
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक बार आपसे ये समझना चाहता था कि धर्म और संस्कृति – इन दोनों चीज़ों में क्या संबंध है? साथ में इसको यदि मैं अभी के परिप्रेक्ष्य में देखूँ तो हम सभी ने सांस्कृतिक दिवाली देखी है जिसमें मिठाइयों का आदान-प्रदान चलता है, जिसमें नए कपड़े पहने जाते हैं, जिसमें ऐसी बहुत-सी चीज़ें की जाती हैं, जो हम सभी लोग पिछले बहुत सालों से कर रहे हैं। पर एक धार्मिक दिवाली कैसी होगी फिर?
आचार्य प्रशांत: अच्छा सवाल है, बढ़िया। हम इन चीज़ों पर चलते हैं, इन्हें अपने आम जीवन में जगह दिए रहते हैं, पर इन पर स्पष्टता से कभी विचार नहीं करते। हम इनकी परिभाषाओं पर नहीं जाते हैं — धर्म क्या है? संस्कृति क्या है?
संस्कृति क्या है?
जो आम आदमी के चलने-फिरने, सोने-उठने, आपस में बोल-व्यवहार करने का ढंग है, उसको संस्कृति कहते हैं, वही कल्चर है, ठीक है? या कि जैसी हमारी वास्तुकला भी होती है, जिस तरीके से हम अपनी इमारतें बनाते हैं, वो भी संस्कृति में ही आ जाता है। आप किसका कैसे अभिवादन करते हैं, ये भी संस्कृति में आ जाता है।
तो संस्कृति एक तरीके से व्यवहार की बात है। आप खड़े कैसे होते हो, आप बैठते कैसे हो, आप हाथ बढ़ाकर के किसी का अभिवादन करते हो या हाथ जोड़कर के। आपके सामने यदि एक बुज़ुर्ग महिला आ जाती हैं, तो आप उन्हें क्या कहकर संबोधित करते हो, ये सब बातें संस्कृति में आती हैं; आप कपड़े कैसे पहनते हो। आप जब पूजा करने जाते हो तो पूजा का आपका तरीका क्या होता है, ये भी संस्कृति में आ जाता है। आप शांति से पूजा करते हो या ढोल-मंजीरे बजाकर करते हो, ये भी संस्कृति में आ जाता है।
तो संस्कृति, ग़ौर करिएगा, बहुत ग़ौर से सुनिएगा — संस्कृति एक तरह की पारिवारिक और सामाजिक विरासत है। क्या है? संस्कृति पारिवारिक और सामाजिक विरासत है। क्योंकि ये जो ढर्रे हैं ये कोई आपने आविष्कृत नहीं करे हैं, ये ढर्रे आपको दे दिए गए हैं, घर द्वारा और समाज द्वारा। आप उन्हीं का पालन करने लग जाते हो।
कायदे से कर्म का आधार बोध होना चाहिए न। और हमने कहा, संस्कृति व्यवहार की, माने कर्म की बात है, तो संस्कृति का आधार धर्म को होना चाहिए। ठीक वैसे, जैसे हमारा कोई भी कर्म बोध से उत्पन्न होना चाहिए न। उसी तरीके से कायदे से संस्कृति को धर्म से उत्पन्न होना चाहिए।
संस्कृति के आधार में धर्म को होना चाहिए। धर्म को तय करना चाहिए कि आप कैसे चलो, कैसे उठो-बैठो।
और वो फिर कोई नियम नहीं हो सकता। वो प्रत्येक व्यक्ति को देखना पड़ेगा, उसमें से कुछ बातें साझी हो सकती हैं और कुछ बातें साझी नहीं भी होंगी। लेकिन बात व्यवहार की, साझी हो चाहे न हो, इतना निश्चित रूप से होना चाहिए कि व्यवहार के पीछे, कर्म के पीछे, बोध होना चाहिए, यानी धर्म होना चाहिए।
तो होना ये चाहिए कि ये संस्कृति है कि लोग कैसे मिल-जुल रहे हैं, खा-पी रहे हैं, बातचीत कर रहे हैं, कौन-सी उनकी साझी मान्यताएँ हैं, सब ये संस्कृति का है। और संस्कृति के इस पूरे भवन के नीचे जो बुनियाद है, उसका नाम है धर्म; कायदे से ऐसा होना चाहिए।
अभी बहुत उल्टा हो गया है, संस्कृति की बुनियाद हो गई है परंपरा; ख़तरनाक बात। संस्कृति की बुनियाद हो गई है विरासत, जो हमने कहा न अभी, एक पारिवारिक और सामाजिक विरासत। संस्कृति धर्म से नहीं उठ रही है, संस्कृति परंपरा से उठ रही है। तो संस्कृति, धर्म से बहुत दूर छिटक गई है। यहाँ तक कि धर्म, संस्कृति का एक छोटा-सा हिस्सा बनकर रह गया है, एक सबसेट। और वो जो सबसेट है, उसमें भी धर्म की गहराई नहीं होती। उसमें भी धर्म के छिलके, माने सतह होती है।
हमारी संस्कृति कहाँ से आ रही है? हमारी संस्कृति आ रही है, हम पहले जो कर रहे थे, वही आज भी करते रहेंगे, बस यही संस्कृति है। हम जो पहले कर रहे थे, वो आज भी करेंगे और वो संस्कृति लगातार बदल भी रही है। क्योंकि हम जो सौ साल पहले कर रहे थे, वो हम आज नहीं कर रहे हैं। भारत में ही या भारत के किसी क्षेत्र में ही सौ साल पहले की जो संस्कृति थी, वो आज नहीं है न? उन्नीस-सौ-बाईस के लोगों को आप जाएँगे देखने, उनके घरों को देखेंगे, या उनके बाज़ारों को देखेंगे, या उनके मंदिरों को देखेंगे, तो वहाँ जिस प्रकार का आपको व्यवहार, आचरण मिलेगा, क्या आपको आज घरों, बाज़ारों और मंदिरों में वैसा आचरण मिलता है?
तो संस्कृति बदल भी रही है, लेकिन वो बदलाव उसमें धर्म से नहीं आ रहा, वो बदलाव भी उसमें इधर-उधर के प्रभावों से आ रहा है। और वो आएगा ही, क्योंकि जब आप धर्म से नहीं चल रहे होते, जब आपका आधार धर्म नहीं होता, तो दुनिया की जो तमाम ताक़तें होती हैं, वो आपको प्रभावित कर जाती हैं।
तो इसी तरीके से भारतीय संस्कृति का भी वेस्टर्नाइज़ेशन हो गया। क्योंकि धर्म नहीं था न उसके नीचे, धर्म को न वो आधार में लेकर चल रही, न केंद्र में लेकर चल रही। वो किसको केंद्र में लेकर चल रही? वो अज्ञान को केंद्र में लेकर चल रही। क्या अज्ञान? पता ही नहीं संस्कृति होती क्या है, धर्म आना कहाँ से चाहिए। तो संस्कृति बस ग्रहण कर ली। किससे ग्रहण कर ली? हमारे पिताजी ऐसा करते थे, हमारे दादा जी ऐसा करते थे, तो हम भी कर रहे हैं। आपके पिताजी और दादा जी जो करते थे, उसमें अगर बहुत दम होता, तो आप आज भी वही कर रहे होते जो आपके दादा जी करते थे। लेकिन आप आज वो नहीं कर रहे जो उन्नीस-सौ-बाईस में होता था।
उसका क्या मतलब है?
