
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आई एम अ सेकंड ईयर पीएचडी स्टूडेंट हियर। मैंने आईआईटीज़ में देखा है कि स्टूडेंट्स काउंसलिंग के लिए जाते हैं, और आईआईटी भी काफ़ी पैसे स्पेंड कर रहे हैं काउंसलिंग सर्विसेज़ के लिए। और स्टूडेंट को शॉर्ट टर्म में रिलीफ़ भी मिलता है। उनका मेंटल स्ट्रेस कम होता है।
बट माय क्वेश्चन इज़: व्हाट इज़ द…, मतलब स्टूडेंट को कैसे अप्रोच करना चाहिए जब उनको मेंटल स्ट्रेस होता है? एंड इंस्टिट्यूट किस वे से लाइक लॉन्ग टर्म सॉल्यूशन की तरफ़ स्टूडेंट को मोटिवेट कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सबसे पहले तो जो पूरा सवाल है न, उसमें स्टूडेंट शब्द आया तीन बार, चार बार आया। स्टूडेंट है, स्टूडेंट को काउंसलिंग की ज़रूरत है। स्टूडेंट जाता है, ऐसा-वैसा ये सब। इससे हमें ये भ्रम हो जाता है कि समस्या स्टूडेंट में स्थित है। कि दस स्टूडेंट हैं, उसमें से एक या दो को ही इतना स्ट्रेस हो रहा है कि उन्हें काउंसलिंग की ज़रूरत पड़ रही है। तो ये जो एक-दो हैं, यही अपवाद हैं तो दोष इन्हीं में होगा। नहीं, ऐसा है नहीं शायद।
और आप जैसा कह रही हैं, स्टूडेंट पर ही ध्यान दोगे तो रिलीफ़ तो दे पाओगे। आपने रिलीफ़ कहा था। स्टूडेंट पर ध्यान दोगे तो रिलीफ़ तो दे पाओगे, समाधान नहीं दे पाओगे। क्योंकि समस्या सचमुच उस स्टूडेंट के अंदर नहीं है, जो मेन गेट से प्रवेश करता है किसी डिपार्टमेंट में एडमिशन लेकर के, उसमें नहीं है। हम ऐसा प्रदर्शित करना चाहते हैं जैसे कि जिस दिन वो यहाँ आया बीटेक या किसी भी अन्य प्रोग्राम में, उस दिन समस्या शुरू होती है। क्योंकि स्टूडेंट तो उसी दिन बनता है न, जिस दिन कैंपस में आ जाता है। नहीं, ऐसा नहीं है।
दो व्यवस्थाएँ हैं। दो व्यवस्थाएँ हैं, और स्टूडेंट उन दोनों व्यवस्थाओं का उत्पाद भी है, शिकार भी है। एक व्यवस्था है कैंपस गेट से बाहर वाली, और एक व्यवस्था है कैंपस के अंदर वाली। स्टूडेंट का वास्ता उन दोनों से है, और ये दोनों व्यवस्थाएँ आपस में प्रतिक्रिया करके स्टूडेंट को पैदा कर रही हैं। ये दोनों न हों तो आप जिसको स्टूडेंट कहते हैं न, उस तरह की कोई चीज़ होगी नहीं। मैं ये नहीं कह रहा कि ये स्टूडेंट का शरीर पैदा करती हैं। पर भीतर से जो स्टूडेंट है मानसिक रूप से जिसको हम स्टूडेंट कहते हैं, वो पैदा होता है बाहरी व्यवस्था और भीतरी व्यवस्था के डायलेक्टिकल एंगेजमेंट से। कुछ बाहर वाली व्यवस्था है, कुछ भीतर वाली व्यवस्था है। ये दोनों आपस में रगड़ागड़ी करते हैं। तो उससे वो चीज़ तैयार होती है, जिसको हम कहते हैं, द माइंड ऑफ़ द स्टूडेंट। द माइंड ऑफ़ द स्टूडेंट, कैसे तैयार होता है?
तो हम बड़ी ग़रीबी से गुज़रे पिछले दो-ढाई सौ सालों में। ठीक है? उच्च वर्गीय होना तो छोड़िए, मध्यम वर्गीय होना भी हमारे लिए सपना हो गया। अब जाकर के भारत में एक बड़ी मिडिल क्लास खड़ी हुई है, नहीं तो मिडिल क्लास भी बड़ी छोटी हुआ करती थी। आज से तीस चालीस साल पहले तो कुल मिलाकर ज़िंदगी में यही बहुत बड़ी बात हो गई कि किसी तरह से खाना-पीना, रोटी-कपड़ा चलता रहे।
ये भी हम कैंपस के अंदर की बात नहीं कर रहे हैं। हम कैंपस के बाहर की बात कर रहे हैं। ग़रीब है देश। बहुत ग़रीब है देश। और उसमें स्वतंत्रता के ठीक बाद सरकार तय करती है, विशेषकर उस समय प्रधानमंत्री हैं नेहरू, कि हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के उच्च शिक्षा के संस्थान खड़े करने हैं। इनको वो मंदिर कहा करते थे, मंदिर।
अब ये जो आपने संस्थान खड़े कर दिए, ये द्वीप हैं। ये आइलैंड्स हैं। किस चीज़ के? क्वालिटी के। और द्वार हैं। किस चीज़ के? प्रोस्पेरिटी के। क्वालिटी के द्वीप हैं, छोटे-छोटे और प्रोस्पेरिटी के द्वार हैं। वरना देश में कहीं भी कहाँ कुछ बहुत उच्च गुणवत्ता का है। कुछ भी नहीं। हमारी कोई भी व्यवस्था, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसको हम कह सकें हाई क्लास, हाई क्वालिटी, इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स। कुछ नहीं ऐसा। अब पूरा भारत कैसे देखेगा इन द्वीपों को?
