
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं अपना सवाल हिंदी में रखूँगा। मैं एम.ए.फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट हूँ। और आपको काफ़ी सालों से सुन रहा हूँ मैं, यूट्यूब पर भी और गीता कम्युनिटी का भी पार्ट हूँ मैं। तो काफ़ी सारे बदलाव आए हैं लाइफ़ में, सुपरस्टिशन्स लाइक काफ़ी हट गए हैं। काफ़ी चीज़ें इंटीग्रेटेड अप्रोच में देखता हूँ चीज़ों को।
लेकिन जब मैं अपनी आदतों को देखता हूँ, अपनी टेंडेंसी, अपनी वृत्तियाँ, तो कई सारी वो सेम बदली नहीं हैं मतलब। जैसे कि लस्ट, तो कोई भी लड़की अट्रैक्टिव सामने आती है तो अनकंफर्टेबल फील होता है। अनकंफर्टेबल फील करता हूँ और काफ़ी एक्साइटेड और एजिटेटेड। तो वो चीज़ मतलब क्यों नहीं बदलती? तो फिर काफ़ी फ्रस्ट्रेशन भी होता है, और काफ़ी डिप्रेस फील होता है कि ये चीज़ क्यों नहीं बदल रही? तो इस चीज़ पर आपका मार्गदर्शन चाहिए था।
धन्यवाद।
आचार्य प्रशांत: तुम्हारे घर में कुछ रखा हुआ है, वो तुम्हें बहुत स्वादिष्ट लगता है। खाने की चीज़ रखी है तुम्हारे ही घर में। ठीक है? चीज़ ऐसी है जिसका तुम्हें बड़ा जायका है। कोई बाहर से आकर के अधिक से अधिक यही तो बता सकता है न कि वो जो चीज़ है, वो सड़ चुकी है। यही तो कर सकता है। घर तुम्हारा है, कोई ज़बरदस्ती तुम्हारे घर में उठकर घुस के तुम्हारे घर से उठा के तुम्हारी चीज़ को बाहर तो नहीं फेंक सकता।
हाँ, तुम्हारे घर में कोई चीज़ रखी थी, अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। कोई आकर के उस पर थोड़ा प्रयोग करके तुम्हें बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। यही तो करेगा, उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। तुम्हारा फ़ैसला अगर अभी भी यही है कि नहीं, मुझे सड़ा हुआ खाना ही है, तो कोई क्या कर लेगा?
कोई डॉक्टर भी किसी मरीज़ को पकड़ करके ज़बरदस्ती दवाई तो नहीं खिला सकता। यही करता है कि प्रिस्क्रिप्शन लिख देता है। अब उसके बाद तुम बाहर जाओ, प्रिस्क्रिप्शन ले लो, दवाई ना खाओ, तो क्या होगा?
और दवाई तुम खा भी लो, तो ये बात शरीर के रोगों पर चल जाएगी कि डॉक्टर ने दवाई दी आपने खा ली, तो शरीर के रोग फिर भी साफ़ हो गए। पर जब भीतर की बात आती है न, तो वहाँ अपना फ़ैसला सब कुछ तय करता है। कोई तुमको कितना भी समझा ले-बुझा ले, साफ़-साफ़ सच्चाई दिखा ले, पर नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। ये कोई काम बाहर वाला तुम्हारे लिए नहीं कर सकता। ये तुम्हें ख़ुद ही करना पड़ेगा, क्योंकि घर तुम्हारा है, चीज़ तुम्हारी है। उसको उठा के बाहर फेंकना भी तुम्हें ही पड़ेगा। कोई बाहर वाला व्यक्ति तुम्हारे लिए करने के लिए अधिकृत ही नहीं है।
हाँ, तुम्हारा शुभेच्छु होगा तो फिर कह रहा हूँ, जो चीज़ पड़ी हुई है, उसकी प्रकृति तुम्हें दिखा देगा। उस पर प्रकाश डाल देगा, इतना कर सकता है अधिक से अधिक। अब तुम्हारी नीयत क्या है, ये तो तुम जानो। इसमें कोई और क्या कर सकता है?