दादा जी जिस तरह का जीवन जी रहे थे, वो ठीक है, वो जी रहे थे। वो इसलिए जी रहे थे कि उनके दादा जी वैसा जीते थे। उन्होंने भी कभी पूछा नहीं, कि इस प्रकार के व्यवहार के पीछे, आचरण के पीछे, इन मान्यताओं के पीछे कहीं धार्मिकता, कहीं बोध है भी या नहीं? उन्होंने कोई प्रश्न नहीं किया। बस जो चल रहा है, उसको चलाते रहो, हमने इसको संस्कृति मान लिया है।
और ऐसी संस्कृति निहायती कमज़ोर होती है। तो फिर हमें बहुत डर लगता है, हम कहते हैं, ‘हमारे युवा संस्कृति भ्रष्ट होते जा रहे हैं,’ कहते हैं न? हमारी संस्कृति में अगर दम होता तो फिर हमें ये शिकायत क्यों करनी पड़ती? काहे को हम रोते कि हमारे युवा अब संस्कृति पर नहीं चल रहे। क्योंकि जो संस्कृति धर्म की जड़ों से नहीं उठी होगी, वो संस्कृति बहुत जल्दी बहक जाती है। अब आपके युवा अगर बहक गए हों, तो भी गलत और नहीं बहके हों, तो भी गलत।
भई, आपकी संस्कृति का आधार धर्म तो है ही नहीं, तो अब दो तरह के लोग हो गए हैं, जो वही पुरानी संस्कृति पर चल रहे हैं, वो अपने आप को बोलते हैं, ‘हम सांस्कृतिक लोग हैं।’ और इतना ही नहीं, आपने ये भी बोल दिया है कि राष्ट्रवाद का अर्थ भी सांस्कृतिक ही है। माने भारतीय भी वही है जो पुराने किस्म की संस्कृति पर जो चल रहे हैं, उन सबको हम भारतीय मानेंगे। और जो पुरानी संस्कृति पर नहीं चल रहे, हम कह देंगे, ‘ये भारतीय भी नहीं हैं।’ इसको आपने नाम दिया है, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का।
जो लोग उस संस्कृति पर चल रहे हैं, उन्होंने भी आधार धर्म को नहीं बनाया। उन्होंने किसको आधार बनाया है? अपने पुरखों को, अपनी विरासत को। और ये भी नहीं कि बहुत पीछे की विरासत, बस पिछले सौ-दो सौ साल की विरासत। क्योंकि उसके पीछे की तो पता नहीं है। अपने दादा जी को देखा था, वो जैसे चलते थे वैसे ही हमको चलना है। उसके पीछे और क्या चलता था पाँच रसौ, हज़ार साल पहले? वो हमने कभी इतिहास पढ़ा ही नहीं, तो हम जानते भी नहीं हैं।
जो उस संस्कृति पर चल रहे हैं, वो भी धार्मिक नहीं हैं और जिन युवाओं को आप कहते हैं कि बहक गए हैं, वो भी धार्मिक नहीं हैं, वो भी नहीं चल रहे हैं। कुल मिलाकर के कोई नहीं है जो धर्म पर चल रहा हो। बस जो लोग संस्कृति पर चल रहे हैं, उनको अपने आप पर गौरव बहुत है, वो कहते हैं, ‘देखो, हम सांस्कृतिक लोग हैं।’
अरे, संस्कृति में कौन-सा महत्त्व होता है बहुत। संस्कृति का उद्देश्य होता है — धर्म को सामाजिक तल पर अभिव्यक्ति देना। धर्म जीने की, धर्म आचरण की चीज़ बन सके, इसलिए होती है संस्कृति। संस्कृति को धर्म का सेवक होना चाहिए, लेकिन हमने संस्कृति को बाप बना लिया है, और बाप जो कुछ करते थे, उसी को संस्कृति बना लिया है।
बस इसी पर लगे हैं, ‘हमारे यहाँ ऐसा होता आया है, इन इंडिया दिस हैज़ ऑलवेन बीन डन।’ हाँ, तो क्या हो गया? बहुत कुछ ऐसा है हमारे अतीत में जो बिल्कुल अच्छा नहीं है, जिस पर शर्म आनी चाहिए हमको। और बहुत कुछ हमारे अतीत में ऐसा है, कि ऐसे खड़े हो जाओ, तनके, गौरव से।
जो कुछ ऐसा है, जो जीवन को प्रकाश देता है, भव्यता, गरिमा और गौरव देता है, उसको हमने संस्कृति से एकदम दूर रखा है। और अतीत का ज़्यादातर कचरा वग़ैरह ही हम बाँधकर के आगे बढ़ते जा रहे हैं, ये कहकर कि ‘ये तो हमारी संस्कृति है, ये तो हमारी संस्कृति है।’
मैं बताता हूँ, हमारी संस्कृति जब धर्म से नहीं आती तो कहाँ से आती है। भारत हो या दुनिया का कोई भी और देश हो, यदि उसकी संस्कृति धर्म से नहीं आएगी, तो मनुष्य के भीतर की पाशविकता से आएगी। और मनुष्य के भीतर की पाशविकता बस एक चीज़ माँगती है, भोग। इसीलिए दुनियाभर की जितनी संस्कृतियाँ हैं, सबने मिलकर के पृथ्वी को तबाह करा है।
तुम्हें क्या लग रहा है, जो कल्चरल लोग हैं, जो कल्चर्ड लोग हैं, जो अपने आप को बोलते हैं, ‘हम बहुत सांस्कृतिक हैं,’ ये क्लाइमेट चेंज के लिए उत्तरदायी नहीं हैं? ये बराबर के उत्तरदायी हैं। इनको बोल दो तुम कि अपने जीने का तरीका बदलो, तुम जिस तरीके से जी रहे हो, इससे प्रदूषण होता है, कार्बन होता है। तो ये तत्काल कहते हैं, ‘ये पर हमारे कल्चर का हिस्सा है, हम कैसे बदल जाएँगे?’
संस्कृति, आपको फिर कहूँगा, पूजनीय सिर्फ़ तब होती है जब उसके आधार में धर्म होता है। पर धर्म हमको पता नहीं। जब मैं धर्म कह रहा हूँ तो उससे आशय मेरा अध्यात्म है। धर्म से मेरा आशय है, रीत-रिवाज, परंपरा, पाखंड नहीं होता कभी भी। पर धर्म का हमें कुछ पता नहीं। आपके सामने एक धार्मिक आदमी भी आ जाए तो आप उसको जज करने लग जाते हो, इस बात से कि ये हमारे कल्चर को फॉलो कर रहा है कि नहीं कर रहा है। आपको बड़ी समस्या हो जाएगी। और आध्यात्मिक आदमी कभी भी आपकी संस्कृति पर थोड़ी ही चलेगा, उसके पास चलने के लिए सत्य है, उसे संस्कृति का क्या करना है।
संस्कृति तो एक प्रकार का ज्ञान होती है। उसको आप बोलते हो न, ‘किसी को संस्कारित कर रहे हैं,’ वास्तव में आप उसको एक प्रकार का ज्ञान दे रहे होते हो ताकि वो ठीक हो जाए। वो एक तरह की कंडीशनिंग होती है, वो एक तरह की दवाई होती है, इलाज होती है। आदमी जानवर पैदा होता है न, तो उसको फिर संस्कारित करना पड़ता है, माने उसे शिक्षित करना पड़ता है, माने उसे ज्ञान देना पड़ता है ताकि वो जानवर से इंसान बन सके। समझ में आ रही है बात?