दो भाव रहेंगे। पहला विस्मय और दूसरा लोभ।
विस्मय किस बात का? ऐसी टेक्नोलॉजी पढ़ाई जा रही है, जो पूरे देश में क्या पूरे एशिया में कहीं नहीं है। जब शुरुआती दौर था आईआईटीज़ का, तो एशिया में इनके जैसे कोई संस्थान नहीं थे। अब तो चीन, जापान, कोरिया हैं; सिंगापुर भी है। पर उस समय पर वो भी पिछड़े हुए थे, क्योंकि जब हमें आज़ादी मिली, लगभग तभी वे सब भी आज़ाद हुए थे। और उच्च शिक्षा पर भारत ने जितना महत्त्व दिया, उतना उन देशों ने नहीं दिया; और प्राथमिक शिक्षा पर जितना महत्त्व उन्होंने दिया, भारत ने ज़रा भी नहीं दिया। ये दो अलग-अलग दिशाएँ थीं।
भारत ने कहा, कि हमें हैवी मशीनरी वाली इंडस्ट्रीज़ चाहिए, और उन हैवी मशीन्स को डिज़ाइन और ऑपरेट करने वाले इंजीनियर और मैनेजर चाहिए। तो भारत ने जो इनिशियल इंडस्ट्री लगाई, वो हैवी मशीन्स की थी। बड़े-बड़े बाँध बनाए, बड़ी पीएसयूज़ बनाई। और उन पीएसयूज़ को क्वालिफ़ाइड पर्सनल मिल सके, इसके लिए आईआईटी बनाए, आईएससी बनाया, आईआईएम बनाया, और भी कई संस्थान हैं जो उसी समय लगभग बनाए गए। वो विज़न था। विज़न तो ठीक है, प्राथमिक शिक्षा पर ज़ोर दिया नहीं गया। देश 99.9% बदहाल का बदहाल रहा।
देखिए, आप आज के स्टूडेंट की बात कर रहे हो। कहानी कितनी पीछे से शुरू हो रही है। उतना पीछे नहीं जाएँगे तो आज की समस्या भी नहीं सुलझा पाएँगे। तो जो बाहर के लोग हैं, वो जब एक आईआईटी की तरफ़ देख रहे हैं और तब इतनी आईआईटी नहीं होती थीं। आज तेईस आईआईटीज़ हैं। शुरुआती दौर में पहले दो, फिर चार, फिर पाँच, बस इतना ही था। अभी तीस साल पहले तक भी इतना ही था, चार-पाँच आईआईटीज़, बस।
तो वे देख रहे हैं, तो एक तो विस्मय हो रहा है कि बाप रे बाप! ये हाई क्वालिटी! जहाँ कुछ भी हाई क्वालिटी नहीं है। रेलवे रिज़र्वेशन तक नहीं होता जहाँ; वहाँ कंप्यूटर साइंस पढ़ाया जा रहा है, उसी देश में। जहाँ एक-एक काम काग़ज़-कलम घिस के और क़तार लगा के होता है, वहाँ सिस्टम्स पढ़ाए जा रहे हैं। बाप रे बाप! तो ये तो विस्मय की बात हो गई। और विस्मय से ज़्यादा बड़ा क्या था? लालच।
क्योंकि एक्सीलेंस के आइलैंड्स थे और प्रोस्पेरिटी की एंट्रेंस थे। अगर यहाँ घुस गया आपका लड़का, जानबूझकर के लड़का बोल रहा हूँ, लड़की नहीं भेजते थे; अगर यहाँ पर घुस गया आपका लड़का, तो नौकरी नहीं पक्की है। बढ़िया वाली कंपनी में नौकरी लगेगी। और ये भी हो सकता है कि विदेशी नौकरी लग जाए, या कि विदेशी किसी यूनिवर्सिटी में उसको दाख़िला मिल जाए आईआईटी के नाम से। इस पूरे में कहीं आपको ज्ञान या प्रेम सुनाई दे रहा है? कुछ भी सुनाई दे रहा है क्या? सुनाई दे रहा है?
इसमें आपको नेशनल प्राइड दिखाई दे रहा होगा। इसमें आपको ग्रीड दिखाई दे रही होगी। इसमें आपको, ओ! दिखाई दे रही होगी, विस्मय, चकित हो जाना, ये सब दिखाई दे रहा होगा। इसमें कहीं भी ज्ञान के प्रति प्रेम जैसा तो कुछ नहीं है न। नहीं है न? ये वो बाहरी व्यवस्था है, जो कैंपस के भीतर उसको भेजती है, जिसको आप कह रहे हैं द स्ट्रेस्ड आउट स्टूडेंट।
कल आईआईटी पटना में था, वहाँ पर नहीं; उससे पहले पटना में जो खुला सत्र हुआ, ओपन सेशन उसमें किसी ने सवाल पूछा, वो भी शायद आईआईटीयन नहीं थे। बिहार के कोचिंग माफ़िया के बारे में। बोले, यहाँ एंट्रेंस एग्ज़ाम्स की तैयारी लोग करते नहीं; उनसे करवाई जाती है। ये बाहरी व्यवस्था है। स्टूडेंट से एंट्रेंस की तैयारी करवाई जा रही है, “तू कर।” उसके माँ-बाप द्वारा, जिसको वो कोचिंग माफ़िया बोल रहे थे, उसके द्वारा। और कोचिंग माफ़िया कोई ऐसा नहीं कि सिर्फ़ जेई की तैयारी में ही है। जिन्होंने सवाल पूछा, वो बोले, चाहे जेई की तैयारी हो, यूपीएससी की तैयारी हो, वो माफ़िया ही है।
न भीतर का कुछ पता है कि मैं कौन हूँ, मुझे चाहिए क्या; और न ही ज्ञान से कोई प्रेम है कि मुझे सचमुच मैकेनिकल, कंप्यूटर, इलेक्ट्रिकल, केमिकल कुछ बहुत अच्छा लगता है। कुछ नहीं ऐसा, एक दबाव है बस। और वो दबाव ऐतिहासिक है, 250 साल की ग़रीबी और ग़ुलामी से आ रहा है। और ऐसी ग़रीबी कि अभी सौ साल भी नहीं बीते। दुनिया के सबसे बड़े अकालों में से एक से हम गुज़र चुके हैं। अभी जब द्वितीय विश्व युद्ध हुआ था, और वो कोई अकेला नहीं था। हर दूसरे-तीसरे साल हिंदुस्तान में अकाल पड़ रहे थे, कहीं न कहीं, और बड़े-बड़े। अकाल भी नहीं, दुर्भिक्ष। दुर्भिक्ष समझते हो? कि भिक्षा मिलनी भी मुश्किल हो जाए। खाना कमाना तो छोड़ दो, भीख भी नहीं देगा कोई। ऐसा अकाल।
