
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: अगले प्रश्नकर्ता आपके साथ गोवा शिविर में भी थे और वहीं से ही वे उद्धृत करते हैं। आपने कहा था, ‘आदमी वास्तव में जान जाए उनके ऊपर कौन है। तो आगे लिखते हैं कि आचार्य जी, इस बात को मैं कैसे समझूँ और जान पाऊँ कि ज़िन्दगी निजी भोग


आचार्य प्रशांत: खिंचाव है, आकर्षण है, किधर को जाने की इच्छा, बदल जाने का मन; कुछ अनजाना, कुछ नया पा लेने की अभीप्सा। कोई ऐसा है जिसको ये न होता हो? कोई ऐसा है जो किधर को खिंचता न हो? कोई है जिसको कुछ-न-कुछ आकर्षित न करता हो? सब हैं


प्रश्नकर्ता मेरे को पता है कि मैं नशा करता हूँ और वो एक सर्टेन टाइम (निश्चित समय) पर आता है। शाम हो जाती है तब मन उधर को पूरा खिंचा चला आता है। वो जो मज़ा देता है मैं उसको छोड़ भी नहीं पाता और मैं कहीं भी कोई भी…

Acharya Prashant: If you look at knowledge that man has gathered in various fields, you will easily see that all of man’s knowledge is related to man’s desire. Man does not try to gain knowledge in fields that have absolutely no connection with man’s fundamental desires.


Maturity is when you can transcend your body, and by the body, I mean the bodily compulsions. That includes your thoughts, your feelings, and everything because they are all bodily. You very well know how chemicals in the body translate into thoughts and feelings. Read more...


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने कहा था कि किसी को बचाने से पहले ख़ुद पहले योग्यता अर्जित करो। तो विवाह के लिए क्या योग्यता अर्जित करें और कब माने कि कोई विवाह के योग्य भी है।

प्रश्नकर्ता: आपकी वीडियो देखती हूँ मैं हमेशा। और आपने बहुत लोगों को इस राह पर लगाया है, सत्य की राह पर। मैं भी बहुत महीनों से आपको सुन रही हूँ। और ऐसे जीवन को देखने लगी हूँ अभी। विवेक थोड़ा-थोड़ा जाग्रत होने लगा है, क्या सत्य है, क्या असत्य है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिछले कुछ समय से महिलाओं के प्रति दुराचार की घटनाएँ बहुत सामने आ रही हैं। यह सब देख कर मन बहुत खिन्न है। कृपया कुछ कहें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुदेव। चरण स्पर्श। मुझे प्रश्न नहीं करना है एक अनुरोध है कि आपके पिछले शिविर से जो कुछ सीखा उससे कामवासना में निम्नता आई, जिससे पत्नी की ओर से खिन्नता हमको समझ में आई। पत्नी से सत्र से जुड़ने का अनुरोध भी किया। आरम्भ में वो तैयार नहीं

प्रश्नकर्ता: मैं एक आध्यात्मिक संस्था से छः सालों से जुड़ा हुआ हूँ और आध्यात्मिक साधना का अभ्यास कर रहा हूँ। तीन साल तक ये साधना अच्छी चली लेकिन तीन साल पहले मेरी शादी होने के बाद मेरा ध्यान भटकने लगा।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे अभी थोड़े ही समय पहले तक इसी बात पर चर्चा हो रही थी कि कैसे जो छोटे कस्बे हैं या शहर हैं हिन्दुस्तान में, उसमें क्योंकि लोगों के पास ठीक काम नहीं है करने को, तो अपने समय बर्बाद करने को वो वही सारे ऐबों में

प्रश्नकर्ता: आजकल ये शायद उपयोगी आध्यात्मिकता है कि सन्तुलन बनाएँ। काफ़ी प्रसिद्ध लोग भी ये बोल रहे कि

आचार्य प्रशांत: दुनिया बहुत मूल्य देती है ताकत को और प्रसिद्धि को। दुनिया इन उपकरणों को मूल्य तो देती है पर उनका इस्तेमाल करना नहीं जानती। उनका वो इस्तेमाल करती है मंजिल तक पहुँचने के लिए नहीं, मंजिल से और दूर जाने के लिए। पैसा दुनिया भी कमाती है; मैं

















प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सैक्स (यौन क्रिया) से सम्बन्धित बहुत विचार आते हैं तो उन्हें कैसे कम या नियन्त्रित कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँ ही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो, जो तुमको पता है…
आचार्य प्रशांत डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपनेआप को बहुत मजबूर अनुभव न करो। और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अन्धी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक्क़त नहीं है, अगर वो अन्धी न हों। जो कामना आपको अन्धेरे…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम अंकिता रावत है। सर, जैसे कि मन हमेशा चीज़ों की ओर आकर्षित होता है तो आकर्षित का मतलब होता है कि हमें वहाँ खुशी मिलेगी, हम उसके पीछे भागते हैं और वो और अन्त में हमें दुख ही होता है, मतलब खुशी और दुख का…
जो सबसे अच्छे काम होते हैं उस पर दुनिया कभी इज़्ज़त नहीं देती। दुनिया इज़्ज़त बस उन कामों को देती है जो दुनियादारी के होते हैं। दुनिया जैसे ही काम करो, दुनिया द्वारा स्वीकृत काम करो, दुनियादारी में ही तुम भी लोटने लग जाओ, तो दुनिया इज़्ज़त देगी। सचमुच जो ऊँचे काम होते हैं, उसकी तो कभी इज़्ज़त मिलेगी ही नहीं। तो जो इज़्ज़त के बहुत प्यासे हैं वो फिर कभी सचमुच ऊँचे और अच्छे काम कर भी नहीं पाएँगे। ज़िंदगी में सचमुच अगर कोई काबिल-ए-तारीफ़ काम करना है, कोई मौलिक काम करना है, तो इज़्ज़त की चाह के साथ नहीं करा जा सकता।
Man desires, man gets…
आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिस व्यवसाय में हूँ, मैं जानता हूँ कि इस व्यवसाय में छलकपट, झूठ बड़ी आम बात है। परंतु ये जानने के बावज़ूद भी जो बेहतर से बेहतर मैं कर पा रहा हूँ वो ये है कि मैं इस काम को पूरी ईमानदारी से कर रहा हूँ।…
अगर पीने से तुमको समाधि मिलती होती तो मैं बिल्कुल नहीं मना करता पीने से। तो समस्या पीने में नहीं है। बात ये है कि जब पी रहे हो तो समाधि से और दूर होते जा रहे हो। जब पी रहे हो तो जो तुम्हें वास्तव में चाहिए उससे और दूर होते जा रहे हो। पीने में ये बुराई है। कोई आकर के अगर सिद्ध कर दे कि पीने से उसे परमात्मा मिलता है तो मैं कहूँगा, ‘तू अब पानी भी मत पी, सिर्फ़ शराब पी।’ कसौटी शराब नहीं है, कसौटी परमात्मा हैं। पर उसका तो तुम नाम ही नहीं ले रहे।
आचार्य प्रशांत:देखो, अभी- अभी हमने बात करी कि जीवन में कोई भी निर्णय करना…
आचार्य: ये जो बाहर वाले तुम्हारे भगवान हैं, उनका क्या काम है? तुम्हारी कामनाओं की पूर्ति करना। तो उसको तुम बोलते हो पॉज़िटिव एनर्जी। (सकारात्मक ऊर्जा) ठीक है? जो तुम्हारी कामना पूर्ति करे उसको तुम…
आचार्य प्रशांत: देखो, मैं तीन की बात करता हूँ हमेशा। एक होती है आत्मा, सच्चाई; दूसरे होते हैं सांसारिक प्रभाव और…
मैंने शादी के जो सपने संजोए थे कि उच्चतम सुख…
We see the craving for what it is, laugh it off once, and soon it is back. The laughter “is lazy and goes off to sleep,” as the talk puts it. We are taught to chase our dreams, yet desire is only the ego’s agenda under another name. “Want is not sacred.” Suffering cannot be wished away either, but we do have a choice in how we live with it. Can we keep laughing at our own wants, and ask where they really come from?
आचार्य प्रशांत: मैं कुछ बातें सामने रख रहा हूँ, मुझे नहीं मालूम मैं उनको पूरी तरह समझा सकता हूँ या नहीं। पर अगर आप में ज़रा भी अंतर्दृष्टि होगी तो आप संबंध बैठा पाएँगे। दुनिया की आबादी का बहुत बड़ा तबका है, जो अब यह कहने में गौरव महसूस करता…
We gladly worship Krishna the cowherd of Mathura and Vrindavan, yet the Krishna of Kurukshetra, who speaks the Gita, is rarely welcome. Much of what we call religion is a request: we pick a favourite deity, place and ritual, then ask for a car, money or a cure. The Gita values rituals done for desire as little as a pond beside the ocean. Popular religion says, "I want, therefore I act." The Gita says, "Know who you are and then simply let things happen." Which of the two do our prayers come from?
