
प्रश्नकर्ता: नमस्कार। कलिंग की धरती पर आचार्य प्रशांत जी से बात करने का मुझे अवसर मिला। आचार्य जी की भुवनेश्वर आगमन में, कलिंग की धरती पर और कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल में आगमन के दौरान एक इच्छा थी कि उनसे बात संवाद का काम मैं करूँ। आचार्य जी स्वयं बहुत अच्छे प्रवचनकर्ता हैं और व्याख्यान देते हैं; शिक्षक हैं, प्राध्यापक हैं, प्रशिक्षक हैं, प्रखर वक्ता हैं, तो वो स्वयं कुछ कहेंगे। आचार्य जी को संवाद में अभिरुचि है और वो बात करना चाहते हैं।
हमारा आज का विषय जो है, आचार्य जी का जो क्षेत्र है वो बहुविध क्षेत्र है। लगातार देश की युवा पीढ़ी से संवाद करते रहते हैं। और भारत के जितने भी बड़े संस्थान हो सकते हैं, जहाँ सबसे प्रखर बुद्धिमत्ता उपलब्ध होती है, उन्हीं के बीच आप रहते हैं। तो युवाओं के दिल, युवाओं के दिमाग, युवाओं के मानस और उनके सामने जो संघर्ष है, उनके सामने जो भविष्य है, या वो जो पा चुके हैं, उसको लेकर जो उनके मन में कई बार अराजकता होती है; कई बार दुविधा होती है और वो एक तरह के स्वयं के संघर्ष से लड़ रहे हैं वर्तमान समय में आधुनिकता के प्रखर प्रवाह के चलते, तकनीक के प्रवाह के चलते, धन की प्रचुर उपलब्धता के चलते। आचार्य जी, उनके मन में वो शांति हो, वो अपने जीवन के सही उद्देश्य को पा सकें, उसके लिए ये प्रयास कर रहे हैं।
हमारा आज का विषय भारतीय दर्शन, वेद और परंपरा में युवाओं की जो भूमिका है, भागीदारी है, उस पर केंद्रित है। और संयोग की बात है कि आचार्य जी की एक किताब बहुत चर्चा में है, ट्रुथ विदाउट अपॉलजी जिसका कवर आप देख रहे हैं।
तो सबसे पहले तो मैं शिकायत के साथ शुरू करूँगा आचार्य जी से कि इनकी जो पुस्तकें हैं, अंग्रेज़ी में पहले आती हैं, हिंदी में बाद में आती हैं और भारतीय भाषाओं में सबसे बाद में आती हैं। और मुझे लगता है कि भारतीय युवाओं को आपकी बातों की ज़रूरत अपनी भाषाओं में ज़्यादा है। और आप बेस्ट ब्रेन के साथ तो काम करते हैं, आईआईएम, आईआईटी और इस तरह के बड़े इंस्टिट्यूट्स के पास तो सुविधा भी है। वो बच्चे काफ़ी अभिजात धर्मों से आते हैं या पढ़-लिखकर आते हैं। तो जो सामान्य तबका है, जो युवा है, जो गाँव का है, भारत के गाँव का है और कहीं पढ़ाई कर रहा है। आपके यूट्यूब पर और सोशल मीडिया पर आपकी उपस्थिति और आपकी लोकप्रियता 90 मिलियन से अधिक लोगों तक आपका प्रचार-प्रसार है।
तो मेरा पहला प्रश्न ये है कि जो ये युवा हैं, जो भारत की दर्शन-परंपरा और आपको सुनकर उनसे जुड़ना चाहता है, अपनी किताबें उनकी भाषा में क्यों नहीं पहले लाते?
आचार्य प्रशांत: नहीं, आपकी शिकायत वाजिब है, पर आँकड़े थोड़ी-सी अलग कहानी कहेंगे। लगभग एक सौ साठ किताबें हैं, जिनमें से एक सौ बीस हिंदी में ही हैं। और वो हिंदी में ही हैं माने उनका अंग्रेज़ी अनुवाद भी उपलब्ध नहीं है।
प्रश्नकर्ता: क्या बात है।
आचार्य प्रशांत: तो शिकायत शायद दूसरे छोर से हो सकती है कि जो अंग्रेज़ी पाठक है, वो कह सकता है कि आपका जो तीन-चौथाई साहित्य है, वो तो हिंदी में ही है और हमें कब मिलेगा? कुछ गिनी-चुनी किताबें हैं। प्रशांत अद्वैत संस्था अपने आप में एक प्रकाशक है, हम पब्लिशर हैं, और बहुत किताबें हैं और बहुत लोगों तक पहुँच रही हैं। और जैसे हमने पिछली चर्चा में, आपको याद होगा, बात करी थी कि न्यूनतम मूल्य पर हम पहुँचा रहे हैं। तो कुछ गिनी-चुनी किताबें हैं जो बाहरी प्रकाशकों को हमने दी हैं, जिसमें पेंगुइन, हार्पर कॉलिन्स, जायको, ये लोग हैं। और वो चार अंग्रेज़ी की किताबें हैं और एक या दो हिंदी की किताबें हैं।
जो वो चार अंग्रेज़ी की किताबें हैं, बस उनके हिंदी अनुवाद उपलब्ध नहीं हैं। वो जो चार बाहरी प्रकाशकों को दी, क्योंकि उनकी हो गई वो किताबें, तो उनके अनुवाद उपलब्ध नहीं हैं। हालाँकि ये जो ट्रुथ विदाउट अपॉलजी है, इसके हिंदी अनुवाद पर भी काम चल रहा है।
प्रश्नकर्ता: चलिए बहुत जल्दी आए, मुझे ये अपेक्षा है। और इस किताब पर हम चर्चा करेंगे लंबी क्योंकि ये किताब नौ अध्यायों में बँटी है और एक ऐसे सच की बात करती है जो हम सभी के पास है, हम सभी के जीवन में है। उम्र का कोई भी पड़ाव हो। और हालाँकि आप युवाओं के बीच ज़्यादा लोकप्रिय हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ये किताब किसी भी उम्र के, किसी भी व्यक्ति के, यहाँ तक कि जो जीवन के आख़िरी चरण में है उसके लिए भी बहुत उपयोगी है। क्योंकि ये दृष्टि बदलने वाली किताब है, कुछ सिखाने वाली किताब है।
इस किताब में क्या है इस पर बाद में चर्चा करेंगे। क्योंकि हम कलिंग की धरती पर हैं, तो सबसे पहले कलिंग को लेकर आपके मानस में जो छवियाँ आती हैं, जो विचार आते हैं, वो क्या हैं? मतलब यहाँ का इतिहास, संस्कृति और इस धरती पर जब आप पहली बार आए उसकी कुछ स्मृतियाँ हैं, तो साझा करें।
आचार्य प्रशांत: तो कल ही भोर में, उसको परसों देर रात कहिए, कल भोर कहिए, तो मैं भुवनेश्वर पहुँचा हूँ। तो कल तो रात में सत्र था, वो लगभग 5:30 से शुरू होकर के 10:00 या 11:00 बजे तक चला, बड़ा अद्भुत आनंद था। आज मैंने दिन लगाया कुछ महत्त्वपूर्ण मंदिरों को देखने में, चूँकि मैं पहली बार आ रहा हूँ तो स्मृतियाँ तो नहीं हैं अनुभव हैं, और वो बहुत ताज़े, हालिया अनुभव हैं।
प्रश्नकर्ता: सबसे पहले तो मैं चाहूँगा कि हाल में उपस्थित सभी लोगों को इस बात पर खुशी होनी चाहिए कि कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के दौरान, कलिंग की धरती पर आचार्य प्रशांत पहली बार आए हैं।
आचार्य प्रशांत: तो आज बड़ा रोचक वाक़या हुआ, हम राजा-रानी मंदिर में थे, तो वहाँ बात करते-करते मैंने कुछ कहना शुरू कर दिया और चूँकि संस्था के अन्य लोग भी साथ में थे, तो उसकी रिकॉर्डिंग शुरू हो गई। और वहाँ जो अन्य सब लोग घूमने आए हुए थे मंदिर में दर्शन के लिए या सिर्फ़ पर्यटन के लिए, वो लोग धीरे-धीरे करके एकत्रित हो गए। तो कुल मिलाकर मुझे लगता है, वहाँ लगभग दो घंटे बात हुई होगी। और मेरे लिए ये बात महत्त्वपूर्ण है, रोचक है और आनंदप्रद है कि कलिंग में लोग ऐसे हैं जो जहाँ भी जाते हैं, भले ही व्यक्ति सामने अपरिचित खड़ा हो, पर अगर उसमें बोध पाते हैं, चेतना की सुगंध किधर से भी आती है उनको, तो वो खिंचे चले जाते हैं।
तो एक छोटी-मोटी भीड़-सी वहाँ एकत्रित हो गई थी। यद्यपि जब कोई चैतन्य होकर सुनने आए, तो उसे भीड़ कहना नहीं चाहिए, पर फिर भी। और उनमें से अधिकतर लोग, मुझे लगता है शायद मुझे पहली बार देख रहे हों। और कुछ तो एकदम उड़िया-भाषी थे तो उन्हें मेरी बात पूरी तरह समझ में भी न आ रही हो। लेकिन न सिर्फ़ उन्होंने ध्यान से सुना, अनुमति लेकर पास भी आए और प्रश्न भी पूछे।
प्रश्नकर्ता: वाह!
आचार्य प्रशांत: तो ये बात हृदय-स्पर्शी थी। और आप सबको मेरा धन्यवाद और आयोजकों को आभार मुझे आमंत्रित करने के लिए। और मैं आशा करता हूँ, कल का सत्र था, आज का है। अभी एक-दो दिन और मैं आपके बीच रहूँगा, आपसे अधिक से अधिक हार्दिक बात हो पाएगी। आप कल भी आए थे, हज़ार से अधिक संख्या में उपस्थित थे। आज भी आप हैं, मैं चाहूँगा कि हम सदैव समय का जो अधिकतम सदुपयोग कर सकते हैं, करें। आपका एक बार फिर से आभार।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अब हम अपने मूल विषय पर आते हैं, भारतीय दर्शन, परंपरा और युवा। मेरी दृष्टि में आपकी जो अपनी जीवन-यात्रा अब तक की है, उसमें इन तीनों का समुच्चय दिखाई देता है। आपने युवा अवस्था में ही अपने जीवन के बड़े निर्णय किए। एक तरफ़ आधुनिकता, प्रचुरता, समृद्धि, सब कुछ था; और दूसरी तरफ़ दर्शन, ज्ञान और प्रज्ञा थी। वर्तमान का युवा, जिन लोगों के बीच आप जाते हैं, वो कहीं-न-कहीं इनके बीच झूल रहा होता है। एक तरफ़ उसके पास परंपरा की थाती होती है और दूसरी तरफ़ आगे बढ़ने का आकर्षण होता है। और वर्तमान समय में जिस तरह की उपलब्धता है आधुनिक संसाधनों की, उसकी तरफ़ उसका आकर्षण होता है।
मेरा प्रश्न ये है कि आपकी जो अपनी पृष्ठभूमि, शिक्षा और आपका जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रहा है, और जो भारतीय दर्शन वेदान्त, अद्वैत को समझने की आपकी दृष्टि रही है, इन दोनों के बीच आपने सामंजस्य कैसे बैठाया? और आज का युवा अपनी परंपरा और उस आकर्षण के बीच कैसे तालमेल बैठाए?
पहले आप अपने हिस्से का संवाद करेंगे, और दूसरा उस युवा की बात करेंगे जो आज उन चुनौतियों से दो-चार हो रहा है।
आचार्य प्रशांत: देखिए, दो-तीन बातें होती हैं। आप दुनिया को देख रहे होते हैं और समझने का प्रयास कर रहे होते हैं। आप युवा हैं आप अठारह साल, बीस साल या पचीस साल के हैं, और अभी आप ज्ञान अर्जित करने की प्रक्रिया में ही हैं। आप समझना चाह रहे हैं कि ये दुनिया चलती कैसे है? इसका इतिहास क्या रहा है? आर्थिक व्यवस्थाएँ क्या हैं? संविधान क्या है? राजनीतिक संस्थाएँ कौन-सी हैं? आप ये सब जान रहे हैं, तो ये आप जानते जा रहे हैं। फिर आप अपने आप को देखते हैं कि आपने किस रास्ते से यात्रा करी है, आप कहाँ तक पहुँचे और आप जहाँ खड़े हुए हैं आपकी अपनी स्थिति क्या है?
तो ये दो बातें हो गईं: एक हो गया बाहर का तथ्य, और एक हो गया अपना तथ्य। और इन दोनों से अलग और इन दोनों के ही कभी क़ाबू में न आने वाली बात होती है, एक दूर का सितारा, जैसे ध्रुव तारा, जिससे हर युवा के हृदय में प्रेम होता है, सत्य है वो जो तथ्यों की बहुत परवाह करता है, न वो इस बात की बहुत परवाह करता है कि दुनिया बड़ी संपन्न हो गई है, पैसा ही पैसा बिखरा हुआ है। न वो इस बात की परवाह करता है कि हम जिस परंपरा से आ रहे हैं, हमारे पीछे खानदान में क्या काम-धंधा, व्यापार होता था, या कि हमारे माँ-बाप हमसे किस तरह की उम्मीदें रखते हैं। न वो बाहरी तथ्य को बहुत मोल देता है, न भीतरी तथ्य को।
अब ये फ़ैसला आपको करना होता है कि आप इस त्रिकोण में किसको चुनेंगे। किसी भी त्रिकोण की तरह, इसमें दो बिंदु तो होते हैं जो ज़मीनी होते हैं, और एक होता है जो आसमानी। ठीक है? आप चुन सकते हो कि मेरी प्रथा-परंपरा क्या रही है, या मेरी व्यक्तिगत कामनाएँ क्या रही हैं, या वो सब क्या है जिसको मैं अपनी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी मानता हूँ युवा होने के नाते, कि भाई, हमारा पुश्तैनी व्यापार है और पिताजी चाहते हैं कि मैं उस व्यापार को आगे बढ़ाऊँ, और वो सब बातें।
या आपकी थोड़ी जागरूकता बढ़ सकती है। आप कह सकते हो, मैं देख रहा हूँ कि बाहर अर्थव्यवस्था के फलाने क्षेत्र में, फलाने सेक्टर में आने वाले समय में ज़्यादा अवसर होंगे, तो मैं जा रहा हूँ उस क्षेत्र में एमबीए करने। आप ये कर सकते हो। या आप चुन सकते हो कि कोई है जो पुकार रहा है, और वो कह रहा है कि पैदा हुए हो, जितने भी बंधन हैं चाहे भीतर के, चाहे बाहर के, उनको तोड़ने के लिए। हाँ, इतनी ताक़त तुम में नहीं है कि उन बंधनों को एक झटके में, एक साथ तोड़ दो, क्योंकि उन बंधनों का स्वरूप अभी तुम ठीक-ठीक पहचानते भी नहीं हो। पर इतना तो कर सकते हो न, कि बंधनों को हार न मान लो, बंधनों को आभूषण न समझ लो। इतना तो कर सकते हो। और जितना समझ में आता जाए कि फलानी चीज़ हम पकड़ के बैठे हैं, है ये हथकड़ी ही, कम से कम उस हद तक तो उसको तोड़ते चलो।
तो ऐसे करते हुए मेरी यात्रा आगे बढ़ी। भीतर के तथ्य उपलब्ध थे, और तथ्य तो तथ्य होते हैं और बाहर के भी तथ्य उपलब्ध थे। और कोई तरीका नहीं था कि एक झटके में, जिस हालत में हूँ, उससे आज़ाद हो सकूँ। तो शनैः-शनैः, कदम-दर-कदम, जितने भी प्रलोभन हो सकते थे, जितनी भी पुरानी प्रथाएँ हो सकती थीं, किसी को चुनौती दी, किसी को लाँघा, किसी को तोड़ा, किसी के नीचे से निकल गया, किसी के ऊपर से फाँद गया। ऐसे करते हुए आगे बढ़ता रहा। और अभी भी वही कर रहा हूँ। मैं नहीं कह सकता कि जो कुछ था, उसको लाँघ गया हूँ, बहुत कुछ है जो अभी बाक़ी है, बहुत बंधन हैं जो शेष हैं। धीरे-धीरे मैं प्रयास कर रहा हूँ कि उनको लाँघता चलूँ।
ये आप लोगों ने भी जो मेरा स्वागत किया और मैं बहुत विनम्रता से उसको स्वीकार करता हूँ। वास्तव में, आप मेरा स्वागत नहीं कर रहे थे। जो मेरे माध्यम से आप तक आपकी ही संभावना की अनुगूँज पहुँचती है न, आप उसका सम्मान कर रहे थे। एक काम करा है मैंने अपनी ज़िंदगी में, कि किसी भी बिंदु पर, किसी भी तल पर, थमकर नहीं बैठ जाना है। कि हो गया, यही आख़िरी है, अब रुक जाओ, सेटल हो जाओ; वो नहीं करना है, आगे बढ़ते रहना है।