ये हमारी हालत थी। हमारी हालत ऐसी थी कि पूरा हिंदुस्तान सिर्फ़ मानसिक तौर पर नहीं, शारीरिक तौर पर भी स्टंटेड हो गया। आज जो हम कहते हैं न कि हिंदुस्तानी ऐसे छोटे-छोटे होते हैं और तगड़े नहीं होते, और स्पोर्ट्स में कम्पीट नहीं कर पाते, उसकी बहुत बड़ी वजह 250 साल की ग़ुलामी भी है। हमारा मन ही नहीं टूटा था, हमारा शरीर भी टूट गया था। ये जो हमारी शारीरिक कमज़ोरी है, ये काफ़ी हद तक अनुवांशिक है। नहीं तो जो हमारा डीएनए है, वही डीएनए इधर आपको मिलेगा, सेंट्रल एशिया में मिलेगा, उसी से मिलता-जुलता यूरोप में मिलेगा, ईरान की तरफ़ मिलेगा; और लोग लंबे-चौड़े, तगड़े हैं।
हम इतने टूटे हुए लोग हैं, क्योंकि हमारा वर्तमान मुक्त नहीं है। वो अतीत से आ रहा है। इसीलिए वर्तमान को समझने के लिए अतीत को समझना पड़ेगा। भीतर आम आदमी के आज भी घोर दहशत बैठी हुई है। घोर दहशत, कि मेरा क्या होगा कहीं मैं बेरोज़गार तो नहीं मरूँगा? भूखा तो नहीं मरूँगा? और ये दहशत वो अपने बच्चों को भी पिला देता है। खेल-कूद रहा होगा बच्चा, तो तुरंत उसको हो जाएगा, “ये जो ऐसे खेल-कूद रहा है न, भूखा मरेगा, भूखा!” सुना है ये? सुना है? ये वो व्यवस्था है, जो इंस्टिट्यूट के मेन गेट के बाहर की है। अभी इंस्टिट्यूट तो शुरू भी नहीं हुआ। इस तरीके से वो जो बाहर वाला लड़का या लड़की है, वो इंस्टिट्यूट में प्रवेश करता है।
हमारी बदहाली ऐसी थी, ऐसी थी कि खाने की साधारण चीज़ें भी बस गिने-चुने एक-दो, पाँच प्रतिशत लोगों को नसीब होती थीं। उत्तर भारत में, विशेषकर उत्तर-पूर्व की तरफ़ आप चले जाओ, तो ये एक साधारण मुहावरा है कि खाने की कोई चीज़ जब अच्छी होती है न, तो उसको बोलते हैं कि बहुत मीठा है। बहुत मीठा है। उदाहरण के लिए, बघेली में कोई खाना अगर स्वादिष्ट होगा तो कहेंगे, बहुत मीठ लागत है। अब वो नमकीन व्यंजन भी हो सकता है पर अगर वो स्वादिष्ट है, अच्छा है, तो उसको कहेंगे, बहुत मीठ लागत है। क्यों? क्योंकि शक्कर तो छोड़ दो, गुड़ भी नसीब नहीं होता था।
तो मिठास पर्याय बन गई, सिनोनिम बन गई, डिज़ायर फ़ुलफ़िलमेंट का। ये जो हम मीठे शब्द को इतना वज़न देते हैं न, अब नहीं देते अब तो ठीक है। अभी एक मेट्रोपॉलिटन कॉन्टेक्स्ट है, हम जिसमें बात कर रहे हैं। इसमें ये बात शायद आपको समझ में भी न आए। पर आप थोड़ा अगर गाँव-देहात की तरफ़ जाएँगे, तो आप आज भी वही मुहावरा पाएँगे। ये हमारी स्थिति रही है, हम इतनी दुर्दशा से गुज़रे हैं।
और वो एक अलग कहानी है कि उतनी दुर्दशा में हम पड़े क्यों। उसका कारण मैं सीधे-सीधे लोकधर्म को मानता हूँ। साफ़ दिखाई देता है कि भारत की जो दुर्दशा हुई है, उसका सीधा-सीधा ज़िम्मेदार लोकधर्म है। और वो लोकधर्म आज भी भूत की तरह चिपका हुआ है, हट नहीं रहा ठीक से। खैर, वो अलग कहानी है।
“जा, पढ़ाई कर। जा, पढ़ाई कर।” भारत शायद इकलौता देश होगा, जिसने एक पूरा शहर बसा दिया है कोचिंग के नाम पर। जानते हैं कौन-सा शहर? वहाँ और कुछ नहीं होता, यही होता है, कोचिंग, कोचिंग, कोचिंग। और हम जानते हैं कि आए दिन वहाँ आत्महत्याएँ होती रहती हैं। आपने स्ट्रेस का नाम लिया, जोड़ के देख लीजिए। क्या स्ट्रेस इस कैंपस में आने के बाद शुरू हो रहा है? अगर कैंपस में आने से स्ट्रेस हो रहा है, तो उस शहर में इतनी आत्महत्याएँ क्यों होती हैं?
डरे हुए माँ-बाप; जिन्होंने अपने डरे हुए माँ-बाप देखे हैं। क्योंकि उन्होंने भूख ही नहीं, भूखमरी देखी है। जो पेट पर कपड़ा बाँधकर सोए हैं, ताकि किसी क़दर नींद आ जाए। हम वहाँ से आ रहे हैं। और ये बहुत पीछे की बात नहीं है, तीन-चार पीढ़ी पीछे की ही बात है।
अच्छा, आप सब यहाँ बैठे हुए हो दिल्ली में। बहुत सारे आप आईआईटीयन भी हो, बाक़ी लोग भी बहुत सारे दिल्ली के ही रहने वाले होंगे। आप में से कितने लोग हैं, जो तीन-चार पीढ़ी पहले ही गाँव में रहते थे? तीन-चार पीढ़ियाँ पीछे जो गाँव से आ रहे हैं। ये लोग सब के सार। ये हम हैं। हमें उस ग्रामीण भुखमरी से निकले बहुत समय अभी नहीं हुआ है। हम वहाँ से बाहर निकल आए हैं, लेकिन वो भूख हमसे बाहर नहीं निकली है। हम आज भी भूखे हैं। और हम आज भी डरे हुए हैं, बहुत डरे हुए हैं। क्योंकि अंग्रेज़ों ने तो दो-ढाई सौ साल की ग़रीबी दी, उस ग़रीबी से भी कहीं पुरानी हमारी ग़ुलामी है।
तो भूख अगर हमारी दो सौ साल पुरानी है, तो डर हमारा एक हज़ार साल पुराना है। भारतीय, आम मध्यमवर्गीय भारतीय, भूखा भी है और डरा हुआ भी है और ये डर वो सीधे-सीधे अपने बच्चों को विरासत में दे देता है। बच्चा न भी डर रहा हो, तो उसको पकड़ के डराता है। बच्चा नहीं डर रहा हो, तो माँ डर जाती है कि अगर ये डरेगा नहीं, तो जिएगा कैसे? तू डरना सीख, तू दबना सीख। तू वही सब कुछ करना सीख, जो हर कोई और करता है।
हाइडेगर वापस आ गए न? आ गए न? दस मैन, जो सब लोग करते हैं। वो जो हिंदी में मुहावरा चलता है कि वो काम करो जो चार लोग करते हैं। तो हिंदी में हम बोल देते हैं कि भैया, चार लोगों को देख के काम करा जाता है। हाइडेगर ने उसको कहा था, कि दैट वन फेसलेस, एनॉनिमस मैन; जिसका आप नाम भी नहीं जानते, पर आप बिल्कुल उसी का अनुकरण करना चाहते हो। हम वैसे ही जी रहे हैं।
हमारे राष्ट्रीय मान को थोड़ा धक्का लगेगा, लेकिन मुझे कह लेने दीजिए, इंडियंस आर अमंग द लीस्ट क्रिएटिव पीपल इन द वर्ल्ड। क्योंकि क्रिएटिविटी और डर एक साथ नहीं चल सकते।
हम जब विदेशों में भी जाते हैं, जो हम सक्सेस स्टोरीज़ वग़ैरह बताते हैं न आईआईटी की, कि विदेश में गए उसको ये मिल गया, वो मिल गया, वो भी ज़्यादातर ऑपरेशनल रोल्स हैं। वो भी ज़्यादातर मैनेजेरियल रोल्स हैं। वो भी ज़्यादातर रोल्स हैं, जिनमें स्टेटस क्वो को बनाए रखने का काम भारतीय लोग अच्छे से कर लेते हैं। मालिक ने बता दिया, ये सिस्टम है, बेटा, ऐसे ही चलना चाहिए। आप कर लोगे। मालिक ने बता दिया, बेटा, ये कोड है, इसको इस तरीके से लिखना है। टॉप-लेवल डिज़ाइन पहले ही बनाया जा चुका है, अब जाकर के कोडिंग कर दो, वो कर देगा। पर कोई डिसरप्टिव इनोवेशन करने में भारतीय विदेशों में भी नहीं कहीं आते।
क्योंकि भले ही वो भारत से निकल गए हों, पर भारत की भुखमरी उनके भीतर से नहीं निकली भले वो अमेरिका पहुँच गए हों। वो अमेरिका पहुँच के भी डिसरप्टिव नहीं हो पाते हैं। और उसका वैसे एक सुपरिणाम भी हुआ है। सुपरिणाम ये हुआ है कि भारतीय जहाँ भी जाते हैं, मॉडल सिटिज़न्स माने जाते हैं, आदर्श नागरिक। पूछो क्यों? क्योंकि कुछ भी डिसरप्ट नहीं करते। क्योंकि जहाँ भी जाते हैं, बस कहते हैं, बताओ, बताओ, कैसे जीना है। आप जो बोलोगे (हाथ जोड़ते हुए)।
तो हाल तक दुनिया के सब देश भारतीयों को बड़े प्यार से बुला लेते थे, कि आ जाओ, इनको बुला लो। ये बिल्कुल गाय, जो बोलोगे करेगा, आवाज़ नहीं उठाएगा; जो नियम बनाओगे, सब नियम-कायदों का पालन करेगा। मुझे मालूम है, मैं थोड़ा सा कैरिकेचर जैसा कुछ बना रहा हूँ। मुझे मालूम है कि नुआंसेज़ इससे अलग हो सकती हैं। पर मोटे तौर पर जो मैं बात बोल रहा हूँ, वो बिल्कुल निशाने पर है, उसको समझिए।
हम बहुत डरे हुए हैं, हम कुछ नया नहीं कर सकते। हमें अगर किसी ने बता दिया कि आईआईटी आकर के आपका बच्चा अब बेरोज़गार नहीं मरेगा, तो हम उसकी जान के पीछे पड़ जाएँगे कि घुसेड़ो इसको आईआईटी में। और ये बात शायद आज से तीस साल-चालीस साल पहले थोड़ी सी वैध भी रही हो, क्योंकि तब दुनिया में, भारत में रोज़गार के इतने अलग-अलग साधन नहीं थे। इतनी शाखाएँ नहीं थीं। आज तो ऐसा कुछ है भी नहीं, बिल्कुल ऐसा कुछ नहीं है। आप जिस भी क्षेत्र में चाहो, अच्छे से कमा-खा सकते हो। कोई समस्या नहीं आएगी।
और साथ ही साथ एक चीज़ और हुई है। आईआईटी में 20,000 सीटें कर दी हैं। तो इसका मतलब ये है कि आईआईटी आकर भी आप कमा-खा लोगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। मैं जब घुसा था, तो 2000 सीटें थीं। 2000 सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा होती थी। अब 20,000 सीटें हैं। मैं जब घुसा था, तो पाँच आईआईटी थीं। अब 23 आईआईटी हैं। ये पक्का है न कि जहाँ 20,000 लोग एंट्रेंस ले रहे हैं, वहाँ सब के सब तो कुछ नहीं फन्ने-खाँ निकल जाएँगे। बहुत होते हैं 20,000म
पर आज भी यही है, “घुस, घुस।* चार-चार साल कोचिंग कर। और कोचिंग वाले कुछ हज़ारों में नहीं, लाखों में भी नहीं, बिग लैक्स में वसूलते हैं, बिग लैक्स में। चाहे वो आईआईटी की कोचिंग हो, यूपीएससी की कोचिंग हो। और कितनी सारी और कोचिंग चलती हैं न सरकारी नौकरियों की। जो आपकी स्टेट सर्विसेज़ होती हैं, और बैंकिंग सर्विसेज़, और सब कुछ ये जो भी है। कैट, आईआईएम, कैट होता है।
जिस भी चीज़ की कोचिंग हो, वो अब ऐसा नहीं होता कि आपका दस, बीस, पचास हज़ार में काम हो जाएगा। पाँच लाख, दस लाख। और शायद कुछ सक्सेस-गारंटी प्रोग्राम्स होते हैं, जो बीस-चालीस लाख भी माँगते हैं। कहते हैं, इतना पैसा दे दो, तो निश्चित रूप से हम तुम्हारे लड़के को घुसेड़ देंगे अंदर। लड़का जानबूझ के बोल रहा हूँ, लड़की के लिए कोई चालीस लाख नहीं देता। देता है, दहेज में देता है।
ये सब अभी गेट से बाहर चल रहा है, अभी तो गेट के अंदर भी नहीं आया। और आप कह रहे हैं कि स्ट्रेस गेट के अंदर होता है। ये सब तो गेट के बाहर चल रहा है, और उसके पैदा होने से चल रहा है। अब क्या करें? वो डर, वो खौफ़ हमारे चेहरे, हमारी आँखों से निकल ही नहीं रहा। हम सिर्फ़ ये (हाथ जोड़ना) करना जानते हैं, सबके सामने बस ये करना है; कोई मिल जाए, उसके सामने रीढ़ झुका दो और हाथ ऐसे जोड़ के खड़े हो जाओ। कोई भी हो, चाहे वो तुम्हारे यहाँ प्रचलित कोई स्थानीय स्तर का कुल देवता हो, और चाहे प्लेसमेंट में आ रही कोई कंपनी हो, फ़र्क़ नहीं पड़ता। सबके सामने हम बस क्या करना जानते हैं?
