
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपको लगभग एक साल से सुन रहा हूँ। आपकी अनेक बातों में जो मूल एक सिद्धांत मुझे दिखता है, वो ये है कि जीवन को वैज्ञानिक रूप से जिएँ, तथ्यों को देखें और तथ्य ही सत्य का द्वार हैं।
अभी हाल-फिलहाल में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच में दिल्ली शहर में दंगे हुए। ये बात मुझे बहुत आहत कर गई। और जितना आजकल मीडिया में पढ़ने को मिल रहा है मुझे, और जो मेरी छोटी-सी समझ है, उससे ये दिखता है कि जो भारत का संविधान है, जो इतनी मेहनत, मशक्कत और स्ट्रगल के बाद हमें मिला, वो आज के समय में सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक ग्रंथ, एक वैज्ञानिक किताब है, जो हमारे पास मौजूद है।
मेरा प्रश्न आपसे ये है कि जो धर्मग्रंथ इतने पुराने हो चुके हैं और अक्सर कम्यूनल जो लाइन है उसको क्रॉस भी कर जाते हैं; उनके पक्ष में कुछ भी कहा-सुना क्यों जाए, जब हमारे पास संविधान जैसा वैज्ञानिक एक ग्रंथ मौजूद ही है?
आचार्य प्रशांत: भारत का संविधान निस्संदेह मानव-मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता हुआ एक सुंदर ग्रंथ भी है। उसको विधि, क़ानून भर की दृष्टि से ही न देखा जाए; उसको ये समझने के लिए भी देख लिया जाए कि किन मूल्यों और आदर्शों पर चलकर एक राष्ट्र के लोग और एक व्यक्ति भी जीवन बिता सकते हैं। तो वो निस्संदेह मददगार है।
मौलिक अधिकार संविधान में वर्णित हैं; मौलिक कर्तव्य भी संविधान में वर्णित हैं। सद्भावना, सह-अस्तित्व के मूल्य भी संविधान में उल्लिखित हैं। जीवन के प्रति वैज्ञानिक नज़रिया होना चाहिए, ये बात भी संविधान कहता है। यहाँ तक कि पशुओं की, विशेषकर गौवंश की रक्षा होनी चाहिए, ये बात तक हमारा संविधान कहता है।
‘मुक्ति, आज़ादी, फ़्रीडम;’ ये शब्द संविधान में न जाने कितनी बार आता है। आपको अपने अनुसार अपना धार्मिक आचरण करने की आज़ादी है। आपको अपने अनुसार कहीं भी उठने-बैठने, बसने की आज़ादी है; आने-जाने की आज़ादी है। तो ये सब बातें संविधान में वर्णित हैं। लेकिन जिन्हें आगे जाना हो, जिन्हें आदमी के मन को ही समझना हो, उन्हें फिर ऐसा ग्रंथ चाहिए होगा जिसका उद्देश्य देश में नियम-कायदा चलाना ही भर न हो, बल्कि जिसका उद्देश्य ये हो कि आदमी अपने मन को जीवन को जाने; और मन पर जितने तरीके के अँधेरे और बंदिशें होती हैं, उनसे मुक्त हो सके।
जब संविधान लिखा जाता है, बनाया जाता है, तो उसका ये उद्देश्य होता ही नहीं है। ये तो सराहनीय बात है भारत के संविधान में कि उसने बहुत उच्च कोटि के मानव-मूल्यों को अपने में समेट लिया है। समेट लिया है अच्छी बात है लेकिन फिर भी संविधान का ये उद्देश्य नहीं होता है, न भारत के संविधान का, न दुनिया के किसी देश के संविधान का; कि आदमी को अपने मन की उहापोह से, अपने भीतर के अँधेरे से आज़ादी मिले।
आप संविधान के रचयिताओं के पास जाएँगे, तो वो कहेंगे: “बहुत अच्छी बात है अगर आप आंतरिक तौर पर मुक्त हो जाएँ, बहुत बढ़िया हो अगर हर आदमी आध्यात्मिक तौर से उन्नत हो जाए। लेकिन जब हम संविधान की रचना कर रहे हैं, तब भाई, हम स्पष्ट बता देते हैं कि हमारा उद्देश्य देश चलाना है; हमारा उद्देश्य आदमी की आंतरिक मुक्ति नहीं।”
हाँ, ये बात हम भी समझते हैं, ऐसा कहेंगे रचयिता कि देश को चलाने में सुविधा होती है अगर देश के लोग आंतरिक रूप से जागृत हों, कर्तव्य-परायण हों। तो जब हम चाहते हैं कि लोग अपने कर्तव्य को समझें, जब हम चाहते हैं कि लोग एक-दूसरे की इज़्ज़त करना सीखें, और सद्भावना-पूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास रखें। जब हम चाहते हैं कि कोई किसी को धर्म के आधार पर ऊँचा-नीचा इत्यादि न समझे; जब हम चाहते हैं कि जातिगत या लिंगगत या रंग-आधारित भेदभाव न हो, तो हम निश्चित रूप से ये चाहेंगे कि देश में जगे हुए लोग हों। क्योंकि एक जगे हुए आदमी के साथ देश को इन मूल्यों पर चलाना आसान हो जाता है। आप बात समझ रहे हैं।
जिन्होंने भारत का संविधान दिया, वो चाहते थे कि जात-पात के क्षुद्रपन के आधार पर नहीं चले देश की व्यवस्था। वो नहीं चाहते थे कि अलग-अलग धर्मों के अनुयायी आपस में लड़ते रहें, और जो देश की सरकारी व्यवस्था भी है, वो भी किसी एक समुदाय का पक्ष लेले, समर्थन करे और दूसरे लोगों के विरुद्ध पक्षपाती हो जाए, उनको दबाए; वो ये सब चीजें चाहते थे। वो नहीं चाहते थे कि समाज में जो लोग पिछड़े हैं, वो पिछड़े ही बने रह जाएँ; वो चाहते थे कि सब उठें, सब बढ़ें। महिलाएँ हैं तो महिलाओं को अधिकार मिले; अगर किसी क्षेत्र की जनजातीय आबादी है, आदिवासी इत्यादि हैं, तो उनको विशेषाधिकार मिले। ठीक है।
तो ये सब चीज़ें ज़्यादा आसानी से तब संभव हो पाती हैं, जब देश के लोग जगे हुए हों। तो वो भी स्वागत करते हैं, कहते हैं, “हाँ बिल्कुल अच्छी बात है कि अगर आध्यात्मिक रूप से देश के लोग जागृत हैं, हमारा काम आसान होगा।” लेकिन फिर भी हमें ये बात भूलनी नहीं चाहिए कि अगर वो ये चाहते भी कि देश के लोग आध्यात्मिक रूप से जागृत हों, तो भी ये उनका अंतिम उद्देश्य नहीं है। भूलिएगा नहीं कि वो बैठे हुए हैं संविधान ड्राफ़्ट करने के लिए; उन्हें संविधान रचना है। उन्हें देश को एक नियम-कायदे से चलाना है। देश का आदमी अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी कैसे जी रहा है, इससे उनको विशेष मतलब नहीं है या इससे उनका कम-से-कम प्राथमिक ताल्लुक नहीं है।
उनका प्राथमिक उद्देश्य क्या है? कि देश सुव्यवस्थित रूप से चलता रहे। ये संविधान की बात है। हाँ, देश सुव्यवस्थित रूप से चलता रहे, इसके लिए वो ये ज़रूर चाहेंगे कि देश के लोग भीतर से भी जरा चैतन्य हों, जगे हुए हों। वो ठीक है। पर वो कहेंगे, “भाई, तुम भीतर से चैतन्य हो या नहीं हो, ये फिर भी तुम्हारा निजी मसला है। हम चाहेंगे कि तुम भीतर से जगे हुए हो, लेकिन अगर तुम नहीं भी होते, तो तुम जानो। हमारा प्राथमिक उद्देश्य क्या है? कि हम उन नियमों की, उन आधारों की स्थापना कर दें जिनके आधार पर इस देश में एक राजनैतिक व्यवस्था चलेगी।” ये उनका प्राथमिक उद्देश्य था। ठीक है, बात समझ में आ रही है।
अब आते हैं धर्मग्रंथों पर। धर्मग्रंथों का प्राथमिक उद्देश्य ही दूसरा होता है। कोई धर्मग्रंथ आपको ये बताने नहीं आएगा कि राजनैतिक व्यवस्था कैसी चलनी चाहिए, इत्यादि। धर्मग्रंथ का प्राथमिक उद्देश्य है, आदमी को व्यक्तिगत रूप से उसके आंतरिक नरक से बचाना। हम बाहर ही बाहर की परेशान तो होते हैं, एक परेशानी ये है कि देश में राजनैतिक अव्यवस्था है या सामाजिक उथल-पुथल है, वो तो बाहर की परेशानी हो गई। और एक अंदर की परेशानी होती है न, जिसमें ऐसा भी हो सकता है, बल्कि ऐसा ही ज़्यादा होता है कि बाहर तो सब ठीक-ठाक चल रहा है, बड़ी सुव्यवस्था है। कई देश ऐसे हैं पश्चिम में जहाँ आप जाएँगे तो सड़कों पर आपको बड़ा अनुशासन मिलेगा, और जितनी भी वहाँ पर सरकारी व्यवस्थाएँ हैं, वो सब आपको बिल्कुल ढर्राबद्ध मिलेंगी। सब काम वहाँ नियम-कायदे से हो रहा होगा। लेकिन आदमी के अंदर संग्राम मचा हुआ है; आदमी के अंदर नरक उबल रहा है।
तो इन दोनों का उद्देश्य अलग-अलग है। संविधान चाहता है कि बाहर की व्यवस्था ठीक-ठाक रहे। उसने कुछ नियम दे दिए हैं, बाहर किसी तरीके से एक सुव्यवस्था चलती रहे, अराजकता न फैलने पाए, इसके लिए। और जब आप जाते हैं संतों के ग्रंथों की ओर, या वेदान्त की ओर, या अन्य आध्यात्मिक किताबों की ओर, तो वो आपको बिल्कुल नहीं बताएँगे कि सड़क पर कैसे चलना है, केंद्रों और राज्यों में धन का बँटवारा कैसे होगा, और केंद्र कब राज्य सरकार को बर्ख़ास्त कर सकता है, या कि किसी भी राज्य में राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होगी, कहीं पर विधानसभा होगी कि नहीं होगी। समझ में आ रही है बात? ये सब काम धर्मग्रंथों के नहीं हैं।
धर्म-ग्रंथ कहते हैं, “हमें इस बात से मतलब क्या। हमारा क्षेत्र ही अलग है; हमारा क्षेत्र है, मन और जीवन। हम तुमसे बात करना चाहते हैं तुम्हारे दिल की। वहाँ क्या चल रहा है भाई? और ले आओ बाहर जितनी क्रांति लानी है, बाहर जितनी तरह की सुव्यवस्था लानी है, बदल लो जितनी धाराएँ बदलनी हैं। भीतर अगर तुम्हारे डर बैठा ही हुआ है, भीतर अगर तुम्हारे लालच और वासनाएँ बैठी हुई हैं, तो बाहर की व्यवस्था से तुम्हें बहुत लाभ नहीं होने वाला।” बात समझ में आ रही है?