संस्कृति कंडीशनिंग है, वो कंडीशनिंग बहुत महीन इलाज होता है, उसको दे पाने का हक़ सिर्फ़ उनको होता है, जिन्हें इलाज करना आता हो। किसी को संस्कारित करना लगभग उसकी सर्जरी करने जैसा होता है। इलाज ठीक हो गया तो बीमारी से मुक्त हो जाएगा, इलाज ठीक नहीं हुआ तो जीवन से ही मुक्त हो जाएगा।
हमारे यहाँ पर संस्कारित करने वाले लोग कौन हैं? सब परिवार के लोग मिलकर संस्कारित कर देंगे बच्चे को। स्कूल में जाएगा तो टीचर छोड़ो, जो उसके साथी छात्र हैं, वो उसको संस्कारित कर देंगे। और सबसे ज़्यादा ये टीवी और मीडिया संस्कारित करेगा बच्चों को। और फिर उसको हम बोलते हैं, 'ये हमारी उज्ज्वल, प्राचीन, गौरवमयी संस्कृति है।' उसका धर्म से, अध्यात्म से ताल्लुक बचा कहाँ है? मुझे ये बता दीजिए।
संस्कार वो हैं, जो आपको सत्य और शांति की तरफ़ ले जा पाएँ। जो आपको बोध की दिशा ले जा पाएँ, उसको संस्कार कहा जाता है।
यूँ ही तुम कुछ किसी के साथ कर दो, बिना ये समझने की कोशिश भी किए कि इसका इस बच्चे के, या इस युवा के जीवन पर प्रभाव क्या पड़ेगा; वो तो अपसंस्कृति है न, वो संस्कृति थोड़ी कहलाएगी। और अपसंस्कृति का ही परिणाम है, ये क्लाइमेट क्राइसेस। ये हमारे कल्चर में है, कि सुख माने, भोग। 'अवर कल्चर टेल्स अस दैट हैप्पिनेस इक्वल्स कंज़म्प्शन।'
ये समझ में आ रही है बात?
आप कब किसी को बधाई देते हो, जब आप पाते हो कि अब वो भोगने की और बेहतर स्थिति में आ गया है। तब कहते हो, 'बधाई हो, बधाई हो।' और ये बात धर्म नहीं सिखा रहा आपको, क्योंकि धर्म और संस्कृति बहुत अलग-अलग चल रहे हैं, एकदम विपरीत चल रहे हैं। धर्म बोलेगा, 'देखो अपने आप को, पूछो तुम कौन हो? और पूछो अपने आप से कि तुम्हें वास्तव में चैन और शांति कहाँ से मिलेंगे?’ ये धर्म बोलता है। संस्कृति आपको कभी बोलती ही नहीं कि आत्मज्ञान होना चाहिए। संस्कृति कहती है, 'और आने दो, और आने दो, और आने दो, जितना आ जाए उतना बेहतर। मोर इज़ बेटर।'
दुनियाभर की सारी संस्कृतियाँ ऐसी ही हैं। मैं पूछ रहा हूँ, क्या आवश्यक है कि भारत की संस्कृति भी ऐसी ही हो? भारत अगर वास्तव में वही है, जहाँ से उपनिषद् फूटे थे, तो क्या भारत की संस्कृति भी बोधमर्मी नहीं होनी चाहिए, विशिष्ट नहीं होनी चाहिए? या हम भी ऐसे ही उल-जलूल संस्कृति पर चलते रहेंगे, जैसे पूरी दुनिया चलती है। और फिर भी दावा करते रहेंगे हमारी संस्कृति अलग है। हमारी संस्कृति अलग क्यों है, बताओ-बताओ? 'क्योंकि हमारे यहाँ महिलाएँ पर्दा करती हैं।'
ये विशिष्टता होती है संस्कृति की? आपकी संस्कृति को ये चीज़ विशिष्ट बना देगी कि आप अपनी महिलाओं से पर्दा कराते हो। या संस्कृति को विशिष्ट ये बात बनाती है कि हमारे यहाँ छोटा बच्चा भी पूछता है, ‘नचिकेता कौन था?’ बताओ मुझे! पर आपके घर का छोटा बच्चा अगर पूछ दे कि ‘नचिकेता कौन है?’ तो होश उड़ जाएँगे, साँप सूँघ जाएगा, 'ये कैसी बातें कर रहा है?'
पहले तो घर में से आधे लोगों को नचिकेता का उच्चारण करना ही नहीं आएगा, 'नची-चेका-केका। यू नो माय हिंदी इज़ टू वीक।' और जो बहुत प्रयास करके नचिकेता का उच्चारण कर भी लें, वो फिर गूगल की ओर भागेंगे। कहेंगे, 'था कौन ससुरा?'
और जहाँ उनको पता चला कि यमराज के सामने बैठा था, तुरंत बेहोश हो जाएँगे। कहेंगे, 'ये क्या हो गया?’ पर संस्कृति सिर्फ़ तब है जब आपका दस-बारह साल का नुन्नू पूछना शुरू कर दे, ‘नचिकेता कौन था?’ और पापा ये क्या पढ़ते रहते हो दिनभर उपनिषद् कहाँ हैं। घर में तुमने सौ किताबें जमा कर रखी हैं, मेरे को महाभारत नहीं दिखाई दे रही कहीं इसमें।
कैसे पूछेगा बच्चा? वो तो महभारत! कैसे पूछेगा? लेकिन हम अपने आप को बहुत संस्कृतिशाली बोलते हैं, 'साहब देखिए, हमारा न घर वैसा नहीं है बहुत, देखिए, हम सांस्कृतिक लोग हैं।' क्यों सांस्कृतिक लोग हैं? क्योंकि अब हम ऐसे करते हैं, 'नमस्कारम्' (हाथ जोड़ते हुए)।
इससे संस्कृति हो गई, ये संस्कृति हो गई?
या फलाना वाला ख़ास तिलक या टीका लगाते हैं तो हम सांस्कृतिक लोग हैं। तुम्हारे टीके से क्या होना है, मुझे समझा दो। संस्कृति मैंने कहा, धर्म की सेवक होनी चाहिए। और धर्म का उद्देश्य होता है मन को शांति तक लेकर जाना, ठीक? तो संस्कृति वही है जो मन को शांति तक ले जाए। तुम मुझे बताओ, ये जो कुछ कर रहे हो तुम कल्चर के नाम से, इससे मन को शांति कहाँ मिल रही है? तो मैं इसको संस्कृति बोलूँ या अपसंस्कृति बोलूँ? लेकिन तुम्हें इसी संस्कृति पर नाज़ हो जाता है, तुम सुधार भी नहीं करना चाहते।
छोटे बच्चे को जन्माष्टमी पर तुमने कुछ कपड़े पहना दिए हैं, श्रीकृष्ण जैसे कर दिया और उसको मुरली दे दी हाथ में, मोरपंख लगा दिया और तुम बोलते हो, 'देखो, इंडियन कल्चर सो ग्लोरियस।' कृष्णत्व से भी कुछ परिचय कराओगे उस बच्चे का या बस मुरली ही लगा दोगे और मोरपंख लगा दोगे? और ये पता भी नहीं करोगे कि वो मोरपंख बाज़ार में पहुँचा कैसे था। जानते हो, आपको जो मोरपंख मिले रहते हैं, उसमें नीचे से देखना आपको वहाँ पर एक साफ़ काट का निशान दिखाई देगा। मोरपंख में आपको, अगर मोरपंख सीधे-सीधे मोर के शरीर से निकाला जाए, तो वो जो उसका तना होता है, वो टेपर करेगा न अंत में। वो टेपर नहीं होता, वो काटा जाता है।
बताओ काटा क्यों जाता है, बताओ क्यों काटा जाता है?
क्योंकि उसके सिरे पर खून लगा होता, वो आपको दिखे न इसलिए। खून क्यों लगा होता क्योंकि वो मोरपंख मोर के शरीर से प्राकृतिक रूप से नहीं झड़ा होता है, उसे मोर की खाल से खींच कर निकाला गया होता है, उसमें खून लगा होता है। तो काटा जाता है फिर आपको दिया। तुम कहते हो, 'कान्हा बन गया बच्चा।' ये संस्कृति है?
और कृष्णत्व से मैं कह रहा हूँ, उसका कोई आप परिचय नहीं करा रहे हैं क्योंकि माँ-बाप को ही दूर-दूर तक गीता से कोई लेना-देना नहीं है। माँ-बाप ने ख़ुद कभी न गीता को सम्मान दिया, न गीता को पढ़ा, न गीता को कभी जीवन में उतारा। बस संस्कृति चाहिए, संस्कृति चाहिए।
और क्रोध मुझे इस बात पर कि तुम ये अपसंस्कृति करके गौरव का भी अनुभव कर ले जाते हो। और इतना ही नहीं, जो इस संस्कृति पर नहीं चल रहे, तुम उनको नीचा समझते हो, उन पर लानते भेजते हो। तुम कहते, 'ये देखो, हमने अपने बच्चे को कान्हा बनाया लेकिन वो पड़ोस का घर है न, उनके बच्चे बहुत वेस्टर्नाइज़्ड हैं, वो बेकार लोग हैं, गंदे लोग हैं, छी, थू!'
ज़्यादा संभावना है कि जो अपने बच्चे को कान्हा नहीं बना रहा, उसके घर में गीता को फिर भी सम्मान मिलता हो, वहाँ गीता पढ़ी और गुनी जाती हो।
कंज़म्प्शन तो कंज़म्प्शन है। जब तुम कल्चरल कंज़म्प्शन शुरू कर दो, तो बात और भयानक हो जाती है। कह रहे हैं, ‘कंज़म्प्शन इन द नेम ऑफ़ कल्चर। बिटिया का ब्याह है, कल्चरल बात है। हमने राजस्थान से डांसर्स बुलाए हैं, छह डीजे सेट्स स्पेशल खड़े किए हैं।’
क्या हम इस बात को देख पा रहे हैं साफ़-साफ़, कि ये जिसको हम अपना कल्चर बोलते हैं, भारत में भी, पूरे विश्व में भी, ये कल्चर ही कार्बन और क्लाइमेट के लिए उत्तरदायी है। क्या ये दिख रहा है? ये बात हमारे खोपड़े में ठूस के घुसेड़ दी गई है, कल्चरली घुसेड़ दी गई है, 'बी हैप्पी दैट इज़ द पर्पज ऑफ लाइफ़। ये हमारा कल्चर है, सुखवादी।
अध्यात्म सुखवादी नहीं होता, इसीलिए अध्यात्म को संस्कृति का आधार होना चाहिए। हमारी संस्कृति के पास आध्यात्मिक आधार नहीं है। कल्चर के जो भी एलिमेंट्स हैं, लोगों से पूछना, जो भी कोई कल्चर और कल्चर के ये सब एलिमेंट्स होते हैं — भाषा एक एलिमेंट होता है, शिल्प एक एलिमेंट होता है; ये सब संस्कृति के तत्व माने जाते हैं। किसी भी घर में चले जाओ, वो लोग संस्कृति पर चल रहे हों, पूछना, ‘इसके तत्वों का अध्यात्म से क्या रिश्ता है, ये बताओ?’ वो नहीं बता पाएँगे।
उदाहरण के लिए आपके कल्चर की बात है, आप दिवाली पर कुर्ता पहनोगे। अब ये बात मान्यवर के लिए बहुत अच्छी है, वो तो यही दिखाएगा कि धर्म का संबंध कुर्ते से है। मेरे को बताओ कुर्ता कैसे? दिवाली का कुर्ते से कैसे संबंध बैठ गया? बोलो, दिवाली का कुर्ते से कैसे संबंध बैठ गया? और इसी तरह से विवाह को भी आप एक सांस्कृतिक उपलक्ष्य ही में लेते हो। विवाह पर तो जो आप पहनते हो, वो तो सीधे-सीधे मुगलई है, पर आप कहते हो, 'मेरा कल्चर है।' बोलो कैसे? कुछ नहीं पता लेकिन, ठसक पूरी है कि हम तो देखिए, संस्कृतिवादी लोग हैं।
आपकी संस्कृति में क्या कुछ भी ऐसा है, जो ऋषियों से आ रहा हो? आपकी संस्कृति में ज़्यादातर वो है जो अब्राहमिक स्रोतों से आ रहा है। और ये कहने से मेरा आशय बिल्कुल ये नहीं है कि अब्राहमिक स्रोतों से मुझे नफ़रत है। लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूँ कि जिसको आप अपनी भारतीय संस्कृति बोल रहे हो न, वो प्रच्छन्न रूप से, छद्म रूप से, कोवर्ट, छुपे हुए रूप से अब्राहमिक संस्कृति ही है।
और वैसे तो ज़्यादातर लोगों को बड़ी समस्या रहती है कि छी-छी-छी, हिंदुओं का कल्चर बेहतर है, मुसलमानों, ईसाइयों का कल्चर बेहतर नहीं है! घूम रहे हैं ये सब बातें लेकर के। लेकिन ज्ञान के अभाव में आपको ये पता भी नहीं है कि आप जिसको अपना कल्चर बोलते हो, वो ज़्यादातर वहीं से आ रहा है।
और जो आपकी अपनी चीज़ है — सनातन, विशुद्ध सनातन — उससे आपका दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं बचा है। ये जो पूरा पर्दा और ये सारा जो कार्यक्रम है, उदाहरण के लिए, ये विक्टोरियन मोरैलिटी है, ये अंग्रेज़ों ने आपको दी है। पर आप कहते हो, ‘हमारी संस्कृति है,’ ये आपकी संस्कृति है ही नहीं।
भारत में महिलाओं को ढकने की कोई बात हो ही नहीं सकती कभी। ये आपको अंग्रेज़ों ने सिखाया है और अंग्रेज़ों से पहले आपको मुग़लों ने सिखाया है। पर आज आप बोलते हो, ‘ये तो मेरी संस्कृति है।’ ठीक वैसे ही जैसे आज आप पुलाव और कुर्ते-पयजामे को अपनी बात बोलते हो। आपको नहीं पता न कि पुलाव और पायजामा कहाँ से आ रहा है, लेकिन आप आज वो अपने त्योहार पर भी बनाओगे। पायजामा भारतीय कहाँ से हो गया? मैं भी खूब पहनता हूँ, पर मैं उनसे पूछ रहा हूँ जो बार-बार बोलते हैं कि नहीं, हम तो, ‘यू नो, इंडियन कल्चर!’ पुलाव भारतीय कहाँ से हो गया? बिरयानी पर आक्षेप करते हो, पुलाव क्या है, ये भी तो जान लो।
लेकिन चाहे पायजामा हो, चाहे पुलाव हो, मूल बात ये भी नहीं है कि भारतीय है, कि मुग़लई है, कि विक्टोरियन है — मूल बात ये है कि भाई, मज़ा आना चाहिए! फिर मज़ा कहीं से भी आ रहा हो, क्या फ़र्क़ पड़ता है! नहीं तो बिरयानी की खपत इतनी दुनिया में कैसे होती? जोमैटो ने पता लगाया कि होम डिलीवरी में सबसे ज़्यादा ऑर्डर क्या आते हैं? पिछले दस साल में भारत में बहुत ज़बरदस्त रूप से कट्टरता बढ़ी है, और उतनी ज़ोर से बिरयानी बढ़ी है। ये कैसे हो गया चमत्कार? ये कैसे हो गया?
‘दूसरे पंथ वाले बहुत बुरे लोग हैं, गंदे लोग हैं, छी-छी-छी,’ लेकिन बिरयानी की खपत बढ़ती जा रही है। और किसी भी चीज़ से ज़्यादा जोमैटो बिरयानी की डिलीवरी करता है। ये कैसे हो गया? क्योंकि कल्चर में न बात हिंदू की है, न मुसलमान की है, बात बस किसकी है? भोगो, मज़े मारो, मज़े।
और मज़े दो तल पर मारने हैं, एक इस तल पर (शरीर की ओर इशारा करते हुए), एक इस तल (मन की ओर इशारा करते हुए) पर। इस (मन के) तल पर मज़े मारने में एक चीज़ होती है प्राइड, तो प्राइड भी लेना है। प्राइड भी तो हम कंज़्यूम करते हैं न, तो प्राइड भी खूब रखना है, ‘हमारा कल्चर, हमारी संस्कृति।’
सत्य महत्वपूर्ण है। संस्कृति को सत्य का अनुचर होना चाहिए। संस्कृति पहले नहीं आती है। बार-बार संस्कृति-संस्कृति मत कहिए, ‘हमारे यहाँ तो ऐसे ही चलता है, पर ये तो इंडियन कल्चर है।’
संस्कृति बदलती रही है लगातार, और आज भी बदलनी चाहिए। सत्य सर्वोपरि है — ये अध्यात्म की सीख है।
और ऐसा नहीं है कि आप ख़ुद भी संस्कृति को बचाने में बड़े उत्सुक हों। आप भी संस्कृति के बस उन पक्षों को रखना चाहते हैं जिसमें मज़ा मारने को मिलता है। संस्कृति के वो पक्ष जिनमें कम मज़ा मारने को मिलता है, आप धीरे से उन्हें साइड कर देते हो, हटाओ इसको।
दिवाली भी जैसी मनाई जाती थी कुछ ही दशक पहले, वैसे अब थोड़ी मना रहे हो। दिवाली में भी जो भोग के तत्व हैं वो मैग्निफ़ाई हो गए, वो बढ़ गए, और जो अन्य तत्व थे दिवाली में वो क्षीण हो गए। और मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि जो क्षीण हो गए वो सब धार्मिक तत्व थे, धार्मिक तो बहुत कम हैं हमारी दिवाली में। मैं बार-बार पूछा करता हूँ, और जब मैं पूछता हूँ तो बड़ी गालियाँ पड़ती हैं लोगों से। पूछता हूँ, ‘हमारी इस दिवाली का बताओ राम से संबंध कितना है?’ कितना संबंध है राम से? डिस्काउंट्स, बम्पर सेल, धमाका ऑफ़र, इससे संबंध है दिवाली का। वर्मा जी का काजू और शर्मा जी की गुजिया मिलाकर गुप्ता जी को दे दी, ये है दिवाली।
इसमें श्रीरामचंद्र कहाँ हैं? इसमें योगवाशिष्ठ कहाँ हैं? जो आपके केंद्रीय शास्त्र हैं, उनके पास जाइए — वेदांत, वेदांत और वेदांत।
एक हारती हुई लड़ाई लड़ रहा हूँ, पता नहीं कितनी दूर तक जाएगी, कितनों का साथ मिलेगा। मैं गीता की बात करता हूँ और अब ये बहुत ज़्यादा होने लग गया है। मैं लिखता हूँ ‘गीता’ और उसके नीचे पाँच लिख देते हैं ‘गरुड़पुराण।’ पाँच कम बोल रहा हूँ, पचास।
बिना ये जाने कि वेद क्या है? वेदांत क्या है? गीता क्या है? और गरुड़पुराण कितने हज़ार साल बाद की बात है? और क्यों रचा गया था? कुछ नहीं पता। बस ऐसे ही, ‘हमारे दादा जी को बहुत पसंद था।’ क्यों? ‘क्योंकि उसमें लिखा हुआ था कि जीवात्मा क्या-क्या करती है।’ अच्छा, तो उससे क्या? बोले, ‘नहीं, वो दादा जी के छोटे भाई की अकाल मृत्यु हो गई थी, तो गरुड़पुराण पढ़-पढ़कर पता लगते थे कि उनकी जीवात्मा अभी कहाँ है, तो उन्हें बड़ा अच्छा लगता था।’
'तो दादा जी ऑब्सेस्ड थे, यही सब जीवात्मा और ये चक्कर, फलानी नदी पार करना, फलाने पेड़ पर प्रेत चढ़ गया, इन चीज़ों से।' वो गरुड़पुराण गीता से बड़ा हो गया, और ये लिखित में आता है कि ‘अजी, गीता वग़ैरह तो बाद की बात है, असली चीज़ तो गरुड़पुराण है।’ गरुड़पुराण, बाक़ी और न जाने कितने पुराण हैं। दसियों-पंद्रहियों साल पहले मैंने पढ़कर छोड़ दिए। मैंने कहा, इसमें से थोड़ा बहुत ही है जो काम का है, बाक़ी सब त्याज्य है।
न अष्टावक्र से कोई संबंध, न संतवाणी से कोई संबंध; उपनिषदों का ‘उ’ नहीं छूना, गीता को ये कह देना कि ‘अरे, ये तो ऐसे ही है; श्रीकृष्ण की असली चीज़ तो रासलीला है न, गीता तो बाद में आती है।’ गीता पर कोई बात करो तो, ‘पर कृष्ण भी तो ऐसा कहते थे, ऐसा करते थे।’ मैं कहता हूँ, ये सब बातें गीता में लिखी हैं श्रीकृष्ण के बारे में? ‘नहीं, हमने पढ़ी हैं, या सुनी हैं, या ऐसा माना जाता है।’
मुझे श्रीकृष्ण से संबंध होगा तो मैं श्रीकृष्ण की कहानियों में रस लूँगा या गीता में? मुझे श्रीकृष्ण से प्रेम होगा तो मैं श्रीकृष्ण की कहानियों में रस लूँगा, ‘फिर श्रीकृष्ण ने ये बोला, वो बोला, ये करा’ या गीता में श्रीकृष्ण आपको क्या सुनाना चाहते थे, गीता या अपने जीवन की पचास कहानियाँ? पर हम गॉसिपवादी लोग हैं, श्रीकृष्ण के भी जीवन में क्या चल रहा है, उसमें भी हमें ताक-झाँक करनी है। और वही सब मुझे तर्क दे देते हैं, कहते हैं, ‘गोपियों के कपड़े उठाए थे। वीगन बात करते हो, वो तो ख़ुद मक्खन खाते थे।’
गीता? ‘नहीं, गीता छोड़िए, गीता हटाइए, गीता से बाद में बात करेंगे, ये सब बात करिए न आप।’ श्रीकृष्ण कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे? कोई बैठकर के उनका वृत्तांत लिख रहा था? तुम्हें समझ में नहीं आता, ये सारी बातें गीता के हज़ार-डेढ़ हज़ार साल बाद कही गई हैं।
तुम किस तरह के आदमी हो कि तुम्हें श्रीकृष्ण के बोध में नहीं रस है, तुम्हें श्रीकृष्ण से संबंधित किस्से-कहानियों में रस है। तुम श्रीकृष्ण के साथ भी वही कर रहे हो न जो तुमने अपने पड़ोसी के साथ किया, कि उसके साथ बैठ करके गप्पें लड़ाईं, और पूछा कि मोहल्ले में किसकी लड़की का किसके साथ चल रहा है। तुम श्रीकृष्ण को भी उसी स्तर पर खींचकर गिराते हो न बार-बार। संस्कृति का खेल है, और संस्कृति में गीता से ज़्यादा किस्सों के लिए महत्त्व होता है।
समझ में आ रही है बात?
हमारी संस्कृति आज सुधार माँग रही है। हमारी संस्कृति गहराई माँग रही है और समुचित आधार माँग रही है। हमें अपने तौर-तरीकों का, अपने रीति-रिवाजों का, अपनी परंपराओं का पुनर्विलोकन करना पड़ेगा। हमें पूछना पड़ेगा, उनमें से कितना है जो वास्तव में आध्यात्मिक है? और जितना आध्यात्मिक है, हमें उसे पूरे सम्मान के साथ सहेजकर रखना चाहिए। लेकिन जो कुछ भी आध्यात्मिक नहीं है, वो तो सिर्फ़ पृथ्वी के विनाश का कारण बन रहा है न। मैं कह रहा हूँ, क्लाइमेट चेंज वहीं से आ रहा है, उसको क्यों पकड़े बैठे हो?
इतना ही नहीं, हो सकता है कि आज की माँग के अनुरूप हमें नए सांस्कृतिक तत्व भी आविष्कृत करने पड़ें। उदाहरण के लिए हमें नई परंपराएँ बनानी पड़ें आज, और क्यों न बनाएँ हम नई परंपराएँ? जैसे कि आप घोषित कर देते हो, फलाना दिन है, आप बोलते हो न मदर्स डे है। ये आपने संस्कृति में एक नया तत्व जोड़ दिया, और ठीक किया न?
अगर आप पाओ कि माँ को जो स्थान मिलना था, वो नहीं मिल रहा है, तो उसमें कोई गलती तो नहीं कि आप मदर्स डे जोड़ दो। आज से एक हज़ार साल पहले पर्यावरण को किसी संरक्षण की ज़रूरत नहीं थी, पर आज बहुत ज़रूरी है कि इंटरनेशनल एनवायरमेंट डे मनाया जाए। और वो बात कल्चर का हिस्सा बननी चाहिए, वो बात एक त्यौहार बन जानी चाहिए। तो कल्चर में एक नई चीज़ जुड़ गई, कि पर्यावरण दिवस के दिन हम बड़ा उत्सव मनाते हैं, एक अनूठे किस्म का। आज हमें नई परंपराएँ चाहिए। मुझे नहीं पता ये बात मेरी कितनी दूर तक और कितनी गहराई तक जा रही है, पर कहना ज़रूरी है तो कह रहा हूँ।
प्रश्नकर्ता: जब कभी आचार्य जी, आज के परिप्रेक्ष्य में भी धर्म की रक्षा की बात होती है, तो अक्सर उसमें देखा गया है कि वो कहते हैं कि परंपराओं को बनाए रखो, परंपराओं को ही समय में आगे बढ़ाओ। पर आपके साथ देखा है कि आप बार-बार बात करते हैं पुनर्विचार करने की, देखने की, कि वो चीज़ क्या इस काल के धर्म से मेल खाती भी है या नहीं। तो धर्म की रक्षा वास्तविक रूप में कैसे होगी?
आचार्य प्रशांत: देखो, धर्म कोई ऐसी चीज़ तो है नहीं जिसका आपने स्वयं आविष्कार किया हो, ठीक है न? तो क्या ये बात बिल्कुल व्यावहारिक नहीं है कि जिन्होंने आपको धर्म दिया, आप सीधे उन्हीं से जाकर पूछ लो कि धर्म चीज़ क्या होती है?
आम आदमी को अगर छोड़ दिया गया होता, तो क्या अपने सौ साल के जीवन में भी वो धर्म जैसे किसी शब्द इजाद कर पाता? एक बच्चा पैदा हो आज की दुनिया में और आप उसको ‘धर्म’ जैसा शब्द बताइए मत, तो वो कौन से शब्द हैं जिन्हें ख़ुद ही खोज निकालेगा? वो बाज़ार खोज निकालेगा, वो केक खोज निकालेगा, वो पिज़्ज़ा खोज निकालेगा, वो स्कूल भी निकाल लेगा, वो प्लेसमेंट भी निकाल लेगा, वो प्रॉफ़िट निकाल लेगा, वो सेक्स निकाल लेगा, वो प्लेज़र निकाल लेगा, वो कार निकाल लेगा, वो टूरिज़्म निकाल लेगा, ये सब चीज़ें वो ख़ुद निकाल लेगा।
फिर से सोचिएगा, एक क्षण लेकर के, क्या ‘अध्यात्म’ जैसा शब्द वो निकाल पाएगा? सेल्फ इन्क्वायरी, आत्म-जिज्ञासा — ये शब्द कभी उसके ज़ेहन में कौंधेगा भी? कभी नहीं कौंधेगा न?
तो धर्म कोई आपकी अपनी चीज़ तो है नहीं, आपको किसी ने दिया है, जिन्होंने दिया है, उनसे ही क्यों नहीं पूछते कि धर्म माने क्या? जिन्होंने दिया है, मैं सनातन यदि धारा की बात करूँ, उन्होंने अपनी बात को सबसे स्पष्ट और सशक्त तरीके से वेदांत में अभिव्यक्त किया है। तो धर्म क्या है, ये जानने के लिए वेदांत के पास जाओ। अन्यथा जिस चीज़ को धर्म समझकर बैठे हो, वो न जाने क्या है, व्यर्थ का कूड़ा है अधिकतर। क्यों पकड़े हो?
आप अपने-आप को हिंदू बोलते रहिए बार-बार, और हिंदू शायद आप हों भी, क्योंकि हिंदू तो शब्द ही एक खिचड़ी जैसा है, कोई भी अपने-आप को हिंदू बोल सकता है। लेकिन सनातनी नहीं हैं आप, अगर उपनिषदों का और गीता का आपने पाठ नहीं किया है तो। हिंदू होंगे।
मैं बहुत बार बोलता हूँ न, कि कहने को तो दुनिया में एक सौ दस करोड़ हिंदू हैं, पर वास्तव में एक लाख भी न हों। तो लोगों को आपत्ति हो गई, वो न्यायालय का फैसला लेकर आने लग गए। वो बोले, ‘देखिए, न्यायालय भी यही कहता है कि ये तो एक जीने की पद्धति है, हिंदू।’ और लोग बोलते हैं कि जितने भी इतिहासकार, कि सिंधु नदी के पूरब में जितने भी लोग रहते हैं, सब हिंदू हैं। मैंने कहा, ‘ले लो, होंगे हिंदू, तुम बने रहो हिंदू। ये शब्द तुम्हें ही मुबारक हो, रखो।’ मैं ज़्यादा शुद्ध और ज़्यादा ऊँचा शब्द अब पकड़ूँगा, सनातनी। तुम होओगे हिंदू, सनातनी हो क्या तुम?