और जैसे मैं जिया हूँ, वही मेरा आपके लिए भी संदेश है। और आपके लिए वो संदेश और प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि जब आप आपकी उम्र में होते हो, आप में से अधिकांश लोग मुझे पैंतीस-चालीस से नीचे के ही दिख रहे हैं। तो भीतरी-बाहरी त्रिकोण का जो आधार है, उसके दोनों बिंदु भीतरी दबाव, बाहरी दबाव, दोनों काम कर रहे होते हैं कि बस अब किसी जगह पहुँच जाओ, वहाँ रुक जाओ, बस जाओ और फिर जीवन को भोगना शुरू कर दो। वो कभी मत करिएगा।
जीवन किसी भी तल पर रुकने के लिए नहीं है, चुनौती देते रहिए, आगे बढ़ते रहिए। इस यात्रा-तरह की कोई मंज़िल नहीं है। आगे बढ़ना ही लगातार मुक्ति है, बस यही है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा अगला प्रश्न ये है कि अगर आज के व्यक्ति को ये तय करना हो कि वो भारतीय दर्शन में किस बात को चुने, अपने आप को, यानी “मैं कौन हूँ?” उसकी तलाश करे; अपने परिवार की ओर उन्मुख हो और सामाजिक बंधनों को देखे; या इस बात को चुनना हो कि समाज को परिवर्तित कैसे करें, तो उसे किस बिंदु को चुनना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: वही बिंदु जो आधारभूत है। समाज को अगर मैं चुनूँ भी, तो समाज मैंने और मेरे जैसे लोगों ने ही बनाया है। ये समाज मेरे ही लिए है, मैं ही इस समाज का दृष्टा भी हूँ, सर्जनकर्ता भी हूँ, और मैं ही हूँ जो इस समाज की रवायतों को बनाता-बिगाड़ता भी रहता है। तो समाज को भी अगर मुझे सुधारना है, तो “मैं” की तरफ़ तो आना पड़ेगा।
दूसरा, आपने कहा कि अपनी कामनाओं को देखूँ, तो कामनाएँ भी तो मेरी ही हैं। अपनी परंपराओं को देखूँ, तो वे परंपराएँ भी तो मेरी ही हैं। तो ले-दे के अपने आप को देखने के अलावा दर्शन में कोई विकल्प होता ही नहीं है, क्योंकि दर्शन सत्य की तलाश है। झूठ तो नंगी आँखों से भी दिख जाता है, झूठ के लिए तो आँखें खोले रखना भी ज़रूरी नहीं है। आँख भी बंद करो, तो भी कुछ-न-कुछ दिख ही रहा होता है। झूठ के लिए तो दर्शन चाहिए ही नहीं। दर्शन माने सत्य। और सत्य क्या है, क्या नहीं, उसका असर मुझ पर पड़ना है। झूठ में फँसू, तो दुख मुझे झेलना है, तो मैं ही जाकर के कभी-कभार, बल्कि अक्सर, बल्कि लगभग हमेशा झूठ को ही सच बोल आता हूँ। दर्शन यदि सत्य की तलाश है, तो मैं ही तो वो हूँ न जिसने झूठ को ही सत्य घोषित कर रखा है।
तो सत्य को तलाशूँ या अपने आप को तराशूँ? अगर मैं ही झूठ में डूबा हुआ हूँ और मैं कहूँ कि मैं बाहर सत्य की तलाश करने निकला हूँ, तो मुझे पता भी कैसे चलेगा कि मैंने जिसको सत्य घोषित कर दिया, वो सत्य है या मेरा ही कोई झूठ, जिसको मैं सच बोलकर पूज रहा हूँ? तो दर्शन में आत्म-अनुसंधान का कोई विकल्प नहीं है। आत्मज्ञान दर्शन की मंज़िल है, और आत्म-अवलोकन उसकी विधि है। इसके अलावा जो कुछ भी किया जा रहा है, वो एक अच्छी जिज्ञासा हो सकती है; वो समाजशास्त्र या मनोविज्ञान में किया गया शोध हो सकता है पर उसको दर्शन नहीं बोल सकते।
प्रश्नकर्ता: अब मैं मुस्कुराया इसलिए था आपके उत्तर के बीच में कि मैं दो प्रश्न पूछना चाहता था, और संयोग ये कि आपने उत्तर में उन दोनों प्रश्नों को समाहित कर लिया। तो मैं इस बात पर हँसा था कि मेरे अगले प्रश्न के लिए मुझे कुछ और सोचना पड़ेगा। और मैं ये जानना चाहता हूँ कि जो दुनिया भर में दार्शनिक परंपराएँ हैं, दर्शन के बीच जो विवाद है और जो धार्मिक विवाद है, इस समय दुनिया उससे सबसे ज़्यादा दो-चार हो रही है। या अगर इस बात को मैं घुमा कर प्रश्न करूँ कि इस समय दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती क्या है? आपकी दृष्टि में वो क्या है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, विवाद मान्यताओं के बीच होते हैं, पूर्वाग्रहों के बीच होते हैं, कामनाओं और स्वार्थों के बीच होते हैं। सत्य और सत्य में तो कोई विवाद हो ही नहीं सकता, न। तो जब भी कभी धर्म का आधार मान्यता बनेगी, परंपरा बनेगी, तो विवाद होकर रहेगा। उनको धार्मिक विवाद कहा भी नहीं जाना चाहिए। वास्तव में, धर्म के नाम पर अगर विवाद हो रहा है, तो ये सारे विवाद अधार्मिक हैं।
कारण क्या है? क्यों होता है विवाद?
क्योंकि एक व्यक्ति ने धर्म का मतलब समझ रखा होता है कुछ नियम-कायदे, कुछ विश्वास, आस्था की कुछ कहानियाँ, जिनको मानकर उसको चलना है। कुछ करने, कुछ न करने का कुछ नियम, कुछ अनुशासन, जिनका वो उल्लंघन नहीं कर सकता। और दूसरे व्यक्ति ने उससे विपरीत मान्यता, उससे विपरीत कहानी कुछ पकड़ रखी है।
अब एक कहानी और दूसरी कहानी कभी मेल खाएँ कैसे? आप ये बताइए। और कहानियों में कोई समस्या नहीं है। बोध-कथाएँ बड़ी अच्छी होती हैं। धर्म-अध्यात्म के क्षेत्र में बोध-कथाओं का बड़ा महत्त्व मानते हैं, कहानी सुना करके कोई ऊँची बात समझा दी जाती है। तो कहानी से अगर आपको बोध प्राप्त करना हो तो ठीक है, पर आप कहानी को ही सत्य घोषित कर दें, तो बड़ी गड़बड़ हो जाती है।
आप मिथ को इतिहास घोषित करने लग जाएँ, तो अब तो स्ट्राइफ़ होगी, अब कॉन्फ़्लिक्ट होगी, अब द्वंद्व होगा।
इन्होंने कह दिया कि साहब, चार आसमान होते हैं। और ये कह रहे हैं, नहीं, दो ही आसमान होते हैं। इन्होंने कह दिया, हमारी हूरें हैं उनका रंग हरा होता है। इन्होंने कहा, नहीं, उनका जो रंग है, वो सफ़ेद होता है; कपड़ों का रंग, या कुछ भी। और इस बात को सत्य कहा जा रहा है कि ऐसा तो है ही। ये कह रहे हैं कि आप जब चलना शुरू करें, तो पहले बायाँ क़दम आगे बढ़ाएँ। ये कह रहे हैं कि पहले दायाँ क़दम आगे बढ़ाएँ। वो कह रहा है, तुम्हारी टाँग काट दूँगा अगर तुमने दायाँ क़दम आगे बढ़ाया तो।