भारतीय चित्त बहुत हद तक ऐसा हो गया कि हमें कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं करना। नींद आ रही? नहीं आ रही। खाओगे? नहीं खाएँगे। कपड़ा चाहिए? नहीं चाहिए। पैसा चाहिए? नहीं चाहिए। तू जी ही क्यों रहा है फिर, जब तुझे कुछ नहीं चाहिए तो? भीतर कामना भरी हुई है और बाहर से संस्कारी दिखना है। जो खुल के नहीं बता सकता कि उसकी कामना क्या है, उसके पास छुपी हुई बहुत बड़ी कामना है। सरल हो जाओ। प्रकृति ने पैदा किया है। प्रकृति को ही हम महा-माँ बोलते हैं। जैसे भी हो, वैसे हो, पैदा ही ऐसे हुए हो, शर्माने-लजाने की क्या बात है इसमें?
There is such great fun in leaving yourself behind and turning a servant to the Truth. It’s almost like Krishna advising Arjuna, “Talk in everlasting words and dedicate them all to Me—*mām ekaṃ śaraṇaṃ vraja, sarva-dharmān parityajya*.” And at numerous places in the *Bhagavad Gita*, he says, “Arjuna, you are not fighting for yourself, you are fighting for Me. As long as you fight for yourself, if you win, you suffer, and if you lose, you suffer. And when you fight for Me, then you are a victor even before the fight begins.”
फटी हुई जींस पहनने, और बाल रंगवाने से कोई कूल नहीं हो जाता। कूलनेस बहुत अच्छी चीज़ है, परंतु कूल हो नहीं, और ख़ुद को कूल कहो — यह समस्या है। कूल होना आध्यात्मिक बात है। कूल होने का असली मतलब है कि तुम श्रीकृष्ण का ज्ञान जानो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा — तू विगत-ज्वर हो जा। जिसे ज्वर न चढ़े, जो आवेश और आवेग से मुक्त हो, वही वास्तव में कूल है।
आपके लिए लग्ज़री सिर्फ़ मटेरियल होती है। और इसीलिए फिर आप पैसे के पीछे भागते हो क्योंकि पैसा तो टेंजिबल चीज़ें ही ख़रीद सकता है। न्यूयॉर्क में बंगला ख़रीदा है, क्या बस यही लग्ज़री है? बड़ी-से-बड़ी लग्ज़री है, एक सही और सच्चा जीवन। लग्ज़री होती है कि बिना बात के डरना नहीं पड़ता। ये पैसे देकर नहीं ख़रीदी जातीं। तुम जीवन के ग़ुलाम बनकर न जियो, जीवन में इससे बड़ी और क्या लग्ज़री हो सकती है?
सबके ऊपर ये एक बहुत बड़ा फ़ितूर होता है कि अगर बिकेंगे नहीं, तो जिएँगे कैसे? पैसा कहाँ से आएगा? जितना तुमको चाहिए, सचमुच उतना आ जाएगा। और अनाप-शनाप पैसा चाहने की कोई सीमा होती नहीं है। इसीलिए हर इंसान बिक जाता है इन दो चीज़ों पर — एक, कंचन (कंचन माने सोना, पैसा); और दूसरा, कामिनी (कामिनी माने वासना)। इन दो से बचे रहो, तो हो गई क्रांति — एक सही ज़िंदगी अपने आप जीने लगोगे।
तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।
The tiger chases the buffalo calf and brings it down. Does that disappoint you? No, because that was expected. Similarly, expect animal behavior all the time from everyone around you, including yourself. Everything we do comes from the jungle, so don’t be disappointed. Disappointment always arises from expectations. You really have to strive to be someone who is not an animal. And the first step in that striving is to address your own inner animal.
वजाइया वाजा पउण नउ दुआरे परगट कीए दसवा गुपतु रखाइआ।। ~ नितनेम (अनंदु साहिब)
आचार्य प्रशांत: ‘आनन्द साहिब’ से है कि उसने शरीर के वाद्य यन्त्र में साँस फूँकी और नौ द्वार खोल दिये लेकिन दसवें को छुपाकर रखा। दसवाँ द्वार कौनसा है? कौनसा हो सकता है दसवाँ द्वार? मन…
We are told that cleaner technology will solve the climate crisis. But emissions begin before any fuel is burnt, in a life that has no joy and so keeps reaching for the next lower pleasure: the party, the trip, the purchase. The demand for pleasure is not wrong. What matters is which pleasure we seek. Music, books, sport and real company cost the planet almost nothing. Can we look honestly at what our own consumption is trying to fill?
अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।
