भाषा तो उतनी ही सशक्त हो पाएगी, जितने शक्तिशाली उसको बोलने वाले लोग हैं। हिंदी नहीं पीछे हट गई है; हिंदी बोलने वाले सब कायर हैं। इनको अपनी हस्ती पर ही शंका होनी शुरू हो जाती है, जब सामने कोई अंग्रेज़ी बोल देता है। विचार और चेतना के तल पर ऊँचे स्तर की सामग्री सब आपको अंग्रेज़ी में मिलेगी, और हिंदी हमने छोड़ दी है गाली-गलौज करने वालों और रोस्टर्स के हाथों में। ये बीमारी अब छोटे-छोटे कस्बों में, गाँवों में भी पहुँच रही है। अंग्रेज़ी सीखना एक बात है, अंग्रेज बन जाना बिल्कुल दूसरी बात है ना।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते। बहुत-बहुत प्रणाम। आचार्य जी, मैं व्यवसाय से एक शिक्षिका हूँ। जब मैं बच्चों को पढ़ाती हूँ, छात्र-छात्राओं को पढ़ाती हूँ, तो कई बार उनके माता-पिताओं से मुझे बात करनी पड़ती है उनकी पढ़ाई को लेकर। मैं बहुत दिनों से और बहुत सालों से ये चीज़ ग़ौर कर रही हूँ, कि उनके माता-पिता मेरे पास आते हैं तो वो अंग्रेज़ी में मुझसे बात करते हैं।
अब मैं व्यवसाय के तौर पर उनको कुछ कह भी नहीं सकती, क्योंकि रिस्क है, कि आप मुझसे हिन्दी में पूछें; क्योंकि ऐसा तो नहीं है कि वो हिन्दी में मुझसे पूछेंगे तो मैं उन्हें उत्तर नहीं दूँगी। मैं पढ़ा तो अंग्रेज़ी नहीं रही, मैं तो जर्मन पढ़ा रही हूँ। तो ये मैं आसपास इतना माहौल देख रही हूँ, उनके लिए एक स्टेटस सिम्बल बन गया है कि अगर हम अपर मिडिल क्लास लोग हैं तो हम अंग्रेज़ी में बात करेंगे, तो हमें सम्मान मिलेगा।
मैं पूछना चाहती हूँ उन लोगों से, ये समाज से भी, कि क्यों ऐसा है कि आप अपनी हिन्दी को इतना अपमान दे रहे हैं? मैं हिन्दी में बात करूँगी या हिन्दी में आपकी बात सुनूँगी, तो मैं आपका अपमान नहीं करूँगी। ये मैं आसपास, जैसे छोटी-छोटी बातें लोग बोलते हैं न, “मेरा हसबैंड ये करता है, मेरी वाइफ़ ये करती है।”