अब मनुष्य इन बातों पर इतना आग्रह क्यों डाल रहा है? क्योंकि उसे धर्म का दार्शनिक आधार पता ही नहीं है। और ये धर्म के क्षेत्र में बड़ी गड़बड़ हो गई है। हमें धर्म के नाम पर क़िस्से-कहानियाँ दे दिए गए हैं, नियम-कायदे दे दिए गए हैं, कर्मकांड दे दिए गए हैं। जीवन की एक बँधी-बँधाई पद्धति दे दी गई है कि अगर तुम जैन हो, बौद्ध हो, हिंदू हो, मुसलमान हो, पारसी हो, ईसाई हो, तो तुम्हें ऐसे जीना है, तुम्हें ऐसे जीना है, तुम्हें ऐसे जीना है, तुम्हें ऐसे जीना है। ये तुम्हारी लेन है, तुम्हें इस गली में चलना है, तुम्हें उस गली में चलना है। ये सब दे दिया गया है। लेकिन धर्म सदा दर्शन से उठता है सदा। और धर्म के पीछे अगर दर्शन नहीं है, तो मामला बहुत विकृत ही नहीं विभत्स हो जाता है।
अब अगर आप सनातन धर्म का उदाहरण लें, तो हम कहते हैं हमारा धर्म वैदिक है। और यहाँ पर बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि इस वैदिक धर्म के पीछे दर्शन क्या होगा। वेदों का शिखर और वेदों का दर्शन है, वेदान्त। तो अब यहाँ समीकरण बिल्कुल बराबर हो जाता है कि सनातन धर्म है, वैदिक है, और उसका जो दार्शनिक आधार है, उसका नाम है वेदान्त। नाम से ही स्पष्ट हो जाता है। उपनिषद् वेदों का ही हिस्सा हैं, और वेदों को ही सनातनी कहते हैं कि हमारे पवित्र ग्रंथ हैं। तो ठीक है तुम्हारे पवित्र ग्रंथ हैं, तो उन्हीं ग्रंथों में तुम्हारा दर्शन भी उल्लिखित है; और वो दर्शन जो है, धर्म का आधार है।
वेदान्त नहीं, तो वेद अपनी धार खो देते हैं, अपनी ऊँचाई खो देते हैं। वेदान्त नहीं, तो वेदों में फिर तो कर्मकांड इत्यादि ही बचेगा और प्रकृति-पूजन बचेगा।
उपनिषद् सदा से; इसीलिए वेदान्त कहते हैं न उसको क्योंकि वेद वहाँ आकर के अपनी निष्पत्ति पा लेते हैं। वेद भी जैसे वेदान्त की प्रतीक्षा करते हैं कि आए और हमें पूर्णता दे। तो आप दुनिया भर में कहीं भी सड़क पर चलते आम आदमी से पूछिए, कि “तुम्हारा धर्म किन दार्शनिक सिद्धांतों पर खड़ा हुआ है?” तो अफ़सोस की बात है कि उसे पता नहीं होगा। हज़ार में से नौ सौ निन्यानवे मामलों में या तो पता नहीं होगा, या कुछ आधी-अधूरी जानकारी होगी।
अब इस कारण दुनिया भर के सारे विवाद होते हैं और द्वंद्व होते हैं। दर्शन तो आपस में बातचीत कर सकते हैं, क्योंकि दर्शन में एक प्रमुख तत्व होता है, ज्ञानमीमांसा (एपिस्टेमोलॉजी)। आप कोई दर्शन लेकर आएँगे, आप सांख्य ले आइए, मैं योग ले आऊँ, तो अब चर्चा होगी। लड़ाई नहीं हो सकती। ठीक है? और जो भी बात होगी, वो पूर्वाग्रह से निकलकर अगर आएगी, तो हमने पहले ही आपस में ये निर्णय कर लिया है, ये समझौता, ये करार कर लिया है कि भाई, देखो, हम आप बात करने बैठे हैं लेकिन पूर्वाग्रह न आपका चलेगा, न हमारा चलेगा। आप जो भी बात यहाँ सामने मेज़ पर रखोगे, उसे प्रमाण के साथ रखो।
अच्छा, दर्शन में प्रमाण बड़ी बात होती है, हम जानते हैं। ऐसे नहीं कि आपने कुछ कह दिया कि ऐसा होता है, तो होता है। हम जानते हैं कि कितने तरह के प्रमाणों की बात होती है। कभी हम अनुभव-प्रमाण कहते हैं, कभी हम श्रुति-प्रमाण कहते हैं, कभी अनुमान को भी हम प्रमाण बोल देते हैं। तो अलग-अलग दर्शन, अलग-अलग तरह के प्रमाणों को स्वीकृति देते हैं। लेकिन क्या प्रमाण हो सकता है, इस पर भी बाक़ायदा चर्चा हो सकती है, जिसे कहिए शास्त्रार्थ हो सकता है। लड़ाई नहीं होगी। लड़ाई तो सिर्फ़ होती है जब “ऐसा है, हम ऐसा मानते हैं जी, हम ऐसा मानते हैं जी, यही धर्म है।” बिलीफ़ सिस्टम्स लड़ते हैं आपस में। और सिर्फ़ लड़ते नहीं हैं, अफ़सोस की बात है कि उन्हें लड़ना पड़ेगा। क्योंकि एक धारणा, एक मान्यता, आप कितनी भी कोशिश कर लीजिए, आप कह दीजिए सर्वधर्म समभाव, लेकिन एक धारणा कभी दूसरी धारणा से मेल कैसे खाएगी?
हाँ, आप ये कर सकते हैं कि किसी तरीके से बर्दाश्त कर लें। और इसीलिए फिर हम बात करते हैं रिलिजियस टॉलरेंस की, बर्दाश्त तो उसी को किया जाता है जो चुभ रहा हो। जब हम कहते हैं कि किसी को बर्दाश्त करना है, तो ये तो अपने आप में हिंसा हो गई। आपको अच्छा लगेगा, मैं कहूँ कि मैं आपको बर्दाश्त कर रहा हूँ? या आप मुझे बर्दाश्त कर रहे हैं? और फिर हम इस बात को वर्च्यू मानें, इस बात को हम नैतिक श्रेष्ठता का द्योतक मानें कि साहब, हम लोगों में आपस में सहिष्णुता बहुत है, टॉलरेंस बहुत है, हम एक-दूसरे को बर्दाश्त करते हैं।
बर्दाश्त करने की ज़रूरत क्या है? आओ, बात करते हैं। जब बात कर सकते हैं, तो बर्दाश्त क्यों करें? हाँ, बातचीत का हमारा परस्पर आधार ये होना चाहिए कि तुम भी हवा-हवाई बात नहीं करोगे और हम भी हवा-हवाई बात नहीं करेंगे।
प्रश्नकर्ता: भारतीय दर्शन का मूल तत्व क्या है? आपने वेदान्त की बात कही। युवाओं के लिए मुझे ऐसा आभास होता है, हालाँकि आपसे मेरा अनुभव इतर होगा, क्योंकि आप भारत के बेस्ट ब्रेन्स के बीच जा रहे हैं और मैं हर तरह के युवाओं के बीच हूँ, तो मुझे लगता है कि दर्शन नाम सुनते ही युवाओं को बड़ी असहजता होती है। परंपरा से भी आज का युवा बहुत प्रेम नहीं करना चाहता, और कहीं-न-कहीं किसी भी उम्र में उसे ये लगता है कि उससे पहले की जो पीढ़ी है वो थोड़ी कम जानकार है।
तो ये जो बोध है, जबकि सच बात ये है कि जहाँ से हमने अपनी बातचीत की शुरुआत की थी, संकट उस युवा के सामने है लेकिन वो एक तरह से दर्शन समझना नहीं चाहता। धर्म उसके लिए दूर है, परंपरा का बोझ वो ढोना नहीं चाहता। और प्राप्ति की जो उसकी आकांक्षा और तलाश है, उसे ये पता ही नहीं है कि उसे क्या पाना चाहिए।
मैं ये इस प्रश्न का उत्तर, जो भारतीय दर्शन का मूल संदेश है, और जिस वेदान्त की आप बात कर रहे हैं, जहाँ वेद भी अपनी निष्पत्ति प्राप्त कर लेते हैं, वो क्या है? और वो युवाओं के बीच कैसे उतरे? उसे युवा कैसे आत्मसात करे? या उसका आकर्षण कैसे बढ़े? कैसे वो आग्रही हो, कि नहीं मुझे सारी बातों के बीच इन बातों को भी जानना चाहिए और इन्हें लेकर चलना चाहिए।
आचार्य प्रशांत: बहुत सुंदर, बहुत सुंदर प्रश्न है। धन्यवाद। देखिए, आपने मुख्यतः जो दो बातें कहीं युवाओं के विषय में, कि दर्शन से थोड़ा बचकर चलते हैं और परंपरा का पालन नहीं करना चाहते, धीरे-धीरे ठुकरा रहे हैं परंपरा को।
