
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं प्रश्न पूछना चाहती हूँ, अंधविश्वास पर। एक बार मैं थोड़ा-सा डर रही थी और मैं अपनी दादी के कमरे में थी। और उनके कमरे में बहुत सारी भगवान जी की फ़ोटो रखी हुई हैं। और वहाँ पर बहुत पूजा करती हैं वो रोज़, वो एक मंत्र का मतलब पढ़ती हैं। तो फिर एक बार वो मुझसे कह रही थी, कि वहाँ पर एक कवच बना हुआ है कोई भी आत्मा या फिर कुछ और आएगा तो फिर वो जल जाएगा। तो क्या ये सच है?
आचार्य प्रशांत: सच है। लेकिन दादी ने थोड़ी-सी गलती कर दी, उन्होंने भगवान जी को वहाँ रख दिया। अगर वहाँ रखोगे तो कवच भी कहाँ बनेगा? वहीं बनेगा। अब आप तो दूर आ गए, कवच वहीं रह गया तो आप फँस गए। अगर कवच वहाँ बनता है जहाँ भगवान जी रहते हैं, तो भगवान जी को अगर सिर्फ़ कमरे में रख दोगे या घर के मंदिर में रख दोगे, तो कवच भी कहाँ बनेगा?
श्रोता: मंदिर में।
आचार्य प्रशांत: और आप हर समय तो उस कमरे में रह नहीं सकते। देखो अभी आप यहाँ आ गए, और यहाँ भूत–पिशाच बहुत सारे हैं। अब कवच तो है नहीं तुम्हारे पास, तुम फँस गई। वो पीछे से आके, धीरे से ऐसे बाल काट देते हैं। बहुत एक-से-एक हैं। वो देखो, एक वहाँ खड़े हैं वो, उधर देखो (श्रोता की ओर इंगित करते हुए)। एक उधर भी खड़े हुए हैं, वो देखो, काले-काले (काले रंग के कपड़े पहने हुए श्रोता की ओर इंगित करते हुए)। और तुम तो फँस गई।
तो ये तो ठीक है बिल्कुल कि जहाँ भगवान जी रहते हैं, वहाँ कवच तो रहता है, ये बात तो बिल्कुल ठीक है। तो फिर अब क्या करें? क्या करें? भगवान जी को यहाँ (दिल की ओर इंगित करते हैं) रख लें तो कैसा रहेगा फिर? बोलो जल्दी।
प्रश्नकर्ता: सही।
आचार्य प्रशांत: तो यहीं क्यों न रख लें? फिर न ये पूरा जो शरीर है न, यही कवच हो जाता है। अब कोई नहीं छू सकता तुमको।
हरि मरें तो हम मरें, हमरी मरे बलाय। साँचे गुरु का बालका, मरे ना मारा जाय, कबीरा।।
~संत कबीर
यहाँ दिल में बैठा लिया है, मारोगे कैसे? कैसे मारोगे? यहाँ बैठाने का मतलब होता है, भीतर जो मरने से डरता था न, वही मर गया। तो अब कौन मरेगा? वही था जो मर सकता था, वो मर ही गया। भगवान को यहाँ बैठाओ। एक ही भगवान सच्चा है, जो यहाँ रहता है।
जो बाहर रहता है न भगवान, जो आँखों से दिखाई देता है, जिसको तुम कहते हो, ये आँखों से, ये जगह है, ये ऐसा-ऐसा, वो तो तुम्हारा भगवान है। तुम्हारा माने, अहंकार का। तुम उस पर अपने सब पसंद–नापसंद आरोपित कर देते हो। आरोपित करना माने, वैसे ही बना देते हो, प्रक्षेपित कर देते हो। जो तुम्हें पसंद होता है, वो सब गुण तुम उसमें डाल देते हो। उसकी सारी कहानियाँ तुम अपनी सुविधा के हिसाब से बना लेते हो।
लेकिन यहाँ (हृदय की ओर इंगित करते हुए) वाला जो भगवान होता है, वो राजा होता है। उसे तुम अपने हिसाब से नहीं चला सकते, तुम्हें उसके हिसाब से चलना होता है। अब भगवान जी तो सबसे ऊपर होते हैं न, तो बताओ भगवान जी को राजा होना चाहिए या ग़ुलाम?
प्रश्नकर्ता: राजा।
आचार्य प्रशांत: तो यहाँ (दिल की ओर इंगित करते हुए) रखोगे तो भगवान जी राजा हैं। और वहाँ रखोगे तो भगवान जी ग़ुलाम हो गए। भगवान जी इतनी ऊँची बात है, उन्हें कोई ग़ुलाम बनाता है? अच्छे बच्चे तो नहीं बनाते न। तो यहाँ रख के चलो। यहाँ रख के चलोगी तो जहाँ जाओगी, कवच साथ जाएगा। अब कोई कुछ नहीं कर पाएगा। कोई छू के दिखाए तुम्हें। तुम कहना, यहाँ भगवान जी हैं, कुछ नहीं हो सकता हमारा। ठीक है?
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।