Gen Z को बगावत चाहिए — पर भीतर वही पुरानी गुलामी है

PrashantAdvait Foundation

भीड़-आधारित विद्रोह, ऑनलाइन क्रांतियाँ और व्यवस्था-विरोध तब तक सतही बने रहते हैं जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं समझता। समाज की समस्याएँ केवल नेताओं, संस्थाओं या व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि उसी सामूहिक चेतना से पैदा होती हैं जो उन्हें बनाती है। बाहरी बदलाव स्थायी नहीं होते यदि भीतर का दृष्टिकोण वैसा ही रहे। वास्तविक परिवर्तन आत्म-शिक्षा, जिम्मेदारी और स्वयं को देखने के साहस से शुरू होता है, न कि केवल प्रतिक्रियाओं और नारों से।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम के एक सोशल मीडिया पेज को लेकर है। सिर्फ़ दो-तीन दिनों में उस पर बहुत तेजी से फॉलोअर्स बढ़ रहे हैं। बहुत सारे बेरोज़गार युवा इस पेज को सरकार के ख़िलाफ़ एक तरह की क्रांति मानकर फॉलो कर रहे हैं। मेरा प्रश्न है, क्या यह सच में व्यवस्था में कोई बदलाव ला सकता है?
आचार्य प्रशांत: मैंने तो ऐसा नहीं किया है, तो मैं कैसे समझा सकता हूँ कि यह करना अच्छा है या नहीं? अगर ऐसा होता, मैं पहले से ही इस पर काम कर रहा होता। लेकिन तुम बड़े प्रभावित दिख रहे हो। कोई बात नहीं। सड़न की जड़ तक पहुँचना यही समस्या का समाधान कर सकता है। प्रतिक्रियाएँ शायद ही सफल होती हैं। दरअसल,
प्रतिक्रियाएँ उसी ढाँचे से उत्पन्न होती हैं जहाँ समस्या है, सतहीपन ही समस्या है। अगर प्रतिक्रिया भी सतही हो, तो क्या प्रतिक्रिया समाधान बन जाएगी?