मेरे देखे ऐसा है नहीं, “लिव लाइफ़ किंग साइज” इनके इंस्टाग्राम हैंडल पर लिखा हुआ है। ये दर्शन नहीं है, तो क्या है? ये थोड़ा-सा घटिया दर्शन हो सकता है, पर है तो दर्शन ही। वहाँ उन्होंने लिख रखा था, उन्होंने कोई रील बनाई, और उसमें आकर के बोल रहे हैं, “लव मेक्स लाइफ़ लिव।” ये दर्शन नहीं है, तो क्या है? कोई पीछे से आकर अपना कहना ये है, कि “भगवान सब संभाल लेगा।” ये दर्शन नहीं है, तो क्या है? वो वहाँ पर कह रहे हैं कि “भला कर, भला होगा और बुराई के बदले बुरा मिलेगा।”* ये दर्शन नहीं है, तो क्या है? बस ये अपरीक्षित दर्शन है, अनएग्ज़ैमिंड फ़िलॉसफ़ी है। ये वो दर्शन है जो दार्शनिक को पता भी नहीं है कि उसने पा कहाँ से लिया। ये वो दर्शन है जो हम हवाओं से उठा लेते हैं।
“तुम लड़की हो, घर को बचाकर चलना तुम्हारा काम है, तुम घर की जान हो। पति की सेवा करो, बच्चों को पालो-पोसो और घर को एकजुट करके चलो।”
क्या इसमें दर्शन नहीं है? पर आपको कैसे पता कि ये आपने कहाँ से उठा लिया? आपको पता नहीं है। देखिए, कहा जाता है कि मनुष्य एक कहते हैं न, सोशल एनिमल, सामाजिक पशु वग़ैरह जो भी है।
श्रोता: सामाजिक प्राणी।
आचार्य प्रशांत: हाँ, सामाजिक प्राणी है, मेरे देखे वो दार्शनिक प्राणी है। मनुष्य बिना दर्शन के रह नहीं सकता, बस ये है कि अच्छा दर्शन नहीं है हमारे पास। यहाँ एक व्यक्ति ऐसा नहीं है जो फ़िलॉसफ़र नहीं है, बस सब कोई अपने खेत से उठकर फ़िलॉसफ़र है; कोई गली-मोहल्ले से उठ रहा है; स्कूल-कॉलेज के फ़िलॉसफ़र हैं; चौराहों पर फ़िलॉसफ़र हैं; नुक्कड़ पर फ़िलॉसफ़र हैं; चाय के अड्डों पर फ़िलॉसफ़र हैं; बाथरूम में फ़िलॉसफ़र हैं; इंस्टाग्राम में फ़िलॉसफ़र हैं। उस स्तर की फ़िलॉसफ़ी चल रही है।
समस्या ये नहीं है कि फ़िलॉसफ़ी नहीं है, समस्या ये है कि फ़िलॉसफ़ी में स्तर नहीं है।
मेरा काम किसी को फ़िलॉसफ़र बनाना नहीं है। मेरा काम है उनसे कहना कि फ़िलॉसफ़र तो तुम हो ही। चेतना को प्यार होता है सत्य से। आपसे कोई झूठ बोले, आपको कैसा लगता है? बुरा लगता है न? तो जो मनुष्य की चेतना है, ये सच से प्यार करती है, और फ़िलॉसफ़ी शब्द का भी बिल्कुल यही अर्थ है, सच से प्रेम। ये जो फ़िलॉ (PHILO) है, इसका अर्थ ही है आकर्षण। दूसरे शब्दों में, प्रेम; सच से प्रेम।
और हम कह रहे हैं, मनुष्य की चेतना तो सच से प्रेम करती ही है, तो माने हर मनुष्य है ही फ़िलॉसफ़र। तो मेरा काम नहीं है इनको फ़िलॉसफ़र बनाना, ये पहले से हैं। मेरा काम है जो फ़िलॉसफ़ी है सबकी, उसको एक उठा हुआ दर्जा देना। तो कैसे करता हूँ? मैं कहता हूँ, तुम अपनी बताओ फ़िलॉसफ़ी। और मैं प्रत्युप्रश्न करूँगा। तुमने जो भी एक दिमागी मॉडल बना रखा है, उसमें जो छेद हैं और विसंगतियाँ हैं, मैं उनकी ओर इशारा करूँगा।
तो इंसान हो और सच न माँगे, इंसान हो और विचार न करे, ये संभव नहीं है। दिक़्क़त बस ये होती है कि इंसान विचार के किसी निचले तल पर अटक जाता है, उसी तल को सच मानकर के, तब उसको ऐसे की ज़रूरत होती है जो उसके सच को झूठ साबित कर दे। वो काम मैं विनम्रता से करने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरे सामने जो कोई अपना सच लेकर आता है, मैं कहता हूँ, ये सच नहीं है, तुम्हारा सच है। ये ट्रुथ नहीं है, योर ट्रुथ है। और योर ट्रुथ माइट ऐक्चुअली बी वेरी फ़ार फ़्रॉम द ट्रुथ। कैन वी डिस्कस दैट? ये मेरा काम है। तो दार्शनिक तो अब हैं।
अब दूसरी बात आपने परंपरा की कही। परंपरा का पालन युवा कैसे नहीं कर रहे हैं? मैं तो प्रश्न करता हूँ, मैं पूछता हूँ इनसे, तुम बताओ अपनी ज़िंदगी में कोई काम जो मौलिक रूप से उस काम से भिन्न हो जो तुम्हारे दादा-परदादा या दादी-परदादी भी कर रहे थे। तुम पूरे परंपरावादी हो, तुम्हारे कपड़े बदल गए हैं, बस। कपड़े बदल गए हैं, भाषा बदल गई है। इंटरनेट आ गया है, एआई आ गया है। ये सब बदल गया है। पर मूल रूप से जो मनुष्य की आदिम वृत्तियाँ हैं, तुम उन्हीं का पालन कर रहे हो।
तो परंपरा तो चल ही रही है। वही नर का नारी के पीछे दौड़ना, वही नारी का एक तरीके से व्यवहार करना, प्रतिक्रिया करना, वही पैसे की भूख। वही घोंसला बनाने की इच्छा, “मेरा भी अपना घर होना चाहिए।” वही ज़मीन-जायदाद के लफड़े-पचड़े। ये सब काम तो सदा से चलता आया है न परंपरा में और तुम भी वही कर रहे हो। बस वो अलग तरीके से पैसा बनाने की सोचते थे, तुम अलग तरीके से पैसा बनाने की सोचते हो। उन्हें भी प्रभुत्व चाहिए था, यश चाहिए था। तुम इन्फ्लुएंसर बनने की सोचते हो।
उन्हें भी होता था कि किसी तरह हमारा नाम, यश, कीर्ति बढ़ जाए। तुम भी कहते हो, हमारी रीच कितनी है? हमारे फ़ॉलोअर्स कितने हो गए? वो भी गिनते थे कि हम सड़क पर चलते हैं तो हमें कितने लोग नमस्कार करते हैं। तुम गिनते हो, तुम्हें लाइक कितने आ गए तुम्हारी पोस्ट पर। तो बदला क्या गया है? परंपरा तो चल ही रही है। जिन बातों से वे डरते थे, उन्हीं बातों से तुम भी डरते हो। जिस अज्ञान में वे फँसे हुए थे आज से सौ, पाँच सौ, पाँच हज़ार साल पहले वाले, उन्हीं अज्ञानों में हम भी फँसे हुए हैं।
तो अज्ञान की जो धारा है, वो परंपरा बनकर तो बह ही रही है मनुष्य की अहम् वृत्ति के रूप में, तो सब परंपरावादी हैं। परंपरा का उल्लंघन करना तो किसी बिरले की बात होती है। इतना आसान नहीं होता कि आज के युवा हैं तो परंपरा नहीं मानते। इतना आसान नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आप अपने व्याख्यानों में और संवाद में सत्यनिष्ठ अध्यात्म, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्क की बात करते हैं। और आपका मानना है कि युवाओं को इसका पालन करना चाहिए अपने जीवन में।
अगर मैं पूछूँ आचार्य प्रशांत से कि उनके स्वयं के लिए सत्यनिष्ठ अध्यात्म, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टि उनकी नज़र में क्या है, तो उनका उत्तर क्या होगा?
आचार्य प्रशांत: दो ही जगहें हैं जहाँ झूठ पाला जा सकता है: एक तो ये कि ये सामने खड़े हुए हैं, उन्होंने काले रंग की जैकेट पहनी हुई है। और मैं कह दूँ, काला नहीं साहब, पीला है। तो एक ये बाहरी जगह हो गई, बाहर मुझ से जहाँ मैं कह सकता हूँ कि झूठ का अस्तित्व हो सकता है। और उस बाहरी जगह से ज़्यादा ख़तरनाक जगह जहाँ झूठ पाला जा सकता है, वो भीतर है।
मैं अपने आप को घोषित किए हुए हूँ कि मैं तो बहुत निर्भीक हूँ, मैं बहुत करुण हूँ, बहुत प्रेमपूर्ण हूँ, बहुत निस्वार्थ हूँ। और हूँ मैं एक नंबर का स्वार्थी, क्षुद्र, कामी इंसान। इन दो जगहों पर; वो जो बाहर का झूठ है उसको हटाने का काम विज्ञान करता है। लेकिन विज्ञान के पास भी आपको जाना पड़ेगा, अन्यथा आप बहुत मज़े में अपनी कल्पनाएँ, अपनी मान्यताएँ पाले बैठे रह सकते हैं। आप बिल्कुल कह सकते हैं कि साहब, आसमान का रंग नीला इसलिए है क्योंकि एक परी है, उसने बड़ा-सा लंबा-चौड़ा दुपट्टा जो है वो फैला रखा है, और वो दुपट्टा नीला है। आप बिल्कुल ऐसा कर सकते हैं ऐसे, जबकि विज्ञान अब सैकड़ों सालों से जानता है कि आसमान नीला क्यों है।
आप जाकर विज्ञान की किताब पढ़ें, तो आपको पता चले। आप फ़ैसला कर सकते हैं कि मैं जानबूझकर विज्ञान की किताब पढ़ूँगा ही नहीं, क्योंकि मैं अपना बाहरी भ्रम यथावत रखना चाहता हूँ।
और अपने भीतर क्या चल रहा है, ये तो विज्ञान भी नहीं बता पाएगा। ये तो ख़ुद को ही मानना पड़ता है, ये और कठिन पड़ता है। सत्यनिष्ठ अध्यात्म का मतलब है, न बाहर झूठ स्वीकार करूँगा, न भीतर झूठ स्वीकार करूँगा। बाहर तथ्य हैं उनको जानने के लिए विज्ञान और तमाम शोध-क्षेत्रों के निकट जाऊँगा। कुछ भी यूँ ही मान नहीं लूँगा। कि साहब, किसी ने कहा चीन की आबादी कितनी है? किसी ने आकर कहा, एक सौ साठ करोड़। हमने कहा, हाँ, ठीक है। अरे भाई, तुम्हारे पास साधन उपलब्ध हैं, जाकर जाँचो, परीक्षण करो। ये है वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जिसका आपने अभी उल्लेख किया।
जो ज़्यादा कठिन काम है, जो हम कह रहे हैं वो है भीतर। कि मैं तो कह रहा हूँ कि मैं आपसे बात इसलिए करने आया हूँ ताकि हम ज़रा परस्पर विमर्श करके एक-दूसरे के मन को शुद्ध कर सकें। और भीतर मैंने ये पाल रखा है कि मैं यहाँ आऊँगा तो कुछ यश कमाऊँ, कुछ पैसा कमाऊँ, कुछ और करूँगा, राजनीति में प्रवेश कर जाऊँ, यहाँ तो चुनाव क्यों न लड़ूँ, ठीक है? और वो मैं कपट पाले बैठा हूँ। और बात बुरी ये नहीं कि मैंने वो पाल रखा है, बुरी बात ये है कि मैंने ख़ुद को ही जता रखा है कि मैं बहुत अच्छा आदमी हूँ। वो अपने सारे इरादे भीतर रखते हुए भी मैंने स्वयं को आश्वस्त कर रखा है कि आदमी तो मैं साधु हूँ।
यहाँ कोई विज्ञान आपकी मदद नहीं कर सकता। यहाँ तो आत्म-अवलोकन ही करना पड़ता है। सत्यनिष्ठ अध्यात्म का मतलब ये है कि बाहरी और भीतरी तथ्य, दोनों को जानूँगा, और जो जान लिया उसको अनजाना नहीं करूँगा। सिर्फ़ जानना भी पर्याप्त नहीं होता, जो देख लिया उसको अनदेखा नहीं करूँगा। समर्पण ज़रूरी है, जो दिख गया, उसके सामने सिर झुका दूँगा। तथ्यों से फ़ालतू बहस नहीं करूँगा, लड़ूँगा-झगड़ूँगा नहीं। जब तक बात पता नहीं चली है, झुकूँगा नहीं और जब बात स्पष्ट दिख गई है, उसके बाद झुका हुआ सिर मेरा उठेगा नहीं। समर्पण ज़रूरी है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने बहुत सारे गीता और उपनिषदों पर लगातार पाठ्यक्रम संचालित कर रहे हैं, और आपकी लगातार इस बात की कोशिश है कि युवाओं के बीच यह लोकप्रिय हो, वो जानें। मेरा प्रश्न ये है, कि अगर मैं सार-संक्षेप में पूछूँ कि आज का युवा उन पाठ्यक्रमों के मूल तत्व को कैसे जाने, या उनकी ओर आकर्षित कैसे हो, तो आप क्या कहेंगे?
आचार्य प्रशांत: नहीं, देखिए, आकर्षण ज़रूरी नहीं है, विकर्षण ज़रूरी है। जब तक मैं माने बैठा हूँ कि जैसा मैं हूँ, मैं ठीक हूँ, मुझे सिर्फ़ मेरी ही छाया, मेरा ही प्रतिबिंब आकर्षित करेगा। क्योंकि मैं ठीक हूँ, मैं ही सुंदर हूँ, मैं ही बढ़िया हूँ। तो जो मेरी इच्छा है, विचार है, कामना है, वही ठीक है।
विकर्षण होना चाहिए, अपनी बुरी हालत साफ़ दिखनी चाहिए। मैं यहाँ तक कहता हूँ कि वास्तविक अध्यात्म की शुरुआत तब मानना, जब स्वयं से घिन आने लगे। विकर्षण ज़रूरी है।
विकर्षण नहीं होता, इसीलिए चाहे भगवद्गीता हो, उपनिषद् हों, दुनिया भर के तमाम बोध-ग्रंथ हों, वो विफल चले जाते हैं। क्यों चले जाते हैं? मैं यहाँ बैठा हुआ हूँ, आत्मविश्वास से भरा हुआ, आत्म-संतुष्ट। मैं कह रहा हूँ, “मैं ज़िंदगी में बहुत बढ़िया आदमी हूँ। सफल आदमी हूँ, सब हासिल कर रखा है। समाज में इज़्ज़त है मेरे पास, बैंक में पैसा है मेरे पास। मैं बहुत अच्छा आदमी हूँ, सब मेरा अच्छा चल रहा है, दान-पुण्य कर देता हूँ। तो अगला जन्म भी मैंने अभी से आरक्षित कर रखा है। स्वर्ग में मेरी सीट भी पक्की है। मैं बहुत अच्छा आदमी हूँ।”
इस आदमी के पास आप जाकर कहेंगे, आओ दर्शन पढ़ते हैं, उपनिषद् खोलते हैं। ये क्यों आएगा? मुझे बताइए, क्यों आएगा? ये नहीं आएगा। ये आएगा भी तो खानापूर्ति करने आएगा। ये आएगा, कहेगा, “हाँ-हाँ, ये उपनिषद् है। दिखाओ।” दो-चार पन्ने पलटेगा, जमाई मारेगा, भाग जाएगा। और ज़्यादातर लोगों का यही चला है, इसीलिए तो आप जब आम जनता में जाएँ और दर्शन की बात करें, तो किसी को क्या पता है? नाम तक नहीं पता। न भारतीय दार्शनिकों के नाम पता होंगे, न ग्रंथों के पता होंगे, न पश्चिमी दार्शनिकों के नाम पता होंगे। चीन, जापान, अरब, आप किसी दिशा में चले जाएँ, लोगों को नहीं पता होगा।
क्यों नहीं पता होता?
क्योंकि हमें लग रहा होता है कि हमारा हिसाब-किताब जैसा चल रहा है, उसमें थोड़ी-बहुत कुछ खोट हो सकती है, पर मूलतः तो वो ठीक ही है। हमारे जीवन का आधार ठीक है, हाँ, इमारत में थोड़ा रंग-रोगन करना बाक़ी है। बाक़ी बुनियाद, फ़ाउंडेशन तो ठीक ही है, पर्दे बदलने बाक़ी हैं घर के। हमें ऐसा लग रहा होता है।
**विकर्षण चाहिए। शुरुआत इससे होती है कि मुझे दिखे कि मैं ज़िंदगी जी ही गलत बुनियाद पर रहा हूँ। कि मेरे एक-दो फ़ैसले गलत नहीं हो गए, मेरे सब फ़ैसलों का आधार ही गलत है। मेरे कर्म उल्टे नहीं पड़ गए, मुझसे अनायास कोई गलतियाँ नहीं हो गई, कर्ता जो भीतर बैठा है, द डूअर, वो डूअर ही फ़ॉल्स है, वो डूअर ही झूठा है। जब ये दिखाई पड़ता है, तो आदमी नाक घिसता हुआ, दौड़ता-भागता फिर आता है ग्रंथों की ओर और दर्शन की ओर। तो वो चाहिए।
और आज का जो युग है, वो आपको अच्छा अनुभव करने के, फ़ील-गुड करने के इतने साधन और इतने मनोरंजन देता है कि आपकी हालत कितनी भी ख़राब हो, आपको फिर भी ऐसा लगता है, “मेरी ज़िंदगी तो ठीक ही चल रही है।” कितनी भी हालत ख़राब हो, कुछ मनोरंजन आ जाएगा। कुछ बहाना, कुछ सांत्वना, कुछ दिलासा, ये सब आ जाएँगे और आप कभी भी उस बिंदु पर नहीं आएँगे, जहाँ आप स्वयं से पूरे तरीके से निराश हो पाएँ। वो जो टोटल डिसइल्यूज़नमेंट है न, वो किसी वास्तविक शुरुआत के लिए बहुत आवश्यक है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक प्रश्न जो हमारे संवाद से थोड़ा-सा ही इतर है। वर्तमान में हम जहाँ भी जाते हैं, बहुत सारे मठ, धार्मिक गुरु, आध्यात्मिक गुरु, शिक्षक, प्रशिक्षक और हमारे हिन्दू वाङ्मय में जितने भी माध्यम हैं; जहाँ आपने एक प्रश्न के उत्तर में ये बात कही थी कि जितने भी हमारे वेदांग और दर्शन के जितने भी तत्व हैं, इन सबके नाम पर बहुत सारे लोग एक तरह से, अपनी तरह से प्रयास करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कहीं-न-कहीं वो एक बड़े बाज़ार के रूप में परिवर्तित हो चुका है।
ऐसी स्थिति में आप क्या देखते हैं कि आज का युवा या आज के लोग, उसमें सच्चे प्रशिक्षक को, सच्चे धर्म-गुरु को या सच्चे शिक्षक को कैसे चुनेंगे? और ये बाज़ार के रूप में परिवर्तित हो रहा है, ये सही है या गलत?