ये घटना है जो आपको परेशान कर रही है। मैं चाहता हूँ कि आप सिद्धांत की ओर जाएँ, और ये आपको एक बहुत बेहतर और गहरे तरीके से सुरक्षित करेगा। एक बात ये है कि कोई आपको बताता है, “ओह, यूरेनियम की गेंदों के साथ मत खेलो, कुछ बुरा हो सकता है।” एक बात ये है कि आप सिद्धांत जानते हैं। आप ठीक-ठीक जानते हैं कि *क्रिटिकल मास,* गेंद का *रेडियस,* और ऐसी चीज़ें कैसे गणना की जाती हैं। आप क्या चाहेंगे? आप सिद्धांत के बारे में जानना चाहेंगे, है न?
Manifestation is simply an expression of your desire. You desire something, and then you imagine your desire has been fulfilled. What does the common man desire? ‘Give me more money.’ What will the politician desire? ‘Finish off democracy and give me power for life.’ We have very stinking desires. Do we ever desire anything that is really good for everybody? The question remains: Was that thing worth it? You gave it so much time, so much respect, did it deserve that?
प्रेम भी इच्छा ही है, वो बहुत ऊँचे स्तर की इच्छा है। प्रेम नहीं आया, इच्छा ही कम कर ली तो मुर्दा हो गए।
आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…
हर वो चीज़ जो हमारे भीतर के "जानवर" को अच्छी लगती है, वह तुरंत प्रसिद्ध हो जाती है। आप लोकप्रिय होना चाहते हो? कोई बहुत अच्छा या ऊँचा काम मत करना—कोई एकदम घटिया काम कर दो, तुरंत पॉपुलर हो जाओगे। कोई ऐसा काम करो जो एकदम ही गिरे हुए तल का हो। ऊँचा काम करोगे, तो लोगों को समझ में नहीं आएगा, दिखाई भी नहीं देगा और लोग डर भी जाएँगे—क्योंकि ऊँचाई खतरा होती है और ऊँचाई कुर्बानी मांगती है। कौन ऊँचा चढ़े? श्रम भी बहुत लगता है। तो बिल्कुल, कोई एकदम साधारण या साधारण से भी नीचे का कुछ करने लगो, लोग आकर्षित हो जाते हैं आपकी ओर।
You have to be dismissive of any talk of the afterlife. Only then the Gita will make sense to you. Those who have a battle at hand, those who are living in matters of the moment, those who are engaging deeply with the world as it is right now — present to them — they are the ones who will find the Gita useful, indispensable rather.
Once you know where you are chained, you already have the right desire. The right desire is to break the chain. It begins with an observation, and admission of your own state. The right desire is a desire to be free, to be at ease, to be able to flow. To be without fear, that is the right desire. But when we say the right desire is about being fearless, first of all you have to figure out where your fears are.
How is it surprising then that nothing really appeals to you, that you don't find anything worthy of—let's come to that word—love? And except for love, what is it that can hold you for long? Greed, attractions, good foods, good clothes, nice odor, prestige, excitement—these are small things that will not be able to keep you for long. However, to compensate for their lack of quality, they proliferate in quantity.
हम चाहते हैं कि दुनिया की टॉप कंपनी का नाम, ब्रांड, उसकी पर्क्स-प्रिविलेजेस भी मिल जाए, और साथ ही बिल्कुल साफ़ काम करने की संतुष्टि भी मिल जाए। अगर आपको गरिमा के साथ सही काम करना है, तो फिर इस पूरी व्यवस्था से बाहर निकलकर अपने लिए एक अलग रास्ता बनाना पड़ेगा, नहीं तो आपको पाखंडी होना पड़ेगा। जैसे बड़ी कंपनीज़ पहले पॉल्यूशन करते हैं और फिर CSR का पाखंड।
Who are the people who never understand Shri Krishna? The ones whose minds are full of Karmakand. If your mind is full of Karmakand, Shri Krishna himself has very clearly said, you will never understand the Gita because Karma Kand deals with desire, because whatever you do, you do for the sake of desire.
A mind full of desires gets blind. It comes to supremely stupid conclusions, and it refuses to see or acknowledge facts that disrupt or disprove its biases. It's just that the fulfillment of the desire stands zero chance of your fulfillment. But there is definitely some chance that the desire can get fulfilled. And if you are stupid enough and laborious enough, the chance of desire fulfillment can also multiply.