अब इसी त्यौहार को मनाने के दो तरीके हो सकते हैं, एक सांस्कृतिक तरीका, जिसको आप मोटे तौर पर हिंदू तरीका बोल सकते हैं। और एक आध्यात्मिक तरीका, जो सनातनी तरीका है। आप जाएँगे यहाँ से वापस, मैं चाहता हूँ आप ये लगातार अपने-आप से पूछते रहें कि आप जो दिवाली मना रहे हो, वो सांस्कृतिक है या आध्यात्मिक। अगर आपकी दिवाली मात्र सांस्कृतिक है, तो उस दिवाली का कोई मूल्य नहीं। वो दिवाली बस एक विरासत की बात है कि ऐसे ही पहले मन रही थी, ऐसे ही हमने मना ली।
मैंने क्या प्रश्न पूछा है, ये प्रश्न आप तक पहुँच भी रहा है? आपको सांस्कृतिक दिवाली मनानी है या आध्यात्मिक? ये मेरा प्रश्न है। पूछिएगा फिर कि आध्यात्मिक दिवाली का अर्थ क्या हुआ? आध्यात्मिक दिवाली का अर्थ शायद ये होगा, आप ख़ुद खोज करें, पर कुछ इशारे दे देता हूँ, शायद ये अर्थ होगा कि राम के थोड़े निकट आया जाए, कि नहीं?
रामचरितमानस पढ़ी भी है हमने? वाल्मीकि रामायण हमारे घर में भी है एक प्रति के तौर पर? योगवाशिष्ठ क्या, योगवाशिष्ठ सार भी हमने पढ़ा है? ‘आचार्य जी-आचार्य जी’ आप बोलते हैं, मैंने ही योगवाशिष्ठ पर इतना बोला है वो आपने यूट्यूब पर भी वीडियोज़ हैं, उस पर कोर्स भी है। उस पर किताब भी है, वो किताब यहाँ बाहर ही होगी।
वास्तविक दिवाली में रामायण का, रामचरितमानस का, और योगवाशिष्ठ का बहुत केंद्रीय स्थान होगा न? होगा न? ये बात लेकिन पाठन के तल पर हुई।
व्यवहार और आचरण के तल पर वास्तविक दिवाली का क्या अर्थ होगा? यही होगा, वैसा कुछ भी नहीं करना जो शायद राम न करते।
राम को सोने से लगाव था? दुनिया का जो बड़े से बड़ा सोने का गढ़ हो सकता था, उसको छोड़कर आ गए। एक ही बार नहीं त्याग किया है राम ने, कि पिता ने कहा कि अयोध्या छोड़ दो, तो अयोध्या छोड़ दी बस। अयोध्या तो चलो पिता की थी, पिता कहेंगे, ‘छोड़ दो,’ तो छोड़नी पड़ेगी। लंका तो ख़ुद जीती थी और जीती हुई लंका, सोने की लंका। और लंका के पास अयोध्या की अपेक्षा बहुत ज़्यादा सोना था, लंका अपने समय का अमेरिका था। सामरिक, मिलिटरी ताकत भी सबसे ज़्यादा अमेरिका के, माने आज की। उस समय की लंका, आज के अमेरिका के पास और आर्थिक ताकत भी, माने सोना भी, वो भी लंका के पास और दबदबा भी।
रावण का था नहीं दबदबा! सारे राजाओं को अधीन कर लिया था, देवताओं को नीचे जाकर कैदखाने में डाल दिया था। वो सब कुछ राम को उपलब्ध रहा। राम ने कहा, चाहिए ही नहीं। जिसको मारा, उसी के छोटे भाई को सौंपकर आ गए, ‘तुम रखो, नहीं चाहिए।’
अरे अगर अयोध्या छोड़कर चौदह वर्ष तक वन में भटक सकते हैं तो लंका क्या, इसको भी छोड़ देंगे और फिर वापस जाएँगे। हाँ, दो-चार चीज़ें उनको लोगों ने भेंट कर दीं, उसको लेकर अयोध्या चले गए थे, बाक़ी कुछ चाहिए ही नहीं। ये राम थे। त्याग और राम समानार्थी शब्द हैं। तो बोलिए, दिवाली फिर कैसी होगी? क्यों न वो सब कुछ त्यागें अपने घर से जिसकी आवश्यकता नहीं है? और फिर त्यागें अपने मन से वो सब कुछ जो व्यर्थ ही बैठा हुआ है। ऐसी दिवाली क्यों न मनाएँ? दिवाली हमारे लिए वास्तविक सफ़ाई, स्वच्छता माने त्याग का त्यौहार क्यों न हो?
और त्याग कोई ऐसी बात नहीं होती कि कोई चीज़ बहुत अच्छी थी, इसलिए छोड़ दी है। ये क्या बोला था अभी? जो असत् है, उसको छोड़ना है न? ‘असतो मा सद्गमय’ माने असत् क्या होता है? जो चलना नहीं है, जो लगता है, बहुत अच्छा है, ज़रूरी है, पर वो वास्तव में व्यर्थ है, उसको असत् बोलते हैं। जो आज ऐसा लग रहा है, कल पलटकर कुछ और हो जाएगा, उससे संबंधित आपकी कामना की कभी पूर्ति होगी नहीं, उसको असत् बोलते हैं। क्यों न असत् को, तमस को, और मृत्यु को त्यागने का पर्व बने दीपावली? कहिए, बोलिए!
राम धीरे-धीरे अपनी लोकप्रियता खोते जा रहे हैं। प्रसिद्ध तो रहेंगे वो, लेकिन लोकप्रियता खोते जा रहे हैं, आपने ये ग़ौर करा है? कितने ही ज़्यादा लोग हैं जो अब राम को लेकर अनाप-शनाप बोलने लगे हैं, अपशब्द बोलते हैं। राम हिंदुओं के एक बहुत बड़े वर्ग के आदर्श रहे नहीं। उसके बहुत कारण हैं, और विशेषकर युवा पीढ़ी को तो राम ज़्यादा नहीं भाते। और क्यों नहीं भाते? क्योंकि कई कारण हैं, पर जो एक बड़ा महत्त्वपूर्ण कारण है, वो ये है कि राम त्याग के प्रतीक हैं और नई पीढ़ी विशेषकर भोग में रुचि रखती है।
राम कह रहे हैं, ‘जिसपर तुम्हारा सामाजिक रूप से या क़ानूनन हक़ हो, तुम उसको भी छोड़ दो यार, रखा क्या है।’ और नई पीढ़ी कह रही है, ‘जिसमें तुम्हारा हक़ नहीं है, उसको भी हथिया लो।’ तो राम कैसे पसंद आएँगे?
इस पृथ्वी को लेकिन आज ज़रूरत किसकी है? जो नई संस्कृति चल रही है उसकी, या जो हमारे पुराने राम हैं उसकी? तो पृथ्वी को बचाने के लिए भी हमें असली, वास्तविक, पुराने राम चाहिए। क्यों न इस दीपावली पर हम असली रामचंद्र को घर लेकर आएँ? वो वास्तविक दिवाली होगी कि नहीं होगी? और उनको घर लाने का अर्थ होगा, बहुत कुछ अपने घर से, जो व्यर्थ है, उसको निष्कासित करना।
राम का निष्कासन तभी समाप्त होगा जब आपके जीवन से वो सब निष्कासित हो जो व्यर्थ है, तब राम की घर-वापसी होती है। अन्यथा राम तो सत्य हैं। कबीर साहब बोलते हैं न कि चार राम हैं जगत में, जो चौथा है, उसको बूझो तो जानें। तीन तो सभी पकड़ लेते हैं, जो मनुष्य-रूपी राम हैं, उनको सभी जानते हैं। वो पहले तल के राम होते हैं। 'एक राम दशरथ का बेटा' वो पहले तल के राम हैं।
दूसरे राम को कहते हैं, वो जो प्रकृति बनकर के फैले हुए हों, दूसरे राम हैं। तीसरे राम कौन से हैं? जो प्रत्येक मनुष्य में अहंवृत्ति बनकर बैठे हैं। कहते हैं, चौथे राम हैं, वो असली हैं, और जगत पहले ही राम में उलझा रह जाता है। जो चौथे राम हैं, वो हैं निर्गुण, निराकार, ब्रह्म। दिवाली असली, चौथे राम का त्योहार क्यों नहीं होनी चाहिए? बताइए, होनी चाहिए न? तो क्यों न हम असली राम की मानें, जो चौथे राम हैं, जो उच्चतम राम हैं, हम उनकी दिवाली क्यों न बनाएँ?