आचार्य प्रशांत: नहीं, ये बाज़ार के रूप में सदा से रहा है, बस आज साधन आ गए हैं उस बाज़ार के आकार के बढ़ने के। एक तो दुनिया की अर्थव्यवस्था ही बहुत बड़ी हो गई है, इतिहास में इतनी बड़ी कभी रही नहीं। और दूसरा, संचार के संवाद के माध्यम बहुत बढ़ गए हैं। तो वो जो बाज़ार है, उसका आकार बढ़ गया, मार्केट साइज बढ़ गया। वरना बाज़ार हमेशा से था, धर्म के नाम पर लूट हमेशा से मची है।
आपने पूछा, कैसे पहचानें कि सच्चा शिक्षक ठीक है या नहीं? कैसे जाएँ उसके पास? ज़रूरत ही नहीं है। मुझे अपनी बीमारी नहीं पता, मुझे डॉक्टर क्या पता? पहले मैं क्या जानूँ? देखिए, शरीर की बीमारी झुठलाई नहीं जा सकती क्योंकि वो तथ्य होती है, भौतिक, स्थूल तथ्य होती है। आपके यहाँ जाँघ में इतना बड़ा फोड़ा निकल आया, आप झुठला नहीं पाओगे, दिख रहा है, ठीक है? आप झुठलाओगे, कोई और पूछेगा कि ये क्या हो गया?
पर भीतरी बीमारी, अंतःकरण का रोग हम दबाए रहते हैं, हम उसको मानते ही नहीं। हम स्वीकार करना ही नहीं चाहते कि हम भीतर से बहुत-बहुत रोगी हैं। जिसको अपनी बीमारी का पता होगा, वो किसी घटिया चिकित्सक के पास फँस ही नहीं सकता, क्योंकि अब बीमारी ही फैसला कर देगी कि चिकित्सक ठीक है कि नहीं। बीमारी ही फैसला कर देगी न, मैं जिसके पास गया हूँ अगर वो मेरी बीमारी का इलाज कर सकता है, तो चिकित्सक ठीक है।
मुझे गुरु को पहचानने की कोई ज़रूरत नहीं है, मुझे स्वयं को पहचानने की ज़रूरत है। गुरुओं को, जो बाज़ारू गुरु हैं, जो लूट-लाट रहे हैं, जेल भी चले जा रहे हैं, उनको तो मैं दोष देता ही नहीं। बिल्कुल नहीं, क्योंकि वो सिर्फ़ सप्लायर हैं, उन्होंने आपको वही दिया जो आपने माँगा। आप उनके पास मनोरंजन माँगने गए थे उन्होंने मनोरंजन दिखा दिया। आप गए थे उनके पास कि हमें भूत चढ़ा है, उन्होंने कहा, “भूत भगाए देते हैं तुम्हारा।” आप उनके पास मनोकामना पूरी करने गए थे कि मुझे बेटा चाहिए, उन्होंने कहा, “लो, ये खा लो फलानी अदरक की गाँठ। इससे तुमको बेटा हो जाएगा।”
तो आप जो कर रहे हो, उसी का आपको फल मिल रहा है। मैं पूछ रहा हूँ, ये जो पूरी भक्त-जनों की टोली बैठी होती है, ये अगर थोड़ी जागरूक हो तो फर्जी बाबा इन्हें ठग पाएगा क्या? पूछ रहा हूँ, बस बताइए।
अब एक और बात पूछ रहा हूँ। ये जो भक्त-जनों की, भक्त माने अंधभक्त, ये जो अंधभक्तों का जमावड़ा लग जाता है बड़े-बड़े शामियानों में, कई बार तो लाखों में तादाद पहुँचती है, भाई। ठीक है? ये गए ही हैं अपने भ्रम को पोषण देने, इनमें साहस नहीं कि ये अपनी धारणाओं को दी गई कोई चुनौती बर्दाश्त कर पाएँ।
मान लीजिए मंच पर कोई आ गया ऐसा जो कहे कि तुम सब के सब फर्जी हो। ये जो तुम यहाँ पर एक लाख लोग जमा हो, तुम सब यदि अध्यात्म की तरफ भी आए हो, तो सिर्फ़ अपनी वही पुरानी गँधाती कामनाएँ पूरी करने आए हो, तुम लोग ही गड़बड़ हो। तो वो पंडाल कितनी देर में खाली हो जाएगा? ये बताइए। अरे, सब भागेंगे।
प्रश्नकर्ता: भाग जाएँगे।
आचार्य प्रशांत: सब भागेंगे, क्योंकि हम तो मंदिर भी इसलिए जाते हैं न, कि हे ईश्वर, मेरी मुरादें पूरी कर दे। कौन जाता है? कौन जाता है मंदिर ये कहने कि अगर मेरे भीतर झूठ ही झूठ भरा है, तो तोड़ दे मुझको भीतर से? किसने जाकर के कहा ये मंदिर में?
तो बाबाओं के पास भी हम बस इसीलिए जाते हैं कि सस्ता मनोरंजन मिल जाए, मनोकामना-पूर्ति का कुछ मिल जाए, जो हमारी पहले से ही धारणाएँ चल रही हैं बाबा उनकी पुष्टि कर दे। जो रास्ते, जो साधन हम पहले से ही अपनाते आ रहे हैं, बाबा कह दे, हाँ, हाँ, इसी रास्ते पर और तेज़ी से चलो, और उसका ये रहा मंत्र, इस मंत्र का उपयोग कर लो। जिस रास्ते पर पहले ही चल रहे हो वो रास्ता और साफ़ हो जाएगा तुम्हारे लिए। जो कहानियाँ तुम पहले से ही मानते आ रहे हो, बाबा उन कहानियों को और ज़्यादा सत्यापित कर देता है।
तो जब तक लोग जागरूक नहीं होंगे, बाबाओं की सप्लाई लाइन वैसे ही चलती रहेगी जैसी है। एक को हटाएँगे, दूसरा आ जाएगा। एक के बाद एक नए-नए पैदा होते रहेंगे। अब तो बच्चे भी आ जाते हैं। क्यों आ जाते हैं बच्चे? क्या उस बच्चे में कुछ खास है? नहीं, बच्चे में कुछ खास नहीं है। मैं तो कह रहा हूँ, बच्चे का बचपन मारा जा रहा है। बच्चे का तो बचपन मारा जा रहा है। ये लोग दोषी हैं, जिनको इस तरह का आध्यात्मिक मनोरंजन भोगना है। ये स्पिरिचुअल एंटरटेनमेंट है और उसका कंज़म्पशन चल रहा है, और शिकार हो रहा है बच्चा उसका। ये चल रहा है। तो मैं क्या, किसको दोष दूँ? भाई, रोगी को पता होना चाहिए, मुझे ठीक होना है, क्योंकि गरज किसकी है? गरज किसकी है?
श्रोता: रोगी की।
आचार्य प्रशांत: रोगी की। मैं अपना अगर रोग जानूँगा तो फर्जी चिकित्सक को मैं दो दिन में पहचान के हटा दूँगा। मैं कहूँगा, मैं अपना रोग जानता हूँ, तू मेरा रोग तो हटा ही नहीं पाया। ये बाबाओं के सामने बैठते हैं लोग, ये कभी सवाल करते हैं? सवाल करते हैं? ये अपना रोग प्रदर्शित तक नहीं करते। ये बस बैठ जाते हैं कि हमें प्रवचन दे दो, हमें कथा सुना दो, हम चले जाएँ।
जो रोगी अपना रोग प्रदर्शित भी नहीं कर रहा, उसे कैसे पता चलेगा कि उसका रोग ठीक भी हुआ कि नहीं हुआ? वो तो बस किसी तरह का मलहम लगवाने आया है। मलहम लग जाता है, लोग हँसते हुए घर चले जाते हैं।
प्रश्नकर्ता: आपने अभी जैसे रोगी वाला प्रश्न पूछा, वैसे ही एक अपने किसी कार्यक्रम में आपने पूछा था, युवाओं से कि आज के युवाओं को ग़ुलामी पसंद है? या आज के युवा किस तरह से, किन चीज़ों के ग़ुलाम हैं? वो अपने-अपने मानस के ग़ुलाम हैं। अपने समय के ग़ुलाम हैं? अपनी सोच के ग़ुलाम हैं। अपने अंतर्मन के ग़ुलाम हैं। किस चीज़ के ग़ुलाम हैं?
