विकसित देशों की चमक अक्सर प्रदूषण मिटाने से नहीं, उसे अपनी सीमाओं से बाहर धकेलने से बनी है। कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय नुकसान का बड़ा हिस्सा गरीब देशों पर डालकर वे स्वयं को "स्वच्छ" कहते हैं। यदि स्वच्छता का पैमाना कम कार्बन है, तो उसी कसौटी पर कई विकासशील देश उनसे अधिक स्वच्छ सिद्ध होते हैं। वास्तविक स्वच्छता तकनीक या दिखावे से नहीं, बल्कि उस चेतना से आती है जो उपभोग, शोषण और पर्यावरण विनाश की जड़ - अहंकार - को समाप्त करे।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Navbharat Times on 5 July '26
इन दिनों मैं ब्रिटेन के दौरे पर हूं। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और ब्रिटिश पार्लियामेंट में बोध, स्वतंत्रता और जलवायु संकट पर चर्चा के बाद लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में प्रफेसर जोनाथन बर्च के साथ पशु चेतना और पर्यावरण पर लंबा सार्वजनिक संवाद हुआ। उसी शाम मैं रिचमंड पार्क गया। हिरण घास पर बेफिक्र चर रहे थे, खरगोश झुरमुटों से कूद-कूदकर निकल रहे थे। पहली नजर में पार्क यही कहता दिखता है: प्राणियों को कैसी आजादी, कैसी सुरक्षा! फिर पता चला कि इसी पार्क से हर साल लगभग 200 हिरण योजनाबद्ध ढंग से मार दिए जाते हैं।
यह पार्क 17वीं सदी में राजा चार्ल्स प्रथम ने शिकार के लिए बनवाया था। सदियां बीती, शिकार बंद हुआ, पर हिरण उसी घेरे में रहे। यानी पहले बसाओ, फिर बसाहट को समस्या बताओ और उस समस्या का हल हत्या बताओ। और यह हत्या होती भी है तो इतनी चुप्पी से, इतने अंधेरे में कि किसी आने वाले को भनक तक न लगे, ठीक वैसे ही जैसे बूचड़खाने शहर की नजर से दूर रखे जाते है। हो सकता है कि असली गंदगी सिर्फ छुपा दी गई हो। यही सवाल पूरे शहर पर लागू होता है। लंदन की सड़कें चमकती है, लॉन इतने बेदाग कि आंखें ठहर जाएं। असली परख यह है: यह चमक किसकी सेवा में है और किसकी कीमत पर?