तुम कहोगे कि फलानी चीज़ है, वो ज़िंदगी में अभी भी मौजूद है। तो उसका उत्तर ये होगा, तुम्हारी मर्ज़ी क्यों मौजूद है? तुम्हारी मर्ज़ी। और कोई कारण नहीं है, तुम्हारी मर्ज़ी ही कारण है। तो मर्ज़ी कैसे बदले? तुम्हारी मर्ज़ी है, कोई और कैसे बदल सकता है? तुम बदलोगे।
नहीं, अगर हम नहीं बदल रहे तो? नहीं बदल रहे तो फिर अपनी मर्ज़ी पर आगे बढ़ो। अपनी मर्ज़ी पर आगे बढ़ो और फिर बस यही प्रार्थना की जा सकती है कि आगे बढ़ने के जो दुष्परिणाम होंगे, शायद वो तुम्हें कुछ सिखा जाएँ। बहुत लोग उन दुष्परिणामों से भी नहीं सीखते, तो नहीं सीखते तो नहीं सीखते। 70-80 साल की ज़िंदगी है। जी लो, मर जाओगे।
कोई ऐसा थोड़ी है कि व्यथा अनंत काल तक चलती रहेगी। इंसान की व्यथाओं को भी मर जाना होता है 70-80 साल में। डूबे रहोइधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो कि कुछ हो, लालच हो, डर हो, जो भी है उसमें डूबे रहो।
जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने जैसे कई बार बताया कि जब चीज़ समझ में आ जाती है, तो अपने आप चीज़ें झड़ जाती हैं।
आचार्य प्रशांत: नहीं, अपने आप उनके लिए ही झड़ती हैं। कल आई.आई.टी. कानपुर में बात कर रहा था, उन्होंने भी यही पूछा, कि आपने तो पहले कई बार बोला है कि “सीइंग इज़ फ़्रीडम,” पर मेरा मामला ये है कि सीइंग हो रही है, फ़्रीडम नहीं आ रही है। तो सीइंग इज़ फ़्रीडम उनके लिए लागू होता है, जिनके पास सबसे पहले एक बर्निंग डिज़ायर फ़ॉर फ़्रीडम होता है। दो चीज़ें होती हैं, जिनको मिलकर के मुक्ति या लिबरेशन आता है।
पहला, तुम्हारे पास मुमुक्षा होनी चाहिए। मुक्त होने की तीव्र उत्कंठा, अ बर्निंग डिज़ायर टुवर्ड्स लिबरेशन, और उसके साथ में होनी चाहिए सीइंग, दर्शन, जानना, देख पाना। ये दो चीज़ें जब मिल जाती हैं तब जाकर लिबरेशन आता है या फ्रीडम आती है। जिसके पास पहले से ही नीयत मौजूद है, उसको मैं कहता हूँ कि सीइंग इज़ फ़्रीडम। क्योंकि तुम्हारे पास मुमुक्षा, डिज़ायर फ़ॉर फ़्रीडम तो पहले से थी। तुम्हारे पास क्या नहीं था? सीइंग नहीं थी। तो सीइंग जैसे ही आ गई, मुमुक्षा पहले से थी तो फ्रीडम हो जाएगी।
पर जिसके पास मुमुक्षा हो ही न, उसको सीइंग दे दो तो भी फ्रीडम नहीं आती। और मुमुक्षा तो देखो, अपने दिल की बात है वो कोई तुम्हारे ऊपर लाद नहीं सकता। किसी से ज़बरदस्ती प्यार कराया जा सकता है क्या? तो तुम्हें मुक्ति से भी ज़बरदस्ती प्यार कैसे कराएँ? जिसको है तो है। जिसको नहीं है, उसके सामने आप उदाहरण रख सकते हो। उसके सामने आप अपना प्रेम रख सकते हो। लेकिन उसके बाद भी अगर उसके भीतर प्रेम उठ ही नहीं रहा तो आप ज़बरदस्ती थोड़ी करोगे। कैन यू फ़ोर्स समबडी टू लव? नो। तो कुछ नहीं हो सकता। तुम वासना-पथ पर आगे बढ़ो, पथिक।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी बहुत-बहुत धन्यवाद, सर।