आचार्य प्रशांत कलिंग में युवाओं से संवाद करते हैं। वे कहते हैं कि दर्शन सत्य की खोज है, जो आत्म-अनुसंधान से शुरू होती है। परंपरा सदा से चली आ रही है, बस रूप बदल गया है। विकृत धर्म बाजार बन गया है। युवाओं को अपनी बीमारी पहचानी चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम मन को नियंत्रित कर रहा है। सच्चा शिक्षक वह है जो आपकी झूठी धारणाओं को चुनौती दे।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार। कलिंग की धरती पर आचार्य प्रशांत जी से बात करने का मुझे अवसर मिला। आचार्य जी की भुवनेश्वर आगमन में, कलिंग की धरती पर और कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल में आगमन के दौरान एक इच्छा थी कि उनसे बात संवाद का काम मैं करूँ। आचार्य जी स्वयं बहुत अच्छे प्रवचनकर्ता हैं और व्याख्यान देते हैं; शिक्षक हैं, प्राध्यापक हैं, प्रशिक्षक हैं, प्रखर वक्ता हैं, तो वो स्वयं कुछ कहेंगे। आचार्य जी को संवाद में अभिरुचि है और वो बात करना चाहते हैं।
हमारा आज का विषय जो है, आचार्य जी का जो क्षेत्र है वो बहुविध क्षेत्र है। लगातार देश की युवा पीढ़ी से संवाद करते रहते हैं। और भारत के जितने भी बड़े संस्थान हो सकते हैं, जहाँ सबसे प्रखर बुद्धिमत्ता उपलब्ध होती है, उन्हीं के बीच आप रहते हैं। तो युवाओं के दिल, युवाओं के दिमाग, युवाओं के मानस और उनके सामने जो संघर्ष है, उनके सामने जो भविष्य है, या वो जो पा चुके हैं, उसको लेकर जो उनके मन में कई बार अराजकता होती है; कई बार दुविधा होती है और वो एक तरह के स्वयं के संघर्ष से लड़ रहे हैं वर्तमान समय में आधुनिकता के प्रखर प्रवाह के चलते, तकनीक के प्रवाह के चलते, धन की प्रचुर उपलब्धता के चलते। आचार्य जी, उनके मन में वो शांति हो, वो अपने जीवन के सही उद्देश्य को पा सकें, उसके लिए ये प्रयास कर रहे हैं।
हमारा आज का विषय भारतीय दर्शन, वेद और परंपरा में युवाओं की जो भूमिका है, भागीदारी है, उस पर केंद्रित है। और संयोग की बात है कि आचार्य जी की एक किताब बहुत चर्चा में है, ट्रुथ विदाउट अपॉलजी




