जो बाहर रहता है ना भगवान, जो आँखों से दिखाई देता है, जिसको तुम कहते हो, ‘यह जगह है, ये ऐसा-ऐसा;’ वो तो तुम्हारा भगवान है। तुम उस पर अपने सब पसंद–नापसंद आरोपित कर देते हो। उसकी सारी कहानियाँ तुम अपनी सुविधा के हिसाब से बना लेते हो। "हरि मरें तो हम मरें, और हमरी मरे बलाय। साँचे गुरु का बालका, मरे ना मारा जाय, कबीरा।।” यहाँ दिल में बैठा लिया है, यहाँ वाला जो भगवान होता है, वो राजा होता है। उसको तुम अपने हिसाब से नहीं चला सकते। तुम्हें उसके हिसाब से चलना होता है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं प्रश्न पूछना चाहती हूँ, अंधविश्वास पर। एक बार मैं थोड़ा-सा डर रही थी और मैं अपनी दादी के कमरे में थी। और उनके कमरे में बहुत सारी भगवान जी की फ़ोटो रखी हुई हैं। और वहाँ पर बहुत पूजा करती हैं वो रोज़, वो एक मंत्र का मतलब पढ़ती हैं। तो फिर एक बार वो मुझसे कह रही थी, कि वहाँ पर एक कवच बना हुआ है कोई भी आत्मा या फिर कुछ और आएगा तो फिर वो जल जाएगा। तो क्या ये सच है?
आचार्य प्रशांत: सच है। लेकिन दादी ने थोड़ी-सी गलती कर दी, उन्होंने भगवान जी को वहाँ रख दिया। अगर वहाँ रखोगे तो कवच भी कहाँ बनेगा? वहीं बनेगा। अब आप तो दूर आ गए, कवच वहीं रह गया तो आप फँस गए। अगर कवच वहाँ बनता है जहाँ भगवान जी रहते हैं, तो भगवान जी को अगर सिर्फ़ कमरे में रख दोगे या घर के मंदिर में रख दोगे, तो कवच भी कहाँ बनेगा?
श्रोता: मंदिर में।
आचार्य प्रशांत: और आप हर समय तो उस कमरे में रह नहीं सकते। देखो अभी आप यहाँ आ गए, और यहाँ भूत–पिशाच बहुत सारे हैं। अब कवच तो है नहीं तुम्हारे पास, तुम फँस गई। वो पीछे से आके, धीरे से ऐसे बाल काट देते हैं। बहुत एक-से-एक हैं। वो देखो, एक वहाँ खड़े हैं वो, उधर देखो