बहुत भारी बूट के तले रौंदा गया ये राष्ट्र, और उसकी पीड़ा से अभी भी उभर नहीं पा रहा। कहानी बहुत पीछे से शुरू हुई है। कहानी वहाँ से शुरू हुई है, जहाँ से धर्म को विकृत करके लोकधर्म बनाया गया। उस विकृति की वजह से भारत को हर क्षेत्र में पराभव और पराजय झेलनी पड़ी। वही पराभव, वही पराजय फिर भूख बन गए, महामारी बन गए, अकाल बन गए। और वही भूख, वही हार, वही चोट आज एक-एक अभिभावक, एक-एक माँ की छाती में बैठी हुई है। और वो कहते हैं, अपने बच्चे को किसी तरह बचाना है, उसको बचाने के लिए उसको आईआईटी भेज दो न।
ये जो कोचिंग नाम का फिनॉमिना है, ये भारत जैसा दुनिया के किसी देश में नहीं होता। दूसरे देशों में भी होता है। उसको टेस्ट प्रेप इंडस्ट्री बोलते हैं। क्या बोलते हैं? टेस्ट प्रेप इंडस्ट्री। उसका एक साधारण सा आकार होता है, वो एक साधारण, फ़ॉर्मल सी चीज़ होती है। पर भारत में जो हो रहा है, ये यूनिक है। ये फ़िनोमिनल है। और जिस शहर में पिछड़ापन और बेरोज़गारी जितनी ज़्यादा होती है, वहाँ आप उतनी ज़्यादा कोचिंग की होल्डिंग्स पाएँगे।
मैं कोचिंग को ज़िम्मेदार बिल्कुल नहीं ठहरा रहा हूँ। कोचिंग फ़ंडामेंटल नहीं है। अगर ये जो बीमारी है, इस बीमारी में फ़ंडामेंटल कोचिंग नहीं है। इस बीमारी में जो फ़ंडामेंटल है, वो इतिहास है। वो बहुत पीछे तक जाता है। लेकिन क्या इतिहास की बात करके हम इस बीमारी को जस्टिफ़ाई कर सकते हैं? पूछ रहा हूँ, बोलो। हम क्या ये कह सकते हैं, हम क्या करें? हमारा तो इतिहास ही बेचारगी का है, तो इस कारण हम डरते हैं अपने बच्चों के लिए। बोलो, कर सकते हैं क्या? इतिहास जो होगा, सो होगा। हम आज क्यों इतने अजीब तरीके से व्यवहार कर रहे हैं? इतिहास तो वो है न जो बीत गया। तो जो बीत गया, वो बीतने क्यों नहीं देते? उसको पकड़कर ढो क्यों रहे हैं?
जेनेटिकली जो भारत में बच्चा पैदा होता है, वो इनफ़ीरियर है क्या? वो वैसा ही है जैसा कहीं भी कोई और बच्चा पैदा होता है। पर उसके ऊपर चढ़ बैठोगे तो वो दब्बू, कमज़ोर, लालची, अंधविश्वासी, सब बन ही जाएगा। फिर बोलोगे, “हम इंडियंस तो होते ही ऐसे हैं न।” कैसे ऐसे ही होते हैं? बताओ न। जेनेटिकली ऐसे होते हैं? जेनेटिक्स में तो कोई अंतर है ही नहीं। हम अपने बच्चों को दब्बू बनाते हैं। उनके अंदर तनाव डालते हैं, “पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो होगे ख़राब।” सही बात तो ये है कि जिसका पढ़ाई से रिश्ता खेलने का हो गया, वही बड़े-बड़े आविष्कार करता है। पढ़ाई और खेल-कूद दो अलग-अलग चीज़ें हैं ही नहीं। जो पढ़ाई के अंदर खेलने लग गया, वो अब आविष्कारक बन जाता है।
पर हमने विभाजन कर दिया, हमने दो फाड़ बना दिए। “तू खेलने नहीं जाएगा, बिल्कुल।” “तू खेलने नहीं जाएगा, बिल्कुल।” “खेलने नहीं जाएगा।” “तू पढ़ाई कर।” “तू पढ़ाई कर।”
मेरी ज़िंदगी में भी लगभग चार साल का समय ऐसा था जब मैं बिल्कुल नहीं खेला। क्योंकि हवाएँ ऐसी थीं कि दिमाग़ में भी नहीं आता था कि खेला जा सकता है। 10th का बोर्ड है, 12th का बोर्ड है और जेई एंट्रेंस है, ये टाइम खेलने का थोड़ी है। और मेरी फ़ितरत स्पोर्ट्स पर्सन की है। बिल्कुल हो सकता है कि मैं खेला होता, तो मैं शायद किसी खेल में निकल गया होता। हाथ में माइक की जगह रैकेट होता। पता नहीं अच्छा होता, बुरा होता, अच्छा-बुरा का फ़ैसला करने वाले हम कौन होते हैं अब, पीछे की बात। लेकिन एक कन्वेयर बेल्ट है, उस पर आप डले हुए हो और उस पर आपको चलना है। कोई जानने-पूछने वाला नहीं है कि तुम्हारे भीतर उस पर चलने वाली प्रकृति है भी कि नहीं है।
अब बाहरी प्रतिस्पर्धा किसी क़दर झेल करके वो भीतर आ गया। स्कूल की प्रतिस्पर्धा, फिर कोचिंग इंडस्ट्री की प्रतिस्पर्धा झेल करके आ गया भीतर। चलो, आ गए। अब हम गेट के अंदर आ गए हैं। बाहर की अवस्था से भीतर की अवस्था में आ गए हैं। उसने राहत की साँस ली, फाइनली, आइ हैव अराइव्ड। मैं कोई हूँ। मेरी इतनी जेई रैंक है और मैं स्कूल का टॉपर वग़ैरह हूँ, जो भी हूँ, व्हाटएवर। अब वो यहाँ अंदर आता है, अपने डिपार्टमेंट में जाता है। डिपार्टमेंट में दो सौ चालीस लोग हैं। मेरे समय में साठ ही हुआ करते थे। अब कितने हैं? दो सौ चालीस। और दो सौ चालीस के दो सौ चालीस उसी के जैसे हैं। समझ में आ रही है बात?
