यात्राएँ करिए

Acharya Prashant

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यात्राएँ करिए
हिमालय से ऋषि चलते थे और सीधे दक्षिण भारत तक पहुँच जाते थे। या वो कहते थे कि मैं हिमालय का हूँ, वही रहूँगा? कबीर साहब जीवन भर चलते रहे। नानक साहब अरब तक पहुँच गए, चीन से यात्री चलते थे और ज़्यादातर ज्ञान की खोज में होते थे, वह तिब्बत पार करके हिमालय लाँघ करके भारत आ जाते थे। आपको यात्रा करने से किसने रोका है? यात्रा ही बहुत कुछ सिखा देती है। विदेश न जाओ, भारत तो घूम लो। पृथ्वी पूरी तुम्हारी है, जहाँ जा सकते हो, जाओ। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मनोज ज्योति की तरफ़ से आपको सादर चरण-स्पर्श। आचार्य जी, प्रभु-कृपा से मैं आपसे चार माह से जुड़ा हूँ। आपके मिशन, आपके कार्यों को देखकर इक़बाल जी का एक शेर याद आ जाया करता है मुझे अनायास:

“हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पर रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।”

~अल्लामा इक़बाल

अर्थात, एक समाज की ज़िंदगी की पीड़ा जब गहरी बहुत हो जाती है, पीड़ा से तब उसमें दृष्टा का जन्म होता है, तब उसमें जो संसार को उसकी ख़ूबसूरती से परिचित करवाता है। और मुझे उस रूप में आप दिखाई देते हो।

आचार्य जी मैं हरियाणा के एक शहर सिरसा से आया हूँ। क़रीब चार माह से आपका अनुशरण कर रहा हूँ। आप ही को देख और सुन रहा हूँ, और मुझे अब लगने लगा है कि मेरी ज़िंदगी के श्रीकृष्ण मुझे मिल गए हैं। गुरुजी मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, आज की सामाजिक कुरुतियों, जैसे युवाशक्ति का ह्रास, शिक्षा की दयनीय स्थिति, मांसाहार, धर्म के नाम पर आडंबर, बॉलीवुड की निर्लज्जता, आदि विषयों पर फ़िल्में बनाना है। सिनेमा के माध्यम से जासूसी-बुद्धि से विचार करते हुए समाज में फैली बीमारियों को दिखाते हुए, उसके कुचक्र में फँसते हुए, और फिर उसके भयंकर दुष्परिणाम दिखाते हुए, और अंत में उससे निकलने का एक माध्यम बताना है। और वो माध्यम हिंदी के किसी भी विषय, “गाय पर निबंध लिखो” जैसा साधारण या उबाऊ नहीं होगा।

हर एक दर्शक, जो उस फ़िल्म के विषय से संबंधित बीमारी से ग्रस्त होगा, उसे झकझोर कर रख देने वाली प्रेरणा उस फ़िल्म के माध्यम से मिलेगी।

अब इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए जो मेरे मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है, वो मेरा स्थान यानी मेरा शहर है, जहाँ रहकर मैं धन-संपत्ति आदि तो खूब कमा रहा हूँ, परंतु अपने लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पा रहा हूँ। परंतु आपसे प्रेरित होकर मेरे लक्ष्य को एक चिंगारी मिली है। अतः क्या मैं शुभ कार्य के लिए अपना शहर छोड़कर एनसीआर, गुड़गाँव इत्यादि में शिफ़्ट हो सकता हूँ, जहाँ मैं अपने काम के साथ-साथ अपने परम-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भी अधिकतम संसाधन जुटा सकूँ, और अपनी मुक्ति के साथ-साथ इस जगत का भी कल्याण कर सकूँ?

कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: देखिए, बात नियत की होनी चाहिए। अहंकार से पीड़ित होकर के निचले तल की इच्छाओं की पूर्ति के लिए, शूद्र-स्वार्थों के लिए कुछ भी करोगे तो गलत होगा। और विवेक पर चलकर, सद्बुद्धि से सोचकर, ऊँचे लक्ष्य के लिए कुछ भी करोगे तो सही होगा। ठीक है न दोनों बातें?