आचार्य प्रशांत: देखिए, ग़ुलामी नहीं पसंद नहीं होती किसी को, मुक्ति तो स्वभाव है। पर दाम के मज़े लूटने की बुरी आदत लग जाती है। ग़ुलामी के साथ दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि उसके दाम मिलते हैं, ग़ुलामी नहीं पसंद है दाम पसंद हैं। अब क्या करें? अगर बिना दाम की कोई ग़ुलामी करवाए, तो एक आदमी न करे। कोई आपसे ग़ुलामी करवाए और कहे, दाम भी नहीं दूँगा, कोई सुख-सुविधा नहीं दूँगा, बदले में तुम्हें किसी तरह की कोई स्वार्थ-पूर्ति नहीं मिलेगी, कोई करेगा ग़ुलामी?
लोग आते हैं, कहते हैं, हम यहाँ फँसे हुए हैं, हमारी हालत, हम बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, हमारी हालत ख़राब है। मैं कहता हूँ, ये मत बताओ कि फँसे कहाँ हो? ये बताओ कि वहाँ फँसने के तुम्हें दाम कितने मिल रहे हैं। कोई भी व्यक्ति ग़ुलामी सिर्फ़ एक कारण से स्वीकार करता है कि उस ग़ुलामी के एवज़ में, उस गुलामी के बदले में, उसे कुछ दिया जा रहा होता है। और व्यक्ति मूल्यांकन नहीं कर पा रहा होता कि जो कुछ भी उसको दिया जा रहा है, वो बहुत कम है उस नुकसान की अपेक्षा, जो वो ग़ुलामी बर्दाश्त करके झेल रहा है। ये समस्या है।
अब आज का युवा; दुनिया इतनी समृद्ध, संपन्न कभी भी नहीं थी जितनी आज है। तो आज ग़ुलामी के जो दाम मिलते हैं, उतने कभी नहीं मिलते थे। तो आज ग़ुलामी को ठुकराना और मुश्किल होता जा रहा है।
प्रश्नकर्ता: आपने तो ख़ुद छोड़ दिया और युवाओं को कह रहे हैं कि दाम मिल रहे हैं, इसलिए उन्होंने पकड़े रखा है।
आचार्य प्रशांत: तो इसीलिए तो हमारा इनका प्यार है न। ये इनके सामने कोई तो खड़ा होता है, जो कि अभी दाम लेकर बिकने को तैयार नहीं है। तो यही बात इन्हें अच्छी लगती है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम सावन है। आपको जितना सुना है, उसमें ये पाया है कि भारतीय दर्शन परंपरा संस्कृति को बचाने के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की दासता और बंधनों से मुक्त करने के लिए है। आज जो भारतीय संस्कृति और परंपरा है, वो वास्तविक दर्शन से तो तालमेल रखती नहीं है काफ़ी हद में विकृत हो चुकी है। तो इस विकृति का क्या प्रभाव युवाओं के जीवन पर पड़ रहा है, और इसका क्या प्रभाव साहित्य पर पड़ा है? क्योंकि ये साहित्य का मंच है, तो साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है?
आचार्य प्रशांत: बहुत बड़ा स्कोप है, जो ये प्रश्न आपने पूछा है, इसके उत्तर को बड़ी व्यापकता चाहिए होगी। उतना शायद हमारे पास समय है नहीं। पर मैं उसमें संक्षेप में जो बोलता हूँ, देखिए, कहते हैं न, हम सदा से साहित्य समाज का दर्पण है, आईना है। तो किसी समय में किसी समाज में कैसा साहित्य रचा जा रहा है, ये बात संयोगिक या अनायास नहीं होती है। सामाजिक परिस्थितियाँ बहुत हद तक तय करती हैं कि साहित्य कैसा रचा जाएगा और कौन-सा साहित्य है जो प्रकाश में, प्रमुखता में आएगा, जनमानस के बीच लोकप्रिय हो पाएगा।
अब बिल्कुल हो सकता है कि आज कोई उदयमान लेखक हो, प्रतिभावान हो, और बहुत अच्छी किताब लिखे और वो किताब बिल्कुल धारदार है, और सच बोल रही है, लेकिन उसे कोई पाठक ही न मिले। बिल्कुल हो सकता है।
तो व्यक्ति ही समाज बनाता है, और व्यक्ति की दशा ही तय कर देती है कि उस समाज में कलाओं का क्या स्थान और स्तर होगा।
ठीक है? तो ये आप निश्चित जान लीजिए।
तो साहित्य हो, संगीत हो, कलाकृतियाँ हों तरह-तरह की जिसमें सिनेमा भी शामिल है, ये सब की सब प्रदर्शित कर रही हैं आज आम आदमी के मानसिक स्तर को। हम तो आप उनको जब देखते हैं, तो पता चल जाता है कि हम कहाँ पर खड़े हुए हैं। ठीक है? बाक़ी आपने जो बोला, उस पर बात आधे-एक घंटे हो सकती है। कोई उसमें विशेष बिंदु हो जो आप पूछना चाहते हों, तो वो बोल दीजिए।
प्रश्नकर्ता: युवाओं के जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है, जो विकृति आई है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, हमारे ज़्यादातर लोग न अपने चलाए चलते नहीं हैं, हमारा मन हमारा नहीं होता। आजकल एक शब्द प्रचलित हो रहा है, एल्गोरिथ्मिक कॉन्शियसनेस। आपकी चेतना को सोशल मीडिया एल्गोरिदम चला रहा है। क्योंकि युवा अपना बहुत सारा समय मोबाइल की स्क्रीन के सामने बिता रहा है।
टीवी नहीं देखते युवा, बहुत कम देखते हैं। मोबाइल देखते हैं। और टीवी में तो फिर भी प्री-प्रोग्राम्ड कार्यक्रम आता है आपके सामने, कि 9:30 बजे इस चैनल पर ये आएगा, तो वही आना है। सोशल मीडिया एक मामले में अलग है और ख़तरनाक है। वो आपका मन पढ़ता है, मन की वृत्तियाँ और विकार पढ़ता है, आपकी पसंद-नापसंद पढ़ता है। और उसी के अनुसार आपको वही दिखा देता है और ज़्यादा जो आप पहले से हो।
लालची आदमी को लालच से भरी सामग्री दिखा देगा सोशल मीडिया आपकी फ़ीड में वही सब आएगा। डरे आदमी को डरी हुई चीज़ें। हिंसक आदमी को हिंसक। नफ़रती आदमी को नफ़रत बढ़ाने वाली चीज़ें दिखा देगा। जो जैसा है, उसको वही दिखा देगा। किसी को नाच में रुचि उसको नाच ही नाच, नाच ही नाच, नाच ही नाच। किसी को कॉमेडी का चसका, वो कॉमेडी, कॉमेडी देख रहा है। किसी को सिर्फ़ सेक्सुअल कंटेंट ही दिखा रहा है, क्योंकि व्यक्ति ऐसा ही है।
तो ढलान पर गिरना आसान होता है। कोई भी व्यक्ति जाकर के आमतौर पर ऊँची उठने वाली चीज़ तो सर्च करता नहीं न एल्गोरिदम में। आदमी ज़्यादातर, सौ में से निन्यानवे मौकों पर, कोई व्यर्थ की चीज़ ही सर्च करता है। और एल्गोरिदम आपको वही-वही चीज़ें बार-बार दिखाएगा। वो बेकार चीज़, जो आपने सर्च करी थी, वही आपकी ज़िंदगी बन जाएगी। क्योंकि जो आप अपनी आँखों से ले रहे हो, वो भी भोजन है। वो आपका शरीर बन जाएगा। और जो आपका शरीर बन गया, वो सब कुछ जीवन हो गया आपका। आ रही है बात समझ में?
तो आज एक इंस्टाग्राम पर रील चल रही है, उसको साहित्य क्यों न माना जाए? वो भी साहित्य है। यूट्यूब पर कोई वीडियो आ रहा है, उसमें जाकर के कोई कुछ बोल रहा है, पॉडकास्ट जैसा है, वो एक तरह से दर्शन की ट्रेनिंग चल रही है। और वो सब बहुत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है आपको। तो आपको बहुत सतर्क रहना पड़ेगा कि आप उसमें से क्या अपने लिए चुन रहे हो। जो आप चुनोगे, वो और ज़्यादा आपको मिलेगा, और वो चीज़ आपकी ज़िंदगी बन जानी है। तो सावधान रहिए।