दुबे जी से वो जीतकर आ गया क्योंकि वो चौबे जी है। यहाँ भीतर आता है तो पाता है कि यहाँ जितने हैं सब छब्बे जी हैं। उसको पहले इसी बात का बहुत स्ट्रेस होता था कि ये जो कोचिंग वाले हैं, इनसे कैसे कम्पीट करूँ? जो जनरल क्राउड है, उससे कैसे कम्पीट करूँ? टॉप वन परसेंटाइल में कैसे आऊँ? जेई कैसे *क्वालिफ़ाई *करूँ? इसी बात का उसको बड़ा भारी स्ट्रेस था और इतना भारी स्ट्रेस था कि सुसाइड्स हो जाती हैं। तो ये जो टॉप वन परसेंटाइलर है, बाहर किससे कम्पीट कर रहा था? जो बाक़ी 99% थे। अब भीतर आया है, तो ये जो 1% वाला है अब ये किससे कम्पीट कर रहा है? जो बाक़ी 1% वाले हैं।
अब ये बैठ जाता है, अब ये ध्वस्त हो जाता है। आसमान से गिरे, खजूर में अटके। क्योंकि अगर दो सौ चालीस लोग हैं किसी डिपार्टमेंट में, तो दो सौ चालीस के दो सौ चालीस अल्ट्रा-कम्पीटिटिव हैं। बहुत सारी इंटेलेक्चुअल बाधाएँ पार करके यहाँ पर आए हैं, आए हैं न? लेकिन अगर दो सौ चालीस लोगों का डिपार्टमेंट है, तो उसमें किसी की तो रैंक दो सौ चालीस भी होगी न, होनी पड़ेगी। और भीतर का जो सिस्टम है वो रूथलेस है। वो बात-बात में रैंकिंग निकाल देता है। निकल गई रैंकिंग और बाहर से अंदर घुसे थे कि “मैं तो कुछ हूँ। मैंने ये कर दिया, मैंने वो कर दिया। मेरी इतनी जेई रैंक है।” और ये डिपार्टमेंटल लिस्ट लगी और इसमें तुम्हारा नाम कहाँ पर है? दो सौ चालीसवें नंबर पर, कोलैप्स।
दो सौ चालीस तो एक है, यहाँ पर जो सौ के बाद होगा, वो भी रो पड़ेगा। क्योंकि उसने कभी सोचा नहीं होगा कि किसी भी लिस्ट में उसका नाम इतना नीचे आएगा। कभी नहीं सोचा होगा। क्योंकि अब ये जो डिपार्टमेंट है, उसके लिए क्लासरूम की तरह है। क्लास में तो हमेशा फ़र्स्ट आता था, सेकंड आता था, इतना ही रहता था उसका। अब यहाँ पर आ रहा है, तो उसका नाम सबसे नीचे या बीच में कहीं है। बीच में है, वो तो भी रोएगा कि मेरा नाम बीच में क्यों आ रहा है। अब ये यहाँ का सिस्टम है। फिर चूँकि सब के सब एक ही मिट्टी से उठकर आ रहे हैं। हमारा कोई इंटरनेशनल कम्पोज़िशन तो है नहीं।
जैसे विदेशी यूनिवर्सिटीज़ होती हैं उनमें बहुत डायवर्स मिक्सिंग होती है। अलग-अलग नेशनलिटीज़ होती हैं, बैकग्राउंड्स होते हैं। और अगर पोस्ट-ग्रेजुएट प्रोग्राम्स हैं, तो उसमें अलग-अलग उम्र के लोग भी होते हैं। यहाँ पर क्या होता है? सब एक ही जैसी इकोनॉमिक और साइकोलॉजिकल बैकग्राउंड से उठकर आ जाते हैं। जो एक की कंडीशनिंग है, वही दूसरे की है। और जो आपकी कंडीशनिंग है, वही आपके सीनियर बैच की है। और उनकी, उनसे *सीनियर, उनकी, उनसे सीनियर। ले-दे-के फिर से हम हिस्ट्री में पहुँच गए।
तो जो संदेश आता है, वो यही आता है, “भाई, जान लगा दे, देख ले। यही चार साल हैं, तूने फोड़ दिया तो फोड़ दिया। लाइफ़ सेट हो जाएगी, यही चार साल हैं।” अब वो चार साल में फोड़ने निकलता है। कितनी भी जान लगा ले, दो सौ चालीस की लिस्ट में कुछ पक्का नहीं है उसका नाम कहाँ पर आएगा। कुछ पक्का नहीं है। क्योंकि ये दो सौ चालीस के दो सौ चालीस पुराने शिकारी हैं। अब वो क्या करेगा? वो क्या करेगा?
फिर वो जितना ज़्यादा* कम्पीटिटिव* होना चाहेगा, वो उतना ही ज़्यादा को-करिकुलर्स को इग्नोर करेगा। और को-करिकुलर्स के लिए बहुत व्यवस्था है। खेलने के मैदान हैं, बहुत अच्छा कैंपस है। पर आप जितना उस पर प्रेशर बनाओगे परफ़ॉर्मेंस और प्लेसमेंट का, वो को-करिकुलर से उतना ही दूर होता जाएगा। कई बार तो यहाँ तक होता है कि एक ही परिवार है, दो भाई हैं। मेरे भी बैच में था, मैंने देखा हुआ है। जो बड़ा भाई है, वो हाई अचीवर है।
कंप्यूटर साइंस में है, किसी प्रीवियस बैच का है और अच्छी स्कॉलरशिप लेकर किसी यूएस यूनिवर्सिटी में पहुँच गया है। और ये कर रहा है, वो कर रहा है। और फिर छोटा भाई है वो थोड़ा मस्त-मलंग है वो आया है और उस पर पीयर प्रेशर क्या बनेगा, उस पर तो फ़ैमिली प्रेशर बन रहा है। कि तू, तेरा भाई तो जब था, तो उसके फ़र्स्ट सेमेस्टर में इतनी आई थी, एसजीपीए। तेरी कितनी आई है? तेरा भाई इतना बड़ा पैकेज ले निकला है, तू क्या कर रहा है? तेरा तो डिपार्टमेंट भी नीचे वाला है, तू क्या कर रहा है? तू बेकार है बिल्कुल।
समझ में आ रही है बात?
हम चाहते हैं कि हम बाहरी-भीतरी व्यवस्थाएँ वैसे ही रखते हुए सारा दोष स्टूडेंट में निकाल दें। हम ये नहीं कहते कि दोषी है, पर हम ऐसे कहते हैं कि द प्रॉब्लम इज़ इन द स्टूडेंट, एंड द स्टूडेंट इज़ प्रॉब्लम्ड। ऐसे कह देते हैं।
स्टूडेंट एक क्लोज़्ड सिस्टम नहीं है न। स्टूडेंट एक ओपन सिस्टम है, इंटरैक्टिंग कंटिन्युअसली विद द यूनिवर्स। और उसका यूनिवर्स भी बड़ा लोकलाइज़्ड है, बेचारे का। यूनिवर्स उसका क्या होता है? फोन पर पाँच-छह उसके नंबर हैं वही यूनिवर्स है उसका। मम्मी का नंबर, पापा का नंबर, बड़े भैया का नंबर, इसका नंबर, उसका नंबर, यही उसका यूनिवर्स है। और साथ में जो पीयर ग्रुप है, यही उसका यूनिवर्स है। बात आ रही है समझ में?