तो हम जिस जगह पर रहते हैं, उसे छोड़ने का निर्णय भी इसी मानदंड, इसी आधार पर करना होगा; मैं क्यों छोड़ना चाहता हूँ उस जगह को? अगर आपके पास छोड़ने के लिए कोई समुचित, माक़ूल कारण है तो किसी भी जगह का कोई मोह करने की कोई आवश्यकता नहीं है। और अगर छोड़ने की वजह बस यही है कि कहीं और चला जाऊँ तो वहाँ पर ज़्यादा भोग वग़ैरह कर सकता हूँ; तो आप जगह छोड़कर भी कुछ नहीं पाएँगे; जहाँ जाएँगे वहाँ भी दुखी रहेंगे।

भारत में, विशेषकर उत्तर भारत में, स्थान के प्रति मोह थोड़ा ज़्यादा रहता है। अगर आप इमिग्रेशन-डाटा देखेंगे, तो उसमें पाएँगे कि भारत में अधिकतर दक्षिण भारत से ही लोग हैं जो विदेशों में जाकर बसते हैं। और विदेशों से जो रेमिटेंस भी आती है, वो अधिकतर दक्षिण भारत में ही आती है। उत्तर भारत में पंजाब है बस अकेला जहाँ से बाहर लोग जाते हैं ज़्यादा, अन्यथा दक्षिण भारत से ही।

तो उत्तर में स्थानीय-मोह कुछ ज़्यादा रहा है, मिट्टी की बात की, “मिट्टी में कुछ ख़ास है, मिट्टी में कुछ ख़ास है।” उसकी कोई आवश्यकता नहीं है, और मैं समझता हूँ ये जो स्थानीयता है, इसने नुकसान भी बहुत पहुँचाया है। क्योंकि जब तक आप एक जगह को छोड़ोगे नहीं, उस जगह के साथ जो मन बना है, वो मन भी नहीं छूटेगा।

हम परेशान रहते हैं न कई बार और सोचते हम हैं कि मन की समस्या है। वो समस्या मन की नहीं होती, वो बहुधा जगह की होती है।

अच्छा, प्रयोग करते हैं अभी छोटा-सा, एक क्षण अभी आप कैसा अनुभव कर रहे हैं, देखिएगा, और दुनिया कैसी लग रही है। कुछ बत्तियाँ बुझा दीजिए, कुछ जला दीजिए। कुछ अलग कर दीजिए थोड़ा-सा अभी, करिए। मेरे ऊपर ये दो आ रही हैं इनमें से एक बंद हो सकती है? ऐसा मत बंद करना कि फिर जले ही नहीं, कर दो।

मन कैसा हुआ? कुछ बदला?

आपके कमरे में अगर पीली रोशनी लगी हो, और आप उसकी जगह सफ़ेद लगा दीजिए, आपको लगेगा आप नए कमरे में आ गए हैं। और ये तब हुआ है जब आपने कुछ भी नहीं बदला, सिर्फ़ ज़रा-सी रोशनी बदल दी है।

बहुत सारी हमारी मानसिक समस्याएँ वास्तव में उस जगह की समस्याएँ हैं, जहाँ हम फँसे हुए हैं। आप वो बदल दीजिए, मन बदल जाएगा, समस्या बदल जाएगी।

क्योंकि हम आत्मा पर चलने वाले लोग तो अभी हुए नहीं न। हम किस पर चलते हैं? हम प्रभावों पर चलते हैं। दो ही चीज़ें होती हैं जो आपका मालिक हो सकती हैं, या तो आत्मा होगी, नहीं तो संसार; और हम संसार पर ही चलते हैं। तो हमारी जो समस्याएँ हैं वो वास्तव में हमारे संसार की समस्या हैं। जिसको मैं कहता हूँ, “संगत से बड़ी बात दूसरी नहीं होती।” उसका अर्थ यही है कि आप जहाँ रह रहे हो, आपके ऊपर जो प्रभाव पड़ रहे हैं, आपको जिस प्रकार के अनुभव हो रहे हैं, उन्हीं से आपके मन का निर्माण हो रहा है।

आप सोच रहे हो आपका मन है। वो आपका मन नहीं है, वो आपका माहौल है। और इसलिए फिर वो समस्याएँ हल भी नहीं होतीं, क्योंकि हम मन ठीक करना चाहते हैं माहौल बदले बिना। नहीं होगा। आप जिस कमरे में रहते हो, आप जिस स्थान पर कैद हो, उसको त्यागे बिना आपके मन में बहुत परिवर्तन आ ही नहीं सकता, आपकी समस्याएँ जस-की-तस रहेंगी।

भारत ने ये भूल करी है, हम चिपककर बहुत रह गए, जहाँ के हैं वहीं बैठे रह गए। हम बाहर निकले ही नहीं। हिंदुओं की 99% आबादी एक देश में है। ऐसा और कोई धर्म है? और 99% भी इसलिए क्योंकि अपना छोटा-सा नेपाल है, उसने एक प्रतिशत बचा रखे हैं। ऐसा और कहीं भी हुआ है क्या, कि सारे के सारे एक ही जगह पर सीमित होकर रह गए हों? वो फैले। और भारतीयों ने क्या किया? संकुचित रह गए।

तीन हैं जो सफल हैं और तीनों ने यात्राएँ बहुत करीं। अब तीनों में साझी बात देखिएगा। एक वो जो विस्तारवादी थे, कोलोनियलिस्ट, इन्होंने क्या करा? लंबी यात्राएँ करीं, इससे उनको कम से कम भौतिक सफलता मिली। दूसरे कौन थे? ट्रेडर। इन्होंने भी लंबी यात्राएँ करीं, इन्हें भी भौतिक सफलता मिली। तीसरे कौन थे जिन्होंने लंबी यात्राएँ करीं? गुरु; और बुद्ध, और महावीर और संत, इन्होंने भी लंबी यात्राएँ करीं, इन्हें भी सफलता मिली। यात्रा किन्होेंने नहीं करी? आम मध्यमवर्गीय लोगों ने, जिन्होंने कहा “मेरी मिट्टी, मेरा खेत, मैं तो यहीं लठ्ठ गाड़ूँगा।” तो तुम लठ्ठ गाड़े ही रह गए।

आप समझ रहे हो कितनी दूर है ब्रिटेन, और ये तो छोड़ दो कि इंटरनेट था, पेट्रोल-इंजन, डीज़ल-इंजन भी नहीं थे। वो वहाँ से उठकर के आ गए। चंद द्वीप हैं वो छोटे से, भारत के कुछ जिलों को मिला दो, बड़े जिलों को, तो ब्रिटेन बन जाएगा। उत्तर प्रदेश की तिहाई आबादी, उससे भी कम और वो यहाँ आ गए, और दो सौ साल तक कब्ज़ा करे रहे, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वो यात्रा करने को तैयार थे, वो हटने को तैयार थे। और शासक बनने से पहले वो सफल व्यापारी थे। उनका व्यापार भी सारा यही था, यात्रा पर आधारित।

जो अपनी जगह पर बैठा रह जाएगा वो अपनी जगह से भी हाथ धो बैठेगा। ये तो भौतिक बात हुई, आध्यात्मिक बात भी यही है, जो एक जगह पर बैठा है, वो उस जगह के दोषों से कभी आगे नहीं निकल पाएगा, कभी नहीं।

तो मैं नहीं जानता कि आप अपने शहर को छोड़कर के किसी और शहर में जाने के प्रति नियत क्या रखते हैं। नियत असली चीज़ है, और अगर नियत साफ़ हो तो ज़रा भी हिचकना नहीं चाहिए, एक दम नहीं। कितनी भी दूर जाना है, कोई बड़ी बात नहीं हो गई। क्योंकि देखो, पृथ्वी पूरी ही तुम्हारी है। जब भौतिकता का कोई अर्थ नहीं, तो किसी भौतिक स्थान का बहुत बड़ा अर्थ कैसे हो सकता है, बताओ? आध्यात्म क्या सिखाता है? जो भौतिक है उसको हल्के में लेना है, बहुत गंभीरता से नहीं लेना है।

जब जो कुछ भौतिक है उसे हल्के में लेना है, तो किसी भौतिक स्थान से चिपकने का क्या अर्थ हुआ? क्यों चिपक के बैठ गए हो? क्यों? पृथ्वी पूरी तुम्हारी है, जहाँ जा सकते हो जाओ। और भारत को तो इस वक़्त बहुत ज़रूरत है कि बेटा, फैलो, बाहर निकलो! बहुत ज़्यादा भीड़ हो गई है। और दुनिया के कई देश हैं, जिनके पास आबादी की अभी कमी है, ख़ास तौर पर युवा आबादी। तुम तो फैलो, बाहर निकलो। यहाँ काहे पड़े हो।

जो भारत से बाहर निकल सकते हों, भारत से बाहर निकलें। जो अपने छोटे गाँव-कस्बों में फँसे हुए हों, वो अपने गाँव-कस्बों से बाहर निकलें। आपके ऊपर कोई ऐसा कर्तव्य नहीं है कि आप जहाँ पैदा हुए आप वहीं पर मरो भी। कम-से-कम ऐसा कोई आध्यात्मिक कर्तव्य नहीं है, पर भारत ने इस बात को एक नैतिक मूल्य बना लिया है। लोग मिलते हैं एक दूसरे से, तुरंत पूछते हैं, “कौन-से गाँव से हो?” भूल गए यार! कौन-से हैं? बहुत आगे निकल आए हैं। इतनी पुरानी बात क्यों पूछ रहे हो? ब्राउज़र की हिस्ट्री खोलनी पड़ेगी। हमें नहीं याद कहाँ से हैं। “कहाँ से हैं?” कोई बहुत पूछे। बोलो, “आसमान से हैं।” क्योंकि असली तो हमारी वही पहचान है न, वहाँ से हैं। पृथ्वी के किस टुकड़े से हैं इससे क्या अंतर पड़ता है।

