रहता है, इसे मारना है। एक पशु को मारकर खाने से तुम्हें शांति कैसे मिल जाएगी? इससे कौन-सा देवता प्रसन्न हो जाएगा? ये क्रूरता और मूर्खता की बात है। वास्तविक धर्म कहता है — “भीतर वाले पशु को मारो।”
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम प्रबन थापा है। “दशहरे में जो बलि चढ़ाते हैं, मेरा प्रश्न उसके विषय में है। एक समय हमारे मंदिर में जो बलि चढ़ाने वाली जगह होती है उसकी जगह बदल दी गई, और उसके बाद जो मंदिर समिति के अध्यक्ष हैं उनकी मृत्यु हो गई, और कुछ दूसरे लोगों की भी मृत्यु हुई। गाँव के लोग सोचते हैं कि ये सब उस बलि वाली जगह को बदलने के कारण हुआ है। साथ ही कुछ लोगों का ये मानना है कि बलि चढ़ाना ठीक नहीं है और उसके बाद हमारे गाँव में बहस भी चली।
कुछ लोग कहते थे कि ‘बलि चढ़ाने की परंपरा है, हम इसको ऐसे ही नहीं छोड़ सकते, हमारे पूर्वज यही करते थे।‘ कुछ कहते हैं कि ‘बलि चढ़ाना ठीक नहीं है, ऐसा शास्त्रों में भी लिखा हुआ है।‘ लेकिन वो लोग जो बोलते भी हैं कि ‘बलि चढ़ाना ठीक नहीं,' अपने घर में तो माँस खाते ही हैं। तो मैं पूछना चाहता हूँ कि बलि चढ़ाना ठीक है या नहीं।”
आचार्य प्रशांत: बलि का नाम तो तुम यहाँ मंदिर के परिप्रेक्ष्य में ले रहे हो न, धर्म के संबंध में ले रहे हो न? तो बलि क्या है, उसका उद्देश्य धर्म के आत्यंतिक उद्देश्य से भिन्न तो नहीं हो सकता। अगर आप किसी क्रिया को धर्म के अंतर्गत मानते हैं, तो उस क्रिया का भी उद्देश्य वही होगा न जो धर्म का उद्देश्य है? मंदिर में कुछ भी हो रहा हो, उसका उद्देश्य मैला फैलाना, मन को ख़राब करना या अशांति फैलाना तो नहीं हो सकता, या हो सकता है? मंदिर में अगर कुछ भी हो रहा हो, तो उसका तो एक ही उद्देश्य होगा — शांति, सत्य, करुणा। ठीक? धर्म इन्हीं की ओर ले जाने वाला मार्ग है न? सत्य की ओर, मुक्ति की ओर, शांति की ओर। है न?