साइकोलॉजिकली ये बात गलत है, वो तो अपनी जगह ही है। इस तरह के व्यवहार का अब कोई इकोनॉमिक रेशनल भी नहीं है। आईआईटी में घुसना कोई उतनी बड़ी बात रह गई है ना उतना ज़रूरी रह गया है ढंग की ज़िंदगी जीने के लिए, कमाने-खाने के लिए। कहीं भी घुसना ज़रूरी नहीं है। मूल सिद्धांत ये है, एकदम फ़ंडामेंटल प्रिंसिपल, कि अगर तुम सचमुच कुछ ऐसा कर रहे हो जो क्रिएटिव है, तो उससे तुम्हें ही नहीं, दूसरों को भी फ़ायदा होगा। क्योंकि क्रिएटिविटी सबके दिल को अच्छी लगती है। और अगर दूसरों को फ़ायदा होगा, तो दूसरे तुम्हें कुछ पैसे भी दे देंगे, तू भूखा नहीं मरेगा। क्रिएटिव होकर कोई भूखा नहीं मरता। आ रही है बात समझ में?
जब तक कैंपस के भीतर एकेडमिक परफ़ॉर्मेंस को ही जो प्राइम वेटेज दी जाती है, उसको डिफ़्यूज़ नहीं करेंगे, तब तक स्ट्रेस बना रहेगा। जब तक हम इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का मतलब ये सोचते रहेंगे कि यहाँ टेक्नोलॉजी ही पढ़ाई जाएगी, तब तक ये टेंशन बना रहेगा।
सेकंड स्पेशलाइज़ेशन क्यों नहीं हो सकती? डबल मेजरिंग क्यों नहीं हो सकती? किसी बच्चे को उसके दिल की नहीं सुनने दी गई, उस पर दबाव डाला गया। उस दबाव के चलते वो जेई क्लियर करके किसी क़दर कैंपस में आ भी गया। तो अब कैंपस उसको दिली ज़िंदगी जीने का दोबारा मौका क्यों नहीं देता? कैंपस क्यों नहीं बोलता कि ठीक है यार, तू सिविल इंजीनियरिंग और सोशियोलॉजी दोनों में पैरेलल मेजर कर सकता है, कर ले। अब उसका टेंशन डिफ़्यूज़ होगा न?
और आईआईटी जैसे संस्थान निश्चित रूप से ये कर सकते हैं। या डबल मेजर नहीं हो सकता, तो कम से कम माइनर स्पेशलाइज़ेशन दे दो। लगभग 180-190 क्रेडिट होते हैं, जो आपको चार साल में बी.टेक प्रोग्राम में करने होते हैं। हम क्यों नहीं उसमें से 40-50 क्रेडिट आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज़ को डिवोट कर सकते? या क्रेडिट बढ़ा दो, 20 क्रेडिट बढ़ा दो। लेकिन 20 क्रेडिट बढ़ाने के बाद, 50 क्रेडिट कुल मिलाकर के; अभी हम 16 क्रेडिट देते हैं ऑप्शनल ह्यूमैनिटीज़ कोर्सेज़ होते हैं। चार सेमेस्टर्स में होते हैं चार-चार क्रेडिट के। 16 क्रेडिट देते हैं। इस 16 को बढ़ाकर 40 या 50 कर दो। फिर देखो कैंपस में स्ट्रेस लेवल कितना कम होता है।
और स्टूडेंट्स को चॉइस के द्वारा एम्पावर करो, कि वो एक वाइड वैरायटी में से अपने लिए ऑप्शनल कोर्सेज़ चुन सकें। *हिस्ट्री, फ़िलॉसफ़ी, साइकोलॉजी, * जो कुछ भी दुनिया में होता है। क्योंकि इनोवेशन के फ़्रंटियर अक्सर इंटरसेक्शनल होते हैं। वो ऐसी जगह होगी, उदाहरण के लिए, जहाँ न्यूरोसाइंस मैकेनिकल इंजीनियरिंग से मिल रही होगी। जहाँ न्यूरोसाइंस मैकेनिकल इंजीनियरिंग से इंटरसेक्ट कर रही होगी, उस जगह पर एक ज़बरदस्त इनोवेशन होगा। उदाहरण के लिए, आपको एक आर्टिफ़िशियल आर्म बनानी है, तो उसके लिए आपको मैकेनिकल इंजीनियरिंग चाहिए और न्यूरोसाइंस चाहिए। क्यों नहीं हम ऐसे स्टूडेंट्स पैदा कर सकते जो मैकेनिकल इंजीनियर है, जिन्होंने माइनर कर रखा है न्यूरोसाइंस में?
देश की हालत ख़राब है क्योंकि लोग भीतर से उथले होते जा रहे हैं। हम अलग-अलग तरह की फ़िलॉसफ़ीज़ के ऑप्शंस क्यों नहीं दे सकते स्टूडेंट्स को पढ़ने के लिए? हम टेंशन की बात कर रहे हैं, टेंशन साइकोलॉजी के दायरे में आता है। हम कैंपस के भीतर साइकोलॉजी के कोर्सेस ही क्यों नहीं फ़्लोट कर देते? यही कमी देख कर 2006 में अद्वैत लाइफ़ एजुकेशन शुरू करी थी मैंने। और वो करिकुलम बनाकर के जितने ज़्यादा इंस्टिट्यूट्स हो सकते थे, उनके पास गया था ये कहकर कि आप जो भी पढ़ा रहे हैं, उसमें ये नहीं है, मुझे पढ़ाने दो।
IIT दिल्ली में भी मुझे मौका मिला था, 2011–12 में। दो सेमेस्टर तक पढ़ाया, उसके बाद वो चीज़ बंद हो गई। और जो मैं बात कह रहा था, उससे कोई इंस्टिट्यूशन इंकार नहीं कर पाता था। हाँ, उनको समझ में आ जाता था कि ये चीज़ अगर हम नहीं पढ़ा रहे हैं, तो कमी रह जा रही है, बड़ी कमी, अ बिग होल। लेकिन फिर कभी लॉजिस्टिक्स आड़े आ जाता था, कभी कंसेंसस आड़े आ जाता था। कभी अलग-अलग स्टेकहोल्डर कंस्टीट्यूएंसीज़ आड़े आ जाती थीं, पेरेंट्स ऐसा कह रहे हैं। ये ऐसा कह रहा है, डिपार्टमेंट्स कह रहे हैं टाइम कहाँ से निकाले? वी आर ऑलरेडी चोक्ड। बाहर की व्यवस्था हम नहीं भी बदल सकते, तो भीतर तो हम उसको कह सकते हैं न कि तू यहाँ आ गया है। जैसे भी आया है, नाउ रिलैक्स एंड ब्रीद। खुलकर साँस ले।
हम स्पोर्ट्स में भी क्रेडिट्स क्यों नहीं दे सकते? पूछ रहा हूँ। कोई अगर अलग-अलग तरह की कम्पटीशन्स हैं, उनमें वो सचमुच परफ़ॉर्म करके दिखा देता है कि मैं कर सकता हूँ। मान लीजिए, इंटर-IIT में इंटर-IIT स्पोर्ट्स मीट्स होती हैं, उसको इस बात के लिए भी क्रेडिट्स क्यों नहीं मिल सकते? ड्रामेटिक्स, इलोक्यूशन क्यों नहीं उसको इस बात के क्रेडिट्स दिए जा सकते इस बात के? हाउ कैन यू हैव टेक्नोलॉजी विदाउट एम्पावरिंग द यूज़र ऑफ द टेक्नोलॉजी?
