आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।
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प्रश्नकर्ता: श्रद्धेय आचार्य जी, सादर प्रणाम। मैं विगत चौदह वर्षों से अध्यात्म से जुड़ी हूँ। कई तरह के आध्यात्मिक गुरुओं की पुस्तकें पढ़ी हूँ और ऑडियो-वीडियो देखती हूँ और सुनती हूँ। पर फिर भी कई तरह के अंतर्द्वंद्व से घिरी रहती हूँ। कहीं भी आस्था ज़्यादा दिन तक टिक नहीं पाती, तो यह आस्था कैसे जागृत हो? कृपया समझाने की अनुकंपा करें।
आचार्य प्रशांत: आस्था जागृत करनी क्यों है? आस्था कोई ज़बरदस्ती की चीज़ नहीं होती। आस्था कोई नैतिक अनिवार्यता का विषय नहीं होता। कोई रस्मो-रिवाज़ तो है नहीं आस्था; आस्था तो सही ज़मीन पर, सही मौसम में स्वतः खिलने वाला फूल होता है। सही ज़मीन मिली होगी, तो खिल जाएगा। बंजर रेगिस्तान हो और वहाँ आप कोशिश कर रहे हों फूल खिलाने की, बहुत कोशिश करनी पड़ेगी और उसके बाद भी कोई भरोसा नहीं कि कुछ खिलेगा या नहीं।
बहुत सारे लोग जब बहुत कोशिशें कर लेते हैं, तो एक उपाय ढूँढते हैं। वो कहते हैं, "इतनी कोशिश करी है, अब कैसे कह दें कि सब कोशिशें नाकाम गईं? कोई फूल खिला नहीं।" तो वो बनावटी, झूठे, प्लास्टिक या कागज़ के फूल लगा देते हैं। ऐसा करना है? ध्यान सारा फूलों की तरफ़ रखना है या मिट्टी और जड़ों की तरफ़ देखना है?