अब संविधान तो कह देगा कि भारत सेक्युलर, सोशलिस्ट है; लेकिन भीतर अगर धर्म का अर्थ ही नहीं पता, तो धर्मनिरपेक्ष तो क्या होंगे आप, अधर्मी ज़रूर हो जाएँगे।
ठीक है?
आप अगर संविधान को उठाएँ, आरंभ में ही उसके प्रीएम्बल में लिखा है: “डेमोक्रेटिक, सेक्युलर, सोशलिस्ट रिपब्लिक।” आप जानते ही नहीं हैं कि ‘जन’ कौन है, तो ‘जनतंत्र’ का आपके लिए क्या अर्थ हो जाना है भाई? ‘जन’ माने इंसान, ‘जन’ माने जीव। जीव पता नहीं, तो जनतंत्र के प्रति आप कौन-सी निष्ठा दिखा लोगे? और आप जनतंत्र का नारा बहुत लगा भी लोगे, तो बात खोखली-सी होगी। आपके लिए जनतंत्र का इतना ही मतलब होगा, कि आओ वोट डाल दो, अपनी-अपनी अक़्ल के अनुसार। ख़ुद जैसे हो उसी तरीके का नेता चुन लो; और फिर उस नेता की कोई बात ठीक न लगे तो सड़कों पर कूद-कूद के नारे लगा दो, कहोगे, “यही तो जनतंत्र है!”
इस तरीके का जनतंत्र तब होगा, जब जीवन में अध्यात्म नहीं है। ‘जन’ का ही अर्थ नहीं समझते, जनतंत्र क्या करोगे? ‘धर्म’ नहीं समझते, धर्मनिरपेक्षता का क्या अर्थ कर लोगे भाई? फिर तो धर्मनिरपेक्षता का इतना ही अर्थ रह जाएगा तुम्हारे लिए, कि “मुझे किसी भी तरीके से धर्म की बात करनी ही नहीं है; धर्म को ही अस्पृश्यता का विषय बना लो; कहोगे धर्म से दूर-दूर रहना है।” क्यों? “क्योंकि हम धर्मनिरपेक्ष हैं!”
इसी तरीके से जब मन में करुणा ही नहीं, तो कैसे हो जाओगे ‘सोशलिस्ट?’ समाजवाद का अर्थ क्या हो गया तुम्हारे लिए? समाजवाद के पीछे जो मूल भावना है, वो यही है कि आदमी और आदमी में भाई इतना भी फ़र्क़ नहीं होना चाहिए कि एक राजा और एक रंक। जब प्रकृति ने सबको बराबर ही बनाया है, तो इतना मत अंतर कर दो कि सारी पूँजी कुछ हाथों में चली गई और बाक़ी सब ऐसे ही खाली-बैठे घूम रहें हैं भिखारी की तरह।
हाँ, ये बात बिल्कुल समझ में आती है कि आदमी और आदमी में संकल्प का और श्रम का अंतर होता है। जिसमें ज़्यादा संकल्पशीलता है, जो मेहनत ज़्यादा करता है, उसके पास शायद पूँजी भी ज़्यादा होनी चाहिए। उतना समझ में आता है। लेकिन ये बात बिल्कुल ठीक नहीं है कि एक आदमी के पास देश के औसत की अपेक्षा दस-हज़ार गुना ज़्यादा पूँजी हो। जो कि होता है, बहुत होता है। ये जानते हैं न हम, दुनिया की 80–90% पूँजी, दुनिया के 1%–2% लोगों के हाथ में होती है। हर देश में आपको इसी तरह का आँकड़ा मिलेगा, कहीं थोड़ा कम, कहीं थोड़ा ज़्यादा।
समाजवाद उठता है प्रकृति की समझ से, समाजवाद की बुनियाद है करुणा। अब संविधान करुणा थोड़े ही सिखा देगा आपको। करुणा और प्रेम का तो बहुत गहरा नाता है। संविधान आपको प्रेम थोड़ी सिखा देगा, हाँ, संविधान वो बहुत ख़ूबसूरती से बख़ूबी कर रहा है जिस काम के लिए उसकी रचना हुई है। संविधान को साधुवाद, बहुत सुंदर संविधान है। लेकिन भाई, वो उतना ही तो करेगा न जितना उसका क्षेत्र उसको अनुमति देता है।
भूलिएगा नहीं कि संविधान का क्षेत्र सीमित है। क्या क्षेत्र है संविधान का? और संविधान का जो क्षेत्र है, उसको हम नहीं सीमित कर रहे; उसको सीमित कर दिया है उसके रचने वालों ने ही। संविधान की परिभाषा ही ये है, कि ये वो विधान है, ये नियमों-क़ानूनों का वो संकलन है जिसके आधार पर ये देश चलेगा; और देश में अन्य जितने भी क़ानून बनेंगे, वो संविधान का उल्लंघन नहीं कर सकते। तो संविधान इस देश का ‘महाक़ानून’ है। ठीक है?
तो क़ानून तो सब आचरण के ऊपर होते हैं न, कि तुम कैसे चलोगे, कैसे खाओगे, कैसे जियोगे। तुम्हारे भीतर क्या चल रहा है, इस पर कोई क़ानून बनता है कभी? बोलो। कोई क़ानून आपको ये बता सकता है कि आप क्या सोचेंगे? कोई क़ानून क्या ये आपको सिखा सकता है कि आपकी भावनाएँ कैसी होनी चाहिए? किससे प्रेम करना है, किससे नहीं करना है? तो संविधान भी सब बाहर-बाहर की बातें कर लेता है; अंदर की बात वो बिल्कुल नहीं करता, क्योंकि वो कर नहीं सकता ही नहीं है।
अंदर की बात करने के लिए फिर आपको चाहिए उपनिषद्; फिर आपको चाहिए कोई भगवद्गीता। तो ये बहुत ही नासमझी की बात है कि लोग कहते हैं, “साहब! न गीता, न क़ुरान, मेरा तो ग्रंथ है संविधान!” ये बेकार की बात है। जो लोग ये बात कह रहे हैं, वो गीता-क़ुरान तो ज़ाहिर है नहीं समझते; वो संविधान भी नहीं समझते। शायद उन्होंने संविधान कभी ठीक से पढ़ा ही नहीं।
संविधान आप ठीक से पढ़ेंगे, तो आपको ही समझ में आ जाएगा कि संविधान का एक दायरा है और उस दायरे में वो एक ज़बरदस्त काम कर रहा है। लिखित संविधानों में दुनियाभर में भारत का संविधान शायद श्रेष्ठतम है। जितना विस्तृत भारत का संविधान है, इतने बहुत कम संविधान हैं। और जो मूल्य भारत के संविधान में निहित हैं, वो दुनिया के ऊँचे से ऊँचे मूल्यों में हैं। लेकिन फिर भी, ये बात मैं चौथी-पाँचवीं बार दोहराकर कह रहा हूँ, संविधान का दायरा तो सब बाहर का है न। तुम भीतर-ही-भीतर जल रहे हो ईर्ष्या में, जैसा कि सब जलते हैं। अगर 140 करोड़ की भारत की आबादी है, तो उसमें से कितने लोग ईर्ष्यालु हैं? बताइएगा। 140 करोड़ में से कितने लोग ईर्ष्या का अनुभव करते हैं? 140 में से 140 करोड़! संविधान में कहीं भी लिखा है क्या, ‘डू नॉट बी जेलस।’ लिखा है क्या?
तो ईर्ष्या से बचना है, ये संविधान थोड़ी बताएगा, बाबा! इतनी-सी बात समझ में क्यों नहीं आती है? लोग कहते हैं, “नहीं साहब, हमारे तो नेता वही हैं; हम उन्हें अब नेता ही नहीं मानेंगे, उन्हें तो हम साधु भी मानेंगे, जिन्होंने संविधान की रचना कर दी।”
ठीक-ठाक बात करो। क्या कर रहे हो? बेशक वो इज़्ज़त के हक़दार हैं, लेकिन जो जिस कोटि का है, उसको उसी कोटि में रखो भाई। ट्रेन बहुत ज़ोर से भागेगी तो प्लेन थोड़ी हो जाएगी। हाँ, बुलेट ट्रेन है, तो उसको नमस्कार है; क्या भागती है! बहुत तेज़ भागती है। लेकिन कितना भी तेज़ भाग ले, वो ज़मीन की चीज़ है, अध्यात्म आसमान की चीज़ है। बुलेट ट्रेन भी हवाई जहाज़ नहीं हो जानी है।
इसी तरीके से संविधान ज़मीन की शायद श्रेष्ठतम चीज़ है; बिल्कुल बुलेट ट्रेन है, लेकिन आसमान की चीज़ नहीं हो सकता वो। समझ में आ रही बात? और आप कहेंगे, हमें आसमान चाहिए ही नहीं। आपको आसमान इसलिए नहीं चाहिए क्योंकि आपने अपना मुँह ही ज़मीन में गाड़ रखा है। और इसीलिए कारण आप भीतर से इतने जल रहे हैं, इतने दुखी हैं, इतना बुखार है भीतर से। आदमी ऐसा है कि उसको लगातार एक आंतरिक अशांति बनी ही रहती है, और वो आंतरिक अशांति जब तक मिटेगी नहीं तब तक बाहर की व्यवस्था कितनी भी साफ़-सुथरी कर दी जाए, बाहर आपको कितना भी न्याय दे दिया जाए, आप भीतर से अतृप्त ही रहेंगे।
कोई ये सोचे अगर कि सामाजिक न्याय मिल जाएगा या आर्थिक न्याय मिल जाएगा, तो बस मज़ा आ गया, जीवन के सब उद्देश्यों की पूर्ति हो गई, तो वो पगला है। हमें दोनों चाहिए। बाहर की दुनिया में हमें वो सब कुछ चाहिए जो हमें संविधान देता है: सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, वो सारे अधिकार जो एक मुक्त नागरिक के, एक मुक्त समाज में होने चाहिए। हमें वो सब निस्संदेह चाहिए; हमारे लिए संविधान बहुत आवश्यक है। लेकिन साथ ही साथ, हमें वो सब भी चाहिए जो हमें भीतर से भी तृप्ति देगा, जो भीतर की ज्वाला को शांत करेगा। हमें दोनों ही चाहिए। बात समझ में आ रही है? इन दोनों में से कोई भी दूसरे का विकल्प नहीं हो सकता।
कोई ये कहे, कि “संविधान मात्र रखूँगा और आत्मज्ञान में कोई रुचि नहीं, ख़ुद को नहीं जानना, मन को नहीं जानना, जीवन को नहीं जानना।” तो उसका जीवन बाहर से हो सकता है ठीक-ठाक लगे; अंदर-ही-अंदर उसकी हालत बड़ी ख़राब रहेगी। और भूलिएगा नहीं कि बाहर-बाहर आप भले समाज के साथ जीते हों, लेकिन अंदर-अंदर चौबीस घंटे आप अपने साथ जीते हैं। अगर आप अपने साथ स्वस्थ नहीं हैं, तो स्वस्थ से स्वस्थ सामाजिक माहौल भी आपके बहुत काम नहीं आएगा।
अब आते हैं इस बात पर कि बाहरी माहौल और भीतरी माहौल में से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कौन-सा है। चलिए, फिर उन्हीं के पास चले चलते हैं जिन्होंने हमें संविधान दिया, वो कोई एक व्यक्ति नहीं था वह, पूरी की पूरी कमेटी थी और बहुत ज़बरदस्त लोग थे उसमें जो बैठे थे। उन्होंने ये सब मूल्य संविधान में नींव की तरह क्यों रखे, कहिए? समता, न्याय, अधिकार, ये सब क्यों रखे? क्या वजह थी? बाहर की दुनिया में आपको कुछ मौलिक अधिकार मिलें, ऐसी व्यवस्था उन्होंने क्यों करी, कहिए? जो समाज का पिछड़ा और उपेक्षित वर्ग रहा है, उसको बड़े प्यार से हाथ थामकर ऊपर उठाना है, ऐसी व्यवस्था उन्होंने क्यों करी, कहिए? क्योंकि उनके दिल में करुणा थी।
तो बाहर की दुनिया के लिए भी आप एक अच्छा संविधान रच सकें, इसके लिए दिल में करुणा होनी चाहिए। और करुणा संविधान का नहीं, धर्म का विषय है। माने, अंदर से अगर आप ठीक होंगे तभी आप बाहर के लिए भी एक अच्छा आदर्श रच पाएँगे। संविधान एक बहुत अच्छा आदर्श है। तो जो लोग संविधान के निर्माता थे, फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो अपने आपको किस रूप में चित्रित कर रहे हैं या अपना परिचय किस तरह से दे रहे हैं, इतना सुंदर संविधान रचने के लिए आवश्यक है कि वो लोग मूल रूप से धार्मिक रहे हों।
क्योंकि आप धार्मिक नहीं हों तो आप दूसरे की मदद क्यों करना चाहोगे, बोलो। ये मत कह दीजिएगा, कि “ये तो बस मानव-मूल्य हैं।” मानव-मूल्य कुछ नहीं होते, दो ही चीज़ें होती हैं; या तो प्राकृतिक मूल्य, या दैवीय मूल्य।
प्राकृतिक मूल्य ये होते हैं, कि अपने जिस्म को बचाओ, मज़े करो, खाओ-पियो, संतान पैदा करो और ज़िंदगी जियो। ये प्राकृतिक मूल्य जंगल के मूल्य हैं, ये जंगल के मूल्य हैं। प्राकृतिक मूल्य होते हैं, कि अगर एक-दूसरे से किसी तरीके का मेल या गठबंधन करना भी है, सहकारिता, को-ऑपरेशन करना भी है, तो वो इसलिए करना है कि आपस में लाभ हो सके। जैसे शेरों का एक झुंड शिकार करने निकले, तो वो सब आपस में क्या कर रहे हैं? को-ऑपरेशन कर रहे हैं, पर वो को-ऑपरेशन क्या प्रेम के नाते है, वो किस लिए है? कि शिकार करने में मदद मिलेगी। तो ये प्राकृतिक मूल्य होते हैं। प्रकृति में भी ऐसा होता है, कि “ज़रा भाई ठीक-ठाक चलें” ऐसा है, वैसा है।
जानते हो, शेर शिकार करने जाता है या कई अन्य जंगली जीव भी; तो जिन प्रजातियों को मारकर खाया जाता है, अगर ये एहसास होने लगता है शिकारी जीवों को कि उन प्रजातियों की तादाद घट रही है, तो उनका शिकार करने में सकुचाते हैं। तुम्हें क्या लग रहा है, ये करुणा के नाते है? इसी तरीके से शिकार अगर करने जा रहे हैं तो वो पहली वरीयता देते हैं प्रौढ़ जानवरों को। जो शावक होते हैं, नन्हे बच्चे, मान लो हिरण के वग़ैरह, उनको नहीं मारना चाहते। ये न प्रेम है, न करुणा है। ये प्रकृतिगत स्वार्थ है, क्योंकि भाई, अगर सारे ही मार दिए तो खाने को क्या पाओगे? तो इसीलिए उतने ही मारो, जितने में तुम्हारे शिकार का भी वंश चलता रहे। फल तोड़ो, पेड़ मत काट दो; वही वाली मानसिकता, अगर फल चाहिए तो।
तो ये प्राकृतिक मूल्य होते हैं। या तो इन प्राकृतिक मूल्यों पर चल लो। और दैवीय मूल्य फिर दूसरे होते हैं, दैवीय मूल्य मानव-मूल्य नहीं कहे जा सकते। दैवीय मूल्य परा-मानव मूल्य हैं, वो धार्मिक मूल्य हैं। दैवीय मूल्य आपको यूँ ही नहीं मिल जाएँगे। आप कहें, “हम पैदा हुए हैं, तो हमें पता है न कि दूसरे को इज़्ज़त देनी है।” नहीं साहब, आप बच्चे को मत सिखाइए कि इज़्ज़त देनी होती है, वो इज़्ज़त देना नहीं जानेगा। प्राकृतिक मूल्य नहीं है सम्मान देना ज्ञान को, ये बात तो धर्म सिखाता है।
हाँ, आप कह सकते हैं, कि “पर मैंने तो कभी धार्मिक शिक्षा ली नहीं; उसके बाद भी मैं प्रेम जानता हूँ, करुणा जानता हूँ, सम्मान देना जानता हूँ।” हो सकता है कि आपने औपचारिक रूप से धार्मिक शिक्षा न ली हो, लेकिन आप पर किसी न किसी तरीके से धार्मिक प्रभाव पड़े हैं, तभी आप जानते हैं दूसरे की भलाई के लिए अपने आप को समर्पित कर देना। प्रकृति में ऐसा नहीं होता।
इंसान भी है तो एक चिम्पैंज़ी, लंगूर ही न, जंगल का बाशिंदा ही न। जंगल में ऐसा नहीं होता कि तुम दूसरे की भलाई के लिए अपना उत्सर्ग कर दो, ना। हाँ, जंगल में ममता होती है, प्रेम नहीं होता। इतना आप देखेंगे, कि छोटा छौना है वो अगर ख़तरे में है तो उसे बचाने के लिए उसकी जो माँ है वो अपने आपको ख़तरे में डाल देगी; पर इसका नाम प्रेम नहीं है, ये तो प्राकृतिक संस्कार है, ये तो शरीर में बसे हुए संस्कार हैं।
समझ में आ रही है बात?
तो जिनको आप मानव-मूल्य कहते हैं न, ह्यूमन वैल्यूज़; वो कुछ नहीं होते, वो वास्तव में धार्मिक मूल्य ही हैं। लेकिन ये हमारी गहरी एहसान-फरामोशी है कि हमने धर्म से मूल्य भी ले लिए और धर्म को उसका श्रेय, क्रेडिट भी नहीं देते। हम ये मानने को तैयार नहीं हैं कि वो धार्मिक मूल्य हैं। वो स्पिरिचुअल वैल्यूज़ हैं, हम ऐसा नहीं कहते, हम उनको क्या कहने लग जाते हैं? ह्यूमन वैल्यूज़, ये तो मानव-मूल्य हैं। मानव-मूल्य कुछ नहीं होते, ये बात अच्छे से समझ लीजिए। आदमी के बच्चे को अगर आप धार्मिकता नहीं सिखाएँगे तो वो जानवर निकलेगा, जानवर से भी बदतर निकलेगा; क्योंकि उसके पास एक बहुत घातक अस्त्र है, बुद्धि। और बुद्धि धर्म का निर्माण नहीं कर सकती, बुद्धि स्वयं या तो धर्म पर चलती है या अधर्म पर।
धर्म बुद्धि से गहरा है, धर्म बुद्धि के पीछे है। बुद्धि दोनों तरह की हो सकती है: धार्मिक और अधार्मिक। अगर आप धर्म में प्रवीण नहीं करेंगे बच्चे को, तो बुद्धि तो उसकी चलेगी पर फिर अधार्मिक तरीके से चलेगी, या आप कह सकते हैं कि प्राकृतिक तरीके से चलेगी। समझ रहे हो?
तो संविधान में भी जो इतने श्रेष्ठ मूल्य आपको देखने को मिलते हैं, भाईचारा, बंधुत्व। ये सब वास्तव में धार्मिक मूल्य ही हैं, लेकिन ये हमने बड़ा गलत काम कर रखा है कि हम मानते भी नहीं कि ये धार्मिक मूल्य हैं। मेरी ही बात सुनकर कई लोगों को बड़ा झंझट हो रहा होगा। वो कहते हैं, “धर्म तो किसी काम की चीज़ है नहीं।” जैसा कि ये जो प्रश्नकर्ता हैं, इनका भाव है। ये कह रहे, “जब संविधान है तो गीता की ज़रूरत क्या है?” भाई, गीता न होती तो संविधान भी नहीं होता। संविधान में जो उदात्तता है, संविधान में जो ऊँचाई है, वो क्या जंगल से आई है, बोलो? संविधान में ये जो बड़प्पन का भाव है, वो आया कहाँ से है? वो धर्म से ही तो आया और कहाँ से आया है।
खेद की बात ये है, कि जिस पीढ़ी ने संविधान की रचना की, उसमें महात्मा गांधी के अलावा कोई नहीं था जिसने धर्म को बराबर श्रेय दिया हो। कोई नहीं था, या कम थे। तिलक थे, गोखले थे, पर जब तक आज़ादी आई तब तक वो थे नहीं। आज़ादी के समय जो बड़े नेता थे, उनमें से बहुत कम थे जो साफ़-साफ़ धर्म को उसका श्रेय देने को तैयार थे। और तो और छोड़ दो मोहम्मद अली जिन्ना, जिन्होंने धर्म के आधार पर ही बँटवारा कराया भारत का, वो तक धर्म को श्रेय देने को तैयार नहीं थे। जिन्होंने उनके जीवन को क़रीब से पढ़ा है, वो जानते होंगे कि जिन्ना क़रीब-क़रीब स्वयं एक नास्तिक थे।
अब इसमें नेहरू की क्या बात करें, अंबेडकर की क्या बात करें, बहुत ऊँचे लोग थे ये लेकिन धर्म को श्रेय नहीं दे पाए कभी, जबकि जो ये कर रहे थे वो काम धार्मिक ही था। और धार्मिक काम, याद रखिए, आप यूँ ही नहीं करने लग जाते। ऐसा नहीं होता कि किसी आदमी को आप धर्म से दूर रखो, दूर रखो, उसको न वेदान्त पढ़ने दो, न भजन गाने दो और वो यकायक धर्म में पारंगत हो जाएगा। नहीं, ऐसा नहीं होता। धर्म की भी शिक्षा देनी पड़ती है।
और मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि आप रीति-रिवाज़ों में किसी को संस्कारित कर दें, तो इसका नाम धार्मिक शिक्षा है। धार्मिक शिक्षा का मतलब होता है, मन के क्रियाकलापों के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण; ये होती है धार्मिक शिक्षा। जीवन में हमें और बाक़ी जितनी शिक्षा मिलती है वो मिलती है बाहर की दुनिया को देखने की, है न?