मैं भी चार साल कैंपस में था, लठ गाड़ दिया था कि जहाँ कहीं भी को-करिकुलर्स कुछ भी हो रहा होगा जाऊँगा ज़रूर, लेकिन मुझे फिर क्लास मिस करके जाना पड़ता था, सिस्टम के ख़िलाफ़ जाकर जाना पड़ता था। डिबेटिंग, एक्सटेंपोर, ड्रामेटिक्स, पोएट्री हर चीज़ में जाकर के हिस्सा लिया, लेकिन फिर उसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ी। कि आप वहाँ पर सब कुछ करके आओ, रात में देर से आओ, और उसके बाद कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं है। सिस्टम इस बात को एक्नॉलेज ही नहीं कर रहा है कि इस लड़के ने जेन्युइनली अपना क्रिएटिव टाइम कहीं पर लगाया है। सिस्टम के लिए मैं एक एब्सेंटी हूँ, कि ये तो क्लास छोड़कर कहीं और ग़ायब था।
और अगर मैं बाहर जाकर वो सब नहीं कर रहा होता, जो मैंने यहाँ के चार सालों में किया, तो शायद जैसे मैं आपके सामने अभी माइक लेकर खड़ा हूँ, वैसे खड़ा भी नहीं रह पाता। इतना महत्त्व होता है होलिस्टिक एजुकेशन का, डायवर्सिफ़ाइड लर्निंग का। समझ में आ रही है बात?
इतना स्ट्रेस विदेशी कैंपसेज़ में देखने को नहीं मिलता, क्योंकि न वहाँ पेरेंट्स कह रहे होते हैं कि तू भूखा मरेगा इसलिए बी.टेक कर, और न वहाँ कैंपस आपको एक यूनिडायरेक्शनल फ़्लो में पुश कर रहा है। एक जो बहुत बड़ा अंतर होता है इंडियन प्रीमियर इंस्टिट्यूशंस और बाहर होता है द शियर नंबर ऑफ इलेक्टिव ऑप्शन्स। वहाँ आप सब कुछ चुनते ही हो। कुछ कोर कोर्सेस हैं, उसके अलावा सब आप चुनते हो। और सैकड़ों कोर्सेज होते हैं। इसमें से ये चुनना, ये चुनो; ये चुनना, अपने हिसाब से अपना पोर्टफ़ोलियो बना लो, जो तुम पढ़ना चाहते हो। “तुम बताओ, तुम क्या पढ़ना चाहते हो? कर लो एनरोल।” ज़ाहिर है कि अब स्ट्रेस लेवल्स कम रहेंगे।
सुनने में बहुत दूर की बात लगेगी। पर मैं पूछ रहा हूँ, हमारे जो डांस फ़ॉर्म्स हैं, क्या वे लर्निंग में नहीं आते हैं? एक-दो क्रेडिट का कोर्स इसी बात का क्यों नहीं हो सकता? कि ज़िंदगी भर तो वो रट्टा ही मारता रहा, बोर्ड की तैयारी करता रहा, जेईई की तैयारी करता रहा। अब वो यहाँ आया है, तो उसको जी लेने दो। वो कुछ सीखना चाहता है, कथक, कुचिपुड़ी, साल्सा, कुछ भी। वो भी एक कोर्स है कैंपस के अंदर, क्यों नहीं हो सकता ये? म्यूज़िक के ऑप्शनल्स क्यों नहीं हो सकते?
यूनिवर्सिटी का और क्या मतलब होता है? विश्वविद्यालय का और क्या मतलब होता है? हम भी डीम्ड यूनिवर्सिटी हैं, तो विश्वविद्यालय का क्या मतलब होता है? होलिस्टिक एजुकेशन। पूरी दुनिया के छात्रों का स्वागत है और पूरी दुनिया के विषय यहाँ पढ़ाए जाएँगे। तब हम कहते हैं, विश्वविद्यालय। फ़ॉरेन लैंग्वेज़ेस के कोर्सेस क्यों नहीं हो सकते? और मुझे पता है कि कुछ हद तक उस दिशा में प्रयास हो भी रहा है। जितने डायवर्स ऑप्शंस हमें उपलब्ध थे, आज के स्टूडेंट्स को उससे कहीं ज़्यादा उपलब्ध हैं। लेकिन फिर भी अगर स्ट्रेस लेवल्स हैं, तो इसका मतलब है कि बहुत कुछ और किया जाना बाक़ी है।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: ये तमन्ना लेकर के मैं चला ही जाऊँगा। लेकिन चाहता यही था कि एक ऐसी जगह हो, जिसको एक कोण से देखो तो कहो मंदिर है, और दूसरे कोण से देखो तो कहो विश्वविद्यालय है। बनाना चाहता था। ताली की कोई बात नहीं है। अफ़सोस की बात है क्योंकि कभी बनेगा नहीं। नहीं हो पाएगा।
श्रोता: क्यों?
आचार्य प्रशांत: पूछ रहे हैं क्यों? छोड़ो।
सोचो, कैसा-कैसा होता वो संस्थान, कुछ नाम देते उसको, “अद्वैत संस्थान।” जहाँ आप सुबह कंप्यूटर साइंस पढ़ रहे हो और शाम को उपनिषद्। सोचो, कैसा होता। वही बनाना चाहता था। बनेगा नहीं, शायद।