और ये बात एक सच्चा भारतीय ही बोल सकता है, क्योंकि आध्यात्मिक मूल्य ही भारत-राष्ट्र के मर्म में है। बार-बार समझाता हूँ, भारत कोई ज़मीन का टुकड़ा नहीं है। भारतीय होना बड़े मेहनत का काम है, बड़ा मुश्किल काम है, हल्की बात नहीं है अपने-आप को भारतीय कह देना। कि तुम कह दो, “ये देखो मेरे पास वोटर-आईडी है या पासपोर्ट है; तो मैं भी तो भारतीय हो गया!” वो सब कुछ नहीं होता भारतीय होना। भारतीय होने का मतलब होता है अपनी पहचान को जानना, भौतिकता का अर्थ जानना। और जो भौतिकता का अर्थ जानता है वो इन चक्करों में नहीं पड़ता कि…।

अरे! त्याग का क्या मतलब है, जब ये (हाथ में रुमाल उठाते हुए) नहीं मेरा। जब ये नहीं मेरा, अरे! जब तन ही नहीं मेरा, तो कोई शहर कैसे हो गया मेरा? समझा तो दो। या ये बोलूँ कि विचार भी त्यागने हैं, भावना भी त्यागनी है, अहंकार भी त्यागना है, धन भी त्यागना है, लेकिन मिट्टी नहीं त्यागनी? ये कहाँ का अध्यात्म है भाई? ये कहाँ का आध्यात्म है?

हिमालय से ऋषि चलते थे और सीधे दक्षिण भारत तक पहुँच जाते थे। क्या वो ये कहते थे, कि “मैं हिमालय का हूँ वहीं रहूँगा?” कबीर साहब जीवन-भर चलते रहे, नानक साहब अरब तक पहुँच गए। चीन से यात्री चलते थे और वो ज़्यादातर ज्ञान की खोज में होते थे। वो तिब्बतकार, पार करके, हिमालय लाँघ करके भारत आ जाते थे और भारत में दस-दस बीस-बीस साल पड़े रहते थे। फ़ा-हिएन का नाम सुना होगा।

आपको यात्रा करने से किसने रोका है? आज भी दुनिया में, ये तो छोड़ दो कि इमीग्रेशन; टूरिज़्म, पर्यटन में भी भारतीय सबसे नीचे हैं। और ये नहीं कि महँगा वाला, जो सस्ता वाला होता है वहाँ भी नहीं जाते। श्रीलंका तक नहीं जाते, भूटान तक नहीं जाते, और कहाँ जाएँगे?

काहे को जाना है? गाँव में घर के पीछे पोखर है, जाकर मार लो डुबकी, हो गया पर्यटन! और जब कोई कहे, “जाते काहे नहीं?” तो बोलो, हमारा मंदिर तो दिल के अंदर। कहीं जाने की ज़रूरत नहीं, हम आँख बंद करते हैं हमारा पर्यटन हो जाता है। पाखण्डी! किसको पागल बना रहे हो, सीधा बोलो न आलसी हो।

कहीं जाकर बसना भी बहुत आगे की बात है, पहले घूम तो आओ, यात्रा ही बहुत कुछ सिखा देती है।

निकलेंगे ही नहीं, पड़े हुए हैं! और इस बात में बड़ा गौरव बता रहे हैं, “हम जीवन में कभी छपरा से बाहर गए ही नहीं।” विदेश न जाओ, भारत तो घूम लो। भारतीय रेल टैक्सपेयर का पैसा चूस-चूस कर टिकट बहुत सस्ते में देती है। वो होता नहीं है, पर हम सब जो टैक्स भरते हैं उस टैक्स से जो साधारण दर्जे का टिकट है वो बड़ा सस्ता कर दिया जाता है। थोड़ा वसूल लो।

आने वाले शिविर बहुत सारे दक्षिण भारत में होंगे। ये अब हो चुका है कि दिल्ली से उठकर के ग्रेटर-नोएडा आ गए और हमने भी महोत्सव कर लिया। अब ऐसे नहीं मिलेगा। अब आओ केरल आओ, हैदराबाद आओ और बेंगलुरु आओ, वहाँ मिलेंगे हम। और हो सकता है कि बाहर भी करें। क्योंकि आपमें से बहुत सारे लोग हैं जो जब तक हम शिविर बाहर नहीं करेंगे, बाहर भी नहीं आएँगे। तो विदेशों में भी करते हैं चलो, या यहीं बैठे रहना है?

झज्जर? क्या बताया? सिरसा। अब ये नहीं होगा कि सिरसा से गाड़ी उठाई और यहाँ आकर पार्क कर दी। ऐसे नहीं, चलो। ठीक है न?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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