भारत का संविधान एक बहुत सुंदर फूल है, लेकिन वह जिस पेड़ पर लगा है, वह धर्म का पेड़ है। जो मूल्य भारत के संविधान में निहित है, वह दुनिया के ऊँचे से ऊँचे मूल्यों में है। बाहर की दुनिया में हमें वह सब कुछ चाहिए जो हमें संविधान देता है: सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय; वह सारे अधिकार जो एक मुक्त नागरिक के एक मुक्त समाज में होने चाहिए। लेकिन साथ ही साथ हमें वह सब चाहिए जो हमें भीतर से भी तृप्ति देगा: उपनिषद्, भगवद्गीता। हमें दोनों चाहिए।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपको लगभग एक साल से सुन रहा हूँ। आपकी अनेक बातों में जो मूल एक सिद्धांत मुझे दिखता है, वो ये है कि जीवन को वैज्ञानिक रूप से जिएँ, तथ्यों को देखें और तथ्य ही सत्य का द्वार हैं।
अभी हाल-फिलहाल में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच में दिल्ली शहर में दंगे हुए। ये बात मुझे बहुत आहत कर गई। और जितना आजकल मीडिया में पढ़ने को मिल रहा है मुझे, और जो मेरी छोटी-सी समझ है, उससे ये दिखता है कि जो भारत का संविधान है, जो इतनी मेहनत, मशक्कत और स्ट्रगल के बाद हमें मिला, वो आज के समय में सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक ग्रंथ, एक वैज्ञानिक किताब है, जो हमारे पास मौजूद है।
मेरा प्रश्न आपसे ये है कि जो धर्मग्रंथ इतने पुराने हो चुके हैं और अक्सर कम्यूनल जो लाइन है उसको क्रॉस भी कर जाते हैं; उनके पक्ष में कुछ भी कहा-सुना क्यों जाए, जब हमारे पास संविधान जैसा वैज्ञानिक एक ग्रंथ मौजूद ही है?
आचार्य प्रशांत: भारत का संविधान निस्संदेह मानव-मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता हुआ एक सुंदर ग्रंथ भी है। उसको विधि, क़ानून भर की दृष्टि से ही न देखा जाए; उसको ये समझने के लिए भी देख लिया जाए कि किन मूल्यों और आदर्शों पर चलकर एक राष्ट्र के लोग और एक व्यक्ति भी जीवन बिता सकते हैं। तो वो निस्संदेह मददगार है।




