Navbharat Times
5 Jul '26

विकसित देशों की सफाई का असली हिसाब कौन देगा?

Acharya Prashant

4 min
2k reads
विकसित देशों की सफाई का असली हिसाब कौन देगा?
विकसित देशों की चमक अक्सर प्रदूषण मिटाने से नहीं, उसे अपनी सीमाओं से बाहर धकेलने से बनी है। कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय नुकसान का बड़ा हिस्सा गरीब देशों पर डालकर वे स्वयं को "स्वच्छ" कहते हैं। यदि स्वच्छता का पैमाना कम कार्बन है, तो उसी कसौटी पर कई विकासशील देश उनसे अधिक स्वच्छ सिद्ध होते हैं। वास्तविक स्वच्छता तकनीक या दिखावे से नहीं, बल्कि उस चेतना से आती है जो उपभोग, शोषण और पर्यावरण विनाश की जड़ - अहंकार - को समाप्त करे। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

Originally published in Navbharat Times on 5 July '26

इन दिनों मैं ब्रिटेन के दौरे पर हूं। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और ब्रिटिश पार्लियामेंट में बोध, स्वतंत्रता और जलवायु संकट पर चर्चा के बाद लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में प्रफेसर जोनाथन बर्च के साथ पशु चेतना और पर्यावरण पर लंबा सार्वजनिक संवाद हुआ। उसी शाम मैं रिचमंड पार्क गया। हिरण घास पर बेफिक्र चर रहे थे, खरगोश झुरमुटों से कूद-कूदकर निकल रहे थे। पहली नजर में पार्क यही कहता दिखता है: प्राणियों को कैसी आजादी, कैसी सुरक्षा! फिर पता चला कि इसी पार्क से हर साल लगभग 200 हिरण योजनाबद्ध ढंग से मार दिए जाते हैं।

यह पार्क 17वीं सदी में राजा चार्ल्स प्रथम ने शिकार के लिए बनवाया था। सदियां बीती, शिकार बंद हुआ, पर हिरण उसी घेरे में रहे। यानी पहले बसाओ, फिर बसाहट को समस्या बताओ और उस समस्या का हल हत्या बताओ। और यह हत्या होती भी है तो इतनी चुप्पी से, इतने अंधेरे में कि किसी आने वाले को भनक तक न लगे, ठीक वैसे ही जैसे बूचड़खाने शहर की नजर से दूर रखे जाते है। हो सकता है कि असली गंदगी सिर्फ छुपा दी गई हो। यही सवाल पूरे शहर पर लागू होता है। लंदन की सड़कें चमकती है, लॉन इतने बेदाग कि आंखें ठहर जाएं। असली परख यह है: यह चमक किसकी सेवा में है और किसकी कीमत पर?

विकसित देश एक भाषा बोलते है: 'स्वच्छ ऊर्जा, स्वच्छ तकनीक।' इस भाषा को ध्यान से परखिए। जिस पल आप किसी तकनीक को 'स्वच्छ' कहते है, उसी पल आप मान चुके होते है कि स्वच्छता का मतलब है कम कार्बन। यानी आपने खुद स्वीकार कर लिया कि जहां कार्बन ज्यादा, वहां गंदगी। अगर यह तर्क मशीन के लिए सच है तो मशीन चलाने वाला समाज इससे कैसे बच निकले? कार्बन ही पैमाना है तो मानिए, तकनीक भले स्वच्छ हो, देश गंदा रहा। और इसी पैमाने पर भारत, जो प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में दुनिया के सबसे कम उत्सर्जन वाले गिनती के देशों में से एक है, तर्क की कसौटी पर सबसे स्वच्छ देशों की कतार में आ खड़ा होता है। जो आज दूसरों को अविकसित' और 'गंदा' कहकर तौलते हैं, उन्हें आईना दिखाने के लिए उनकी अपनी ही परिभाषा काफी है।

सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, अमेरिका जैसे देश 17 से 23 टन के दायरे में है। भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन महज 2 टन, और इसमें भी बड़ा हिस्सा उन चीजों के उत्पादन में खपता है जो किसी दूसरे देश की मेज पर पहुंचती है, यानी भारत अपना नहीं, दूसरों का कार्बन भी उठा रहा है।

ब्रिटेन के अपने आंकड़े इस तर्क को और पैना कर देते है। 1990 के बाद से सीमाओं के भीतर उत्सर्जन 54 प्रतिशत गिरा है। पर जब आयातित चीजों का कार्बन भी जोड़ा जाए तो यह गिरावट 20 फीसदी तक सिमट जाती है। बाकी की कमी, कमी नहीं, स्थानांतरण है। भारी उद्योग उसके धुएं समेत, बाहर भेज दिया गया, मगर जो मांग उस उद्योग को खड़ा रखती थी, वह यही की यहीं रह गई। यहां यह भी सराहना करनी होगी कि यूरोप ने, ब्रिटेन ने, फ्रांस ने, नीदरलैंड्स ने उत्सर्जन घटाने की दिशा में कुछ सच्चे प्रयास किए है। कदम पूरे नहीं पड़े, पर इरादा खोखला नहीं था। लेकिन इस पूरी तस्वीर में एक देश है जो किसी भी जवाबदेही से बाहर खड़ा दिखता है और वह है अमेरिका। जिसने सबसे ज्यादा जलाया, वह सबसे कम जवाबदेह है। सफाई से सचमुच प्रेम होता, तो गंदगी ढकी नहीं जाती, मिटाई जाती। बूचड़खाने को दूर भेजने के बजाय बंद किया जाता, इंडस्ट्री की मांग घटाई जाती, सिर्फ उसका पता न बदला जाता।

Originally published in Navbharat Times on 5 July '26

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories