
प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी, जैसे रमन महर्षि जी ने कहा है, “यू आर नॉट द डूअर,” और आपने भी अपने वीडियोज़ में कहा है, “कर्ता स्वयं मूल झूठ है।” और ये सब चीज़ें जो हो रही हैं, या तो उनका कोई कारण नहीं है या आप कहना चाहें कि उसको इतने अनगिनत कारण हैं एक विशाल तंत्र जिसमें बहुत सारी घटनाओं की वजह से कोई कर्म हो रहा है। और ओशो जी ने भी अपने एक वीडियो में कहा है, कि जो चीज़ें होती हैं वो स्वतः होती हैं और आप चाहिए तो इसके लिए अपना जीवन की पुरानी घटनाओं को देख सकते हैं।
इसके लिए उन्होंने अपना एक उदाहरण भी दिया है कि उन्होंने अपने प्रोफेसर के घर पर रह के पढ़ाई करी। और फिर उन्होंने कहा था, अगर मुझे फ़र्स्ट आना है तो मैं आ जाऊँगा। इस तरह का उन्होंने एक उदाहरण दिया। और फिर वो चीज़, वो आ गए उन्होंने टॉप किया, ऐसा करके।
और मैं अपने केस में ये चीज़ बोलना चाहूँगा कि जैसे चुनाव को ले के आपने कहा। तो अभी मैं अष्टावक्र गीता का एक ऑडियो सुन रहा था, तीन-चार दिन पहले। उसमें आत्मा को अकर्ता बताया गया। और तो अपने केस में मेरा ऐसा था कि जैसे चुनाव करने का अधिकार, जैसे आपने कहा, तो अंदर से, जैसे जब सही चुनाव होता है तब तो बेहतर महसूस होता है। लेकिन वैसे एक घर्षण-सा रहता है, जैसे आप चाह रहे हैं कि गलत चीज़ न हो और हो गई।
मान लीजिए कोई ऐसा हो गया, किसी से कोई गलती हो गई, या कुछ ऐसा हुआ जो चीज़ें बताई गई हैं सही काम के तौर पर, वो चीज़ नहीं हो पाई। तो एक अंदर से उलझन-सी रहती है कि ये चीज़ होनी चाहिए थी, ये चीज़ नहीं हुई।
तो रमन महर्षि जी का एक और मैं ऑडियो सुन रहा था, उसमें उन्होंने कहा कि जैसे आपके अंदर काम है, क्रोध है, ये सब चीज़ें हैं। तो मेरे केस में ये था कि मैं अपने स्तर से चुनाव के तल पर सही चीज़ें करना चाहता था, लेकिन उतने बेहतर फैसले नहीं ले पा रहा था। बहुत और घर्षण की वजह से अंदर एक तरह का ये रहता था कि “ये करो,” होता वो था। “ये चीज़ करो,” लेकिन उसके विपरीत होगी। हो सकता है, शायद मेरी इच्छा कुछ अंदर, भीतरी तल पर कुछ और रहती हो।
तो फिर मैंने अभी इस तरह के घर्षण की वजह से, मैंने ये कहा, रमन महर्षि जी को सुन के, कि मेरे से तो अब नहीं हो पा रहा है। अब अगर मेरे को नहीं पता कि आत्मा के बारे में कुछ कहना भी नहीं चाहता। आपने भी बहुत सारा मना किया कि आत्मा का नाम लेना भी एक तरीके से।
तो वो घर्षण ख़त्म करने की वजह से मैंने ये किया कि अब सही करो तो भी आप करो, गलत करो तो भी आप करो। मैंने अपना चुनाव का अधिकार अपने आप से हटा लिया, क्योंकि अंदर बहुत सारी उलझन रहती थी। लेकिन अब मेरे को ये समझ नहीं आ रहा है। अब उसमें सही चीजें भी होती हैं। बहुत बार सही फैसले भी होते हैं और कभी-कभी गलत फैसले भी होते हैं। बाक़ी चीज़ें कम हुई हैं, गुस्सा वग़ैरह कम हुआ है, सब कुछ कम हुआ है। वो तो आपको जब से सुन रहा हूँ। लेकिन ये जो मैंने चुनाव का अधिकार, ये परेशानी की वजह से अपने ऊपर से हटाया है, ये भागना है या क्या है? मुझे मतलब समझ नहीं आ रहा।
आचार्य प्रशांत: ये अधिकार तो हटाना पड़ता है, पर कर्म चुनने का अधिकार नहीं हटाना होता। कर्मफल भोगने का अधिकार हटाना होता है।
एक चीज़ ये हो सकती है कि करने वाला तो मैं हूँ नहीं, मेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार, पर भोगने वाला तो मैं ही हूँ। तो अब मैं नहीं करूँगा, राम जी करेंगे या रमण महर्षि करेंगे। अब वो करके दे दें, पका के वो दे दें, लेकिन खाने वाला तो मैं ही हूँ अभी भी। ये तो बड़ी मज़ेदार बात हो गई। पहले कम से कम ये कहते थे कि पकाने वाला भी मैं हूँ, खाने वाला भी मैं हूँ, कर्ता भी हूँ, भोक्ता भी हूँ। अब आध्यात्मिक हो गए तो कह रहे हैं, नहीं, पकाएगा कोई और खाऊँगा मैं।
कर्म का अधिकार, चेतना का अधिकार, चुनाव का अधिकार नहीं त्यागा जाता, क्योंकि नहीं त्यागा जा सकता। जिस क्षण तक आप जीवित हो, एक मनुष्य की तरह, आप कैसे अपनी चेतना का स्वभाव त्याग दोगे?
चेतना का काम है चुनना। हाँ, जो चीज़ आप त्याग सकते हो, निश्चित रूप से आप अधिकार त्यागिए, वो झूठा अधिकार है। वो अधिकार भी नहीं है; वो लिप्सा है, वो लालच है, कामना है कि “मैं तो भोगूँगा।”
इतनी बार तो गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, आप लोग कहते ही रहते हैं, क्या? “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” तो उन्होंने बताया है न किस चीज़ पर आपका अधिकार नहीं है और किस पर है। किस पर आपका अधिकार है? “कर्मण्येव,” कर्म पर ही अधिकार है। और किस पर नहीं है, वो भी उन्होंने बता दिया, किस पर नहीं है? फल पर कतई नहीं है, “मा फलेषु कदाचन।”
तो फल छोड़ना होता है, कर्म नहीं छोड़ना। कर्म भी आप किसी और के बताए अगर कर रहे हो, तो ये तो बंधक की स्थिति हो गई, समझिएगा। ज्ञानी की, ध्यानी की, मुक्त की, साधक की, सीधे कह दीजिए एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति ये होती है कि “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा उससे कोई लेना-देना नहीं।” क्योंकि अच्छा हुआ तो भी मुझे कोई अच्छा भोगने की आकांक्षा तो थी नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, अच्छा हो गया। कौन-सा हम उस अच्छे फल के लिए मरे जा रहे थे।
और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। क्योंकि वो जो बुराई हुई है, वो हमें खानी ही नहीं थी। बुरा हो गया तो जो बुराई थी, उसको कोने में रख के आगे बढ़ जाएँगे, भोगने का तो इरादा था ही नहीं न। हमारा काम था सही काम करना। उसका परिणाम जो भी आना था, उस परिणाम को ले के आशा, उम्मीद, भोग की अपेक्षा, भूख हम में थी ही नहीं।
ऐसे कह दीजिए कि पकाने से मतलब था, खाने से मतलब नहीं था। अब पकाया आपने, कुछ बहुत बढ़िया बन गया, बहुत अच्छी बात है। भूख तो ज़्यादा है नहीं बहुत बढ़िया बन गया, थोड़ा-सा खा लेंगे। पकाया आपने बहुत बुरा बन गया, तो भी कोई बात नहीं। वैसे ही कौन-सी बड़ी भूख लगी थी? छोड़ देंगे।
तो अधिकार त्यागना होता है। कौन-सा अधिकार? भोगने का अधिकार। कर्म का अधिकार नहीं त्यागना होता है। वो ख़तरनाक बात हो जाती है कि “मैं तो अब कुछ करता ही नहीं, मेरा तो अब सब जो है वो ऊपर से भगवान करता है।” वो उसमें गड़बड़ी आ जाती है। कर तो आप अभी भी रहे हैं; नाम भगवान का लगा दिया जाता है। ठीक है?
उल्टा कर दीजिए। कहिए, अच्छा, भगवान को अगर मानना ही है तो ऐसे कह दीजिए: “करूँगा मैं, और जो भी आएगा उसका भोग भगवान को लगा दूँगा।” अभी आप कह रहे हैं, करेगा भगवान, और जो आएगा उसका भोग ख़ुद को लगाऊँगा। उसको पलट दीजिए। ठीक है? अब कह दीजिए, करना मुझे है, भोगना भगवान को है। मैं नहीं भोगता।
आपको जो गुस्सा आता था, जो सारी परेशानी होती थी वो कर्म से नहीं होती थी, वो कर्मफल के लालच से होती थी। क्या ये सीधी बात नहीं है? कर्म से किसको समस्या आ जाती है? समस्या आती है उस कर्म के अंजाम से। किसी उद्देश्य से कुछ कर रहे थे, जिस उद्देश्य से कर रहे थे, वो मिला ही नहीं, तो क्या भीतर तड़प उठती है।
अंजाम को छोड़ा जाता है, काम को नहीं। काम तो बिल्कुल दिलो-जान से करिए, टूट कर करिए। अंजाम आ गया जो भी आ गया, ठीक है, देख लेंगे। उसमें से कुछ सीखने लायक होगा तो सीख लेंगे। उसको खाने की उम्मीद ले के तो हम कभी चले ही नहीं थे। तो बहुत कुछ बिगड़ भी गया, तो हमारा क्या चला गया?
गड़बड़ लग रही है बात?
प्रश्नकर्ता: नहीं सही बात है सर।
आचार्य प्रशांत: हम कभी कहते हैं न, कोई काम बड़ा मुश्किल है। काम मुश्किल नहीं होता, कोई काम मुश्किल नहीं होता। क्योंकि आप पर किसी ने ज़िम्मेदारी डाली ही नहीं है काम को सफलतापूर्वक करके दिखाने की। मुश्किल होती है असफलता की आशंका। जब आप कहते हो न, “ये काम तो बड़ा मुश्किल है।” आपके ऊपर तो दायित्व बस प्रयास का था, प्रयास कैसे मुश्किल हो सकता है? किसी चीज़ का प्रयास मुश्किल हो सकता है क्या? जब आप कहते हो “बड़ा मुश्किल काम सामने आ गया,” तो काम नहीं मुश्किल होता।
मुश्किल होता है इस आशंका को स्वीकार करना कि उसमें सफलता नहीं मिलेगी। आप पर सफलता की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। आपकी ज़िम्मेदारी है सही काम का अधिकतम प्रयास करना। बस, ख़त्म। इतनी है गीता। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो। अंजाम की ज़िम्मेदारी आपकी नहीं है। अंजाम की ज़िम्मेदारी आदमी तभी लेता है, जब उसे अंजाम को भोगना होता है। कोई काम मुश्किल नहीं होता, प्रयास कैसे मुश्किल हो सकता है?
काम करके नहीं दिखाना होता। कहते हैं न, “जा।” काम नहीं करके दिखाना होता। क्या करके दिखाना होता है? प्रयास करके दिखाना होता है। काम करके कोई दिखाने का कोई कैसे वादा कर सकता है? काम होगा नहीं होगा, हमें क्या पता? काम तो सारे प्रकृति के क्षेत्र में आते हैं, और वहाँ क्या चलता है? संयोग चलता है। तो कोई काम पूरा होगा कि नहीं होगा, खाना बनते-बनते जल नहीं जाएगा, इन सब की कोई गारंटी नहीं होती।
तो काम नहीं करके दिखाना है, प्रयास करके दिखाना है। कुल उतनी हमारी ज़िम्मेदारी है, बस। उससे अधिक जो ज़िम्मेदारी लेता है, वो अनधिकृत क्षेत्र में चेष्टा कर रहा है। वो प्रकृति की रैंडमनेस को व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहा है। प्रकृति ने तय कर रखा है कि उसे कैसे चलना है, रैंडमली चलना है, कि गति आदृच्छिक कही गई है, रैंडम।
और आप आए हो कहने कि नहीं, मैं यहाँ पर कार्य-कारण लगा दूँगा। कॉज़-इफ़ेक्ट लगा दूँगा। प्रकृति नहीं चलती, भाई, कॉज़-इफ़ेक्ट पर। आप कहते हो, कॉज़ क्या है? मेरा पुरुषार्थ। मैं इतनी मेहनत करूँगा, इतनी मेहनत करूँगा, ये कॉज़ है। और इफ़ेक्ट क्या होगा? कि प्रकृति से मैं मनचाहा परिणाम निकाल लूँगा। हम यही तो कहते हैं न?
ये जो कॉज़-इफ़ेक्ट का खेल है, ये प्रकृति में ऐसे नहीं चलता। कि आप कॉज़ बने और वहाँ पर इफ़ेक्ट निकाल दें, ऐसे नहीं हो पाता। आप अधिक से अधिक ये कर सकते हो कि कॉज़ परिपूर्ण रहे। इफ़ेक्ट पर आपका कोई हक़ नहीं है। प्रयास पूरा रहे, बस। और प्रयास पूरा रहा है, तो आपको फिर पूरा अधिकार है सर उठाकर जीने का। वही जीवन की गरिमा है, “मैंने पूरा प्रयास करा।”
हमारा समाज अगर सही होता न, तो वो सम्मानित भी प्रयास करने वालों को करता, सफल लोगों को नहीं।
सफलता क्या है? सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। सफलता में क्या रखा है? महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं।