हम कॉन्शियस बीइंग्स हैं, कॉन्शियसनेस का काम होता है जानना। कोई सुपरस्टिशस काम कर रहा है और कह रहा है, ‘ऐसे कर रहा हूँ, तुम भी करो।’ तर्क आपको नहीं देना है, तर्क उनके पास होने चाहिए जो ये सब कर रहे हैं। वो तर्क दें, फिर उन तर्कों का परीक्षण करा जा सकता है कि वे कितने फैक्चुअल हैं, उनमें हाइपोथेसिस कितना है, सपोज़िशन कितना है। आपके लिए इतना कहना पर्याप्त है कि आई एम अ कॉन्शियस बीइंग, जो तभी कुछ करती है जब वह पहले समझ लेती है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: सर, आपने सुपरस्टिशंस के ख़िलाफ़ बहुत अच्छा हल्ला बोला है। आई थिंक हमारी सोसाइटी को इसकी काफ़ी ज़्यादा ज़रूरत भी है। ऐण्ड मैं अपने सराउंडिंग्स में देखती हूँ कि कई लोग कई चीज़ें प्रैक्टिस करते हैं, बट उनको उसके पीछे का रीजन पता भी नहीं होता है।
तो मतलब, आप अगर ऐसे सराउंडिंग्स में हो और आपके पास वो तर्क नहीं है देने को। मतलब मैंने आपके कई पॉडकास्ट वग़ैरह भी सुने हैं, आपके प्रवचन भी सुने हैं। उसमें आप बहुत अच्छा तर्क दे पाते हो। तो उसके लिए रीडिंग तो करनी पड़ेगी, बट सुपरस्टिशंस को आसपास, वो जो फ्रीडम ऑफ़ चॉइस को करटेल कर देते हैं, ये सुपरस्टिशंस, स्पेशली फॉर वुमेन इन इंडियन सोसाइटी। तो आप कुछ कहना चाहेंगे उस पर?
आचार्य प्रशांत: देखिए, यूँ ही कुछ भी ना माना जाता है, ना करा जाता है। अगर हम इंसान हैं, कॉन्शियस बीइंग्स




