हिमालय से ऋषि चलते थे और सीधे दक्षिण भारत तक पहुँच जाते थे। या वो कहते थे कि मैं हिमालय का हूँ, वही रहूँगा? कबीर साहब जीवन भर चलते रहे। नानक साहब अरब तक पहुँच गए, चीन से यात्री चलते थे और ज़्यादातर ज्ञान की खोज में होते थे, वह तिब्बत पार करके हिमालय लाँघ करके भारत आ जाते थे। आपको यात्रा करने से किसने रोका है? यात्रा ही बहुत कुछ सिखा देती है। विदेश न जाओ, भारत तो घूम लो। पृथ्वी पूरी तुम्हारी है, जहाँ जा सकते हो, जाओ।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मनोज ज्योति की तरफ़ से आपको सादर चरण-स्पर्श। आचार्य जी, प्रभु-कृपा से मैं आपसे चार माह से जुड़ा हूँ। आपके मिशन, आपके कार्यों को देखकर इक़बाल जी का एक शेर याद आ जाया करता है मुझे अनायास:
“हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पर रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।”
~अल्लामा इक़बाल
अर्थात, एक समाज की ज़िंदगी की पीड़ा जब गहरी बहुत हो जाती है, पीड़ा से तब उसमें दृष्टा का जन्म होता है, तब उसमें जो संसार को उसकी ख़ूबसूरती से परिचित करवाता है। और मुझे उस रूप में आप दिखाई देते हो।
आचार्य जी मैं हरियाणा के एक शहर सिरसा से आया हूँ। क़रीब चार माह से आपका अनुशरण कर रहा हूँ। आप ही को देख और सुन रहा हूँ, और मुझे अब लगने लगा है कि मेरी ज़िंदगी के श्रीकृष्ण मुझे मिल गए हैं। गुरुजी मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, आज की सामाजिक कुरुतियों, जैसे युवाशक्ति का ह्रास, शिक्षा की दयनीय स्थिति, मांसाहार, धर्म के नाम पर आडंबर,




