(गीता-12) फिर सारे अधिकार तुम्हारे हैं, अर्जुन! || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।२.६४।।
राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त करता है।
आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता दूसरा अध्याय, सांख्य योग, श्लोक क्रमांक चौंसठ। “राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त… read_more