अगर आपको संतवाणी में रुचि हो, तो राम पर इतने दोहे हैं, इतनी चौपाइयाँ हैं, उनको ही क्यों न घर में सब लोग बैठ करके गाएँ? और रिकॉर्ड कर-करके डालिए न फेसबुक पर, अपने व्हाट्सऐप ग्रुप्स पर। जिनको भागना है, भागें। जो राम के नाम से भागते हैं, उनके साथ आप हो ही क्यों वैसे भी? मानस की इतनी सुंदर-सुंदर चौपाइयाँ हैं, क्यों न उनको गाया जाए दिवाली पर? क्यों न हो ही यही, कि दिवाली क्या होना है, दिवाली पूरे दिन सुबह से लेकर रात दस बजे तक बस मानस की चौपाइयाँ गाएँगे। कबीर साहब ने राम पर इतना बोला, इतना बोला, क्यों न उसको गाएँ।
ये ऐसे ही कोई विचार करके नहीं आया था, बैठे-बैठे बात आई तो कह दिया। बाक़ी आपको सोचना है कि व्यवहार के रूप में श्रीरामचंद्र को अपने घर लेकर कैसे आना है, वो होगी वास्तविक दिवाली। ये बात बहुत कठिन लग रही है, बहुत महँगी लग रही है, खर्च हो जाएगा, या बस डर लग रहा है कि अड़ोस-पड़ोस वाले क्या बोलेंगे? 'हाय राम!’ ‘हाय राम!’ राम को याद कर लिया।
जो बाज़ारवाद की संस्कृति है हमारी, उसकी जगह राम की दिवाली मनाएँ, अच्छा लगेगा।
और अच्छा लगे तो बताइए सबको। पहले जब शिविरों में जाते थे, वहाँ पाँच-दस लोग ही साथ होते थे, तो वो बोला करते थे, एक ग्रुप हुआ करता था ‘पाओ और गाओ’ नाम से। अब पता नहीं है या नहीं है, क्या है। तो उस पर बोला करते थे कि अगर मिला है, तो बाँटो और गाओ, छुपाओ मत। क्योंकि तब लोग और इतने कम होते थे कि बेचारे डरते थे कि घर में भी क्या बताएँगे।
तो मैं उनको बोलता था कि देखो, कुछ चीज़ें हैं जिनको लेकर के कभी लज्जित नहीं होना चाहिए। उनमें सर्वप्रथम सत्य होता है, वहाँ अगर तुम डर गए तो तुमने सच्चाई के प्रति बेअदबी कर दी। और बातों पर डरना हो, डर लो। सच को खो दूँगा, इस बात से डरना है तो डर लो। लेकिन सच्चाई के पक्ष में हो, इस बात से डरते हो, तो ये तो कैसी बात हो गई! क्या बोलें! कोई शब्द भी है इसके लिए कि नहीं, मालूम नहीं। ये ऐसी-सी बात हो गई कि जिससे प्रेम है, उसी को धोखा दो। कि प्यार भी करते हैं, और डरते भी हैं, और धोखा भी देते हैं, ऐसा इंसान कैसा होगा? छी!
तो प्यार का तकाज़ा यही होता है, उसकी माँग यही होती है, प्यार का अधिकार होता है ये, कि वो अभिव्यक्त हो। उसको छुपाकर नहीं बैठा जाता। राम अगर एक शब्द भर रह गए तो, राम को प्राण बनना होता है, राम को जीवन बनना होता है; या फिर राम को शब्द की तरह भी मत रखो मन में। राम अगर शब्द की तरह हैं तो ये बड़ी अनिष्ठा की बात है, बड़ी बेवफ़ाई की बात है। ये ऐसी-सी बात है कि किसी से बस बार-बार यही बोलते रहो, कि ‘मैं तुमसे प्यार करता हूँ, प्यार करता हूँ,’ और ये जो प्रेम है, ये जीवन में कहीं दिखाई न दे। ज़बान पर है, जीवन में नहीं है। गंदी बात है न? ऐसे इंसान के साथ रहना चाहोगे? कोई हो ज़िंदगी में जो बस बोले बार-बार ‘आई लव यू, आई लव यू।’ उसकी ज़िंदगी को देखो तो उसमें लव जैसा, प्रेम जैसा कुछ है नहीं। उसको तो छोड़ ही देते हो न? मैं कह रहा हूँ, ऐसी ज़िंदगी से ब्रेकअप ही कर लो। अगर कुछ सही है तो उसको जी करके दिखाओ।
आप यहाँ बैठे हो, या तो अपने आप को साबित कर लो कि मैंने जो कुछ बोला, वो बिल्कुल कचरा था, बेकार था। मुझे तर्क देने की ज़रूरत नहीं है, अपने आप को ही सिद्ध कर लो कि मैंने जितनी बातें बोलीं, वो बिल्कुल बेकार हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। आप कर लीजिए अपने आप को ये सिद्ध। लेकिन अगर मेरी बातों में आपको सच दिखाई दे रहा है, तो अब ये आपका कर्तव्य है कि उस सच को अपनी ज़िंदगी में जीकर दिखाओ, या फिर बोलो मत कि सच है।
या तो मेरी बात को झूठ साबित कर दो, और अगर ये मेरी बात झूठ नहीं है, तो कैसे इंसान हो कि सच को जी नहीं सकते? कितनी कायरता है! साधारण भाषा में इसको बोलेंगे ‘बेवफ़ाई।’ शास्त्र इसको बोलेंगे, आत्म-प्रवंचना, सेल्फ डिल्यूज़न ख़ुद को धोखा देना। ये मत करो, ये मत करो।
ये सब करते हैं। जीवन के कई मौक़ों पर मैंने भी करी है। पर जितनी बार ये करो न, अपना ही भीतरी कद छोटा हो जाता है। इंसान भीतर से बेइज़्ज़त हो जाता है। अच्छी बात नहीं है न, अपनी ही नज़रों में बेइज़्ज़त होकर जीना। अच्छा तो नहीं लगता न? मत करो।
दुनिया की नहीं बात कर रहा, दुनिया क्या कहेगी। मैं कह रहा हूँ, सबसे ज़्यादा भीतरी घाव लगता है जब ख़ुद ही पता होता है कि जो सही था, उसको सही जानते हुए भी करा नहीं, जिया नहीं, है न? वो सबसे बड़ी भीतरी बेइज़्ज़ती होती है। उस बेइज़्ज़ती को क्यों आमंत्रित करना? उस बेइज़्ज़ती का थप्पड़ क्यों खाना? इसको जी करके दिखाइए। दो ही दिन हैं, उस दो दिन में एक नई शुरुआत करी जा सकती है।
व्यर्थ से नाता तोड़िए, राम से नाता जोड़िए।