गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।
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प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी, जैसे रमन महर्षि जी ने कहा है, “यू आर नॉट द डूअर,” और आपने भी अपने वीडियोज़ में कहा है, “कर्ता स्वयं मूल झूठ है।” और ये सब चीज़ें जो हो रही हैं, या तो उनका कोई कारण नहीं है या आप कहना चाहें कि उसको इतने अनगिनत कारण हैं एक विशाल तंत्र जिसमें बहुत सारी घटनाओं की वजह से कोई कर्म हो रहा है। और ओशो जी ने भी अपने एक वीडियो में कहा है, कि जो चीज़ें होती हैं वो स्वतः होती हैं और आप चाहिए तो इसके लिए अपना जीवन की पुरानी घटनाओं को देख सकते हैं।
इसके लिए उन्होंने अपना एक उदाहरण भी दिया है कि उन्होंने अपने प्रोफेसर के घर पर रह के पढ़ाई करी। और फिर उन्होंने कहा था, अगर मुझे फ़र्स्ट आना है तो मैं आ जाऊँगा। इस तरह का उन्होंने एक उदाहरण दिया। और फिर वो चीज़, वो आ गए उन्होंने टॉप किया, ऐसा करके।
और मैं अपने केस में ये चीज़ बोलना चाहूँगा कि जैसे चुनाव को ले के आपने कहा। तो अभी मैं अष्टावक्र गीता का एक ऑडियो सुन रहा था, तीन-चार दिन पहले। उसमें आत्मा को अकर्ता बताया गया। और तो अपने केस में मेरा ऐसा था कि जैसे चुनाव करने का अधिकार, जैसे आपने कहा, तो अंदर से, जैसे जब सही चुनाव होता है तब तो बेहतर महसूस होता है। लेकिन वैसे एक घर्षण-सा रहता है, जैसे आप चाह रहे हैं कि गलत चीज़ न हो और हो गई।