धार्मिक शिक्षा का मतलब ये नहीं है, कि आपको सिखा दिया गया कि आरती कैसे करनी है या दिन में नमाज़ कितने दफ़े पढ़नी है। ये धार्मिक शिक्षा नहीं है, मैं इसकी बात नहीं कर रहा हूँ। धार्मिक शिक्षा का अर्थ होता है उस तक पहुँचना, वो जो भीतर बैठा हुआ है और हमें चैन नहीं लेने देता। और ये हर आदमी की कहानी है कि नहीं है? सब बेचैन रहते हैं कि नहीं रहते? तो धर्म का मतलब है, अपनी बेचैनी की जड़ों तक पहुँचना। और अपनी बेचैनी की जड़ तक जो पहुँच जाता है, कहते हैं कि बेचैनी से निजात पा जाता है; ये धार्मिक शिक्षा है। बात समझ में आ रही है?
तो धर्म की जड़ें जितनी मजबूत होंगी, उतना ज़्यादा संभव हो पाएगा भारत के संविधान जैसे एक ख़ूबसूरत फूल का खिलना।
भारत का संविधान एक बहुत सुंदर फूल है। लेकिन वो जिस पेड़ पर लगा है, वो धर्म का पेड़ है। उस फूल का रस धर्म की जड़ों से आ रहा है, उस फूल की खुशबू वास्तव में धार्मिक ही है।
लेकिन बहुत सारे नौजवान वग़ैरह होते हैं या थोड़े भीतर से कम विकसित लोग, अल्प-अर्धविकसित लोग, उन्हें लगने लगता है कि ये फूल ऐसे ही आ गया कहीं से; बिना पेड़ के ही फूल आ गया है! वो कहते हैं, “संविधान बनाओ बढ़िया, धर्म की ज़रूरत क्या है!” ये ऐसी सी बात है जैसे कहो, “फूल लाओ बढ़िया, पेड़ की ज़रूरत क्या है!” धर्म का पेड़ नहीं होगा तो संविधान जैसा सुंदर फूल लगेगा कहाँ? समझ में आ रही है बात?
आदमी के दिल में, संविधान के रचयिता के दिल में अगर करुणा का भाव नहीं होगा, तो वो संविधान में वो सारे प्रावधान रखेगा क्यों जो आप पाते हैं आज वहाँ पर? इसी तरीके से समझिए, कि अगर भारत की आबादी ही धार्मिक न होती तो जितनी बातें संविधान में कही गई थीं, उनका पालन क्यों करती? आप बना लो संविधान, काला अक्षर ही तो है, बोलो। पर पिछले सत्तर साल से, कभी थोड़ा कम, कभी थोड़ा ज़्यादा, ये देश संविधान के प्रति निष्ठापूर्ण तो रहा है। डिगता रहा है भीतर-भीतर, इधर-उधर, लेकिन इसने कभी भी संविधान को उठाकर फेंक नहीं दिया, अपमानित नहीं किया, तिरस्कार नहीं किया। कुछ संशोधन किए हैं, वो समय की माँग है। लेकिन फिर भी जो संविधान की मूल भावना है, उसके साथ कभी दुर्व्यवहार नहीं किया इस देश ने। करना चाहता ही नहीं है ये देश।
क्यों नहीं करना चाहता?
क्योंकि सत्तर साल पहले भी जब ये देश अशिक्षित था, ग़रीब था, हर तरीके से पिछड़ा हुआ था, तो भी धार्मिक था।चूँकि ये देश धार्मिक था, इसीलिए ये देश उस संविधान को स्वीकार कर पाया। समझ में आ रही है बात?
तो संविधान भी बिना धर्म के नहीं चल सकता। आप क्या समझते हैं, देश की आबादी सारी खड़ी हो जाए और कहे, “नहीं साहब, हमें तो हिंदू-मुस्लिम दंगे करने ही करने हैं, और हमें तो जात-पात माननी ही माननी है, और हम तो नहीं मानते कि दक्षिण वाले हमारे भाई हैं, कि पूर्व वाले हमारे भाई हैं। हम उनको नहीं भाई मानते। हम पंजाब के हैं, हम बस पंजाबी हैं, हमें और नहीं कुछ पता है।” तो आपको क्या लगता है पुलिस हो या फ़ौज हो, वो देश को एक रख पाएगी?
अगर देश का आम आदमी ही भीतर से जानवर हो जाए बिल्कुल, तो संविधान काम आएगा क्या? कहिए। कितनी पुलिस है, कितनी फ़ौज है? क्या करोगे? देश के नागरिकों पर ही बम गिराओगे? कैसे उनको क़ाबू में रख लोगे अगर वो अंदर से स्वयं ही आत्म-अनुशासित नहीं हैं? बोलो, रख पाओगे क्या उनको क़ाबू में? 140 करोड़ लोग अराजक हो गए, फ़ौज रोकेगी उनको? दुनिया की कौन-सी फ़ौज 140 करोड़ लोगों को बस में कर सकती है? कर सकती है क्या?
तो इस देश के लोग जो संविधान का सम्मान करते आए हैं, दिल से उसको मानते आए हैं, वो इसीलिए मानते आए हैं क्योंकि इस देश की जड़ें धार्मिक हैं। इस देश की जड़ें इतनी धार्मिक हैं कि जब तुम इन धार्मिक लोगों से कहते हो “धर्म-निरपेक्षता” तो वो उसको मान लेते हैं। क्योंकि धर्म ही है जो आपको बताता है कि अक्षर से बड़ा दिल होता है। धर्म ही है जो आपको बताता है, कि एक अलफ़ पढ़ो छुटकारा है। तो इसीलिए इस देश के एक अशिक्षित किसान को भी जब बोला गया, कि “देखो भाई, सरकार लिंग-भेद, रंग-भेद नहीं करेगी, जात-पात के आधार पर, धर्म के आधार पर अंतर नहीं करेगी।” तो ये बात वो तत्काल समझ गया, चुटकी बजाते समझ गया। बोला, ये तो बिल्कुल ठीक बात है! क्योंकि धर्म ने ही तुम्हें बता रखा है, कि “बंदा और बंदा एक हैं, तो भेदभाव कैसा?”
आप क्या सोच रहे हो, ये बात हमें संविधान ने सिखाई है कि पड़ोसी का गला मत काटो, ये बात किसने सिखाई है? ये धर्म ने सिखाई है भाई और धर्म ने नहीं सिखाई होती तो संविधान कुछ नहीं कर पाता। कई लोगों को ऐसी गलतफ़हमी है कि भारतीय तो क़रीब-क़रीब एक जंगली क़ौम है और उनको संविधान के हंटर ने किसी तरीके से अभी अनुशासित कर रखा है। उनको समझ में ही नहीं आ रहा, कि भारत की ज़मीन पर ही संविधान जैसा फूल खिल सकता था। हमें संविधान ने अनुशासित नहीं कर रखा, संविधान हमारी पैदाइश है। हम धार्मिक हैं, इसलिए हमने ख़ूबसूरत संविधान रचा है। संविधान धर्म का ही फूल है; संविधान धर्म के ख़िलाफ़ कैसे इस्तेमाल कर लोगे भाई तुम।
पर लोग आजकल ये कर रहे हैं; नारे लगाएँगे, ये करेंगे, वो करेंगे; वीडियो चल रहे हैं, वो रामचरितमानस जला रहे हैं, गीता जला रहे हैं और कह रहे हैं, “ये सब हटा दो; राम-शिव-श्रीकृष्ण, ये सब मूर्तियाँ तोड़ दो; जय संविधान, जय संविधान।”
ये पागलपन है। ये ऐसी सी बात है कि तुम बाप को जूता लगाकर के बेटे को माला पहना रहे हो। तुम जिनकी मूर्तियाँ तोड़ रहे हो वो बाप हैं संविधान के, उन्हीं के द्वारा दी गई शिक्षा, उन्हीं के द्वारा दिए गए मूल्यों से ही तो ये संविधान रचा हुआ है। बात समझ में आ रही है? तो ये सब बातें जो चलने लगी हैं, मूर्खतापूर्ण, इनसे ज़रा बचकर रहिएगा, कि “ज़रूरत क्या है वो सब बैलगाड़ी के ज़माने के पिछड़े ग्रंथों को पढ़ने की, ये-वो। आधुनिक मूल्य हैं न, आधुनिक मूल्यों पर चलते हैं, ज़िंदगी ख़ुशहाल रहेगी।”
आधुनिक मूल्यों पर चल लो और फिर जब डिप्रेशन होता है तो संविधान से पूछ लेना इलाज। बता दो मुझे संविधान के कौन-से अनुच्छेद में तुम्हारी मानसिक बीमारियों का इलाज लिखा हुआ है? बताओ! बोलो, किस पदाधिकारी के पास जाकर गुहार मारोगे कि “अरे, मेरे भीतर अशांति है; उसके कारण मैं मनोरोगी हो गया हूँ; रात में नींद नहीं आती; आइना देख के कुछ न कुछ बकता रहता हूँ।” तब क्या बोलोगे? “आर्टिकल 292?” कर लो समाधान।
पर हाँ भगवद्गीता के पास जाओगे तो ये जो मनोरोग है, उससे मुक्ति पा जाओगे। मैं नीचा नहीं दिखा रहा हूँ संविधान को, इतनी बात तो समझ में आ रही है न? नारेबाज़ी मत शुरू कर दीजिएगा। आजकल वही है, कुछ कोई कह दे, “अरे! ये भी…।”
क्या है न, अहंकार बड़ी ऊँचाइयों पर है। और जितनी ऊँचाइयों पर है, उतना ही उसको अब समझ में आ रहा है कि वो विफल हो रहा है। आज दुनिया के सामने जो बड़ी-से-बड़ी समस्याएँ हैं, उनका समाधान अहंकार के पास है ही नहीं, आध्यात्मिक मूल्यों में ही समाधान है। इतना सारा आणविक असलहा इकट्ठा कर लिया है: न्यूक्लियर आर्सेनल, फ़िसाइल मटीरियल। तुम कौन-सा विज्ञान लगाकर के दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों को समझा दोगे कि “न्यूक्लियर बटन नहीं दबाना है,” बताओ? फ़िज़िक्स का कौन-सा सिद्धांत लगाओगे डोनाल्ड ट्रम्प या बोरिस जॉनसन को समझाने के लिए कि “नहीं, ये बटन नहीं दबाना है,” बताओ? वो बटन न दबे इसके लिए तो आध्यात्मिक सिद्धांत ही हो सकता है न, करुणा का। बोलो?
इसी तरीके से ये क्लाइमेट चेंज है। उसका कुल कारण आदमी की भोग-प्रियता है, हमें भोगना है, भोगना है; जितना भोग रहे हो उतना ज़्यादा कार्बन उत्सर्जित हो रहा है, बढ़ता जा रहा है। तुम कैसे मनाओगे एक आम आदमी को कि “तू भोग कम कर।” वो कहेगा, “मुझे मज़े लेने दो न! मेरी बीस-तीस साल की ज़िंदगी है मैं मज़े ले लूँगा; बाद में क्या होता है, मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है!” तुम कैसे राज़ी करोगे उसको कि भोग कम कर और बच्चे कम पैदा कर? कैसे करोगे? बोलो?
अहंकार के पास कोई समाधान नहीं है; समाधान आध्यात्मिक मूल्यों के पास ही है।
तो जितने अहंकारवादी हैं, इन सबको साफ़ दिख रहा है कि अब एक ही चीज़ है जो बहुत बड़ा ख़तरा बनकर सामने खड़ी हुई है, सह-प्रमाण वो ख़तरा बनकर खड़ी हुई है, और वो है अध्यात्म। तो आज के समय पर अध्यात्म पर ज़बरदस्त तरीके के हमले किए जा रहे हैं। एक पूरी पीढ़ी तैयार कर दी गई है, ये जो आज की नस्ल है पूरी, जो धर्म से किसी भी तरह का ताल्लुक रखना शर्म की बात समझती है। इन्होंने ‘धर्म’ शब्द को ही गाली बना लिया है।
और ये सब कुछ एक सोची-समझी साज़िश के तहत किया गया है, लोगों को धर्म से बिल्कुल काट दिया गया; धर्म को एक गंदा शब्द बना दिया। कह दिया गया, “धर्म का तो मतलब ही है शोषण; धर्म का मतलब ही है अवैज्ञानिक और कुतर्कपूर्ण बातें; धर्म का तो मतलब ही है अंधविश्वास।” ऐसी बातें ख़ासतौर पर आज की पीढ़ी के मन में कूट-कूटकर भर दी गई हैं। ताज्जुब नहीं कि प्रश्नकर्ता जिन्होंने ये सवाल पूछा, वो भी युवा ही हैं।
हमारी पूरी शिक्षा-व्यवस्था धर्म को एक समस्या की तरह देखती है; “रिलिजियस प्रॉब्लम्स, रिलिजियस प्रॉब्लम्स। अरे! धर्म की वजह से आतंकवाद है; धर्म की वजह से ये दिक़्क़त है, वो दिक़्क़त है।” ये धर्म के विरुद्ध ज़बरदस्त जो प्रचार किया गया है, प्रोपेगैंडा, वो सिर्फ़ कुल इसलिए है क्योंकि अहंकार झुकना नहीं चाहता। जब बहुत ऊँचा हो गया अहंकार, तब तो और मुश्किल हो जाता है उसके लिए झुकना। आज बहुत लोग हैं ऐसे जिनकी गर्दन बिल्कुल अकड़ी हुई है; उनके सर झुकने को राज़ी नहीं हैं; सर उनका न झुके इसके लिए पूरी दुनिया की बलि देने को तैयार हैं। वो अपने आप को ‘बुद्धिजीवी’ बोलते हैं; कभी अपने आप को ‘लिबरल’ बोलते हैं। ले-देकर उनकी मूल पहचान ये है कि उनका कुल भरोसा सिर्फ़ अपनी बुद्धि पर है, जो कि बुरी बात नहीं। लेकिन बुद्धि पूरी चलाते नहीं कभी, तार्किकता को, बुद्धि को, लॉजिक को भी वो कभी निष्कर्ष पर पहुँचने का मौका ही नहीं देते। बुद्धि का भी वो दुरुपयोग करते हैं, अहंकार को संभाले रखने और बढ़ाने के लिए।
वो बुद्धिजीवी नहीं हैं, वो वास्तव में अहम्-जीवी हैं; क्योंकि बुद्धि भी उनकी केंद्रीय पहचान नहीं है; बुद्धि तो उनका उपकरण है, औज़ार है। और उस औज़ार का उपयोग वो मूल काम के लिए कर रहे हैं, और मूल काम है अहंकार को बचाए रखना और बढ़ाना। वो अहम्-जीवी हैं। इन अहम्-जीवीयों ने अध्यात्म को बड़ा तिरस्कृत कर दिया है, बलात्कृत कर दिया है बल्कि। ऐसा दुर्व्यवहार मानव-इतिहास में कभी नहीं हुआ।
आज आपको अपने आप को किसी सार्वजनिक जगह पर धार्मिक घोषित करते हुए थोड़ी-सी हिचक होगी, ख़ासतौर पर अगर उस जगह पर बहुत पढ़े-लिखे लोग बैठे हों। यूटूब पर अपने वीडियोज़ जाते हैं और बात चूँकि उनमें ख़री कही जाती है, तो बहुत लोगों को बहुत चुभ जाती है। उनको और तो कोई तर्क मिलता नहीं, तो हमारे ख़िलाफ़; तो लिख देंगे, “बाबा कहीं का!”
बाबा कहीं का! माने? ‘बाबा’ शब्द ही गाली हो गया! बाबाओं का बहुत बड़ा मुरीद नहीं हूँ, लेकिन ये ‘बाबा’ शब्द गाली कैसे हो गया भाई? जानते हो ‘बाबा’ का वास्तविक अर्थ क्या होता है? बाप। पूर्व में और बंगाली में ‘बाबा’ माने ‘बाप’ होता है। तो “बाबा कहीं का” गाली कैसे हो गया? अब उसमें कुछ काम तो आजकल के बाबाओं का भी है, जो हैं ऐसे कि उनकी हस्ती को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाए, लेकिन फिर भी। और अगर अंग्रेज़ी का वीडियो हो तो उसमें आएगा, “व्हाय शुड आई हियर फ्रॉम ब्लडी बाबा?”
देवी जी, अंग्रेज़ी हमें भी आती है लेकिन ये क्या अदाएँ हैं, “ब्लडी बाबा!” हम हँस सकते हैं इस पर, पर ये हँसी वैसे ही है जैसे किसी पागल आदमी को देखकर आती है। कोई पागल दिख जाता है तो उसको देख के भी कई बार हँसी छूट जाती है न, तो हँसना तो ठीक है लेकिन जब एक पागल को देखो, तो फिर उस पर दया भी तो आती है। तुम्हारी हालत कर किसने दी? जीवन के श्रेष्ठतर मूल्यों से तुम्हारा नाता ही काट दिया गया! आज की पूरी बातचीत में हम कोई और बात न करें, जितनी बात अभी तक हुई है, आप इसको भी ठीक से समझ लें तो बहुत है। इस बात को लेकर किसी के कुछ संदेह हों तो मैं उनको लेना चाहूँगा।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपने कहा कि संविधान के मूल में धर्म है, पर बंच ऑफ बोरॉइंग है संविधान हमारा; कुछ आयरिश कांस्टिट्यूशन से उठाया, डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स; कुछ फ़ंडामेंटल राइट यू.के. से; कुछ यू.एस. से।
आचार्य प्रशांत: क्यों उठाए?
प्रश्नकर्ता: क्योंकि अंबेडकर साहब वहीं उन्हीं को।
आचार्य प्रशांत: उन्हीं को क्यों उठाया? कुछ और क्यों नहीं उठा लिया?
प्रश्नकर्ता: इंग्लिश सिस्टम में पढ़े-लिखे थे।
आचार्य प्रशांत: इंग्लिश सिस्टम में भी सौ चीज़ें उठा सकते थे, वही चीज़ें क्यों उठाईं? किस आधार पर निर्णय हो रहा था? ये कह रहे हैं कि भारत के संविधान के बहुत सारे तत्त्व आयातित हैं, ठीक है। दुनिया के दूसरे संविधान को देखा गया और जिसमें जो चीज़ बढ़िया लगी, वो सब स्वीकार करी गई। जहाँ जो बढ़िया हो उसको स्वीकार करो, ये मूल्य प्राकृतिक हैं या धार्मिक?
श्रोता: धार्मिक।
आचार्य प्रशांत: बात नहीं समझ में आ रही? ये बात भी तो धर्म ही बताएगा न, कि सिर झुकाओ और जहाँ पर भी जो कुछ अच्छा दिखे उसको ग्रहण करो; अपना पूर्वाग्रह, अपना प्रेजुडिस बीच में मत लाने दो। ये धार्मिक मूल्य है भाई।
प्रश्नकर्ता: फ़ॉरेन कंट्रीज़ के पास पहले धर्म, जब कि उपनिषद् ये सब भारत की धरती पर ऋषि-मुनि हुए, उनको पहले धर्म की जानकारी कैसे हो गई?
आचार्य प्रशांत: किसने कह दिया कि उनको पहले हो गई? ये कहाँ से आ रही है बात?
प्रश्नकर्ता: तभी तो वहीं से उठाया।
आचार्य प्रशांत: अरे, तो 1947 में वहाँ भी था, यहाँ भी था। इसमें ये कहाँ हो रहा है कि उनको पहले हो गई? हाँ, उनका संविधान पहले का है क्योंकि वो आज़ाद पहले से हैं। जब तुम 1947 में ही राजनीतिक आज़ादी पा रहे हो तो तुम्हारा संविधान भी 1950 में ही तो आएगा। इसका ये अर्थ थोड़ी है कि उनके धर्मग्रंथ तुम्हारे वेदों से पुराने हैं।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी इस विषय में आपने कहा कि एक साज़िश है जिसके तहत हमें अपने धर्म से दूर कर दिया जाता है। मैंने भी आचार्य जी बहुत वर्ल्ड वॉर-II के बाद काफ़ी रिसर्च वर्क करी है, वेस्टर्न वर्ल्ड पर भी और हमारे यहाँ पर भी। कि वेस्टर्न कंट्रीज़ में भी क्रिश्चियनिटी से काफ़ी दूर कर दिया गया है वहाँ के लोगों को भी। और इसकी वजह से जो लोग होते हैं, वो फ़र्टाइल हो जाते हैं कि आप जो चेंजेज़ लाना चाहो, उनके ऊपर वो चेंज ला सको, ताकि वो अपने रूट्स से दूर हो चुके हैं।
आचार्य जी, इतना जानना चाह रहा था आपसे, कि आपके हिसाब से ये जो साज़िश है, ये ओरिजिनेट कौन कर रहा है? क्योंकि इतना बड़ा चेंज, इतना बड़ा परिवर्तन, एक बहुत ही ऑर्गनाइज़्ड वे में ही हो सकता है। और ये ट्रेंड इंडिया में भी है और किसी वेस्टर्न कंट्रीज़ में भी।
आचार्य प्रशांत: इतना बड़ा कोई एक आदमी नहीं होता या कोई एक संस्था नहीं होती जो इतना विश्वव्यापी परिवर्तन ला सके या साज़िश कर सके।
मैंने जब ‘साज़िश’ शब्द का इस्तेमाल करा था, तो मैं किसी व्यक्ति की या संस्था की बात नहीं कर रहा था, मैं किसी देश की भी बात नहीं कर रहा था। मैं उसकी बात कर रहा था जो सब साज़िशों की अम्मा है, कौन? माया। उसकी साज़िश है।
देखो, हुआ क्या था, हुआ ये था कि जो मध्ययुगीन यूरोप था न बहुत पिछड़ी हुई जगह था, ज़बरदस्त पिछड़ी हुई जगह। और वहाँ पर बड़ा घमासान मचा रखा था चर्च ने। चर्च जितनी तरह की ज्यादतियाँ करता था, वो ज्यादतियाँ भारत ने तो कभी देखी भी नहीं हैं। हम बात करते हैं न कि भारत में धर्म के आधार पर ये हो गया, शोषण हो गया; जो कुछ तेहरवीं-चौदहवीं शताब्दी के फ़्रांस में हो रहा था धर्म के नाम पर। आज आप कहते हो कि पेरिस तो बड़ी लिबरल जगह है, दुनिया की लिबरल राजधानी है। पेरिस की तेहरवीं-चौदहवीं शताब्दी की आप पेरिस की कहानियाँ सुनोगे तो आपका दिल दहल जाएगा।
श्रोता: चर्च वग़ैरह उनका ही शासन था।
आचार्य प्रशांत: हाँ शासन था, और वो शासन क्या करवा रहा था, वो बातें बड़ी हृदय-विदारक हैं। औरतों को पकड़ लिया जाता था कि चुड़ैल हैं जला दो, और जला दिया जाता था। पूरे-के-पूरे गाँव के गाँव खाली करा दिए जाते थे कि यहाँ ये हो रहा है, वहाँ वो हो रहा है।
प्लेग फैला था। प्लेग से यूरोप की आबादी का बड़ा हिस्सा साफ़ हो गया था और उसमें काफ़ी बड़ा हाथ चर्च द्वारा फैलाए गए अंधविश्वास का था। अब उस वक़्त इतना कोई जानता भी नहीं था कि प्लेग एक आदमी से दूसरे आदमी में जाता कैसे है। तो ये जितने पादरी वग़ैरह होते थे, ये तरह-तरह की कहानियाँ बता देते थे, अफ़वाहें बता देते थे। उस तरह के कुछ काम भारत में अभी भी हो रहे हैं, कि कुछ कहानी बता दो किसी चीज़ को लेकर।
तो फिर आया वहाँ पर दौर रेनेसाँ का; और रेनेसाँ के बाद इनलाइटनमेंट का। इनलाइटनमेंट वैल्यूज़ जो थीं, जो वहाँ पर जागरण-काल आया यूरोप में, बहुत सुंदर मूल्य थे। वो कह रहे थे कि हमें धार्मिक सत्ता नहीं चाहिए; हम समझना चाहते हैं; हमारी जिज्ञासा प्राथमिक है; हम सबसे ज़्यादा महत्त्व अपनी जिज्ञासा को देंगे। तो फिर वो जो भाव था जिज्ञासा का, समता का, न्याय का, प्रामाणिकता का, उससे यूरोप को बड़ी मदद मिली। और वो जो मूल्य थे, वो यूरोप से निकलकर पूरी दुनिया में फैल गए; जनतंत्र उन्हीं मूल्यों की पैदाइश है। ठीक है?
लेकिन हुआ क्या कि वो जो पूरा काल था यूरोप में जागरण का, वो धर्म द्वारा प्रेरित शोषण के ख़िलाफ़ था चूँकि इसीलिए बहुत लोगों को ऐसी गलतफ़हमी हो गई कि धर्म ही अपने-आप में घटिया चीज़ है। जबकि उस समय के जो दार्शनिक थे, विचारक थे, ख़ासतौर पर फ़्रांस के जो विचारक, उनका ये इरादा नहीं था कि धर्म को ही खारिज कर दें। वो वास्तव में धर्म द्वारा पोषित संकुचन, संक्रमण और मूर्खताओं के ख़िलाफ़ थे। वो आदमी के मन को विस्तार देना चाहते थे, जो कि बहुत सुंदर बात है।
लेकिन हुआ ये है, कि जिसको हम कहते हैं आदमी के मन का विस्तार, वो भी एक जगह जाकर अटक गया है और वो कह रहा है, कि मुझे आध्यात्मिक जिज्ञासा स्वीकार नहीं है। वो एक तरीके से पूरी तरह से पदार्थवादी हो गया है। समझना, दो तरह की सत्ता चलती थी सोहलवीं शताब्दी के सत्रहवीं शताब्दी के यूरोप में। सत्ता के दो केंद्र थे; एक था राजा जिसका आदेश तुम्हें मानना ही पड़ेगा, ऑथॉरिटी, और सत्ता का दूसरा केंद्र था, चर्च।
इनलाइटनमेंट ने कहा कि मुझे सत्ता के दोनों ही केंद्र स्वीकार नहीं हैं; बिल्कुल नहीं चाहिए, इन दोनों को हटाओ। ये दोनों केंद्र सत्ता के बाहर के थे न। राजा बताता तुम्हें कि तुम्हें कैसा आचरण करना है, कितना तुम्हें कर देना है, टैक्स देना है, कैसे नियम बनेंगे, ये सब होता था; और तुम राजा को चुनौती नहीं दे सकते थे। और पादरी तुमको बताता था कि तुम्हें अपने व्यक्तिगत जीवन में कैसा करना है, क्या सोचना है, क्या पाप है, क्या पुण्य, और तुम पादरी को भी चुनौती नहीं दे सकते थे। तो तुम्हें बाहर से निर्देशित किया जा रहा था, कि झुको, झुको, झुको।
जो यूरोपियन इनलाइटनमेंट था, इसने तुम्हें सिखाया कि देखो, बाहर किसी के भी सामने झुकना नहीं है। और ये बहुत सुंदर बात थी, पर ये आधी बात थी। यूरोप में जो इनलाइटनमेंट हुआ, हम उसकी बात क्यों कर रहे हैं? क्योंकि वही वो केंद्र-बिंदु है जहाँ से आज हम उस सवाल तक पहुँचे गए हैं जो कह रहा है कि गीता की क्या ज़रूरत है, संविधान है तो? तो इस सवाल का जो हुआ सत्रहवीं शताब्दी में फ़्रांस में, उससे बड़ा गहरा ताल्लुक़ है। इन दोनों बातों को एक साथ समझना पड़ेगा।
तो उस समय के विचारकों ने, दार्शनिकों ने, बाहर की सारी सत्ता को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, वी विल नॉट एक्सेप्ट एनी ऑथॉरिटी। नहीं चलेगा, नहीं चलेगा। ठीक है? अच्छी बात करी लेकिन मैं कह रहा हूँ, आधी बात करी। क्योंकि एक सत्ता थी जिसे वो खारिज करना भूल गए। वो दिखाई नहीं पड़ी। क्यों नहीं दिखाई पड़ी? क्योंकि वो अंदर होती है। वो अंदर वाली सत्ता का क्या नाम है? अहंकार।
तो हुआ क्या? कि बाहर वाली सत्ता तो हटा दी और अच्छा किया कि हटा दी; बड़े बेकार लोग थे ये। बड़े हिंसक, बड़े मगरूर लोग थे उस समय के राजा और ज़ार और ये सब। और उस समय जो चर्च की पूरी शोषक व्यवस्था थी, भला किया कि उसमें आग लगा दी। लेकिन, जिस ईमानदारी के साथ और जिस दृढ़ता के साथ बाहर की सत्ता का सामना किया गया, उसी दृढ़ता के साथ जो भीतर सत्ता बैठी है, सत्ता-धारिणी, क्या नाम है उसका? माया। उसका सामना नहीं किया गया।
तो आज के आदमी की हालत ये हो गई है कि बाहर से तो किसी की बात सुनने को राज़ी नहीं। आज की पीढ़ी देखी है? “डोंट टेल मी!” ठीक है? बाहर से किसी की नहीं सुननी। और भीतर से अपने कोई भी भाव उठ रहा हो, कोई वृत्ति उठ रही हो, उसके पीछे-पीछे ग़ुलाम की तरह चल देते हैं। क्योंकि भीतर जो ऑटोक्रेट बैठा है, भीतर जो ऑथॉरिटी बैठी है, उसके ख़िलाफ़ विद्रोह करना सिखाया ही नहीं गया। तो नारेबाज़ी में सबसे आगे। लेकिन सारी नारेबाज़ी किसके ख़िलाफ़? कभी सरकार के ख़िलाफ़, कभी उसके ख़िलाफ़, कभी उसके ख़िलाफ़, “नहीं चलेगा! इंक़लाब ज़िंदाबाद,” ये-वो। देख रहे हो न। और इन सब में सबसे आगे-आगे जवान लोग रहते हैं, “नहीं चलेगा! नहीं चलेगा!”
भाई, कभी ये भी तो बोल दो अंदर वाले को भी, कि “नहीं चलेगा! नहीं चलेगा!” अंदर वाला तो जो भी करवाना चाहता है, तुमसे करवा लेता है। और उसके सामने तुम बिल्कुल कुत्ते की तरह दो हाथ, दो पाँव पर, जीभ निकाले, दुम हिलाते, गले में पट्टा, चल देते हो। तब नहीं बोलते “इंक़लाब ज़िंदाबाद!” तब कहाँ चली गई तुम्हारी लिबरल वैल्यूज़? तब तुम ऑथॉरिटी के आगे तुरंत झुक जाते हो, सरेंडर कर देते हो।
हाँ, बाहर राजनीति में अगर किसी को पाओ कि वो सत्ता का केंद्र बना जा रहा है तो तुम कहते हो नहीं चलेगा! डिसेंट्रलाइज़ेशन चाहिए, विकेंद्रीकरण चाहिए। बाहर तुम पाओ कि कोई शंकराचार्य हुआ जा रहा है या कोई मौलवी मस्जिद में बैठकर फ़तवा जारी कर रहा है, तो उसके ख़िलाफ़ तुम तुरंत खड़े हो जाते हो, “नहीं, नहीं, नहीं चलेगा!” मैं कहता हूँ, बहुत बढ़िया बात है उनकी तुम नहीं सुनते, ठीक है। लेकिन भीतर भी तो एक बैठा है जो फ़तवे जारी करता रहता है, उसकी क्यों सुनते हो? उसको तो तुम बोलते हो, “यू नो दैट्स माय थॉट!”
ये इसलिए हो रहा है क्योंकि धार्मिक रूप से अनपढ़ हो। ये शिक्षा ही नहीं दी गई है कि “मेरी मर्ज़ी” या “माय थॉट” का मतलब क्या है। तो भीतर वाले के ख़िलाफ़ विद्रोह करना जानते ही नहीं।
अभी अंग्रेज़ी में एक अपना वीडियो प्रकाशित हुआ था, जिसमें मुझसे सवाल पूछा गया था, कि महिलाएँ अक्सर जो ये तन-उघेड़ू वस्त्र पहनकर घूमती हैं, इसके बारे में कुछ बोलें? तो मैंने बोला। तो उस पर भारत की आधुनिक पीढ़ी ने बिल्कुल रेला लगाकर के विद्रोह कर दिया। क्रांति!
“हमारी जो मर्ज़ी है, हम पहनेंगे! तुम होते कौन हो बोलने वाले? हमारी मर्ज़ी! हमारी मर्ज़ी!”
देवी जी, जिसको आप अपनी “मर्ज़ी” कह रही हैं, वो आपकी मर्ज़ी है ही नहीं। वो आपके भीतर कोई बैठा हुआ है जो आपसे ये सब करवा रहा है और आपको ये बात समझ में ही नहीं आ रही। कह रही हैं “नहीं! मेरी जो मर्ज़ी होगी, मैं जैसा चाहूँगी करूँगी, तुम होते कौन हो!” जिसको आप अपनी “चाहत” कह रही हैं, जिसे अपना “विचार” कह रही हैं, जिसे अपनी “भावना” कह रही हैं, वो सब आपकी है ही नहीं। वो उतनी ही बाहरी है जितना बाहर खड़ा कोई ऑटोक्रेट, या शोषक, या तानाशाह।
हाँ, वो बाहर खड़ा हो तो आप तुरंत बुलंद लगा देती हैं, “ज़िंदाबाद! इंक़लाब ज़िंदाबाद!” इंडिया गेट पर खड़े हो जाएँगे! और मोमबत्तियाँ लेकर निकल पड़ेंगे। बहुत सुंदर बात है, मैं उसके ख़िलाफ़ नहीं हूँ। लेकिन मैं चाहता हूँ कि कभी कोई रैली, कभी कोई कैंडल-लाइट विज़िल ऐसी भी हो, जिसमें तुम कहो कि: “आज मैं अपने ख़िलाफ़ हूँ!”
अपने ख़िलाफ़ होना क्यों नहीं सीख रहे? दुनिया की सारी सत्ताओं के ख़िलाफ़ हुए जा रहे हो, और सबसे बड़ी सत्ता तुमने किसको बना लिया? अपने अहंकार को। सबसे बड़ी सत्ता किसको बना लिया? अपने भीतर के अँधेरे को। उसके हमेशा पक्ष में खड़े हो जाते हो, उसकी बात नहीं करना चाहते। देखना ही नहीं चाहते कि तुम्हें जो विचार उठते हैं, वो क्या हैं। तुम कहते हो, “माय थॉट, माय थॉट!”
ज़रा-सी भी अगर तुम में ईमानदारी हो, अंतर्दृष्टि हो तो दिख जाएगा कि तुम्हारा विचार तुम्हारा है ही नहीं। वो विचार तुम में ठोक-ठोक कर, बजा-बजा कर घुसेड़ा गया है।
तुमने ये जो पिक्चरें देखी हैं बचपन से आज तक जो शिक्षा ग्रहण की है, तुम जिस माहौल में रहे हो, जो किताबें पढ़ी हैं, जो शब्द कान में पड़े हैं; उनके कारण तुम्हारे विचार वैसे हो गए जैसे हैं। पर समझना ही नहीं चाहते इस बात को। अपने प्रति ऐसा अंधापन आ गया है, कि कह रहे हो “नहीं! ये तो हमारी मर्ज़ी है, हम किसी और के लिए थोड़े ही अंग-प्रदर्शन करते हैं! हम तो अपने लिए करते हैं!” वाक़ई? वाक़ई अपने लिए करते हो कि नहीं? कह रहे हैं, “हमें किसी और को नहीं दिखाना, हम तो अपने लिए।” वाक़ई?
पर ईमानदारी का ताल्लुक तो अपने आप से होता है न, अपने आप से! वो सब गया। तो वो साज़िश किसी संस्था ने नहीं करी है, साज़िश करने वाला हमारे भीतर बैठा है। ये ख़तरनाक बात है, क्योंकि बाहर की कोई ताक़त होती जो हमें दबा रही होती, जो हमारा उत्पीड़न कर रही होती, तो हम उसकी पहचान करके उसको गिरा देते। हम कहते, ये है, मारो इसको। पर जब हमारा दुश्मन हमारे ही भीतर बैठा हो, और भीतर ही नहीं बैठा, उसने नाम भी हमारा ही ले लिया है, तो उसका सामना करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। चूँकि उसने हमारा ही नाम ले लिया, इसीलिए उसका सामना करना ऐसा हो जाता है जैसे अपना ही सामना करना, अपने ख़िलाफ़ जाना। अपने ही ख़िलाफ़ जाना कष्ट देता है, हम वो कष्ट उठाने को तैयार नहीं।
अब उसमें भी बात क्या है, कष्ट उठाना भी एक धार्मिक मूल्य है, जिसका नाम है ‘साधना।’ बात समझ रहे हो? अपने ख़िलाफ़ जाना, ये आपको कौन सिखाएगा? प्रकृति में कोई अपने ख़िलाफ़ नहीं जाता। प्रकृति में तो आप वो करते हो जो चीज़ आपको सुविधाजनक होती है, सहूलियत पड़ती है। अपने ही ख़िलाफ़ जाना, मन कुछ कह रहा है, लेकिन हम मन के ख़िलाफ़ जाएँगे? ये बात तो धर्म ही सिखाता है न। और जहाँ धर्म नहीं है, वहाँ फिर आप मन के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते; वहाँ आप मन का अवलोकन भी नहीं कर सकते; वहाँ आप मन को समझ भी नहीं सकते; वहाँ बस आप मन के ग़ुलाम हो जाते हो, आप मनचले हो जाते हो। जो मनचला हो गया उसका जीवन कैसा? बर्बाद।
प्रश्नकर्ता: आपने कहा कि आज के जितने भी लिबरल चिंतक इत्यादि हैं, वो कोई भी पराभौतिक हस्ती को पूर्णत: नकार देते हैं, और कहते हैं कि जो भी है, यही आँखों के सामने है। भगत सिंह ने भी कहा कि दुनिया में ‘ईश्वर’ नाम की कोई चीज़ नहीं है। पेरियार ने भी ऐसा ही कहा। मार्क्स ने भी इसी तरफ़ इशारा किया। तो क्या आप आज के लिबरल चिंतकों को और भगत सिंह, पेरियार, मार्क्स को, एक तल पर रखकर तुलना कर रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: अगर कुछ नहीं है पराभौतिक, तो जो है वो है सिर्फ़ भौतिक। ठीक? फिर तो मूल्य अगर किसी चीज़ का है, तो बस भौतिकता का है। भौतिकता माने पार्थिव, शारीरिकता, ठीक। अगर पराभौतिक कुछ नहीं है, तो एक ही चीज़ कीमती बची न। क्या? ये शरीर। और अगर सिर्फ़ शरीर ही कीमती है, तो भगत सिंह ने शरीर का त्याग करना क्यों स्वीकार किया? समझ में नहीं आ रहा क्या, कि जब भगत सिंह कहते थे कि वो नास्तिक हैं, तो वास्तव में परंपरागत धर्म, सड़े-गले धर्म, संस्थागत धर्म को नकार रहे थे। नहीं तो एक ऊँचे आदर्श के लिए शरीर की आहुति दे देने से बड़ा धार्मिक काम क्या होगा? अगर कोई नौजवान सच्चे अर्थों में धार्मिक हुआ है, तो वो तो भगत सिंह स्वयं हैं।
मुझे बताओ, तुम अपना प्राणोत्सर्ग कर रहे हो; तुमने तो पूरी भौतिकता ही खो दी न अपनी? अगर जान चली गई तो ज़रा-सी भी भौतिकता बची? तो कुछ तो होगा न जो भौतिकता से ऊँचा होगा, जिसके लिए तुम अपनी भौतिकता निछावर कर रहे हो। माने, तुम मान रहे हो न कि इस भौतिक शरीर से ऊँचा कुछ है। भगत सिंह ने उस ऊँचे लक्ष्य को नाम दिया था, ‘आज़ादी।’ फ़र्क़ नहीं पड़ता तुम क्या नाम दे रहे हो; इतना मानना काफ़ी है कि तुम्हारी शारीरिक सत्ता से ज़्यादा क़ीमत किसी और चीज़ की है। भगत सिंह का जीवन इस बात का प्रमाण है।
बाईस तेईस साल में वो कह रहे हैं, “नहीं चाहिए बाक़ी पूरी ज़िंदगी।” अभी 60–70 साल और जीते, बोले “नहीं जीना है। शरीर की हैसियत क्या है?” ये तो संतों वाली बात हो गई न बिल्कुल, “नहीं जीना, शरीर की हैसियत क्या है, आज़ादी बड़ी चीज़ है; आज़ादी चाहिए।”
दोहरा रहा हूँ अगर वो शारीरिक मात्र में विश्वास रखते तो जान देने को क्यों राज़ी हो जाते? शरीर गँवाने को क्यों राज़ी हो जाते? अगर शरीर ही अंतिम सत्य होता उनका, बोलो। आ रही बात समझ में?
लेकिन फिर भी चाहे मार्क्स हों, पेरियार हों, भगत सिंह हों, कई अन्य विचारक हों, इन सब लोगों ने धर्म को न सिर्फ़ नकारा, बल्कि धर्म को अपशब्द भी कहे। मैं उनसे सहानुभूति रखता हूँ; उन्होंने जिस धर्म को नकारा, वो था ही इस लायक कि उसे लात मार दी जाए। जो उन्होंने किया, मैं भी वही करना चाहूँगा। पर भूलिए नहीं कि वो किस धर्म को नकार रहे थे। मार्क्स उस धर्म को नकार रहे थे जिसके बारे में कहते थे कि “नशा है, अफ़ीम है।” जो धर्म नशा बन जाए, अफ़ीम बन जाए, उसको तो तुरंत त्याग ही देना चाहिए।
अभी थोड़ी देर पहले हम लोग क्या बात कर रहे थे, कि धर्म के नाम पर क्या-क्या चल रहा है। अगर वो सब जो धर्म के नाम पर चल रहा है, वो धर्म है, तो मैं भी कह रहा हूँ, “लात मारो धर्म को!” पर धर्म उसके अतिरिक्त भी कुछ है बहुत कुछ है, बहुत मूल्यवान है। उसका सम्मान करना सीखिए। समझ में आ रही है बात?
अँग्रेज़ी में एक मुहावरा है, डोन्ट थ्रो द बेबी आउट विथ द बाथवॉटर!
सिर्फ़ इसलिए कि धर्म में कुरीतियाँ आ गई हैं, सिर्फ़ इसलिए कि धर्म का पूरा क्षेत्र बेवकूफ़ और बेईमान लोगों ने गंदा कर दिया है, तुम क्या धर्म को ही उठाकर बाहर फेंक दोगे? और धर्म को उठाकर बाहर फेंक दिया तुमने, तो जियोगे कैसे? बिना प्रेम के, बिना करुणा के, बिना बोध के, बिना सरलता के जी कैसे लोगे? और प्रेम, बोध, करुणा, सरलता तुम्हें विज्ञान तो सिखाएगा नहीं। तो धर्म तो ज़रूरी है न। धर्म गंदा हो गया हो तो प्रार्थना है मेरी कि उसको साफ़ करें। ये थोड़ी है कि हीरा गंदा हो गया है, उस पर तहें जम गई हैं कचरे की, मिट्टी की, तो तुमने उठाकर हीरा ही बाहर फेंक दिया।
दुश्मनी कचरे से रखो न, हीरे से नहीं भाई। ये परम मूर्खता हो गई। एक तो मूर्ख लोग वो थे जिन्होंने हीरे को गंदा होने दिया, और एक मूर्ख ये हैं जिन्होंने गंदगी के साथ-साथ हीरा ही फेंक मारा बाहर। ये मत करो। पहले वाली गलती से ज़्यादा बड़ी गलती ये हो जाएगी।
जिन्होंने हीरे को मलिन किया, गंदा किया वो एक तल के गुनहगार हैं; और तुम उस गंदगी के चलते हीरा ही उठाकर फेंक दो, तुम उनसे ज़्यादा बड़े गुनहगार हो जाओगे। ये मत होने दो, सफ़ाई करो सफ़ाई! आदमी को, धर्म को, हमेशा सफ़ाई की ज़रूरत पड़ती रही है। रिफ़ॉर्म्स आवश्यक रहे हैं, क्रांतियाँ और सुधार हमें चाहिए होते हैं।
बुद्ध और महावीर क्या कर रहे थे? वैदिक धर्म का पुनरुद्धार ही तो कर रहे थे। जगा ही ही तो रहे थे। हाँ, कालांतर में वो जो शाखाएँ थीं वैदिक धर्म की, वो अलग पंथ, अलग परंपराएँ ही बन गई, वो अलग चीज़ है; वरना वो तो सुधार ही कर रहे थे। उन्होंने कहा, उपनिषदों की जो वाणी है, वो लालची-लोभी कुछ पंडितों ने बड़ी ख़राब कर दी। अब वो वेदों का हवाला देकर अपने न्यस्त स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं, ब्राह्मण लोग। तो उन्होंने कहा, “नहीं, देखो, सुधार करना पड़ेगा।” जो लोग गड़बड़ कर रहे थे, वो उनके ख़िलाफ़ थे न बुद्ध-महावीर, उपनिषदों के खिलाफ़ थोड़े ही थे बुद्ध।
बुद्ध की जो बात है, वो उपनिषदों की बात के विरुद्ध क्या है? शत-प्रतिशत मेल खाती है, शब्दों का अंतर है बस। इसी तरीके से और आगे आ जाओ, आचार्य शंकर क्या कर रहे थे? बुद्ध अपने पीछे जो पंथ छोड़कर के गए, हज़ार साल बीतते-बीतते वो भी मलिन और विकृत हो गया। तो फिर, जैसे बुद्ध को सफ़ाई करनी पड़ी थी वैदिक धर्म की, वैसे ही फिर आचार्य शंकर को आकर सफ़ाई करनी पड़ी बौद्ध धर्म की।
जो भी बात एक समय पर नई, ताज़ी, साफ़ और जीवनदायी होती है, प्राणों से ओत-प्रोत होती है, वो कालांतर में गंदी हो जाती है। क्योंकि सत्य कोई बात तो होता नहीं न। सत्य को तुम बात बनाओगे, समय उसको धूमिल कर देगा। थोड़ा और आगे बढ़ो। उसके बाद बाहरवीं शताब्दी से लेकर के अठारवीं शताब्दी तक जो पूरा भक्ति-कार्यक्रम चला, वो और क्या था? अधिकांश संत जो भक्ति-मार्ग से जुड़े हुए हैं, जो अग्रणी रहे उसमें, वो सब तथाकथित पिछड़े वर्ग और निचली जातियों से थे। वो भी एक सुधार-कार्यक्रम था।
और सुधार-कार्यक्रम का सबसे बड़ा उदाहरण, जो सबसे निकट का भी है, वो है सिख पंथ। कि जब पाया गया कि गंदगी, गंदगी चारों तरफ़ फैली हुई है, तो नानक साहब से शुरू होकर के एक पूरी श्रंखला आई गुरुओं की, जिन्होंने कहा, “जो कुछ साफ़ है, सुंदर है, उसको ले आओ। उसको संकलित करेंगे। धर्म का एक एनसाइक्लोपीडिया बनाएँगे। उन सब चीज़ों को रखेंगे जो बहुत बढ़िया वाली हैं, वो जिस भी दिशा से मिल रही, रखो, रखो, उनको रख लो; और बाक़ी सब कुछ नहीं रखेंगे।”
वो जो ज़बरदस्त धार्मिक कोष बनाया गया, उसका नाम है, आदि ग्रंथ या गुरु ग्रंथ साहिब।
तो ये सब चीज़ें समय-समय पर चाहिए होती हैं। बात समझ रहे हैं? सुधार, सफ़ाई। ये थोड़ी चाहिए होता है कि तुम धर्मियों को उठाकर के कचरे में डाल दो। आज इस तरह की हवा बह रही है कि “नहीं, नहीं, नहीं, सफ़ाई नहीं करेंगे; धर्म को ही कचरे में डाल देंगे।”
सफ़ाई चाहिए भाई, सफ़ाई करो। और सफ़ाई का हम सबके लिए जो सबसे सुलभ तरीका है, वो ये है कि कम-से-कम अपनी निजी ज़िंदगी में धर्म के जो विकृत रूप और अर्थ हैं, उनको प्रवेश न करने दें। अगर प्रवेश कर गए हों, तो उनको उठाकर के बाहर फेंक दें। आ रही बात समझ में?
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, जैसा आपने बताया कि भगत सिंह के बारे में अभी, कि वो नास्तिक थे लेकिन जैसे ही हम इतिहास को देखते हैं, जितने भी नास्तिक हुए हैं, उनके शायद कार्य धार्मिकता की दिशा में बहुत सकारात्मक थे। तो नास्तिकता की परिभाषा क्या हो सकती है?
आचार्य प्रशांत: नास्तिकता कौन-सी वाली? असली नास्तिक या वो नास्तिकता जो भगत सिंह की थी? ये दो अलग-अलग नास्तिकता हैं।
प्रश्नकर्ता: जो भगत सिंह जैसी नास्तिकता।
आचार्य प्रशांत: भगत सिंह की नास्तिकता है, कि मैं नहीं मानूँगा उन सब बातों को जो धर्म के नाम पर प्रचारित हैं। ये नास्तिकता है। भगत सिंह कह रहे हैं, “नास्ति।” किस चीज़ को कह रहे हैं “नहीं है?” “नास्ति” माने “नहीं है।” वो किस चीज़ को कह रहे हैं, “नहीं है?” वो कह रहे हैं, “ये जितना जो आडंबर खड़ा किया गया है धर्म और भगवान के नाम पर, वो सच्चा नहीं है, नास्ति। मैं उसके प्रति अस्वीकार रखता हूँ।”
ये उनकी नास्तिकता है। ये सच्ची नास्तिकता है।
आज से सात-आठ साल पहले मैंने बोला था, वो उस पर कोटेशन भी बना दी, पोस्टर भी चल रहे हैं, कि धर्म वास्तव में सच्ची नास्तिकता का विज्ञान है। तुम धार्मिक हो पाओ, इसके लिए बहुत आवश्यक है कि पहले तुम नास्तिक होना सीखो। क्योंकि अगर तुम नास्तिक नहीं हो, तो तुम सस्ते आस्तिक हो। सस्ता आस्तिक कौन होता है? कि तुमको बता दिया गया कि भगवान जी हैं। बोलो, जय, “जय!” हो गया। ये तुम्हारी सस्ती आस्तिकता है। और ये जो सस्ती आस्तिकता है, इसी ने धर्म का बंटाधार कर रखा है, अध्यात्म का बेड़ा गर्क कर रखा है। पहले नकली धर्म को नकारना सीखो। पहले नकली धर्म के प्रति नास्तिक होना सीखो। बहुत अच्छी बात है। जब नकली धर्म के प्रति नास्तिक हो जाओगे, तो फिर सच्चे अर्थ में धार्मिक हो जाओगे।